ताकि राजनीति अपराधीकरण से मुक्त हो – जाहिद खान

4:14 pm or July 24, 2017
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ताकि राजनीति अपराधीकरण से मुक्त हो

—- जाहिद खान —–

आपराधिक मामलों में सजायाफ्ता होने पर आजीवन चुनाव लड़ने की पाबंदी लगाने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में चुनाव आयोग को जमकर फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व नवीन सिन्हा की पीठ ने चुनाव आयोग से जवाब तलब करते हुए पूछा ‘‘आप इस पर कहना क्या चाहते हैं ? आप खमोश क्यों हैं ? ये कोई विकल्प नहीं होता। देश के एक नागरिक ने याचिका दाखिल की है और कहा है कि ऐसे लोगों पर आजीवन पाबंदी लगानी चाहिए आप इसका समर्थन करते हैं या विरोध, जो भी है उसका जवाब हां या न में दें।’’ सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी कहा कि ‘‘उसके ऊपर किसी का दवाब तो नहीं है। क्या विधायिका आपको इस मुद्दे पर कुछ कहने से रोक रही है ? यदि ऐसा है, तो आप अदालत को बताएं।’’ अदालत ने इस मामले में अपनी ओर से साफ कर दिया कि वह संविधान विधायी ढांचे के दायरे में राजनीति को अपराधमुक्त करने की हिमायती है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत चुनाव आयोग से यह भी पूछा कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था बन सकती है, जिसमें जनता को ऐसे दागी नेताओं के खिलाफ जागरूक किया जा सके। अदालत की ये सब चिंताएं और गुस्सा वाजिब भी है। क्योंकि चुनाव आयोग ने इससे पहले अदालत में पेश अपने एक दीगर हलफनामे में याचिका का समर्थन किया था। इसके साथ ही आयोग का यह भी मानना था कि आपराधिक मामले में आरोपी नेताओं का मुकदमा एक साल के भीतर पूरा हो जाना चाहिए। लेकिन आगे सुनवाई के दौरान बाद में उसने अपना रुख बदल लिया। अब उसका कहना है कि इस मुद्दे पर विधायिका ही कोई फैसला ले सकती है। यानी कहीं न कहीं चुनाव आयोग पर सरकार और राजनीतिक पार्टियों का दवाब है। वरना वह अपने पहले के रुख से क्यों पलटता ?

सर्वोच्च न्यायालय बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के लिए कई मांगें की थीं। मसलन सजायाफ्ता व्यक्ति के चुनाव लड़ने, राजनीतिक पार्टी बनाने और पार्टी पदाधिकारी बनने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाये। चुनाव लड़ने के लिये न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और अधिकतम आयु सीमा निर्धारित किया जाये। चुनाव आयोग, विधि आयोग और जस्टिस वेंकटचलैया आयोग के सुझावों को तत्काल लागू किया जाये। नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ चल रहे मुकदमों की सुनवाई एक साल में पूरा करने के लिये स्पेशल फास्ट कोर्ट बनाया जाये। बहरहाल याचिकाकर्ता का पक्ष जानने के बाद अदालत ने इस मामले पर केंद्र और चुनाव आयोग का रुख पूछा और बीते 3 मार्च को उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए आखिरी मौका दिया गया था। तब से अब जाकर चुनाव आयोग ने अदालत में अपना हलफनामा दाखिल किया है। इससे पहले केंद्र सरकार ने अदालत में अपना हलफनामा दाखिल कर कहा था कि ‘‘वो आपराधिक मामले में दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन पाबंदी लगाने के हक में नहीं है। इस मामले में न्यायपालिका को दखल देने की जरूरत नहीं है।’’ सरकार की इस बारे में दलील थी कि ‘‘दोषियों की अयोग्यता को लेकर पहले ही जन प्रतिनिधित्व कानून में पर्याप्त प्रावधान हैं। ऐसे में और प्रावधान जोडने की दरकार नहीं है। आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति से दूर रखने के लिए पिछले कुछ समय से कानून प्रभावी है, जिससे उद्देश्य पूरा हो रहा है। संवैधानिक कोर्ट को तभी दखल देना चाहिए कि जब किसी जनहित के मामले में विधायिका ने काम न किया हो।’’

यह बात सच है कि सजायाफ्ता लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में यह प्रावधान है कि अगर कोई नेता अदालत में दोषी ठहराया जाता है और उसे दो या उससे अधिक साल की सजा होती है, तो वह सजा पूरी करने के छह साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ पाएगा। लेकिन यह एक अकेला प्रावधान राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने के लिए काफी नहीं है। चुनाव आयोग और सरकार को इसके लिए और भी ऐसे कई सख्त कदम उठाने होंगे। उच्चतम न्यायालय को सौंपी अपनी एक रिपोर्ट में विधि आयोग ने राजनीति का अपराधीकरण रोकने की दिशा में कई अहम सिफारिशें की थीं। मसलन पांच साल या इससे अधिक सजा का प्रावधान रखने वाले आरोप अदालत में तय होने पर किसी उम्मीदवार को चुनावी राजनीति के लिए अयोग्य ठहराया जाए। क्योंकि दोषसिद्धि पर आधारित अयोग्यता की मौजूदा व्यवस्था चुनावी राजनीति से अपराधियों को दूर रखने में अक्षम है। आयोग ने अपनी इसी रिपोर्ट में झूठे हलफनामे दाखिल करने को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत भ्रष्ट आचरण के रूप में लेने को कहा था, जिसे लेकर अयोग्य ठहराया जाए। आयोग ने इस तरह के कार्यों के लिए जुर्माना सहित मौजूदा छह महीनों की सजा को कम से कम दो साल करने की सिफारिश की है। आयोग का कहना है कि कानून को एक प्रभावी प्रतिरोध खोजने और न्याय की प्रक्रिया को नष्ट होने से बचाने की जरूरत है। इसके अलावा आयोग की यह भी सिफारिश है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ अदालती कार्यवाही एक साल के भीतर पूरी हो। यदि सुनवाई एक साल के भीतर पूरी नहीं होती है, तो सांसद या विधायक को सदन में बतौर सदस्य उसके मतदान के अधिकार से एक साल की अवधि समाप्त होने पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इस एक साल की अवधि समाप्त होने पर उसके भत्ते तथा कार्यालय से जुड़ी अन्य सुविधाएं निलंबित की जाएं।

राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की तमाम कवायदों के बावजूद हमारे देश में दागी सांसदों की संख्या हर लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ती चली जा रही है। चैहदवीं लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 128 थी, तो पन्द्रहवी लोकसभा में यह संख्या 150 से ऊपर पहुंच गई। एक गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाॅच की एक रिपोर्ट के मुताबिक सोलहवीं लोकसभा के 187 मेम्बरों यानी 34Û4 फीसदी के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से 133 के खिलाफ गंभीर इल्जाम हैं। जिनको इन इल्जामों में पांच साल या उससे अधिक की सजा हो सकती है। इनमें बहुत से दोषी करार सांसद हैं, जो जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुच्छेद 8 (4) का सहारा लेकर ऊपरी अदालत में अपील दाखिल कर अयोग्यता से बचे हुए हैं। चंूकि जनप्रतिनिधित्व कानून लंबित मामलों के आधार पर किसी की उम्मीदवारी या विधायिका की सदस्यता से वंचित नहीं करता और अदालतों में संबंधित मुकदमों में इंसाफ आने में सालों-साल लग जाते हैं। निचली अदालत से दोष-सिद्धि के बाद भी सांसद और विधायक पहले अपनी सदस्यता इस आधार पर बनाए रखते थे कि उन्होंने ऊपरी अदालत में अपील कर रखी है। लिहाजा आरोपी होते हुए भी हमारे ये ‘जनप्रतिनिधि’ अपना कार्यकाल आराम से पूरा कर लेते थे। लेकिन उच्चतम न्यायालय से ही आए एक फैसले ने दागी नेताओं को मिले इस ‘सुरक्षा कवच’ को उनसे छीन लिया है। अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को असंवैधानिक ठहरा दिया है, जो अपील पर फैसला आने तक जनप्रतिनिधियों को अपनी सदस्यता बरकरार रखने की मोहलत देता था। जाहिर है सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले और एक दीगर फैसले में, जिसमें उसने भ्रष्टाचार व अन्य गंभीर अपराधों में आरोपी सांसदों व विधायकों के मुकदमों की सुनवाई एक साल में पूरी करने का सख्त आदेश दिया था, विधायिका में अपराधी तत्वों के प्रवेश पर अंकुश लगाने का महत्वपूर्ण काम किया है। बावजूद इसके सरकारें, इन आदेशों पर सही तरह से अमलदारी नहीं कर रही हैं।

राजनीति के अपराधिकरण ने हमारे देश को काफी नुकसान पहुंचाया है। चुनाव सुधार को लेकर बनी तमाम कमेटियों ने राजनीति को अपराधिकरण से मुक्त करने के लिए कई सिफारिशें कीं, लेकिन सरकारों ने इन पर कोई ध्यान नहीं दिया। वोरा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में राजनीतिज्ञों तथा अपराधियों के बीच साठगांठ पर विस्तृत रोशनी डाली थी। यही नहीं चुनाव सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति की एक और दीगर रिपोर्ट तीन दशकों से सरकार के पास धूल खा रही है। चुनाव सुधार के लिए काम कर रहे लोगों और विधि विशेषज्ञोें ने कई बार अपनी और से सरकार को महत्वपूर्ण सुझाव दिए, लेकिन इन सब पर किसी भी सरकार ने निहित स्वार्थों के चलते ध्यान नहीं दिया। साल 2014 की चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी ने देशवासियांे में वायदा किया था कि वे यदि केन्द्र की सत्ता में आए, तो देश की राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करायेंगे। उनकी सरकार, दागियों पर शीघ्र कार्रवाई की एक व्यवस्था बनाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता संभाले तीन साल से ज्यादा हो गए, लेकिन अफसोस ! इस दिशा में उन्होंने भी कोई कदम नहीं उठाया है। चुनाव सुधार से संबंधित एक महत्वपूर्ण विधेयक संसद में बीते सोलह सालों से लंबित है, लेकिन ये विधेयक पारित ही नहीं हो पा रहा है। मोदी सरकार राजनीति के अपराधिकरण को रोकने के लिए यदि वाकई संजीदा है, तो इस विधेयक को जल्द से जल्द संसद से पारित करवाए। यही नहीं जनप्रतिनिधित्व कानून की उस विवादित धारा 8 (4) में संशोधन के लिए आगे आए, जिसकी वजह से दागी नेता अयोग्य ठहराए जाने से बच जाते हैं।

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