क्या है आरएसएस का शिक्षा एजेंडा? – राम पुनियानी

5:43 pm or August 2, 2017
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क्या है आरएसएस का शिक्षा एजेंडा?

—– राम पुनियानी ——

आरएसएस से जुड़ी संस्था ‘‘शिक्षा संस्कृति उत्थान’’ ने हाल में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को अपनी अनुशंसाओं में अंग्रेज़ी, उर्दू और अरबी शब्दों के अतिरिक्त, रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों, एमएफ हुसैन की आत्मकथा के अंशों, मुगल बादशाहों को उदार शासक बताए जाने संबंधी पंक्तियों, भाजपा को ‘‘हिन्दू पार्टी बताए जाने, 1984 के दंगों के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने और एक वाक्य, जिसमें यह कहा गया है कि गुजरात में वर्ष 2002 में लगभग 2000 मुसलमान मारे गए थे’’ को एनसीईआरटी की पुस्तकों से हटाए जाने की बात कही है। एनसीईआरटी को सौंपी गई ये अनुसंशाएं, आरएसएस के शिक्षा के क्षेत्र में एजेंडे के अनुरूप हैं। इस एजेंडे का अंतिम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है।

एक लंबे समय से संघ, शिक्षा के क्षेत्र में काम करता आ रहा है। संघ की राष्ट्रवाद की अवधारणा, भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा से एकदम भिन्न है और अपनी इस अवधारणा का प्रचार-प्रसार वह सरस्वती शिशु मंदिरों, एकल स्कूलों व शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उसके द्वारा स्थापित विद्याभारती आदि संस्थाएं करती रही हैं। संघ ने देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में शीर्ष पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्ति का अभियान चलाया हुआ है। भाजपा के नेतृत्व वाली पिछली एनडीए सरकार ने शिक्षा के भगवाकरण की प्रक्रिया शुरू की थी। उसने स्कूली पाठ्यक्रमों में परिवर्तन किए थे और पौरोहित्य व कर्मकांड जैसे पाठ्यक्रम प्रारंभ किए थे। सन 2014 में, भाजपा के सत्ता में आने के बाद से, प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय इतिहास को देखने के संघ के तरीके को विद्यार्थियों पर थोपा जा रहा है। आरएसएस के नेता केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से लगातार यह मांग कर रहे हैं कि शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। पाठ्यक्रमों व शिक्षा नीति में जो परिवर्तन किए जा रहे हैं, उनका उद्देश्य शिक्षा को वैश्वीकरण व निजीकरण की आर्थिक नीतियों और मनुवाद के हिन्दुत्वादी एजेंडे के अनुरूप बनाना है।

जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था लागू की जा रही है, उसका अंतिम लक्ष्य आने वाली पीढ़ियों के सोचने के तरीके में बदलाव लाना है। इसका उद्देश्य ब्राह्मणवादी सोच को समाज पर लादना, वैज्ञानिक समझ को कमज़ोर करना और मध्यकालीन, रूढ़ीवादी मानसिकता को बढ़ावा देना है। हाल में एक बैठक में, संघ के नेताओं ने कहा कि पिछली सरकारों ने इतिहास और अन्य विषयों की पाठ्यपुस्तकों का लेखन अपने तरीके से किया। वह ‘उनका’ इतिहास था। अब, समय आ गया है कि विद्यार्थियों को ‘वास्तविक’ इतिहास पढ़ाया जाए और शिक्षा व्यवस्था को सही दिशा में ले जाया जाए। उनके अनुसार यह शिक्षा के भारतीयकरण की परियोजना है।

अभी से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आरएसएस नेतृत्व, सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली को बदलने पर आमादा है और इतिहास, सामाजिक विज्ञान व अन्य विषयों की पुस्तकों की अंतर्वस्तु को पूरी तरह बदल देना चाहता है। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने और मोदी के राजनीतिक क्षितिज पर उभरने के पहले से ही दक्षिणपंथी संस्थाओं ने विद्वानों और इतिहासकारों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया था। शिक्षा बचाव अभियान समिति और आरएसएस से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के दीनानाथ बत्रा ने दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक पेंग्विन को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह वेंडी डोनिगर की विद्वतापूर्ण पुस्तक ‘द हिन्दूजः एन आल्टरनेट हिस्ट्री’ को प्रकाशित न करे। यह पुस्तक पौराणिक शास्त्रों की व्याख्या के ज़रिए, जातिगत और लैंगिक वास्तविकताओं को समझने का संवेदनशील प्रयास है। लेखिका की इतिहास की व्याख्या, संघ परिवार की पदक्रम-आधारित मानसिकता से मेल नहीं खाती और इसलिए पेंग्विन पर दबाव डालकर इस पुस्तक का प्रकाशन रूकवा दिया गया। श्री बत्रा की लिखी हुई नौ पुस्तकों का गुजराती में अनुवाद कर उन्हें गुजरात के 42,000 स्कूलों में लागू कर दिया गया है। यह एक तरह की पायलेट परियोजना है जिसके बाद और बड़े पैमाने पर यही काम किया जाएगा। काफी पहले (23 जून, 2013) वेंकैया नायडू ने कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में वापस आई, तो वह पाठ्यक्रम को बदलेगी। बत्रा देश में राष्ट्रवादी शिक्षा प्रणाली लागू करना चाहते हैं जिसके जरिए एक ऐसी नई पीढ़ी उभरे, जो हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो।

संघ, हिन्दू पुराणों को इतिहास का भाग बनाना चाहता है। आरएसएस की इतिहास की समझ, जिसमें यह दावा शामिल है कि आर्य इस देश के मूल निवासी थे, को जमकर प्रचारित किया जा रहा है। मोहनजोदाड़ो व हड़प्पा को आर्य सभ्यता बताने का प्रयास हो रहा है और सरस्वती नदी पर शोध में अकूल धन बहाया जा रहा है। रामायण और महाभारत की ऐतिहासिकता को साबित करने के प्रयास भी हो रहे हैं। रामायण और महाभारत, महाकाव्यों को इतिहास का दर्जा दिया जा रहा है और उन्हें इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल करने की कवायद चल रही है। ऐसा बताया जा रहा है कि प्राचीन भारत में मानव सभ्यता अपने उच्चतम शिखर पर थी और उस काल में स्टेमसेल पर शोध होता था, प्लास्टिक सर्जरी की जाती थी और हवाईजहाज (पुष्पक विमान) भी थे। इन झूठों को ‘हमारी उपलब्धियां’ बताया जा रहा है।

इसी तरह, मध्यकालीन इतिहास को भी तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि कुतुब मीनार का निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने किया था और उसका असली नाम विष्णु स्तम्भ था। शिवाजी व अफज़ल खान, अकबर व महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह व औरंगज़ेब के बीच युद्धों को धार्मिक रंग दिया जा रहा है। देश की सांझा परंपराएं, जो भारत की आत्मा हैं, की अवहलेना की जा रही है और पंथवाद और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इस तरह के परिवर्तनों का पेशेवर, प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों द्वारा विरोध किया जा रहा है। पिछली एनडीए सरकार में भी इस तरह के परिवर्तन किए गए थे, और इन्हें शिक्षा का भगवाकरण का नाम दिया गया था। अब इस प्रक्रिया को और खुलकर व जोरशोर से चलाया जा रहा है। आरएसएस की यह मान्यता है कि जितने भी हिन्दू राजाओं ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध किया वे सब हिन्दू राष्ट्रवादी थे। यह इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना है क्योंकि राजाओं ने कभी धर्म के लिए युद्ध नहीं लड़े। वे तो केवल सत्ता और संपत्ति के पुजारी थे। और क्या हम यह भूल सकते हैं कि एक ही धर्म के राजाओं के बीच ढेर सारे युद्ध हुए हैं।

एनसीईआरटी को सौंपी गई अनुसंशाएं, हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेंडे को और आगे बढ़ाने वाली हैं। प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास को एक विशेष कोण से देखे जाने के प्रयास हो रहे हैं और वैज्ञानिक समझ को दरकिनार किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि आरएसएस न केवल इतिहास, बल्कि ज्ञान की एक पूरी नई प्रणाली का विकास करना चाहता है, जो उसके संकीर्ण राष्ट्रवाद का पोषण करे।

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