कर्मयोेगी डाॅ0 अब्दुल कलाम – डाॅ0 गीता गुप्त

5:02 pm or July 24, 2017
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कर्मयोेगी डाॅ0 अब्दुल कलाम

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

पूर्व राष्ट्रपति डाॅ0 अब्दुल पाकिर जैनुल आवेदीन अब्दुल कलाम की समूची जीवन-यात्रा भारतवासियों के लिए प्रेरणास्पद् है। भारत के चार धामों में एक रामेश्वरम् के गाँव में एक निर्धन मछुआरा परिवार में 15 अक्तूबर 1931 को जन्मे कलाम अपने ज्ञान, प्रतिभा व कड़ी मेहनत के बल पर सफलता के शिखर पर पहुँचे और ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसकी पुनरावृत्ति शायद ही अब देखने को मिले। कलाम के पास विद्यालयीन शिक्षा के लिए भी पैसे नहीं थे। लेकिन जब वे पाठशाला में पढ़ने गये तो उनका एक सहपाठी उनकी लगन से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने पिताजी से कलाम की सहायता के लिए अनुरोध किया। रामेश्वरम् के प्रतिष्ठित मन्दिर में प्रमुख पुजारी के रूप में सेवारत् पिता ने इस अनुरोध को स्वीकार कर कलाम की विद्यालयीन शिक्षा का व्यय-भार वहन किया।

अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम ने हाॅकर के रूप में अख़बार बेचने का काम भी किया। कहते हैं कि जब वे मद्रास में अख़बार को लपेटकर दूसरी- तीसरी मंज़िल में फेंका करते थे, उसी से उनको मिसाइल बनाने की प्रेरणा मिली थी। अपने अभावग्रस्त बचपन में भी वे पंछियों को आकाश में उड़ते देखते तो स्वयं भी आकाश में विचरण करने की कल्पना करते थे। वर्ष 1958 में उन्होंने मद्रास आई आई टी से अन्तरिक्ष विज्ञान में स्नातक किया। अध्ययन के दौरान उन्होंने एक विमान का डिज़ायन करने का चुनौतीपूर्ण कार्य किया और अपने गुरुओं से प्रशंसा पायी थी। सन् 1962 में भारतीय अन्तरिक्ष संगठन ( इसरो) से जुड़ना उनके जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। यहाँ उन्होंने विभिन्न पदों पर कार्य किया। त्रिवेन्द्रम में स्पेस साइन्स एण्ड टेक्नोलाॅजी सेण्टर में ‘फाइबर रिइनफोस्र्ड प्लास्टिक‘ डिवीज़न की स्थापना की। आम आदमी से लेकर सेना की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं की शुरुआत की। इसरो में स्वदेशी क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से ‘उपग्रह प्रक्षेपण यान कार्यक्रम‘ ( एस एल वी 3 ) की शुरुआत हुई। कलाम को इस योजना का प्रोजेक्ट डायरेक्टर नियुक्त किया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य था उपग्रहों को अन्तरिक्ष में स्थापित करने के लिए एक भरोसेमन्द प्रणाली का विकास और संचालन। कलाम ने अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर इस योजना को भलीभाँति क्रियान्वित किया। जुलाई 1980 में ‘रोहिणी‘ उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित करके भारत को ‘अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष क्लब‘ के सदस्य के रूप में स्थापित करने का श्रेय कलाम साहब को है।

भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने इंटीग्रटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेण्ट प्रोग्राम‘ आरम्भ किया। इसके अन्तर्गत ‘त्रिशूल‘ ( नीची उड़ान भरनेवाले हेलीकाॅप्टरों, विमानों तथा विमानभेदी मिसाइलों को निशाना बनाने में सक्षम ),‘पृथ्वी‘ (ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली, 150 किलोमीटर तक अचूक निशाना लगाने वाली हल्की मिसाइल ), ‘आकाश‘ ( 15 सेकेण्ड में 25 किलोमीटर तक ज़मीन से हवा मंे मार करने वाली यह सुपरसाॅनिक मिसाइल एक साथ चार लक्ष्यों पर वार करने में सक्षम), ‘नाग‘(हवा से ज़मीन पर अचूक मार करने वाली टैंक भेदी मिसाइल), ‘अग्नि‘(बेहद उच्च तापमान पर भी ‘कूल‘ रहने वाली 5000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल) एवं ‘ब्रह्मोस‘ ( रूस के साथ संयुक्त रूप से विकसित मिसाइल, ध्वनि से भी तेज़ चलने तथा धरती, आसमान और समुद्र में मार करने में सक्षम ) मिसाइलें विकसित की गईं।

डाॅ0 कलाम भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। इस दौरान उन्हें कैबिनेट मन्त्री का दर्ज़ा प्रदान किया गया था। उन्होंने प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में वैज्ञानिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद अन्ना विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में अपनी सेवाएँ आरम्भ कीं और एक लाख विद्यार्थियों से मिलकर उन्हें देश-सेवा हेतु प्रेरित करने का संकल्प किया।

वर्ष 2002 में डाॅ0 कलाम ने भारत के राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। वे पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जिन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई परम्पराएँ बदल दीं। वे एकदम सहज, सरल व सादगीसम्पन्न इनसान थे। उन्हें अहंकार छू तक नहीं गया था। राष्ट्रपति भवन की परम्परानुसार एक सहायक राष्ट्रपति को अपने हाथ से जूते पहनाता था। पर कलाम ने इसे इन्सानियत का अपमान मानते हुए इस परम्परा पर विराम लगा दिया। उन्होंने राजघाट पर भी अपने जूते स्वयं उतारे और पहने, सेवक की मदद नहीं ली। 15 अगस्त पर राष्ट्रपति भवन में होने वाले भोज कार्यक्रम में ड्रेस कोड की अनिवार्यता को भी समाप्त किया। नवनियुक्त राष्ट्रपति को भवन का सेवक पूरा भवन दिखाता है। मगर राष्ट्रपति बनीं प्रतिभा पाटिल को उन्होंने स्वयं राष्ट्रपति भवन का दौरा कराया। उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था। इसके लिए वे सुरक्षा-घेरा तक तोड़ देते थे। इसके अलावा अमूमन प्रोटोकाॅल की परवाह किए बिना राष्ट्रपति- भवन के सुरक्षाकर्मियों से भी बात करने लगते थे।

डाॅ0 कलाम अपने विद्यालयीन शिक्षकों से बहुत प्रभावित थे। एक शिक्षक के मार्गदर्शन ने उन्हें वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित किया था। शिक्षकों के प्रति उनके हृदय में अपार सम्मान था। यही कारण है कि जब वे राष्ट्रपति के पद से मुक्त हुए तो शिक्षक के रूप में शेष जीवन बिताने का निश्चय किया। राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए वे कदापि उत्सुक न थे और न ही कभी राजनीति के दलदल में फँसने के इच्छुक रहे। वे बच्चों, युवाओं और आम जनता के बीच समान रूप से लोकप्रिय थे। उन्होंने भारत को विकसित राष्ट्र बनाने हेतु विज़न 2020 का नारा दिया था जिसमें पाँच बातों पर बल दिया गया था-1.देश की कृषि और खाद्य संस्करण को दोगुना करने की आवश्यकता। 2.देश के सभी गाँवों में विद्युतीकरण और सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा। 3. अशिक्षा की समाप्ति और सामाजिक सुरक्षा के साथ ही प्रत्येक मनुष्य तक स्वास्थ्य-सुविधाओं की पहुँच। 4.सूचना एवं प्रसारण तकनीक को बढ़ावा तथा शि़क्षा के क्षेत्र में ई-गवर्नेस को प्रोत्साहन और टेलीकम्युनिकेशन और टेलीमेडिसिन जैसी तकनीक का प्रसार। 5. भारत में परमाणु तकनीक, ऱक्षा तकनीक और अन्तरिक्ष तकनीक की मज़बूती।

आज कलाम साहब नहीं हैं लेकिन उनके विज़न 2020 पर गम्भीरतापूूर्वक विचार एवं कार्य किया जाना चाहिए। वे कहते थे-‘कल्पना ज्ञान से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है… इसलिए कल्पनाशील बनो और सपने ज़रूर देखो। हम उन सपनों सेे बड़े नहीं बनते जो रात में देखे जाते हैं। सपने वे होते हैं, जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और उनके लिए रातों की नींद क़ुर्बान की जाती है।‘ सचमुच, कलाम साहब की बातें, उनकी सोच, उनकी ज़िन्दगी के तमाम पहलू भारत की युवा पीढ़ी का सच्चा मार्गदर्शन करने वाले हैं। उनका बहुआयामी विराट् व्यक्तित्व अनुकरणीय है। अपनी जीवन-शैली एवं कर्तृत्व से उन्होंने अपने मानव होने का नहीं बल्कि महामानव होने का परिचय दिया। आईआईटी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक दीक्षान्त समारोह में राष्ट्रपति के लिए निर्धारित कुर्सी अन्य कुर्सियों से बड़ी होने के कारण उन्होंने उसपर बैठने से इनकार कर दिया था।

उनकी सरलता, सहजता और सादगीप्रियता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे केरल-यात्रा पर पहली बाद गये तो उन्होंने वहाँ एक मोची और छोटे-से होटल के मालिक को बतौर मेहमान आमंत्रित किया था। वे इतने संवेदनशील थे कि एक इमारत की दीवार पर टूटा काँच लगाने के सुझाव को यह कहते हुए नकार दिया था कि ऐसा करना पक्षियों के लिए हानिकारक होगा। यही नहीं, एक बार एक वैज्ञानिक व्यस्ततावश अपने बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने नहीं जा सका। जब वह घर पहुँचा तो पता चला कि कलाम साहब उन बच्चों को प्रदर्शनी दिखा लाए हैं।

डाॅ0 कलाम सच्चे अर्थों में जनता के राष्ट्रपति थे। वे पूरे देश की बेहतरी चाहते थे। उनमें देशभक्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी। उन्हें गीता का कर्मयोगी कहा जा सकता है, जो 84 वर्ष की उम्र में भी निष्काम कर्म व सेवा में लीन रहे। उन्हें कभी अस्वस्थ होते नहीं देखा-सुना गया। वे वैज्ञानिक, लेखक, राष्ट्रपति, वीणावादक, कुरान के साथ-साथ भागवत्गीता के भी अच्छे ज्ञाता और एक अच्छे अध्यापक थे। वे पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने सुखोई विमान उड़ाया और सियाचिन भी गये। उनकी सभी किताबें-‘विंग्स आॅफ़ फायर‘, ‘इण्डिया 2020‘, ‘द फैमिली एण्ड द नेशन‘ और ‘ टर्निंग प्वाइण्ट‘ आदि बहुत चर्चित हुईं। उनकी पुस्तकों में उनके महान् विचार समाहित हैं।

उल्लेखनीय है कि उन्होंने कभी विदेश में शिक्षा प्राप्त नहीं की, फिर भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित करने में वे अग्रणी रहे। विश्व के कई विश्वविद्यालयों व संस्थाओं ने उन्हें डाॅक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया। सफलता के कई सोपान तय करने वाले कलाम अहंकार और मिथ्या प्रदर्शन से सर्वथा दूर रहे। इसरो प्रमुख होते हुए भी वे केवल एक कमरे में ही निर्वाह करते रहे। सन् 1981 में ‘पद्मभूषण‘ ,सन् 1990 में पद्मविभूषण और सन् 1997 में भारतरत्न से सम्मानित होने वाले डाॅ0 कलाम अपनी अन्तिम साँस तक देश का हित-चिन्तन करते रहे। 27 जुलाई 2015 को अपनी मृत्यु के समय वे शिलाँग के आईआईएम में अपने सर्वाधिक प्रिय विषय ‘मेकिंग द वल्र्ड मोर लिवएबिल‘ (संसार को अधिक रहने योग्य बनाने ) पर विद्यार्थियों को व्याख्यान दे रहे थे। उनके मुख पर वही चिर-परिचित मुस्कान थी, जो बच्चों और युवाओं को बहुत आकृष्ट व प्रेरित करने वाली थी। उसी समय ईश्वर ने उन्हें अपने पास बुला लिया।

डाॅ0 कलाम सच्चे कर्मयोगी थे। उन्होंने अपना समूचा जीवन देश की सेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने 7जुलाई 2015 को उत्तरप्रदेश के कन्नौज ज़िले के फकीरपुर-चंदुआहार में 250 मेगावाॅट के सौर ऊर्जा संयंत्र को प्रदेश को समर्पित करने के बाद लोगों को स्वच्छ ऊर्जा का महत्त्व बतलाया था और देशवासियों को यह शपथ दिलवायी थी -1.बच्चे हमारी क़ीमती धरोहर हैं। 2.मैं लड़का-लड़की को बराबरी से रखूँगा, उन्हें शिक्षा और विकास का मौक़ा दूँगा। 3.स्वास्थ्य ,समृद्धि के लिए छोटा परिवार रखूँगा। 4.कठोर परिश्रम से आए पैसे को जुए, शराब और तम्बाकू में बर्बाद नहीं करूँगा। 5.हम अपने बच्चों को शिक्षा का महत्त्व बताएँगे क्योंकि शिक्षा से ज्ञान और ज्ञान से विकास होता है। 6.हम ऊर्जा की बचत करेंगे और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करेंगे। 7 हम प्रदूषण को रोकेंगे और पर्यावरण संरक्षित करेंगे। 8. हम कम-से-कम पाँच वृक्ष लगाएँगे। 9.हम अपने बच्चों के आदर्श बनेंगे। 10. हमारा राष्ट्रीय ध्वज हमारे दिलों में होगा और हम राष्ट्र के लिए समर्पित रहेंगे।

आज देशवासियों को उक्त शपथ का पालन करने की आवश्यकता है क्योंकि यह देशहित में है। स्मरणीय है कि कर्मयोगी कलाम ने अपने जीवन में माता-पिता के निधन के दो दिनों को छोड़कर कभी अवकाश नहीं लिया। उन्होंने इच्छा भी व्यक्त की थी कि ‘ मेरी मृत्यु पर छुट्टी न करें। अगर मुझे प्यार करते हैं तो उस दिन ज़्यादा काम करें।‘ वे युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणा-पुंज थे। वे बड़े लक्ष्य और बड़े स्वप्नों में विश्वास करते थे। उनका यह कथन सदैव स्मरणीय है कि ‘फेल‘ का अर्थ है नेक्स्ट एटम्प्ट इन लर्निंग। ‘एण्ड‘ का मतलब है एफर्ट नेवर डाई और ‘नो‘ का मतलब है नेक्स्ट अपार्चुनिटी। युवाओं से उनका कहना था कि‘ यदि आप सूर्य की तरह चमकना चाहते हैं तो पहले उसकी तरह जलिए। अगर आप रेत पर अपने क़दमों के निशान छोड़ना चाहते हैं तो एक ही उपाय है-क़दम पीछे मत खींचिए।‘ एक और महत्त्वपूर्ण सीख यह कि ‘अपनी पहली जीत के बाद कभी आराम मत कीजिए क्योंकि दूसरे मौक़े पर अगर आप असफल हुए तो पहले से कहीं अधिक लोग यह कहने के लिए तैयार हैं कि पहली जीत महज़ भाग्य की बात थी।‘

यह तो तय बात है कि डाॅ0 कलाम ऐसी विभूति नहीं हैं जिन्हें केवल उनकी जन्म और पुण्य तिथि पर स्मरण किया जाए। वे देश के सच्चे सपूत थे, जिनका पूरा जीवन प्रेरणास्पद् है। यदि हम उनके पदचिह्नों पर चलने का प्रयास कर सकें, उनकी दिलवायी हुई शपथ पर कायम रह सकें तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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