भिलारे गुरूजी के लिए दो मिनट का मौन – सुभाष गाताडे

4:05 pm or August 9, 2017
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भिलारे गुरूजी के लिए दो मिनट का मौन

—– सुभाष गाताडे —–

आज़ादी के लिए लड़े स्वतंत्रता सेनानी की मौत की ख़बर अक्सर संमिश्र भावनाओं को जन्म देती है।

लोगों के एक हिस्से के लिए – जिनकी तादाद तेजी से घट रही है – यह अतीत को याद करने का ऐसा अवसर होता है जब आदर्शवाद हवाओं में था और मानवता की मुक्ति के लिए अपने आप को कुर्बान करना गौरव की बात समझी जाती थी, जबकि लोगों के शेष हिस्से के लिए – जो अपने प्राचीन अतीत के वैभव के गल्प पर मस्त है, उसके लिए ऐसी ख़बरें कोई मायने नहीं रखतीं।

भिखु दाजी भिलारे /जन्म 26 नवम्बर 1919/ जिनका हाल में 98 साल की उम्र में निधन हुआ, वह इस मायने में अपवाद रहे। न केवल जीवन के तमाम क्षेत्रों से जुड़े लोग और अलग अलग राजनीतिक धाराओं से सम्बद्ध लोग हजारों की तादाद में उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए बल्कि मुख्यधारा के मीडिया ने भी इसकी ख़बर पाठकों को दी। यह मुमकिन है कि अपनी युवावस्था में राष्ट सेवा दल से सम्बद्ध रहे भिलारे गुरूजी – जैसा कि लोग उन्हें प्रेम और आदर से सम्बोधित करते थे – जो 1942 के झंझावाती दिनों में क्रांतिकारी नाना पाटील की अगुआई में सातारा जिले में बनी प्रतिसरकार में सक्रिय थे और जिन्होंने विधायक के तौर पर जवाली विधानसभा की 18 साल तक नुमाइन्दगी की – लगातार सामाजिक-राजनीतिक कामों में सक्रिय रहे।

तयशुदा बात है कि अधिकतर लोग उनकी जिन्दगी के उस साहसिक कार्य के बारे में नहीं जानते होंगे – जब उन्होंने मुल्क के इतिहास में एक नाजुक वक्त़ में गांधीजी की जान बचायी थी, जब आज़ादी करीब थी और तेजी से बदलते घटनाक्रम में गांधीजी अहम भूमिका निभा रहे थे। यह  1944 का साल था जब गांधी पुणे के नजदीक हिलस्टेशन पंचगणी /मई 1944/ पहुंचे थे, जब वहां 15-20 नौजवानों का एक दस्ता चार्टर्ड बस में पहुंचा। इन नौजवानों ने उनके खिलाफ उनके आवास के सामने विरोध प्रदर्शन किया मगर जब गांधी ने उन्हें वार्ता के लिए बुलाया वह नहीं आए, उसी वक्त यह हमला हुआ था।

गांधी के प्रपौत्र/परपोता तुषार गांधी अपनी किताब ‘लेट अस किल गांधी’ में इस घटना का जिक्र करते हैं। वह बताते हैं कि किस तरह प्रार्थना सभा में नेहरू शर्ट, पाजामा और जैकेट पहने नाथुराम गोडसे, हाथ में खंजर लिए गांधीजी की तरफ लपका था।

भिलारे गुरूजी और मणिशंकर पुरोहित ने गोडसे को कब्जे में किया। गोडसे के साथ जो दो युवा थे, वह वहां से भाग गए।’’…

‘‘जुलाई 1944 में आगा खान पैलेस की कैद से रिहा होने के बाद गांधी को मलेरिया हुआ और उन्हें आराम करने की सलाह डॉक्टर ने दी। ..

वह पंचगणी पहुंचे,, जो पुणे के नज़दीक एक पहाड़ी इलाका है, जहां वह दिलखुश बंगलो में रूके। लगभग 18 से 20 नौजवानों का एक समूह पंचगणी पहुंचा और वहां उसने दिन भर उनके खिलाफ प्रदर्शन किया।’’..

‘‘ जब गांधीजी को प्रदर्शन के बारे में बताया गया तब उन्होंने उस समूह के नेता नाथुराम विनायक गोडसे से सम्पर्क किया और उसे बातचीत के लिए बुलाया। नाथुराम ने न्यौता ठुकरा दिया और प्रदर्शन जारी रखा। ’’

(http://www.newsnation.in/india-news/bhialre-guruji-man-who-saved-mahatma-gandhi-in-1944-dies-at-98-article-177398.html)

वह समूचा प्रसंग भिलारे गुरूजी की याददाश्त में गोया अंकित हुआ था, जिसके बारे में उन्होंने कई स्थानों पर बोला था और लिखा भी है ॅः

‘‘ पंचगणी में महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में आने की सभी को अनुमति मिली थी। उस दिन, उनके सहयोगी उषा मेहता, प्यारेलाल, अरूणा असफ अली और अन्य प्रार्थना में उपस्थित थे। हाथ में खंजर लिए गोडसे गांधीजी की तरफ भागा और कहा कि उसके कुछ सवाल हैं। मैंने उसे रोका, उसका हाथ मरोड़ा और उसका चाकू छीना। गांधीजी ने उसे जाने दिया।”

(http://timesofindia.indiatimes.com/india/man-who-saved-gandhi-in-1944-dies-at-98/articleshow/59673840.cms)

प्रस्तुत घटना ने रातों रात भिलारे गुरूजी को ‘युवकों का आइकन ’ बना दिया जिसका जिक्र वरिष्ठ स्वतंत्राता सेनानी एन डी पाटील के संस्मरणों में भी मिलता है जिन्होंने ‘शेतकरी और कामगार पार्टी अर्थात किसान और मजदूर पार्टी की अगुआई की। 90 साल की उम्र पार कर चुके पाटील ने एक अग्रणी दैनिक को बताया था:

‘‘ गुरूजी ने जिस तरह गांधीजी को गोडसे के हमले से बचाया था वह ख़बर तुरंत सातारा जिले में फैली। मैं उस वक्त़ 15 साल का था। हम कई छात्रा गुरूजी से मिलने साइकिल पर पहुंचे। वह हमारे लिए एक आइकन/हीरो बने थे। उन्होंने ताउम्र सादगीभरा जीवन बीताया और गांधीवादी  उसूलों का पालन किया।’’ 

(http://timesofindia.indiatimes.com/india/man-who-saved-gandhi-in-1944-dies-at-98/articleshow/59673840.cms)

वैसे यह मुल्क में बदलते सियासी माहौल का परिणाम है या लोगों में छा रही थकान का प्रतीक है कि जबकि मीडिया ने भिलारे गुरूजी और उनके बाद के जीवन पर अवश्य रौशनी डाली, मगर उसने इस मसले की चर्चा नहीं की कि किस तरह हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों ने महात्मा गांधी को मारने की कोशिश 1944 में भी की थी, जिसमें उनका भावी हत्यारा मुख्य अभियुक्त था।

यहां यह मसला समीचीन हो उठता है कि आखिर नाथुराम गोडसे और उसके आतंकी समूह ने आखिर किस वजह से गांधीजी पर हमला किया था ?

2.

‘‘..हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक सन्देह नहीं कि इस षडयंत्रा में हिन्दु महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारे रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करते हैं कि पाबन्दी के बावजूद उनमें कमी नहीं आयी है। दरअसल जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है संघ के कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोडफोड/विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।..

/देश के तत्कालीन  गृहमंत्राी पटेल हिन्दु महासभा के नेता एवं बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता एवं समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना करनेवाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखते हैं  (18 जुलाई 1948 ) मूल अंग्रेजी से अनूदित /

बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकीफ हैं कि हिन्दुत्व अतिवादी गांधीजी से कितनी नफरत करते थे, जो इस बात से भी स्पष्ट होता है कि नाथुराम गोडसे की आखरी कोशिश के पहले चार बार उन्होंने गांधी को मारने की कोशिश की थी। (गुजरात के अग्रणी गांधीवादी चुन्नीभाई वैद्य के मुताबिक हिन्दुत्व आतंकियों ने उन्हें मारने की छह बार कोशिशें कीं) गांधीजी को मारने का पहला प्रयास पुणे में (25 जून 1934) को हुआ जब वह कार्पोरेशन के सभागार में भाषण देने जा रहे थे। उनकी पत्नी कस्तुरबा गांधी उनके साथ थीं। इत्तेफाक से गांधी जिस कार में जा रहे थे, उसमें कोई खराबी आ गयी और उसे पहुंचने में विलम्ब हुआ जबकि उनके काफिले में शामिल अन्य गाडियां सभास्थल पर पहुंचीं जब उन पर बम फेंका गया। इस बम विस्फोट ने कुछ पुलिसवालों एवं आम लोग घायल हुए।

जैसे कि उपर चर्चा की जा चुकी है महात्मा गांधी को मारने की दूसरी कोशिश में उनका भविष्य का हत्यारा नाथुराम गोडसे भी शामिल था। सितम्बर 1944 में जब जिन्ना के साथ गांधी की वार्ता शुरू हुई तब उन्हें मारने की तीसरी कोशिश हुई। जब सेवाग्राम आश्रम से निकलकर गांधी मुंबई जा रहे थे, तब नाथुराम की अगुआई में अतिवादी हिन्दु युवकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उनका कहना था कि गांधीजी को जिन्ना के साथ वार्ता नहीं चलानी चाहिए। उस वक्त भी नाथुराम के कब्जे से एक खंजर बरामद हुआ था।

गांधीजी को मारने की चौथी कोशिश में (20 जनवरी 1948) लगभग वही समूह शामिल था जिसने अन्ततः 31 जनवरी को उनकी हत्या की। इसमें शामिल था मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, दिगम्बर बड़गे, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, नाथुराम गोडसे और नारायण आपटे। योजना बनी थी कि महात्मा गांधी और हुसैन शहीद सुरहावर्दी पर हमला किया जाए। इस असफल प्रयास में मदनलाल पाहवा ने बिडला भवन स्थित मंच के पीछे की दीवार पर कपड़े में लपेट कर बम रखा था, जहां उन दिनों गांधी रूके थे। बम का धमाका हुआ, मगर कोई दुर्घटना नहीं हुई, और पाहवा पकड़ा गया। समूह में शामिल अन्य लोग जिन्हें बाद के कोलाहल में गांधी पर गोलियां चलानी थीं, वे अचानक डर गए और उन्होंने कुछ नहीं किया।

उन्हें मारने की आखरी कोशिश 30 जनवरी को शाम पांच बज कर 17 मिनट पर हुई जब नाथुराम गोडसे ने उन्हें सामने से आकर तीन गोलियां मारीं। उनकी हत्या में शामिल सभी पकड़े गए, उन पर मुकदमा चला और उन्हें सज़ा हुई। नाथुराम गोडसे एवं नारायण आपटे को सज़ा ए मौत दी गयी, (15 नवम्बर 1949) जबकि अन्य को उमर कैद की सज़ा हुई। इस बात को नोट किया जाना चाहिए कि जवाहरलाल नेहरू तथा गांधी की दो सन्तानों का कहना था कि वे सभी हिन्दुत्ववादी नेताओं के मोहरे मात्रा हैं और उन्होंने सज़ा ए मौत को माफ करने की मांग की। उनका मानना था कि इन हत्यारों को फांसी देना मतलब गांधीजी की विरासत का असम्मान करना होगा जो फांसी की सज़ा के खिलाफ थे। ..

3.

‘सरकार ने इस बात को चिन्ता के साथ नोट किया है कि व्यवहार में राष्टीय स्वयंसेवक संघ अपने घोषित आदर्शों पर टिका नहीं रहा है।

अवांछित और यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को संघ के सदस्यों ने अंजाम दिया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में राष्टीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों ने हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है जिसमें आगजनी, डकैती, लूट और हत्या तक शामिल है और उन्होंने अवैध ढंग से हथियार और गोला बारूद इकटठा किए हैं। वे ऐसे पर्चे वितरित करते पाए गए हैं, जिसमें लोगों को आतंकी गतिविधियों का सहारा लेने क ेलिए उकसाया गया है, फायरआर्म्स इकटठा करने के लिए कहा गया है, और सरकार के खिलाफ असन्तोष पैदा करने और पुलिस एवं सेना को भेदने की बातें कहीं गयी हैं।

/गांधी हत्या के बाद राष्टीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी का ऐलान करते हुए सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति, 4 फरवरी 1948, मूल अंग्रेजी से अनूदित/

प्रश्न उठता है कि गांधीजी के इन आतंकी हत्यारों ने अपने आपराधिक कारनामे को किस तरह वाजिब ठहराया ?

उनका दावा था कि गांधीजी ने मुसलमानों के लिए अलग राज्य के विचार की हिमायत की और इस तरह वह पाकिस्तान निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। दूसरी बात कि मुसलमानों के कथित अडियलपन के पीछे गांधीजी के ‘तुष्टीकरण’ कीन नीति का हाथ है। कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण के बावजूद गांधीजी ने आमरण अनशन किया ताकि पाकिस्तान को दी जानेवाली 55 करोड़ रूपए की धनराशि दी जा सके।

ऐसा कोईभी शख्स जो उस कालखण्ड से परिचित है बता सकता है कि यह तमाम आरोप बेबुनियाद हैं और तथ्यगत तौर पर गलत हैं। दरअसल साम्प्रदायिक सदभाव के जिस विचार की हिमायत गांधीजी ने ताउम्र की वह संघ, हिन्दु महासभा के हिन्दु वर्चस्ववादी विश्व नज़रिये के बिल्कुल प्रतिकूल था। जहां हिन्दुत्ंव की ताकतों के कल्पनाजगत में राष्ट एक नस्लीय/धार्मिक संरचना/गढंत था, गांधी और बाकी राष्टवादियों के लिए वह एक इलाकाई संरचना थी, एक ऐसा इलाका जहां अलग अलग समुदाय और समष्टियां साथ रह रही हों।

अगर हम गांधीजी को मारने के इस चौदह साला इतिहास पर नज़र डालें – जो 1934 से शुरू होकर 1948 तक चला – यह साफ हो जाता है कि उन्हें मारने का षडयंत्रा बहुत पहले ही रचा जा चुका था, हिन्दुत्व ब्रिगेड के कर्णधारों और उसके प्यादों की नफरत भरी राजनीति के लिए वह बाधा बने थे, लिहाजा उनको मारने के लिए कई तरकीबंे उन्होंने रची थी। 1948 में उनकी हत्या के बाद उसे गोडसे तथा उसके आतंकी मोडयूल की तात्कालिक प्रतिक्रिया के तौर पर पेश करना एक तरह का बहाना रहा है ताकि हिन्दुत्व के मास्टरमाइंड इस अपराध की जिम्मेदारी से बचाये जा सकें।

भिलारे गुरूजी इस हक़ीकत के जिन्दा गवाह थे कि हिन्दुत्व वर्चस्ववाद की ताकतों द्वारा गांधीहत्या को पेश की जानेवाली तमाम दलीलें निरी बकवास हैं। उनकी स्म्रति चिरायु होवो।

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