पशु-पक्षियों का धार्मिक महत्व और हमारा उनके प्रति व्यवहार – योगेन्द्र सिंह परिहार

2:54 pm or July 31, 2017
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पशु-पक्षियों का धार्मिक महत्व और हमारा उनके प्रति व्यवहार

—– योगेन्द्र सिंह परिहार ——

अभी कुछ दिन पहले  हमनें श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नाग देवता का विधि विधान से पूजन किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उस दिन सर्पों के नौ अवतारों यानि नव नाग का पूजन होता है और वे नौ अवतार हैं, शेष नाग, कर्कोटक नाग, वासुकि नाग, पद्म नाग, धृतराष्ट्र नाग, शंखपाल नाग, कम्बल नाग, तक्षक नाग व कालिया नाग। समूचे विश्व में एक ही मंदिर है जो मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण में स्थित है जिसके पट साल में एक बार ही खुलते है जहां हमें भगवान् नागचंद्रेश्वर के दर्शन होते हैं। कहते हैं नागराज तक्षक नागपंचमी के दिन यहाँ स्वयं विराजमान रहते हैं। इस तरह नाग पंचमी के दिन सर्पों की पूजा बहुत ही श्रद्धा और विश्वास के साथ सम्पन्न होती है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवता और दानवों को समुद्र में से कई वस्तुएं प्राप्त हुईं जैसे मूल्यवान रत्न, अप्सराएं, शंख, पवित्र वृक्ष, चंद्रमा, पवित्र अमृत, कुछ अन्य देवी-देवता और हलाहल नामक अत्यंत घातक विष। इसी समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर में से कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी हुई थी। कामधेनु का मतलब समस्त इक्षाओं को पूरा करने वाली। पुराणों में कामधेनु गाय को नंदा, सुनंदा, सुरभि, सुशीला और सुमन जैसे नामों से भी उल्लेखित किया गया। कामधेनु गाय को माँ के स्वरुप में पूजा गया। भागवत महापुराण के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तब बांसुरी की मोहक धुन सुनकर गायें कृष्ण जी के पास दौड़ी चली आती थी। भगवान् कृष्ण को गायें पसंद थी और इसी वजह से भी गौ माता को पूजा गया।

इसी तरह दुर्गा जी के वाहन के रूप में शेर, शंकर जी के वाहन के रूप में नंदी, सरस्वती जी के वाहन के रूप में हंस, विष्णु जी के वाहन के रूप में गरुड़, लक्ष्मी जी के वाहन के रूप में उल्लू व गणेश जी के वाहन चूहे की पूजा की जाती है। देखा जाए तो कोई न कोई पशु-पक्षी किसी न किसी देवी-देवता के वाहन के रूप में पूजा जाता है।

धार्मिक मान्यताएं उन पशु पक्षियों के पूजने की बात करती हैं जिनका उल्लेख शास्त्रों और पुराणों में आया हो। जैसा कि मैंने ज़िक्र किया है कि नागों में नव-नागों की पूजा, गायों में कामधेनु की पूजा। मैं यहाँ ज़ोर देकर किसी विशेष प्रयोजन से आपको मान्यता और धर्मान्धता का भेद बताने की कोशिश कर रहा हूँ। शास्त्रों में वर्णित पशु-पक्षियों की पूजा हो, इससे किसी को भी इनकार नहीं है। लेकिन त्योहारों को उनकी विशेषताओं और सांस्कृतिक मान्यताओं के आधार से ही मनाया जाना चाहिए। यदि नाग-पंचमी आये और आप सपेरों द्वारा जबरिया पकड़ कर लाये किसी भी सर्प की पूजा करते हैं तो ये शास्त्र सम्मत नहीं है क्योंकि सर्प दूध नहीं पीते। हर सांप का ज़िक्र शास्त्रों में नहीं है। हम झूठी और मनगढ़ंत बातों की वजह से उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की पूरी कोशिश करते हैं और इसी वजह से सर्पों के जीवन को खतरा हो जाता है। इसीलिये आप उन्ही नागों की पूजा कीजिये जिन्हें देवता कहा गया, जिनकी मंदिरों में प्रतिमा स्थापित की गई हो। अच्छा ये बताइये कि नाग पंचमी के दिन ही अचानक से आपको ज़हरीला खतरनाक सांप मिल जाए तो आप क्या करेंगे उसे पूजेंगे या मार देंगे? आप तत्काल उस सर्प को मार देंगे क्योंकि जब आपकी जान पर बन आई हो तो फिर आप गलती नहीं कर सकते। एक और बड़ी बात है चूँकि सपेरा सांप के ज़हरीले दांत निकाल लेता है इसीलिये आप नज़दीक से उसकी पूजा करने लगते हो और यदि ज़हरीला होता तो, तो क्या? भाग जाते या उसे मार देते। नाग पंचमी के अलावा किसी ने कभी सोचा है कि इन नागों को अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मारा जा रहा है, सांप की चमड़ी और उसका ज़हर विश्व बाज़ार में बहुत महंगा बिकता है। क्या कभी हमने जानने का प्रयास किया कि सर्प विलुप्त हो रहे हैं तो वे कहाँ जा रहे हैं? यही तो विडम्बना है साल में एक बार नाग-पंचमी में पूजा कर लीजिये, फिर उन्ही से प्रार्थना भी कर लीजिये कि प्रभु, धोखे से भी मेरे सामने मत आ जाना, क्योंकि कोई क्यों चाहेगा कि काल उसके सामने आये।

प्राचीन मान्यता के अनुसार जब आप अपने घर से निकलते हैं, किसी काम के लिए और आपको गाय मिल जाए जिसका दूध बछड़ा पी रहा हो तो अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है। लेकिन जिस तरह सर्पों की प्रजाति विलुप्त हो रही हैं उसी तरह कामधेनु कही जाने वाली गायें भी अब खतरे में हैं। गाय दूध देती है इसीलिये हमारी माता है इसमें कोई संदेह नहीं है।  ये बातें बहुत समझने वाली हैं। हम पुराने समय की बात करेंगे तो उस समय लाखों की तादाद में गायें होती थी और उन्हें चराने के लिए घांस से भरा जंगल होता था, एक चरवाहा पूरे गाँव की गाय चराने सुबह ले जाता था और शाम को वापस ले आता था। लेकिन अब घांस के जंगल की जगह कॉनक्रीट के जंगल लेते जा रहे हैं। डेरी को हटा दिया जाए तो आम ग्रामीण के पास गाय को खिलाने-पिलाने की व्यवस्था तब तक ही रहती है जब तक वो दूध देती है। प्रश्न ये है कि यदि वो दूध देना बंद कर देती है तो उसे बेचना या छोड़ देना कहाँ तक उचित है, क्या हम गाय को अपने स्वार्थ के लिए पालते हैं, ये तो ऐसा ही हो गया कि काम निकल जाने पर लोग अपने बूढ़े माँ-बाप को घर से निकाल देते हैं। आप इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि जिन गायों को छोड़ दिया जाता है वो आवारा पशुओं में शामिल हो जाती हैं फिर उन्ही गायों को कांजी-हॉउस में रख दिया जाता है जो कि चारे-पानी के अभाव में तड़प-तड़प कर मर जाती हैं। गौ माता को बचाना है तो अपनी ही भागीदारी से चन्दा एकत्रित कीजिये, अपने क्षेत्र में ऐसी गायों की सेवा के लिए सर्व सुविधा युक्त गौ शाला निर्मित करवाइए। अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से आग्रह करना चाहिए कि वे गौ पालन के क्षेत्र में सरकार की योजनाओं को क्रियान्वित कराये।

एक बात हमेशा अनुत्तरित रह जाती है कि गाय हमारी माता है तो फिर बैल जिसे नंदी कहा जाता है जिनकी अपनी पौराणिक मान्यता है, उसे क्यों नहीं पूजा जाता। बैलों को उनकी हालात पर क्यों छोड़ दिया जाता है। अगर खतरा है तो पूरे गौ वंश पर है, ऐसा कैसे हो सकता है कि गौ माता पूजनीय है और उसका बछड़ा श्रद्धा का पात्र नहीं है। इस सबका निचोड़ यही है कि जो पशु-पक्षी पूज्यनीय है उन्हें स्मरण करके उनकी मानसिक पूजा की जा सकती है लेकिन सभी ज़िंदा खतरनाक पशु-पक्षियों को देवता मानकर पूजेंगे तो मुसीबत खड़ी हो जायेगी। मैं उस वक़्त ये बात कह रहा हूँ जब मैने अभी-अभी विधि-विधान से भोले नाथ की पूजा, उनके सभी गणों के साथ की है जिसमें नागराज भी विशेष रूप से विद्यमान हैं। मैं आपको ये भी बता देता हूँ कि हम प्रत्येक सोमवार को वर्ष भर भोले बाबा का अभिषेक करते हैं उनके गणों सहित। इसीलिये प्रतीकों को मानना अलग बात है और वास्तविक धरातल पर व्याप्त चीजों को समझना अलग बात।

आज समूचे भारत वर्ष में इस बात को समझने की ज़रूरत है कि हिन्दू धर्म के अनुसार हमारे आराध्य देवी-देवताओं को जो पशु-पक्षी प्रिय थे वे हमारी भी पसंद हों और हम सकारात्मक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ उनके पालन-पोषण में अपनी महती भूमिका निभाएं ।

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