मुश्किल दिनों में छुट्टी कितनी जायज़ ? – डाॅ0 गीता गुप्त

5:43 pm or August 19, 2017
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मुश्किल दिनों में छुट्टी कितनी जायज़ ?

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

हाल ही में मुम्बई की कल्चर मशीन फर्म और गोजुप ने नयी स्त्री हितैषी योजना के अन्तर्गत महिला कर्मचारियों के लिए मासिक धर्म के पहले दिन अवकाश देने की घोषणा की है। कल्चर मशीन फर्म में 75 महिलाएँ कार्य करती हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि कम्पनी ने महिला बाल विकास मन्त्रालय में एक याचिका दाखिल कर सरकार से पूरे देश में इस योजना को लागू करने का आग्रह किया है।

मुम्बई की एक मीडिया कम्पनी के बाद कोच्चि के मीडिया समूह ‘मातृ-भूमि‘ ने भी महिला कर्मचारियों को उनकी माहवारी के पहले दिन सवैतनिक अवकाश देने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही देश भर में इस तरह के ‘माहवारी अवकाश‘ लागू करने -न करने को लेकर बहस छिड़ गई है। क्या देश के सभी संस्थानों/प्रतिष्ठानों/कम्पनियों के मुखिया ऐसे अवकाश हेतु सहमत होंगे ? महिला सशक्तिकरण की पैरोकार महिलाओं का एक तबका इस अवकाश के विरोध में है। मगर महिलाओं का एक ऐसा वर्ग भी है जो इस अवकाश का पक्षधर है।

मासिक धर्म एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। महीने के ये चार-पाँच दिन महिलाओं के लिए मुश्किल भरे होते हैं। वे शारीरिक रूप से थकान और कष्ट का अनुभव करती हैं ,साथ ही मानसिक तौर पर भी उनपर एक खिन्नता हावी रहती है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उन दिनों वे अपने आपको अस्वच्छ और अपवित्र मानती हैं और ईश्वर की आराधना से भी दूर रहती हैं। तो इसका उनके मन पर भी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। प्रश्न यह है कि क्या इसके लिए उन्हें बाक़ायदा अवकाश दे दिया जाना चाहिए ?

यूरोप में इटली ऐसा पहला देश है, जहाँ माहवारी के दिनों में महिलाओं के लिए इस तरह का अवकाश देने का निर्णय लिया गया है तथा जापान, इण्डोनेशिया, दक्षिण कोरिया और ताइवान में भी सवैतनिक अवकाश का प्रावधान है। रूस तथा आस्ट्रेलिया में भी शीघ्र ही यह नियम लागू होने की सम्भावना है। भारत में इस सन्दर्भ में की गई पहल एकदम नयी है और अधिकतर कामकाजी महिलाओं द्वारा इसे सही ठहराया जा रहा है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नेत्री और सामाजिक कार्यकत्र्री वृन्दा करात ने आईएएनएस से कहा-‘‘सभी कम्पनियों को अपनी छुट्टी के चार्ट में ‘पीरियड्स लीव ‘ का विकल्प रखना चाहिए ताकि ज़रूरतमन्द महिलाएँ इसका लाभ ले सकें। इसका वैकल्पिक तौर पर उपयोग किया जाना चाहिए; लेकिन मैं इस छुट्टी को अनिवार्य किये जाने की पक्षधर नहीं हूँ।‘‘

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने भी ऐसे अवकाश से असहमति जतायी है और कहा कि, ‘‘आज महिलाएँ प्रतिदिन नयी ऊँचाइयों को छू रही हैं। ऐसे में ,इस तरह के दकियानूसी नियम थोपे जाने से कार्यालय में महिलाओं की भागीदारी पर असर पड़ेगा। महिलाएँ शारीरिक रूप से मज़बूत हैं और मासिक धर्म की नैसर्गिक प्रक्रिया हमारे जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग है। ऐसे में ‘माहवारी अवकाश‘ का नियम महिलाओं को शारीरिक रूप से कमज़ोर मानने वाली सोच पर मुहर लगाने जैसा है।‘‘

महिला-अधिकारों के लिए काम करने वाली अशासकीय संस्था ‘सखी‘ की सदस्यों ने मुम्बई की कम्पनी की पहल का स्वागत करते हुए कहा है कि ‘‘इसका विरोध करना अनुचित है। माहवारी के दिनों में महिलाओं को दर्द होना स्वाभाविक है और यदि किसी कम्पनी ने महिलाओं कोे इन मुश्किल दिनों में अवकाश की सुविधा देने की शुरुआत की है तो इसमें ग़लत क्या है ? इन दिनों में प्रायः महिलाएँ कार्यालयों में या कहीं भी काम पर जाना पसन्द नहीं करतीं। वे अधिक शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करने की स्थिति में नही होती हैं। ऐसे में यदि कोई कम्पनी अपने महिला कर्मचारियों को इस तरह का अवकाश दे रही है तो यह महिला सशक्तिकरण की राह में रोड़े अटकाने जैसा कुछ भी नहीं है।‘‘

गुड़गाँव की प्रसिद्ध तकनीकी कम्पनी विप्रो में कार्यरत् सुनीता माथुर ने आईएएनएस से कहा, ‘‘मैं चाहती हूँ कि मुम्बई की उक्त कम्पनी की तर्ज़ पर देश भर के कार्यालयों में इस तरह की व्यवस्था हो ताकि हमें कुछ तो राहत मिले। इससे हम कमज़ोर साबित नहीं होंगी।‘‘

ग़ौरतलब है कि सरकार स्त्रियों के मातृत्व अवकाश की अवधि तीन माह से बढ़ाकर साढ़े छह माह पहले ही कर चुकी है। इस कारण संस्थानों पर आर्थिक भार बढ़ता है। किसी शिक्षिका के मातृत्व अवकाश पर जाने की दशा में उसके स्थान पर अस्थायी रूप से नियुक्त व्यक्ति को वेतन देना संस्था का व्यय-भार बढ़ना ही है। अन्य क्षेत्रों में कार्यरत् महिलाओं के भी ऐसे अवकाश पर जाने से कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। यदि वैकल्पिक तौर पर ही मासिक धर्म के दिनों में अवकाश का प्रावधान कर दिया जाए तो कम्पनियों में महिलाओं की नियुक्ति खटाई में पड़ जाएगी। बहुत सम्भव है कि तब नियोक्ता अपनी कम्पनी में महिलाओं के स्थान पर पुरुषों की नियुक्ति को प्राथमिकता दें। ‘‘सवैतनिक अवकाश‘‘ का प्रावधान तो कम्पनियों में महिलाओं की नियुक्ति के द्वार ही बन्द कर सकता है।

यह सच नहीं है कि मासिक धर्म के दिनों में शिक्षित कामकाजी महिलाओं की उपस्थिति उनके कार्यस्थल पर घट जाती है। अलबत्ता ‘वैकल्पिक‘ या ‘अनिवार्य‘ माहवारी छुट्टी का प्रावधान उनके लिए कार्य-विमुख होने की छूट देने वाला साबित हो सकता है। कुछ तकनीकी संस्थान या कम्पनियाँ अपने यहाँ कार्यरत् महिलाओं को घर से भी कार्य करने की ( बल्कि नौकरी ही घर से कर लेने तक की ) सुविधा देती हैं ,यह महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी है। मगर अध्यापन, पुलिस-सेवा और अन्य कई क्षेत्रों में नौकरी घर बैठे रहकर करना सम्भव नहीं है। ग़ौरतलब है कि कुछ राज्यों में महिलाओं के लिए पुलिस-सेवा में 30 प्रतिशत और शिक्षा विभाग में 50 प्रतिशत पद आरक्षित कर दिये गए हैं। तो इतने व्यापक पैमाने पर सेवारत् महिलाओं को मासिक धर्म के कष्ट के नाम पर सहानुभूति जतलाते हुए अवकाश देना सही नहीं ठहराया जा सकता।
आज महिलाएँ अपने अधिकारों की पैरवी करते हुए कुछ अनुचित या असंगत माँगों की पूर्ति के लिए भी धरने-आन्दोलन तक करने पर उतारू हो जाती हैं। पिछले दिनों मन्दिरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध को लेकर अच्छा-ख़ासा आन्दोलन किया जा चुका है। जिसका समाधान न्यायालय को ही करना पड़ा क्योंकि धर्माचार्यों या सामाजिक संगठनों के नेताओं के तर्क महिलाओं को सन्तुष्ट करने में विफल रहे थे। यह भी सच है कि अब महिलाएँ केवल तर्क की कसौटी पर खरे उतरने वाले निर्णयों की हामी भरती हैं, उन्हें अपने अधिकारों के अलावा दूसरे पहलुओं की कोई चिन्ता नहीं है।

यहाँ प्रसंगवश जार्जिया की राजधानी तबलिसी के सबसे महँगे क्लब ‘वेक स्वीमिंग और फ़िटनेस क्लब‘ की एक घटना उल्लेखनीय है। गत वर्ष अगस्त में वहाँ क्लब में लोगों ने यह नोटिस देखा-‘‘ डियर लेडीज़, पीरियड्स के दौरान पूल में स्वीमिंग करने न जाएँ। पूल की स्वच्छता और सफ़ाई के कारण यह फ़ैसला लिया गया है।‘‘ यह देखते ही महिला तैराक सोफी ताबात्द्जे ने सोशल मीडिया के विरोध में पोस्ट करना शुरु कर दिया। उसने अपनी पोस्ट में लिखा-‘‘ आपको पता भी है कि यह कितना अपमानजनक है ? यह महिलाओं के साथ भेदभाव करने जैसा है। आपके इस नियम के अनुसार, हम महीने में पाँच-छह दिन स्वीमिंग नहीं कर पाएँगे। आपके क्लब ने पैसे तो हमसे पुरुषों के बराबर लिये हैं लेकिन स्वीमिंग हम उनसे कम दिन कर पाएँगे। डाॅक्टर भी महिलाओं को पीरियड्स के दौरान स्वीमिंग करने की सलाह देते हैं। उस दौरान होनेे वाले दर्द से इसमें राहत मिलती है। तो फिर आप कैसे हमें मना कर सकते हैं ? इस पोस्ट के बाद सोफी ने क्लब के फेसबुक पेज़ पर भी पोस्ट किया-‘‘इस मैसेज़ का यही मतलब है कि आप महिलाओं के प्रति द्वेष का भाव रखते हैं। आपका क्लब उन्हें कमतर समझता है, जो सही नहीं है।‘‘

अन्ततः सोफी के अभियान को मिले व्यापक समर्थन के बाद क्लब के मैनेजर को माफ़ी माँगने के लिए विवश होना पड़ा। उन्होंने इस विवाद पर क्षमा माँगते हुए कहा-‘‘हमारा बयान जेण्डर बायस्ड नहीं है। हमने पूल की साफ़-सफ़ाई के मद्देनज़र यह फै़सला किया था। हम कोई बन्दिशें नहीं लगाना चाहते। यदि किसी का अपमान हुआ , तो हम माफ़ी माँगते हैं। हम यह नोटिस वापस लेते हैं।‘‘

उक्त प्रकरण पर यदि ईमानदारी से विचार करें तो शायद ही कोई महिला माहवारी के दौरान स्वींिमंग पूल में तैराकी को उचित ठहरा सकेगी और मन्दिर में पूजा के लिए भी शायद मुट्ठी भर महिलाएँ भी तत्पर न हों। परन्तु अपने अधिकारों की दुहाई देते हुए स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर तर्क की कसौटी पर किसी अनुचित बात को भी सही ठहराना आज आम बात हो गई है। मानाकि हानिकारक रूढ़ियों-परम्पराओं को ढोते चले जाना अब उचित नहीं है। परन्तु अधिकार के नाम पर परम्पराओं को चुनौती देने की बजाय स्त्रियों को ऐसे क़दम उठाने को प्राथमिकता देनी चाहिए जिससे देश में उनके विकास के नये द्वार खुलें और उनकी उन्नति की राह आसान हो। माहवारी के दिनों में मन्दिरोें में प्रवेश की अनुमति मिल जाने या स्वीमिंग की छूट मिलने से व्यापक स्त्री समाज का ऐसा क्या भला हो सकता है, जिससे वे अब तक वंचित थीं ? फिर यदि पुरुष के साथ समानता की बात ही प्रमुख है तो स्त्री को कोई विशेष अवकाश क्यों मिलना चाहिए ?

आज स्त्रियाँ प्रत्येक क्षेत्र में राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना रही हैं। वे शिक्षिका, प्रशासिका, खिलाड़ी, विज्ञानी, पुलिस, डाॅक्टर, इंजीनियर, न्यायाधीश ,राजनेत्री-सभी कुछ तो हैं। तो क्या सबको हर माह मासिक धर्म के नाम पर एक दिन का अवकाश दे देना सम्बन्धित संस्थानों और कार्य-संस्कृति के लिए हानिकारक नहीं होगा ? उत्तर सर्वविदित है। स्त्रियों को काम न करने या अवकाश के बहाने ढूँढ़ने की बजाय काम करने और देश की दशा पर भी विचार करना चाहिए। स्त्री होने के नाते सिर्फ़ अपने अधिकार ही नहीं, कर्तव्य का भी उन्हें स्मरण होना चाहिए। पुरुष से होड़ लेेने वाली स्त्रियों को आज कुछ क्षण एकान्त में आत्मचिन्तन करना नितान्त आवश्यक है ताकि उनमें कुछ तो स्त्रियोचित् शेष रह सके। अगर वे ऐसा नहीं चाहतीं तो फिर पुरुषों से बराबरी के मैदान में अपने लिए किसी विशेषाधिकार की अपेक्षा क्यों ?

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