रक्षा बन्धन आस्था, विश्वास और नारी-मुक्ति का सूत्र बने ! – डाॅ0 गीता गुप्त

4:43 pm or August 3, 2017
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रक्षा बन्धन आस्था, विश्वास और नारी-मुक्ति का सूत्र बने !

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। किन्तु परम्पराएँ जीवित हैं, यह महत्त्वपूर्ण बात है। चिन्ताजनक यह है कि परम्पराओं पर बाज़ारवाद हावी होता जा रहा है और भावनाओं की अहमियत ख़त्म होती जा रही है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्योहार भाई-बहन के प्रेम और ऱक्षा के दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। प्रागैतिहासिक काल में, शायद रक्षाबन्धन जैसा कोई पर्व नहीं था। बाद के कालखण्ड और इतिहास में कुछ कथाएँ मिलती हैं।

भविष्यपुराण की कथा के अनुसार, देव और दानवों के बीच दीर्घकालीन युद्ध हुआ जिसमें असुरों ने सभी श्रेष्ठ देवताओं सहित इन्द्र को भी जीत लिया। श्रीहीन देवता तथा इन्द्र अमरावती पहुँचे। दैत्यराज ने त्रिलोकी को अपने वश में कर लिया और आज्ञा दी-‘सभी देवता व मनुष्य यज्ञादि न करें। इन्द्र देवसभा छोड़ दें। सुरासुर मेरी ही पूजा करें।‘ इन्द्र का जीवन संकट में था अतः उन्होंने प्राणान्त युद्ध करने की मंशा बृहस्पति से व्यक्त की । तब पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल बृहस्पति ने इस मन्त्र से रक्षा कवच का विधान किया-

‘‘ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलाः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चलयाचल।।‘‘

पति की विजय-कामना से इन्द्राणी ने भी वैदिक मन्त्रों से अभिसिंचित करके एक रक्षा-सूत्र पति को बाँधा। उसके प्रभाववश इन्द्र के दानवों पर विजय पायी। तभी से यह पर्व मनाया जाता है।

प्राचीन काल मेें ऋषियों द्वारा आयोजित यज्ञ में राजा को यज्ञ की दीक्षा के रूप में लाल सूत्र बाँधा जाता था जो रक्षा के लिए बन्धन होता था। मध्यकाल में रक्षा-सूत्र बाँधकर भाई बनाने की प्रथा थी। मुगल काल में जब असुरक्षित हिन्दू बहनंे अपनी लाज बचाने के लिए रक्षा-सूत्र भेजकर किसी से सहायता माँगती थीं तो धर्मभाई उनकी रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देते थे। महारानी कर्णावती और मुगल शासक हुमाँयू के एक-दूसरे को देखे बिना रक्षा-सूत्र के माध्यम से भाई-बहन बनने की कथा इतिहासप्रसिद्ध है। शास्त्रों के अनुसार, देवी पार्वती ने रक्षा-सूत्र बाँधकर विष्णु को अपना भाई बनाया था। भगवान विष्णु ने इसके बदले उन्हें रक्षा का वचन दिया था। इसी तरह द्रौपदी द्वारा भगवान कृष्ण को साड़ी फाड़कर राखी बाँधने की बात भी सुनने में आती है। इन्हीं कथाओं को आम तौर पर रक्षा-बन्धन से जोड़कर देखा जाता है। मगर भारत के भिन्न-भिन्न भागों में इस त्योहार का रूप अलग-अलग है।

उड़ीसा में इसे ‘गमहा पूर्णिमा‘ कहते हैं। इस दिन घर के गायों और बैलों को सजाया जाता है और विशेष व्यंजन ‘मीठा और पीठा‘ बनाकर इष्ट मित्रों तथा रिश्तेदारों को बाँटा जाता है। साथ ही राधा-कृष्ण की प्रतिमा झूले में स्थापित कर झूलन यात्रा मनाने की परम्परा है। गुजरात के कुछ भागों में ‘पवित्रोपन‘ नाम से मनाये जाने वाले इस पर्व में शिव-पूजा का विधान है। पश्चिम बंगाल में इसे ‘झूलन पूर्णिमा‘ कहते हैं। इस दिन बहनें राधा-कृष्ण की पूजा के बाद भाइयों को रक्षा-सूत्र बाँधकर उनके मंगलमय जीवन की कामना करती हैंै।

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल में इस दिन लोग नया जनेऊ धारण करते हैं शायद इसीलिए इसे ‘जानोपुन्यु‘ कहा जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘मराली पूर्णिमा‘ कहते हैं। इस दिन समुद्र देवता को नारियल चढ़ाने की परम्परा है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, बिहार और झारखण्ड में ‘कजरी पूर्णिमा‘ रक्षाबन्धन का ही पर्याय है। देश के अन्य भागों में भी रक्षा-बन्धन के दिन बहनों द्वारा भाइयों को राखी बाँधने की परम्परा मिलती है। रक्षा-बन्धन से जुड़ी परम्पराओं का अपना एक महत्त्व है जिसे आज पूरी तरह से भुला दिया गया है। वैदिक कर्मकाण्डों के अनुसार, स्वर्ण, अक्षत, दूर्वा, पीली सरसों, तिल और कुछ औषधियों आदि से युक्त साथ ही मन्त्रों से अभिमंत्रित होने के कारणस रक्षा-सूत्र के रोगनाशक शक्ति होती थी और इसे वेदज्ञ ब्राह्मण से पूर्ण शास्त्रीय रीति से बँधवाने का विधान था। इस दिन धारण किया हुआ रक्षा-सूत्र मनुष्य को मानसिक-शारीरिक व वाणीगत पापों से बचने के लिए भी दृढ़ सम्बल प्रदान करने वाला होता था। किन्तु आज इस त्योहार में प्राचीन पारम्परिक विधान दिखाई नहीं देता। अब अभिमन्त्रित रक्षा-सूत्र नहीं होते, न भाई अपनी बहन की रक्षा के लिए संकल्पित होते हैं। यह विशुद्ध रूप से भाई -बहन के बीच भौतिक उपहारों के लेन-देन का त्योहार मात्र रह गया है।

इन दिनों अख़बार उपहारों के विज्ञापन से अटे पड़े होते हैं। ‘इस रक्षाबन्धन पर बहन के लिए ख़ास उपहार-हीरों का हार‘ या ‘ प्यारी बहना को दीजिए इस बार एक्टिवा शानदार‘ जैसे अनगिनत आकर्षक विज्ञापन सुखिऱ्यों में होते हैं जो आर्थिक तौर पर अक्षम भाइयों के मन में कुण्ठा उपजाते हैं और बहनों केे मन में लालसा जगाते हैं। रक्षाबन्धन के दौरान उपहार के रूप में महँगे आभूषण, इलेक्टाªॅनिक सामग्री, वाहन आदि की ख़रीदारी पर आकर्षक छूट का प्रचार इस त्योहार का एक बहुत ़त्रासद पक्ष है। मानो भाई-बहन के बीच भावनात्मक सम्बन्ध का कोेई महत्त्व ही नहीं है या फिर महँगे उपहार न दे सकने वाला भाई अपनी बहन की दृष्टि में कमतर समझा जाएगा। आत्मीय सम्बन्धों के बीच भौतिक लालसा व्यवधान बन गई है। यही कारण है कि त्योहार का आनन्द कम हो गया। भाइयोें के लिए यह अनावश्यक व्यय-भार तनाव का कारण बन गया है। क्योंकि कहा जाने लगा है-

जितना बड़ा उपहार
बहन के प्रति
भाई का
उतना ही प्यार।

एक नयी परम्परा इस त्योहार से और जुड़ गई है-रिटर्न गिफ़्ट की। आर्थिक रूप से सम्पन्न बहनें अब भाइयों को भी यथोचित् भेंट देती हैं। वे होटलों में ‘टेबिल बुक‘ करके इस दिन को उत्सव के रूप में मनाती हैं। अब हाथ से राखी बनाने, भाई की पसन्द के मिष्ठान्न बनाने और अपने सम्बन्धों को मज़बूती देने जैसी बातें गुज़रे ज़माने की हो गई हैं। इस अवसर पर अपनी कोई माँग भाई से पूरी करवाने का लक्ष्य ही इस त्योहार की सार्थकता है। आज मनुष्य की प्रकृति, सामाजिक व्यवस्था, परिवार-सबमें बहुत तेज़ी से बदलाव आया है और दुर्भाग्यवश समूची व्यवस्था पर देह और बाज़ारवाद हावी हो चुका है।

यह विडम्बना ही है कि हमारे रिश्ते, हमारी परम्पराएँ, हमारी समझ -सब कुछ गड़बड़ा गए हैं। समाज ने रिश्तों का सूत्र तो थमा दिया पर उसके पीछे निहित विचार लुप्त हो गए। कहाँ है आज वह विश्वास, पवित्रता और दृढ़ आस्था-जो रक्षा का सम्बल बनती थी ? आज स्त्री माँ, बहन, बेटी, पत्नी, सखी नहीं-वस्तु है पुरुष के लिए। इसीलिए स्त्री के हिस्से में आग है, धुआँ है, तन्दूर है, अनचाही सन्तान और यातनाओं के अन्तहीन सिलसिले हैं। बेशक स्त्री की दुनिया बदल रही है। आज नारी पश्चिमी पोशाक में है, कार्यालयों में है, विमानों और अन्तरिक्ष में है, सौन्दर्य-स्पद्र्धाओं और कारपोरेट-जगत् की सुखिऱ्यों में भी है। पर वह मात्र प्रभु वर्ग का एक अशेष समाज है, जहाँ लैंगिकता कोई मायने नहीं रखती ;जो सम्पूर्ण स्त्री समाज का प्रतिनिधिस्वरूप नहीं है। शेष व्यापक स्त्री समाज अब भी पुरुष द्वारा संचालित और नियंत्रित है। वहाँ पुरुष के नियम-क़ानून, परम्पराएँ हैं। उसकी ज़्यादतियाँ हैं, जिनके क़िस्से सुनकर दिल दहल जाएँ। वहाँ औरतें दहेज़ के लिए जलायी जा रही हैं, देह-व्यापार के लिए बेची जा रही हैं, पवित्रता के लिए अग्नि-परीक्षा दे रही हैं, अपनों के द्वारा ‘वस्तु‘ की तरह भोगी जा रही हैं।

आज स्त्री-सशक्तिकरण के आन्दोलन चलाये जा रहे हैं, स्त्री-जागरण और स्त्री-स्वातन्त्र्य की बात की जा रही है; तो क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि स्त्री को अबला होने का अहसास कराया जा रहा है ? उसे स्मरण कराया जा रहा है कि वह पुरुष की छत्रछाया में है, उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है ? गम्भीरता से सोचें तो यह पर्व स्त्री -विरोधी प्रतीत होता है। वर्तमान परिस्थितियों में रक्षाबन्धन को हमें नये विचारों के आलोक में देखना चाहिए। हमें क्यों स्त्री को रक्षा का कवच देना चाहिए ? क्यों यह जतलाने की कोशिश करनी चाहिए कि उसमें आत्म-विकास और आत्म-रक्षा का माद्दा नहीं है। ग़ौरतलब है कि बहन एक स्त्री है, भाई एक पुरुष है और यह भी ग़ौरतलब है कि शायद पुरुष को एक यही बात स्मरण है। शायद इसीलिए रक्षाबन्धन के बावजूद स्त्री की आबरू सुरक्षित नहीं है, वह अपने ही भाई और पिता की हवस का शिकार हो रही है, उसकी इज़्ज़्ात दाँव पर लगायी जा रही है। यह भी तय है कि रक्षाबन्धन जैसा पर्व न भी होता तब भी स्त्रियाँ देवी की तरह पूजी नहीं जा रही होतीं, पर आज तो यह पर्व पुरुष के वर्चस्व की पुष्टि करता हुआ, प्रवंचना-सा प्रतीत होता है।

आज भाई-बहन के पवित्र सम्बन्ध को लेकर सोच में जो बदलाव आया है वह आश्चर्यजनक ही नहीं दुःखद भी है। इस रिश्ते में स्त्री का सबसे सच्चा स्वरूप व्यक्त होता है। भाई के प्रति बहन की सेवा-भावना स्त्री के सभी रूपों की सेवा-भावना से सर्वोपरि है। सम्भवतः इसीलिए चिकित्सा-क्षेत्र में परिचारिकाओं को ‘सिस्टर‘ कहकर सम्बोधित किया जाता है। अमेेरिका के ब्रीघेम यंग विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, ‘बहन से संवाद पुरुषों में नकारात्मक विचारों को कम करता है और स़्ित्रयों के प्रति सम्मान भाव को जाग्रत करता है।‘ लेकिन आज तो लोग बहन का महत्त्व भूलते जा रहे हैं। बेटों का वर्चस्व बढ़ने और बेटियों की अवहेलना के कारण सामाजिक पर्यावरण दूषित होता जा रहा है। अब ‘बहिनजी‘ शब्द आदरसूचक न रहकर कटाक्ष हो गया है। भाई-बहन जैसे एक पवित्र सामाजिक रिश्ते की अहमियत कम होती जा रही है।

अब समाज को अपना रवैया बदलने की ज़रूरत है, कोरे चिन्तन, सभाओं और गोेष्ठियों की नहीं। रक्षाबन्धन में निहित विचार को आचरण में आत्मसात करने की आवश्यकता है। मात्र एक दिन-रक्षाबन्धन के दिन बहन के शील की रक्षा करने की शपथ लेने की आवश्यकता नहीं। इस अवसर पर सम्पूर्ण स्त्री-समाज से वादा करना होगा कि हम उनके विकास के मार्ग में बाधक नहीं बनेंगे, उनके आत्मसम्मान और विश्वास को चोट नहीं पहुँचाएँगे, कि उनकी निर्णायक भूमिका की क्षमता को नहीं रौंदेंगे, कि उनकी आँखों में पल रहे सपनों के साकार होने की राह में रोड़े नहीं अटकायेंगे। बल्कि आज के दिन पूरी सचाई और ईमानदारी के साथ आह्वान करेंगे स्त्री-जगत् का, कि वे चुनौतियों से भरे इस संसार में आगे आयें, पूरी ताक़त और हौसले के साथ लड़ें, जूझें और अपना रक्षा-कवच आप बनें; क्योंकि वे भी पुरुष की भाँति इनसान हैं और समर्थ भी। यही कामना है कि रक्षा-बन्धन मात्र धागों का त्योहार बनकर न रह जाए, वह सचमुच सुदृढ़ सम्बन्ध-सूत्र बने!

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