चुनाव आयुक्त ने खोल दी बीजेपी की कलई – विवेकानंद

6:21 pm or August 19, 2017
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चुनाव आयुक्त ने खोल दी बीजेपी की कलई

—— विवेकानंद ——

मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत का मानना है कि आजकल हर हाल में चुनाव जीतना एक चलन बन गया है। लोकतंत्र तभी अच्छा चलता है जब चुनाव निष्पक्ष और सही तरीके से हो लेकिन आम आदमी को ऐसा लग सकता है कि राजनीतिक दल चुनाव को हर हाल में जीतना चाहते हैं, और इसके लिए एक तरह की स्क्रिप्ट भी लिखते हैं। विधायकों की खरीद-फरोख्त करना, उन्हें धमकाना एक चतुर चुनावी प्रबंधन है। किसी को अपनी ओर करने के लिए पैसे का लालच देना, राज्य तंत्र का उपयोग करना, ये सब चुनाव जीतने का हिस्सा बन गया है। विजेता कोई पाप नहीं कर सकता है और एक हारने वाले को भी इस अपराधिक दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता है। आज की राजनीति में यह एक तरह की साधारण चीज हो गई है। यह उस राजनीतिक कुचक्र के अनुभव का प्रकटीकरण है जो बीजेपी ने गुजरात में रचा था और जिसको बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भोपाल में आकर स्पष्ट शब्दों में कह भी दिया। भोपाल में शाह ने कहा कांग्रेसियों के काम मत करो, उन्हें असहज करो और बीजेपी में शामिल करो। शाह का यह बयान कांग्रेस के आरोपों की पुष्टि करता है, कि बीजेपी विधायकों को डरा धमका कर तोड़ रही है और जो नहीं टूट रहे हैं उन्हीं जांच एजेंसियों के मार्फत कर रही है।

पिछले तीन सालों में जो कुछ देखने को मिला उससे स्पष्ट है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं के दुरुपयोग से लेकर राजभवन के मार्फत सरकार बनाने-बिगाड़ने, सांसद-विधायकों की खरीद-फरोख्त और राजनीतिक बदलते तक की सारी कार्रवाईयों का सहारा ले रही है और ईमानदारी व नैतिक शिक्षा का ढोंग कर रही है। गुजरात में अहमद पटेल के राजनीतिक ‘आखेट’ के लिए उसने अभूतपूर्व सियासी ड्रामा किया। हद तो तब हो गई जब देश के कानून मंत्री बीजेपी कार्यकर्ता बनकर चुनाव आयोग पर दबाव बनाने निर्वाचन कार्यालय पहुंच गए। कम से कम राज्यसभा चुनाव की एक सीट के लिए इस तरह की जिद कभी देखी नहीं गई।

यह कभी न भूलने वाला कड़वा सच है कि भारतीय लोकतंत्र के कई नुमाइंदे सियासत की मंडी में अपनी बोली लगाकर न केवल विचाराधार बल्कि जनता के विश्वास को बेच देते हैं। पैसे लेकर संसद में सवाल उठाने से लेकर राज्यसभा में समर्थन अथवा विरोध के काले पन्ने संसदीय इतिहास में हैं और सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग की भी लंबी सूची है। वर्ष 2008 में जब अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार पर वामपंथियों ने डॉ. मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, उस वक्त अहमद पटेल ने विपक्षी दल की सारी संभावनाओं पर पानी फेर दिया था। सोनिया गांधी के इस राजनीतिक सचिव ने अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मिलकर ऐसी बिसात बिछाई कि संसद में नोट लहराना भी काम न आया। उल्टे जांच शुरू हुई और बीजेपी नेताओं को जेल की हवा खानी पड़ी। जनता इस और इस तरह की अन्य घटनाओं से परिचत है। लेकिन मौजूदा वक्त में यह सब जिस तरह खुल्लमखुल्ला और ताल ठोककर किया जा रहा है, वह ‘प्रचंड जनादेश’ का भरोसा छलनी करने वाला है।

भगवा रणनीतिकार भले ही इसे लेकर बेपरवाह हों, लेकिन हर मोर्चे पर जीत की सनक से गुजरात में रचे गए समूचे सियासी ड्रामे से बीजेपी के प्रति कई मोर्चों पर नकारात्मक संदेश गया है। जिसको मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ शब्दों में बयान कर दिया। कांग्रेस 6 विधायकों के इस्तीफा देने के बाद बाकी बचे एमएलए को कर्नाटक ले गई। किसी को उम्मीद भी नहीं थी यहां आयकर विभाग छापा डालने आ जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में कहा कि विधायकों के होटल में छापा नहीं डाला गया है, जबकि मीडिया को मिले सीसीटीवी फुटेज में यह बात पकड़ में आ गई। इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि यह छापा सरकार के इशारे पर डाला गया था। इससे पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए बलवंत राजपूत को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया, इससे यह बात भी छिपी नहीं रह गई कि कांग्रेस विधायक अपने नेतृत्व पर अविश्वास के कारण पार्टी छोड़कर आए या राज्यसभा जाने की लालच और मामूली किराने की दुकान से खड़ा किया अरबों का साम्राज्य बचाने की चिंता में।

गुजरात राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने लिए अनुपलब्ध तीसरी सीट जीतने का प्रयास किया। इससे पहले गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में सियासी बाजीगरी दिखाई गई। इसके अलावा  पिछले साल बीजेपी ने ऐसा ही खेल मध्यप्रदेश से एडवोकेट विवेक तन्खा को रोकने के लिए विनोद गोडिया को डमी कैंडीडेट के रूप में उतारकर खेला था जबकि उत्तर प्रदेश से वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल को रोकने के लिए गुजरात के एक उद्योगपति की पत्नी को मैदान में उतारा था। दोनों स्थानों पर बीजेपी के पास तीसरा प्रत्याशी जिताने लायक वोट नहीं थे। ये उम्मीदवार किस भरोसे से उतारे गए थे कहने की जरूरत नहीं है। बीजेपी जिस मासूमियत से कांग्रेस नेताओं में नेता और नेतृत्व के प्रति अविश्वास करार देती है वह वास्तव में बहाना है। हकीकत यह है कि बीजेपी हर मोर्चे पर और हर कीमत पर जीत चाहती है, इसके लिए वह सभी हथकंडों का इस्तेमाल कई गुना दुस्साह से और खुलेआम कर रही है। साथ ही निरंतर सफलता के अहंकार में इस तथ्य को भी अनदेखा करती जा रही है कि ‘हरहाल में जीत’ की सनक में उसके बुनियादी उसूलों और चुनावी वादों की कलई खुलकर सामने आती जा रही है, जिन पर भरोसा करके 2014 में अभूतपूर्व जनादेश मिला था।

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