अवैध खनन पर सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी कार्यवाही -जाहिद खान

4:20 pm or August 8, 2017
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अवैध खनन पर सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी कार्यवाही

—– जाहिद खान ——

ओडिशा में लौह एवं मैग्नीज अयस्कों के अवैध खनन में लिप्त कंपनियों पर एक बड़ी कार्यवाही करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में इन कंपनियों से अवैध खनन की कीमत का सौ फीसदी जुर्माना, राज्य को अदा करने का ऐतिहासिक आदेश दिया है। कंपनियों को जुर्माने की यह रकम इस साल 31 दिसम्बर तक जमा करनी होगी। वैधानिक जरूरतों के अनुपालन, मुआवजे और दूसरे बकाये के पूर्ण भुगतान के बाद ही खनन पट्टाधारक राज्य में खनन दोबारा शुरू कर सकेंगे। न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस मामले में केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के आधार पर दोषी कंपनियों पर साल 2000-01 से लेकर अब तक किए गए अवैध खनन की कीमत का जुर्माना जो कि तकरीबन 61,000 करोड़ रूपए होता है, उन पर लगाया है। जाहिर है कि यह एक बहुत बड़ी रकम है, जो अब राज्य सरकार के खजाने में जमा होगी। पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि बिना पर्यावरण मंजूरी या वन मंजूरी या दोनों की मंजूरी के बिना खनिजांे का खनन का काम ‘माइंस एवं मिनरल एक्ट, 1957’ की धारा-21 (5) के प्रावधानों के दायरे में आएगा। ऐसे में कंपनियों को गैरकानूनी तौर पर हुए खनन के मूल्य का सौ फीसदी जुर्माना भरना होगा। अदालत ने इसके साथ ही राज्य में चल रहे अवैध खनन के कारणों की पहचान करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति बनाने का भी निर्देश दिया है। समिति सरकार को ये सुझाव देगी कि अवैध खनन को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जाएं ? अलबत्ता अदालत ने इस मामले की सीबीआई जांच का निर्देश देने से साफ इंकार कर दिया है।

शीर्ष न्यायालय ने यह फैसला, एक गैर सरकारी संगठन काॅमन काॅज की याचिका को निपटाते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में अदालत से राज्य में अवैध खनन में लिप्त कंपनियों पर कार्यवाही करने के अलावा अवैध खनन में जुटे लोगों का पता लगाने के लिए सीबीआई जांच की गुहार लगाई थी। बहरहाल मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने इस बात पर बेहद चिंता जताई कि अवैध गतिविधियों की वजह से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। अदालत का इस बारे में कहना था कि ‘‘देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहा अवैध खनन तभी रुकेगा, जब केन्द्र सरकार ‘नेशनल मिनरल पाॅलिसी, 2008’ पर पुनर्विचार करे और इस नीति पर 31 दिसम्बर तक कोई फैसला ले। सरकार प्राथमिकता के साथ नई राष्ट्रीय खनिज नीति बनाए।’’ अदालत की यह सलाह वाजिब भी है। मौजूदा खनिज नीति पर्यावरण संरक्षण और खनिज विकास के संदर्भ में एक दशक पुरानी हो चुकी है। लेकिन सरकार ने तब से लेकर अब तक इस नीति पर कोई महत्वपूर्ण संशोधन नहीं किया है। जबकि सारे परिदृश्य में काफी बदलाव आ गया है। नीति में सेंध लगाकर खनन कारोबारी या बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियां सरकार को लाखों-करोड़ों रूपए के राजस्व का चूना लगा रही हैं। पर्यावरण का विनाश हो रहा है, वह अलग। ओडिशा जैसे राज्य में जहां पर्यावरण प्रणाली बेहद संवेदनशील है, सघन वन है, हाथियों का सबसे बेहतर प्रवास और गलियारा है, वहां खनन गतिविधियों की वजह से पर्यावरण का नाश तो हुआ ही, वन्य प्राणियों और जनजातीय समुदाय का भी बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। राज्य में उनकी दयनीय स्थिति हो गई है।

कहने को देश में खनिजों के खनन को व्यवस्थित, नियंत्रित और अवैध खनन को रोकने के लिए एक ‘नेशनल मिनरल पाॅलिसी, 2008’ है। इसके अलावा खदान का पट्टा लेने से पहले कंपनी या किसी व्यक्ति को पर्यावरण मंत्रालय और वन मंत्रालय से खनन की मंजूरी भी लेना होती है। बावजूद इसके पूरे देश में अवैध खनन धड़ल्ले से जारी है। खनन कारोबारी, नौकरशाही और भ्रष्ट सियासी लीडरों का नापाक गठबंधन सारे कायदे-कानूनों को धता बताकर सरकार की नाक के नीचे अवैध खनन करता रहता है और उन पर कहीं कोई कार्यवाही नहीं होती। यदि कहीं कोई कार्यवाही होती भी है, तो सिर्फ देखने-दिखाने को। बाद में ये अवैध गतिविधियां फिर ज्यों के त्यों चलने लगती हैं। इन्हें कोई नहीं रोकता। ओडिशा की ही यदि बात करें, तो प्राकृतिक संसाधनों और खनिज से परिपूर्ण इस राज्य में अवैध खनन बरसों से चल रहा है। राज्य में अधिकतर खनन कार्य नियमों, नियमन तथा पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर होते रहे हैं। जिसमें टाटा स्टील और आदित्य बिड़ला समूह की एस्सल माइनिंग एण्ड इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं। नियमों के उल्लंघन के अलावा यह कंपनियां पट्टे पर दिए गए क्षेत्र से आगे बढ़कर खनन कार्य भी कर रहीं थी। वह तो जब सरकार ने देश में लौह अयस्क और मैगनीज अयस्क के अवैध खनन और निर्यात की जांच के लिए न्यायमूर्ति एमबी शाह आयोग का गठन किया, तब उसकी रिपोर्ट से मालूम चला कि टाटा स्टील, सेल और एस्सल माइनिंग के अलावा उषा मार्टिन और रूंगटा माइन्स जैसी छोटी और मध्यम दर्जे की कंपनियां झारखंड, गोवा और ओडिशा जैसे प्राकृतिक और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्यों में नियमों का उल्लंघन कर बड़े पैमाने पर अवैध खनन में लगी हुई हैं।

साल 2008 से 2011 के बीच खनन गतिविधियों में अनियमितता की जांच के लिए गठित इस आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट साल 2014 में संसद के ऊपरी सदन में पेश की थी। रिपोर्ट में कई सनसनीखेज खुलासे करते हुए आयोग ने कहा था कि ‘‘झारखंड में 22,000 करोड़ रुपये का अवैध खनन, गोवा से 2,747 करोड़ रुपये का अवैध अयस्क निर्यात और ओडिशा में इस दरमियान 61,000 करोड़ रुपये के खनिजों का अवैध खनन किया गया।’’ रिपोर्ट के मुताबिक ओडिसा के तीन जिलों क्योंझर, सुन्दरगढ़ और मयूरभंज में सरकार ने लौह अयस्क और मैग्नीज के लिए 187 पट्टे आवंटित किए थे। इनमें से 102 पट्टेदारों के पास आवश्यक पर्यावरण मंजूरी या वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत मंजूरी नहीं थी। इस दौरान 215.5 मिलियन टन का अवैध खनन किया गया, जिसकी कीमत तकरीबन 61,000 करोड़ रूपए होगी। रिपोर्ट में आयोग ने कई तल्ख टिप्पढ़ियां भी कीं थीं। मसलन ‘‘इस अवधि के दौरान सरकारी मशीनरी एक तरह से धाराशायी हो गई थी। ऐसा लगता है कि सरकारी मशीनरी खनन माफिया, राजनेताओं, ताकतवर लोगों तथा कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के सामने असहाय हो गई थी।’’ इस पूरे मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश करते हुए आयोग ने उस वक्त कहा था, ‘‘चूंकि इसमें ताकतवर लोग, राज्य एवं बाहर के बड़े व्यापारी, राजनीतिक इकाई, उच्च स्तर के अधिकारी संलिप्त हैं, लिहाजा राज्य पुलिस के लिए तथ्यों और वास्तविकताओं का पता लगाना मुमकिन नहीं होगा।’’ सीबीआई जांच के अलावा आयोग ने सरकार को अपनी ओर से कई अहम सुझाव भी दिए थे। मसलन ‘‘सरकार जांच के दायरे में आए खनन पट्टे निरस्त करे, नुकसान हुए राजस्व की वसूली और खनन कंपनियों के साथ साठगांठ करने वाले अधिकारियों को दंडित करे।’’

केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के बाद नवीन पटनायक सरकार ने इस रकम की वसूली के लिए पट्टेदारों को सौ से ज्यादा नोटिस जारी किए, लेकिन कंपनियों ने इन नोटिसों को ना तो संजीदगी से लिया और ना ही सरकार के पास रकम जमा की। यही वजह है कि इस वसूली के लिए अब सर्वोच्च न्यायालय को आगे आना पड़ा है। अदालत ने अपने सख्त आदेश में दोषी कंपनियों से कहा है कि यदि वे राज्य में अपना काम आगे भी जारी रखना चाहती हैं, तो पहले सरकार को जुर्माना अदा करें। अदालत का यह फैसला, निश्चित तौर पर देश में अवैध खनन को रोकने के लिए मील का पत्थर साबित होगा। लेकिन अवैध खनन रोकने के लिए सिर्फ यही एक कदम काफी नहीं है। इस मामले में अदालत ने तो अपना काम कर दिखाया है, अब सरकार को भी काम करना चाहिए। जस्टिस शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकार से सिफारिश की थी कि ओडिशा के अवैध खनन घोटाले की सही तरीके से तहकीकात करने के लिए एक सीबीआई जांच होनी चाहिए। बावजूद इसके राज्य की नवीन पटनायक सरकार और भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार ने इस दिशा में अभी तलक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है। दोनों ही सरकारें इस मामले में खामोश हैं। यही नहीं दोषी कंपनियों, सरकारी अफसरों और अवैध खनन में शामिल राजनेताओं पर भी कोई दंडात्मक कारवाई नहीं हुई है। जबकि अपनी जांच में आयोग ने इनकी ओर साफ-साफ इशारा किया है। यदि सरकार वाकई अवैध खनन रोकने के लिए संजीदा है, तो उसे इस मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच करानी चाहिए और जांच में जो भी दोषी पाया जाए, उस पर सख्त कार्यवाही हो।

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