शर्म उनको मगर आती नहीं – जाहिद खान

2:59 pm or August 18, 2017
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शर्म उनको मगर आती नहीं

—- जाहिद खान —-

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बीआरडी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में पिछले दिनों ऑक्सीजन सप्लाई बंद होने से 48 घंटे के अंदर 30 बच्चों की दर्दनाक मौत की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। सच बात तो यह है कि 7 अगस्त से 11 अगस्त के दरमियान करीब 60 बच्चे मरे हैं। पांच दिनों के भीतर साठ बच्चों की मौत बड़ी घटना है, जिसे महज एक ‘हादसा’ कहकर भुलाया नहीं जा सकता। जैसा कि इस घटना के कुछ दिन बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी प्रेस काॅफ्रेंस में पत्रकारों से कहा है। बच्चों की मौत अस्पताल प्रबंधन की आपराधिक लापरवाही से हुई है, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार भी समान रूप से जिम्मेदार है। मरने वाले सभी बच्चे इन्सेफ्लाइटिस यानी जापानी बुखार से गंभीर तौर पर पीड़ित थे और वेंटिलेटर के सहारे उनकी सांसें चल रही थी। अचानक आॅकसीजन की कमी से इनकी जान चली गई। जैसे ही ये खबर मीडिया के जरिये पूरे देश में पहुंची, हड़कंप मच गया। अस्पताल प्रबंधन और सरकार इस आपराधिक लापरवाही को स्वीकार करती और दोषियों पर जरूरी कार्यवाही करती, इसके उलट सरकार ने मामले की जांच से पहले ही इस बात को सिरे से नकारना शुरू कर दिया कि आॅक्सीजन सिलेंडर्स की कमी की वजह से बच्चों की मौत हुई है। स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का कहना था कि ‘‘अस्पताल में पर्याप्त सिलेंडर्स मौजूद थे। 69 लाख का बकाया बिल भी बहाना है। सरकार को यूं ही बदनाम किया जा रहा है। कुछ बच्चों की मौतंे एईएस, इनफेक्शन और कुछ मौतें इसलिए हुईं, क्योंकि बच्चे कमजोर पैदा हुए थे।’’ यानी सरकार के मुताबिक कोई बच्चा आॅक्सीजन की कमी से नहीं मरा। जबकि इस बात में जरा सी भी सच्चाई नहीं है। यदि सरकार सही थी, तो उसने मृतक बच्चों का पोस्टमार्टम क्यों नहीं करवाया ? क्यों मृतकों के परिजनों को लाश देकर भगा दिया गया ?

अलबत्ता अपना चेहरा बचाने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस पूरे मामले की न्यायिक जांच के आदेश जरूर दे दिए हैं, तो वहीं केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार से इन मौतों को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। मीडिया और जन दवाब में बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रमुख एवं इंसेफेलाइटिस के मरीजों के लिए बनाये गये स्पेशल वार्ड के प्रमुख को इस पूरे मामले में लापरवाही के इल्जाम में निलंबित कर दिया गया है। यही नहीं पुष्पा आक्सीजन गैस एजेंसी के मालिक के घर छापेमारी कर, सरकार ने यह जताने की नाकाम कोशिश की, कि वह इस मामले में बेहद संजीदा है और दोषियों पर कार्यवाही करने से पीछे नहीं हटेगी। एक तरफ सरकार इस बात से इंकार कर रही है कि बच्चों की मौत आॅक्सीजन की कमी से नहीं हुई है, तो फिर पुष्पा आक्सीजन गैस एजेंसी के मालिक के घर पर छापेमारी का क्या मतलब है ? इस पूरे मामले में योगी सरकार की गलतबयानी और कलाबाजी के दरमियान ऑक्सीजन सप्लाई बाधित होने के संबंध में अस्पताल प्रबंधन और आॅक्सीजन गैस एजेंसी के बीच पत्राचार की एक कॉपी मीडिया के जरिये सामने आ गई। जिससे अस्पताल प्रबंधन और सरकार का झूठ जनता के सामने आ गया। दस्तावेजों के मुताबिक ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ‘पुष्पा सेल्स’ का अस्पताल पर कुल बकाया 68,58,596 रुपये था। पैसे का भुगतान नहीं होने पर कंपनी ने सप्लाई रोकने की चेतावनी दी थी। इस बात का साफ उल्लेख एग्रीमेंट में भी है कि दस लाख से ज्यादा रकम का भुगतान यदि समय पर नहीं होगा, तो कंपनी आॅक्सीजन की सप्लाई रोक लेगी। यह पहली बार नहीं है, जब कंपनी ने अस्पताल में ऑक्सीजन सप्लाई रोकी हो, बल्कि पिछले साल अप्रैल में भी कंपनी ने ऑक्सीजन सप्लाई रोकी थी। लेकिन तब ऐसा कोई हादसा नहीं हुआ था और समय रहते मामले को सुलझा लिया गया था। इस बार बात हद से ज्यादा गुजर गई। जिसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ा और उनकी असमय ही मौत हो गई।

गोरखपुर के इस हृदयविदारक मामले में अस्पताल प्रबंधन की आपराधिक लापरवाही तो सामने आई ही है, उत्तर प्रदेश सरकार का भी संवेदनहीन चेहरा सामने निकलकर आया है। इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह और चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन गंभीर नहीं दिखे। स्वास्थ्य मंत्री ने प्रेस काॅफ्रेंस के जरिये, आंकड़ों से यह जताने की कोशिश की, कि योगी सरकार के कार्यकाल में तो इन्सेफ्लाइटिस से बच्चों की मौतें कम हुई हैं। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने यह विवादास्पद बयान दिया कि ‘‘अगस्त महीने में तो ज्यादा बच्चे मरते ही हैं।’’ योगी आदित्यनाथ जो साल 1998 से 17 मार्च, 2017 तक लगातार गोरखपुर के सांसद रहे हैं और फिलहाल प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, सच बात तो यह है कि उन्होंने भी इस मामले में संवेदनशीलता नहीं दिखलाई। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गोरखपुर में मेडिकल सुविधाएँ वैसी की वैसी ही हैं और बच्चों का मरना रुका नहीं है। योगी आदित्यनाथ मीडिया में यह दम भरते हैं कि उनकी सरकार गठन होने के साथ ही सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि ‘‘इमरजेंसी सेवाओं में कोई व्यवधान न आए। कोई फाइल किसी मेज पर तीन दिन से ज्यादा न रुके। दवा या आवश्यक सुविधाओं के लिए किसी स्तर से धन की कमी न होने पाए।’’ लेकिन सच्चाई कुछ और बयां कर रही है। उन्हीं के गृहनगर के एक बड़े अस्पताल में आॅक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत हो गई है। एक अहम बात और, 9 अगस्त को खुद मुख्यमंत्री ने इस अस्पताल में तीन घंटे तक अधिकारियों के साथ बैठक ली थी। बैठक में आॅक्सीजन का मसला नहीं उठा होगा, इस बात का यकीन नहीं होता। बहरहाल हादसे के बाद जब वे एक कार्यक्रम में शामिल हुए, तो अपने भाषण में उन्होंने इंसेफेलाइटिस को एक गंभीर चुनौती बताते हुए इस बीमारी की वजह गंदगी और खुले में शौच करना बतलाया। इस बात में कोई दो राय नहीं कि इन्सेफ्लाइटिस यानी जापानी बुखार मच्छरों की वजह से फैलता है और यह मच्छर गंदगी में पनपते हैं। लेकिन साफ-सफाई की जिम्मेदारी अकेले जनता की नहीं है, सरकार की भी कुछ जिम्मेदारी है। जिसमें साफ-सफाई से लेकर इलाज की बुनियादी सुविधाएं, सर्व सुविधासंपन्न अस्पताल और प्रशिक्षित स्टाफ शामिल है। सरकार सिर्फ वजह बतलाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं छुड़ा सकती।

उत्तर प्रदेश में इंसेफ्लाइटिस या दिमागी बुखार बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्वांचल के कुशीनगर जिले में साल 1978 में दिमागी बुखार का पहला मरीज मिला था, तब से लेकर अब तक इस इलाके में 39 साल के अंदर यह बीमारी 25 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले चुकी है। जिसमें मरने वाले ज्यादातर बच्चे हैं। हर साल सैंकड़ों बच्चे इस बीमारी का शिकार होकर अपनी जान गवां देते हैं। फिर भी सरकारों के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगती। जानकर भी वे अंजान बनी रहती हैं। हर साल की तरह इस साल भी इंसेफ्लाइटिस के प्रति सरकार की उदासीनता और लापरवाही का सिलसिला रूका नहीं है। एक तरफ अंचल में इस बीमारी से मौत का सिलसिला जारी है, तो दूजी तरफ राज्य के स्वास्थ महकमे ने अभी तलक बीमारी की रोकथाम के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं। अस्पतालों में जरूरी दवाओं और टीकों की भारी किल्लत है। गंभीर तौर पर बीमार मरीजों के लिए वेंटिलेटर और आॅक्सीजन सिलेंडर के साथ एम्बूबैग की जरूरत पड़ती है, लेकिन ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में यह बुनियादी सहुलियतें न के बराबर हैं। इन मौतों के बाद भी सूबे की योगी सरकार संजीदा नहीं दिखलाई देती। सरकार यदि जरा सा भी संजीदा होती, तो एक निश्चित समयसीमा के अंदर गोरखपुर मामले की उच्च स्तरीय जांच कराती और जांच में जो भी दोषी पाया जाता, उन पर उचित कार्यवाही होती। फिर वह चाहे कोई क्यों न हो ?

दिमागी बुखार से बचाव करने और बच्चों को इस बीमारी से बचाने के लिए सिर्फ यही काफी नहीं है, योगी सरकार को कुछ ठोस कदम भी उठाने पड़ेंगे। लेकिन कोई ठोस कदम उठाना तो दूर, उसने प्राथमिक स्तर पर भी अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की है। मच्छरजनित इस बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले मच्छरों पर काबू पाया जाए। पर इतनी छोटी सी बात भी सरकार को समझ में नहीं आ पा रही है। दिमागी बुखार से अंचल में हालात बेकाबू हो चले हैं, फिर भी वह हाथ पर हाथ रखे बैठी है। बदइंतजामी का आलम यह है स्वास्थ महकमा, दिमागी बुखार से प्रभावित इलाकों में फाॅगिंग तक नहीं कर पाया है। बीमारी से बचने के लिए उसने न तो एहतियात के कोई पूर्व कदम उठाए हैं और न ही इलाज के लिए कोई वाजिब इंतजाम हैं। यहां तक कि कई जिलों में दिमागी बुखार की जांच के लिए जरूरी सुविधाएं तक नहीं है। जरूरी दवाओं, वेंटीलेटर और एंटी इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन के अभाव ने हालात को और भी बदतर बना दिया है। ऐसा नहीं है कि पिछले चार दशक से लगातार दिमागी बुखार को भुगत रहे, क्षेत्र के लोगों की बीमारी से केन्द्र सरकार अंजान है। पिछले कुछ सालों से केन्द्र सरकार ने बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण की एक मुहिम चलाई हुई है। लेकिन आज भी राज्य में कई इलाके ऐसे हैं, जहां ये टीके नहीं लगाए जा सके हैं। इंसेफ्लाइटिस के बचाव के यह टीके फिलवक्त, अकेले हिमाचल प्रदेश के कसौली स्थित लैब में बनाए जाते हैं। जहां साल भर में भी देश की जरूरत के मुताबिक टीके तैयार नहीं हो पाते।

दिमागी बुखार से लड़ने के लिए आज हमारे पास भले ही कोई कारगर दवाई न हो लेकिन समय पर बचाव और टीकाकरण से इसकी रोकथाम जरूर हो सकती है। बीमारी से बचाव का आसान और कारगर तरीका गंदगी में रोकथाम और मच्छरों को पनपने वाले स्थानों पर फाॅगिंग मशीनों के जरिए मैलाथियान कीटनाशक का छिड़काव है। साथ ही इलाके में बड़े पैमाने पर समय रहते टीकाकरण से भी हालात को काबू में लाया जा सकता है। चीन, कोरिया, जापान और वियतनाम जैसे देश एक समय इस बीमारी से जूझ जुके हैं। लेकिन उन्होंने अब इस रोग पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया है। भारत में भी आंध्रप्रदेश, और तमिलनाडु में सैंकड़ों लोग इस बीमारी से मरते थे। लेकिन गंदगी में रोकथाम और बीमारी के वाहक सुअरों को अलग जगह कर देने के बाद वहां भी यह बीमारी नियंत्रण में है। लेकिन योगी सरकार के स्वास्थ महकमे को अंचल में कीटनाशकों के छिड़काव, सफाई या टीकाकरण जैसे साधारण उपाय करना भी जरूरी नहीं लगता। जबकि, सफाई और मच्छर-रोधी दवाओं का छिड़काव नगरनिगम की सामान्य ड्यूटी का छोटा सा हिस्सा भर है।

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