भारतीय राजनीति का व्यवहारिक दर्शन और अदृश्य सिद्धांत – शैलेन्द्र चौहान

3:41 pm or August 9, 2017
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भारतीय राजनीति का व्यवहारिक दर्शन और अदृश्य सिद्धांत

—– शैलेन्द्र चौहान ——

बीजेपी में अमित शाह को सियासत में रणनीति का मास्टर माना जाता है। तो कुछ ऐसी ही पहचान कांग्रेस में अहमद पटेल की है। इस बार गुजरात राज्यसभा चुनाव को दोनों के बीच रणनीति की होड़ ने सबसे रोमांचक मुक़ाबले में तब्दील कर दिया। इस चुनाव के चलते मंगलवार को रात भर सियासी ड्रामा चलता रहा। आखिर एक बड़ी जद्दोजहद के बाद अहमद पटेल राज्य सभा पहुंच गए।  पटेल को राज्यसभा पहुंचने से रोकने की बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की हर कोशिश नाकाम हो गई। अब दोनों दिग्गज गुजरात से राज्यसभा पहुंच गए हैं। अमित शाह पहली बार राज्यसभा पहुंचे हैं तो अहमद पटेल लगातार पांचवीं बार। नतीजों के बाद अहमद पटेल ने ट्विटर पर ‘सत्यमेव जयते’ लिखते हुए अपनी जीत का एलान किया। उन्होंने लिखा, ‘यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है। यह पैसे, ताक़त और राज्य की मशीनरी के खुले इस्तेमाल की हार है। मैं उस प्रत्येक विधायक को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने भाजपा की अभूतपूर्व धमकियों और डर के बावजूद मुझे वोट दिया। भाजपा ने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और राजनीतिक आतंक को ही उजागर किया है।  गुजरात के लोग चुनाव में उन्हें जवाब देंगे।’ पटेल का यह ट्वीट भारतीय राजनीति के बारे में कुछ चिंतनीय तथ्यों और प्रवृत्तियों की ओर इशारा करता है।

उनका यह कहना कि यह पैसे, ताक़त और राज्य की मशीनरी के खुले इस्तेमाल (दुरुपयोग) की हार है आभासी तौर पर तो सही लगता है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। असल में यह कथन जितना भाजपा के लिए सच है ठीक उतना ही कांग्रेस के लिए भी है। हालांकि गत कुछ समय में असम, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम गोवा और बिहार में इस तरह की वीर गाथाएं दर्ज की हैं लेकिन यह भी हम जानते हैं कि कांग्रेस का इतिहास भी इससे इतर नहीं है। राजनीति में नैतिकता जब अव्यवहारिक तत्व मान ली जाये तब यही होगा। हमें सर्वथा ज्ञात है कि अवैध निजी लाभ के लिये सत्ताधारियों द्वारा अपने विधायी शक्तियों का उपयोग राजनैतिक भ्रष्टाचार कहलाता है। किन्तु सामान्यतः सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग (जैसे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को सताना/दबाना, पुलिस की निर्दयता आदि) राजनैतिक भ्रष्टाचार में नहीं गिना जाता। सारी गड़बड़ यहीं से शुरू होती है।

राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाज और व्यवस्था को सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है। अगर उसे संयमित न किया जाए तो भ्रष्टाचार मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के मानस का अंग बन सकता है। मान लिया जाता है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक सभी को, किसी को कम तो किसी को ज़्यादा, लाभ पहुँचा रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार एक-दूसरे से अलग न हो कर परस्पर गठजोड़ से पनपते हैं। भ्रष्ट राजनेता बिना नौकरशाही की मदद के सरकारी धन की लूट नहीं कर सकते। इस भ्रष्टाचार में निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट पूँजी की भूमिका भी होती है। बाज़ार की प्रक्रियाओं और शीर्ष राजनीतिक- प्रशासनिक मुकामों पर लिए गये निर्णयों के बीच साठगाँठ के बिना भ्रष्टाचार इतना बड़ा रूप नहीं ले सकता। आज़ादी के बाद भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की यह परिघटना बड़ी तेज़ी से पनपी है। एक तरफ़ बड़े-बड़े राजनेताओं का अवैध धन स्विस बैंकों के ख़ुफ़िया ख़ातों में जमा है और दूसरी तरफ़ तीसरी श्रेणी के क्लर्कों से लेकर आईएएस अफ़सरों के घरों पर पड़ने वाले छापों से करोड़ों-करोड़ों की सम्पत्ति बरामद हुई है। भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में चुनाव लड़ने और उसमें जीतने-हारने की प्रक्रिया अवैध धन के इस्तेमाल और उसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत बनी हुई है।

यह समस्या अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण के दिनों में भी थी, लेकिन बाज़ारोन्मुख व्यवस्था के ज़माने में इसने पहले से कहीं ज़्यादा भीषण रूप ग्रहण कर लिया है। एक तरफ़ चुनावों की संख्या और बारम्बारता बढ़ रही है, दूसरी तरफ़ राजनेताओं को चुनाव लड़ने और पार्टियाँ चलाने के लिए धन की ज़रूरत। नौकरशाही का इस्तेमाल करके धन उगाहने के साथ-साथ राजनीतिक दल निजी स्रोतों से बड़े पैमाने पर ख़ुफ़िया अनुदान प्राप्त करते हैं। यह काला धन होता है। बदले में नेतागण उन्हीं आर्थिक हितों की सेवा करने का वचन देते हैं। निजी पूँजी न केवल उन नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की आर्थिक मदद करती है जिनके सत्ता में आने की सम्भावना है, बल्कि वह चालाकी से हाशिये पर पड़ी राजनीतिक ताकतों को भी पटाये रखना चाहती है ताकि मौका आने पर उनका इस्तेमाल कर सके। राजनीतिक भ्रष्टाचार के इस पहलू का एक इससे भी ज़्यादा अँधेरा पक्ष है। एक तरफ़ संगठित अपराध जगत द्वारा चुनाव प्रक्रिया में धन का निवेश और दूसरी तरफ़ स्वयं माफ़िया सरदारों द्वारा पार्टियों के उम्मीदवार बन कर चुनाव जीतने की कोशिश करना। इस पहलू को राजनीति के अपराधीकरण के रूप में भी देखा जाता है।

क्या आज की भारतीय राजनीति में कहीं कोई सिद्धांत या दर्शन शेष है ? ‘सिद्धान्त’ का अर्थ है तर्कपूर्ण ढंग से संचित और विश्लेषित ज्ञान का समूह। राजनीति का सरोकार बहुत-सी चीजों से है, जिनमें व्यक्तियों और समूहों तथा वर्गों और राज्य के बीच के संबंध और न्यायपालिका, नौकरशाही आदि जैसी राज्य की संस्थाएँ शामिल हैं। राजनीतिक सिद्धान्त की परिभाषा करते हुए डेविड वेल्ड कहते हैं- राजनीतिक जीवन के बारे में ऐसी अवधारणाओं और सामान्यीकरणों का एक ताना-बाना है ‘जिनका संबंध सरकार, राज्य और समाज के स्वरूप, प्रयोजन और मुख्य विशेषताओं से तथा मानव प्राणियों की राजनीतिक क्षमताओं से संबंधित विचारों, मान्यताओं एवं अभिकथनों से है। एंड्रू हैकर की परिभाषा के अनुसार राजनीतिक सिद्धान्त- एक ओर अच्छे राज्य और अच्छे समाज के सिद्धान्तों की तटस्थ तलाश और दूसरी ओर राजनीतिक तथा सामाजिक यथार्थ की तटस्थ खोज का संयोग है।प्राचीन काल में सारा व्यवस्थित चिंतन दर्शन के अंतर्गत होता था, अतः सारी विद्याएं दर्शन के विचार क्षेत्र में आती थी। राजनीति सिद्धान्त के अन्तर्गत राजनीति के भिन्न भिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता हैं। राजनीति का संबंध मनुष्यों के सार्वजनिक जीवन से हैं। परम्परागत अध्ययन में चिन्तन मूलक पद्धति की प्रधानता थी जिसमें सभी तत्वों का निरीक्षण तो नहीं किया जाता हैं, परन्तु तर्क शक्ति के आधार पर उसके सारे संभावित पक्षों, परस्पर संबंधों प्रभावों और परिणामों पर विचार किया जाता हैं। गुल्ड और कोल्ब ने राजनीतिक सिद्धान्त की एक व्यापक परिभाषा करते हुए कहा है कि ‘राजनीतिक सिद्धान्त राजनीति विज्ञान का एक उप-क्षेत्र’ है,  राजनीति का एक नैतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विचारों का एक ऐतिहासिक अध्ययन, एक वैज्ञानिक मापदंड, राजनीतिक विचारों का भाषाई विश्लेषण और राजनीतिक व्यवहार के बारे में सामान्यीकरणों की खोज और उनका व्यवस्थित विकास। हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बुनियादी तौर पर राजनीतिक सिद्धान्त का संबंध दार्शनिक तथा आनुभविक दोनों दृष्टियों से राज्य की संघटना से है। राज्य तथा राजनीतिक संस्थाओं के बारे में स्पष्टीकरण देने, उनका वर्णन करने और उनके संबंध में श्रेयस्कर सुझाव देने की कोशिश की जाती है। निःसन्देह, नैतिक दार्शनिक प्रयोजन का अध्ययन तो उसमें अंतर्निहित रहता ही है।

चिंतक वाइन्स्टाइन ने कहा था कि राजनीतिक सिद्धान्त मुख्यतः एक ऐसी संक्रिया है जिसमें प्रश्न पूछे जाते हैं, उन प्रश्नों के उत्तरों का विकास किया जाता है और मानव प्राणियों के सार्वजनिक जीवन के संबंध में काल्पनिक परिप्रेक्ष्यों की रचना की जाती है। जो प्रश्न पूछे जाते हैं वे कुछ इस तरह के होते हैंः राज्य का स्वरूप और प्रयोजन क्या है? राजनीतिक संगठन के साध्यों, लक्ष्यों और पद्धतियों के बारे में हम कैसे निर्णय करें? राज्य और व्यक्ति के बीच संबंध क्या है और क्या होना चाहिए? इतिहास के पूरे दौर में राजनीतिक सिद्धान्त इन प्रश्नों के उत्तर देता रहा है। इसे इसलिए महत्त्वपूर्ण माना गया है क्योंकि मनुष्य का भाग्य इस बात पर निर्भर होता है कि शासकों और शासितों को किस प्रकार की प्रणाली प्राप्त हो पाती है और जो प्रणाली प्राप्त होती है उसके फलस्वरूप क्या सामान्य भलाई के लिए संयुक्त कार्यवाही की जाती है। राजनीतिक दर्शन के अन्तर्गत राजनीति, स्वतंत्रता, न्याय, सम्पत्ति, अधिकार, कानून तथा सत्ता द्वारा कानून को लागू करने आदि विषयों से सम्बन्धित प्रश्नों पर चिन्तन किया जाता है। ये क्या हैं, उनकी आवश्यकता क्यों हैं, कौन सी वस्तु सरकार को ‘वैध’ बनाती है, किन अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है, विधि क्या है, किसी वैध सरकार के प्रति नागरिकों के क्या कर्त्तव्य हैं, कब किसी सरकार को उकाड़ फेंकना वैध है आदि। दर्शन में सत्य और ज्ञान की खोज में किसी भी विषय पर किए गए समस्त चिंतन का समावेश है। जब वह खोज राजनीतिक विषयों पर होती है तब उसे हम राजनीतिक दर्शन कहते हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि उसमें कोई सिद्धान्त प्रस्तावित किया जाए और राजनीतिक दर्शन तथा राजनीतिक सिद्धान्त में यही अंतर है। इस प्रकार राजनीतिक सिद्धान्त राजनीतिक दर्शन का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक दर्शन अधिकांशतः काफी अधिक व्यापक होता है और आवश्यक नहीं कि उसमें कोई सिद्धान्त शामिल हो।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दर्शन राज्य, सरकार, राजनीति, स्वतंत्रता, न्याय, संपत्ति, अधिकारों, कानून और किसी भी प्राधिकरण द्वारा कानूनी संहिता को लागू कराने आदि से संबंधित प्रश्नों अर्थात् वे क्या हैं? उनकी जरूरत अगर है तो क्यों है? कौन-सी बातें किसी सरकार को वैध बनाती हैं, उसे किन अधिकारों और किन स्वतंत्रताओं की रक्षा करनी चाहिए और उसे क्यों और कौन-सा रूप ग्रहण करना चाहिए और कानून क्यों है और क्या है और वैध सरकार के प्रति नागरिकों के कर्तव्य यदि हैं तो क्या हैं और कब किसी सरकार को अपदस्थ कर देना वैध होगा या नहीं होगा आदि प्रश्नों का अध्ययन है। ‘राजनीतिक दर्शन’ से बहुधा हमारा तात्पर्य राजनीति के प्रति सामान्य दृष्टिकोण या उसके संबंध में विशिष्ट नैतिकता अथवा विश्वास या रुख से होता है और यह सब जरूरी तौर पर दर्शन के संपूर्ण तकनीकी विषय के अंतर्गत नहीं आता है। राजनीतिक दर्शन का सरोकार अक्सर समकालीन प्रश्नों से नहीं, बल्कि मनुष्य के राजनीतिक जीवन के अधिक सार्वभौम प्रश्नों से होता है। लेकिन यहां मामला सब उल्टा ही दिखाई देता है। राजनैतिक नुकसान उठाकर राष्ट्रहित में कार्य करने की प्रवृति लगता है विदा हो चुकी है वरना एक परिवार विशेष के नाम पर हवाई अड्डा, अस्पताल, विश्वविद्यालय, अनेक संस्थान, नगर -बस्तियाँ हैं लेकिन उनसे बढ़कर त्यागी, तपस्वी, क्रांतिकारी समर्पित नेताओं को यथोचित सम्मान तक न मिलने ने किसी की नैतिकता को परेशानी नहीं होती ? संविधान में सभी भारतीयों को समानता लेकिन अलग-अलग कानून बनाये रखने के औचित्य पर चर्चा तक स्वीकार नहीं, आखिर क्यों?  आज महंगाई सातवें आसमान को पछाड़ते हुए अनंत की ओर है लेकिन जिम्मेवारी लेने वाला कोई नहीं है। कुछ मंत्री तो महंगाई को विकास का पर्याय घोषित कर उसे और बढ़ाने, भड़काने में लगे हैं। महंगी खाद्य वस्तुएं भी शुद्ध नहीं मिलती जबकि हर नगर में लम्बी -चौड़ी सरकारी फौज है जिसका काम मिलावट रोकना है। वे मिलावट रोकने की जिम्मेवारी का निर्वहन करने की बजाय नोट बटोरने का कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं। युवा भटकन बढ़ रही है।

हम सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व बेलगाम टीवी चैनलों को सौंपकर अपनी जिम्मेवारी पूर्ण मान लेंगे तो कैसे उम्मीद करें सुसंस्कृत युवा पीढ़ी की? अन्ना हजारे के अनशन के दौरान टीवी चैनलों ने दिन-रात रामलीला मैदान का सीधा प्रसारण कर भ्रष्टाचार और लोकपाल के मामले में कितनी देश सेवा की, यह जानना दिलचस्प होगा। इन टीवी चैनलों ने इन दौरान विज्ञापनों से 1800 करोड़ रूपये कमाये थे। इलैक्ट्रानिक मीडिया और बड़े घरानों द्वारा संचालित मीडिया सीधे-सीधे अर्थशास्त्र पर चलता हैं इसका नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है। खुद अतिरंजित अथवा दिग्भ्रमित करते हैं महत्वपूर्ण सूचनाओं को छिपाते अथवा तोड़-मोड़ कर प्रस्तुत करना उनका स्वभाव है लेकिन सवाल उठायेंगे दूसरों की नैतिक जिम्मेवारी था। इस सारे परिदृश्य को देखकर लगता हमारी आंख का पानी भी सूख गया है। हम रिश्वत देने और बटोरने के बाद भी नैतिकता पर बेशर्मी से घंटों भाषण देते हैं। स्वार्थ की मोटी चादर ने हमारी नैतिकता को ढककर सुला दिया है जो बार-बार शोर मचाने पर भी नहीं जागती? यदि जाग भी जाए तो फिर से सो जाती है अथवा आंखें चुराने लगती है। नैतिकतावादी बताते हैं कि इसका संबंध अन्तरात्मा से होता है लेकिन आत्मा-परमात्मा के दूरदर्शनी अवतार भी ‘माया महा ठगनी’ बताते हुए हजारों हाथों से माया बटोर रहे हैं। शायद वे नैतिकता की बातें सुनाते-सुनाते इतना थक जाते हैं कि अपने जीवन में उतारने की सामर्थ्य उनमें शेष नहीं रहती। अंतरात्मा की आवाज पर नैतिक अनैतिक सबकुछ किया जा सकता है। योग्य ईमानदार लोगों को चुनाव में इसलिए टिकट नहीं मिलती कि उन्होंने अनैतिक तरीकों से साधन नहीं जुटाये, बड़े नेताओं की चाटुकारिता नहीं। किसी दार्शनिक ने कहा है कि – ‘इस तरह लोग राजनीति में सदा छल और आत्म-प्रवंचना के नादान शिकार हुए हैं और तब तक होते रहेंगे, जब तक वे तमाम नैतिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक कथनों, घोषणाओं और वायदों के पीछे किसी न किसी वर्ग के हितों का पता लगाना नहीं सीखेंगे। सुधारों और बेहतरी के समर्थक जब तक यह नहीं समझ लेंगे कि हर पुरानी संस्था, वह कितनी ही बर्बरतापूर्ण और सड़ी हुई क्यों न प्रतीत होती हो, किन्हीं शासक वर्गों के बल-बूते पर ही क़ायम रहती है, तब तक पुरानी व्यवस्था के संरक्षक उन्हें बेवकूफ बनाते रहेंगे। और इन वर्गों के प्रतिरोध को चकनाचूर करने का केवल एक तरीका है और वह यह कि जिस समाज में हम रह रहे हैं, उसी में उन शक्तियों का पता लगायें और उन्हें संघर्ष के लिए जागृत तथा संगठित करें, जो पुरातन को विनष्ट कर नूतन का सृजन करने में समर्थ हो सकती हैं और जिन्हें अपनी सामाजिक स्थिति के कारण समर्थ होना चाहिए।’

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