भारत छोड़ो आंदोलन – शैलेन्द्र चौहान

4:06 pm or August 8, 2017
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भारत छोड़ो आंदोलन

—– शैलेन्द्र चौहान ——

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का यह 76 वां वर्ष है किंतु आज भी भाषा, धर्म, क्षेत्रीयता के तत्त्व भारत को निगल जाने को आतुर हैं । राष्ट्रीय एकीकरण देश के समक्ष एक दुखजनक समस्या बन गई है । इसका मुख्य कारण स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी का राष्ट्रीय आंदोलन के बलिदानी इतिहास से परिचित न होना है। यूं तो क्रांतियों का इतिहास बड़ा ही जटिल और व्यापक रहा है। मगर बदलाव की आहट के लिए किए जाने वाले हर प्रयास को अगर क्रांति की ओर इंगित मान लें, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि 1942 की अगस्त क्रान्ति जो भारत का राष्ट्रीय आंदोलन था, अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति–संघर्ष की गाथा है। वैसे तो स्वाधीनता आंदोलन के संघर्ष में 1857 का मुक्ति संग्राम उल्लेखनीय है। इसमें हर वर्ग, जमींदार, मजदूर और किसान, स्त्री और पुरुष, हिंदू और मुसलमान–सभी लोगों ने अपनी एकता एवं बहादुरी का परिचय दिया। ‘अगस्त क्रांति’ या 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को हम भारतीय स्वाधीनता का द्वितीय मुक्ति संग्राम कह सकते हैं जिसके फलस्वरूप 5 वर्ष बाद 1947 में हमें आजादी मिली। पं– जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में ‘यह किसी पार्टी या व्यक्ति का आंदोलन न होकर आम जनता का आंदोलन था जिसका नेतृत्व आम जनता द्वारा ले लिया गया था।’ जब द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का समर्थन लेने के बावज़ूद जब अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं हुए तो महात्मा गाँधी ने भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में आज़ादी की जंग का ऐलान कर दिया। जिससे बर्तानिया हुक़ूमत  दहशत में आ गई। 9 अगस्त, सन् 1942 ई. में इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी इसीलिए 9 अगस्त के दिन को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में जाना जाता है। यह आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ उसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से दे दिया गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने के लिए 4 जुलाई, सन् 1942 ई. को एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि यदि अंग्रेज़ भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके ख़िलाफ़ व्यापक स्तर पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाए। पार्टी के भीतर इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद पैदा हो गए और सुप्रसिद्ध कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रस्तावित आंदोलन को लेकर शुरुआत में संशय में थे लेकिन उन्होंने महात्मा गाँधी के आह्वान पर अंत तक इसके समर्थन का फ़ैसला किया। वरिष्ठ गाँधीवादियों और समाजवादियों, जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. राजेंद्रप्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण ने इस तरह के किसी भी आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। आंदोलन के लिए कांग्रेस को सभी दलों को एक झंडे तले लाने में सफलता नहीं मिली। इस आह्वान का मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिन्दू महासभा ने विरोध किया।

8 अगस्त सन् 1942 ई. को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई सत्र में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया। भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित होने के बारे में ब्रितानिया हुक़ूमत पहले से ही सतर्क थी इसलिए गाँधीजी को अगले ही दिन पुणे के आगा खान पैलेस में क़ैद कर दिया गया। अहमदनगर क़िले में कांग्रेस कार्यकारी समिति के सभी कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर बंद कर दिया गया। लगभग सभी नेता गिरफ़्तार कर लिए गए लेकिन युवा नेत्री अरुणा आसफ अली गिरफ़्तार नहीं की गई और मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान में उन्होंने सन् 1942 ई. को तिरंगा फहराकर गाँधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद कर दिया। गाँधीजी ने हालाँकि अहिंसक रूप से आंदोलन चलाने का आह्वान किया था लेकिन अंग्रेज़ों को भगाने का देशवासियों में ऐसा जुनून पैदा हो गया कि कई स्थानों पर बम विस्फोट हुए, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई तथा परिवहन और संचार सेवाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया। जगह-जगह पर हड़ताल की गई। लोगों ने ज़िला प्रशासन को कई जगह पर उखाड़ फेंका। गिरफ़्तार किए गए नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जेल तोड़कर मुक्त करा लिया तथा वहाँ स्वतंत्र शासन स्थापित कर दिया। एक तो द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की रीढ़ टूट रही थी दूसरी ओर भारत छोड़ो आंदोलन उनकी चूलें हिलाने में लगा था। इस आंदोलन से अंग्रेज़ बुरी तरह बौखला गए। उन्होंने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और निर्दोष लोगों को गोली से उड़ा दिया तथा एक लाख से अधिक लोगों को देश भर में गिरफ़्तार कर लिया गया। इसके बावज़ूद आंदोलन पूरे जोश के साथ चलता रहा। लेकिन गिरफ़्तारियों की वजह से कांग्रेस का समूचा नेतृत्व शेष दुनिया से लगभग तीन साल तक कटा रहा। गाँधीजी का स्वास्थ्य जेल में अत्यधिक बिगड़ गया लेकिन फिर भी उन्होंने अपना आंदोलन जारी रखने के लिए 21 दिन की भूख हड़ताल की। सन् 1944 ई. में गाँधीजी का स्वास्थ्य बेहद बिगड़ जाने पर अंग्रेज़ों ने उन्हें रिहा कर दिया। 1944 के शुरू तक अंग्रेज़ों ने हालात पर काबू पा लिया जिससे बहुत से राष्ट्रवादी अत्यंत निराश हुए। गाँधीजी और कांग्रेस को मुहम्मद अली जिन्ना, मुस्लिम लीग, वामपंथियों और अन्य विरोधियों की आलोचना का सामना करना पड़ा। कभी-कभी जल्दबाजी में ऐसे कदम उठा लिए जाते हैं जिनमें शिकस्त की संभावना अधिक होती है। इससे जनहानि भी  और निराशा का संचार भी। यूं विद्रोह और क्रांतियाँ अक्सर असफल होती हैं परन्तु क्रान्तिधर्मी रणबाँकुरे अपना हौसला और धैर्य नहीं छोड़ते। इसीलिए 9 अगस्त भारत के इतिहास में पूरी गरिमा साथ दर्ज़  है।

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