आत्ममुग्धता का सम्मोहन अपना प्रोफाइल फोटो अपडेट किया क्या ?

4:42 pm or June 9, 2014
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अंजलि सिन्हा-

दिल्ली के एक नौजवान को कुछ खुराफाती व्यवहार से सोशल मीडिया में चर्चा बनने का आइडिया आया। उसने अपने कमरे में वीडियो कैमरा लगा कर पिता को अन्दर बुलाया और कहा कि उसकी गर्लफ्रेण्ड गर्भवती हुई है। पिता ने बेटे की धुनाई कर दी। बाद में बेटे ने योजना के मुताबिक उसे यूटयूब पर अपलोड कर दिया। लड़के का अन्दाज़ा एकदम सही निकला। वह क्लिप यूटयूब पर हिट हो गयी। एक हफ्ते के अन्दर आठ लाख से ज्यादा लोगों ने इस वीडियो को देखा तथा इसी समय दो हजार से अधिक लोगों ने ‘लाइक’ किया।

पापुलर होने की जबर्दस्त ख्वाहिश को आज कल युवा ऐसे भी पूरा करता है। बात महज उस नौजवान की नहीं है जिसने वीडियो बनाया और अपलोड किया बल्कि उन आठ लाख देखनेवालों और उसे लाइक करनेवालों की है। मज़ाक का स्तर देखें और वीडियो में चल रहा हिंसाचार देखें। आखिर उसमें देखनेवाली क्या बात थी जिसके लिए लोगों का आकर्षण बना ? किसी लड़की के प्रेगनेन्ट होना सुनना भी इतना पसन्द है क्या लोगों को ? या उस ख़बर मात्र से लोगों को कल्पना के अपने घोड़ें कहीं और भगाने का मौका मिला होगा। जो भी हो यह चर्चित हो चुका वीडियो का उदाहरण मात्र लोगों की मानसिकता को बयान करता है।

आज कल सेल्फी शब्द काफी चर्चा में है यानि अपना फोटो खुद ही अपने मोबाइल से खिंचते रहिए, खुद देखते रहिए और फेसबुक पर डाल कर दूसरों को भी दिखाते रहिए। नेल्सन मंडेला के अन्तिम संस्कार में ओबामा तथा अन्य राजनेता खुद अपना सेल्फी खींचते नज़र आए थे और आलोचना का पात्र बने थे क्योंकि उन्होंने बेहद गम्भीर माहौल को हल्का बनाया था। बहरहाल अब मनोवैज्ञानिक लोग इस नतीजे तक पहुंचे हैं कि अपना ही फोटो खींच कर खुद ही अपलोड करने का सिलसिला इस कदर आगे बढ़ा है जिसे किसी भी सूरत में स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। यह एक तरह से आत्ममुग्धता, नशा अर्थात एडिक्शन और मानसिक अस्वस्थता का लक्षण है। एक मनोवैज्ञानिक ने बताया कि कैमरा फोन के आगमन के बाद उसके यहां आनेवाले तीन में से दो मरीज – जो बॉडी डिसमॉर्फिक डिसआर्डर की शिकायत करते हैं, अर्थात जिन्हें खुद किस तरह दिखते हैं इसे लेकर अधिक चिन्ता होती है- उनके साथ यह देखने में आ रहा है कि उनके अन्दर यह लत लग जाती है कि अपनी ही सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया साइटस पर डालने की। ऐसे मरीजों को ठीक करने के लिए कोगनिटिव बिहेवरियल थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है कि मरीज उन कारणों को पहचाने कि उसके इस व्यवहार के पीछे क्या वजह है।

पिछले साल ‘पर्सनालिटी एण्ड इण्डिविजुअल डिफरनसेस’ में प्रकाशित एक अध्ययन में एक अहम निष्कर्ष निकाला था। इस अध्ययन का कहना था कि किसी व्यक्ति के फेसबुक पर कितने फ्रेण्डस हैं और आत्ममुग्धता में सीधा रिश्ता है ; जिस व्यक्ति के जितने अधिक फ्रेण्ड हों तब यह सम्भावना अधिक बनती है कि वह अधिक आत्ममुग्ध होगा।

निश्चित सोशल मीडिया बहुत उपयोगी और कारगर भी है। कम समय में लगभग बिना खर्च के लोगों तक सन्देश पहुंचाने का यह माध्यम टेक्नोलोजी के विकास ने सुगम बनाया है। यह भी बात चर्चा में आयी कि इन दिनों किस तरह मॉडलिंग, एक्टिंग आदि के साथ ही शादी का प्रपोजल भी फेसबुक फोटो देख कर भेजे जाने का रिवाज चल पड़ा है। और अपने को परफेक्ट लुक देने के लिए फेसलिट ट्रीटमेण्ट का चलन बढ़ रहा है। इसमें कास्मेटिक ट्रीटमेण्ट तथा छोटी मोटी सर्जरी करके चेहरे को आकर्षक बनाया जाता है। यह क्रेज सिर्फ लड़कियों में नहीं, लड़कों में भी बढ़ रहा है। नाक, आइब्रो, होंठ, ठुढी आदि का आकार बदलने का उपाय भी अब मौजूद है। इसके बाद चेहरे को फोटोजनिक बना कर कई पोज देकर खींचे गए तस्वीरों को अपलोड कर दिया जाता है।

युवा लड़कें लड़कियां जहां आकर्षक दिखने का दौड़ लगा रहे हैं वहीं 40 के बाद वाले अपने आप को युवा दिखाने के लिए भी कई उपायों में जुटे दिखते हैं। वे भी फेसबुक फेसलिट ट्रीटमेण्ट करवाते हैं। इसके लिए बोटेक्स इंजेक्शन लगवाने का उपाय तो पहले से ही था। अगर कास्मेटिक सर्जनों की या डर्मेटालाजिस्ट को सुनें तो वे बताते हैं कि अच्छे लुक्स तथा युवा दिखने के लिए लोग फेसबुक फेसलिट ट्रीटमेण्ट का सहारा ले रहे हैं, जिसमें न्यूनतम खर्च 10 हजार से शुरू होता है तथा 40 हजार तक बैठता है।

फेसबुक इस तरह अपनी शक्ल सूरत पर फिदा रहने या आत्ममुग्ध बने रहने का जो एक रास्ता दिखाता है, उसी तरह एक अलग किस्म की आत्ममुग्धता को भी सुगम बनाता है, जिसका ताल्लुक सामाजिक सरोकार के मसलों से हैं।

दरअसल अब आप घर बैठे भी ‘पापुलर’ हो सकते हैं, बहुत ‘एक्टिव’ नजर आ सकते हैं और सिर्फ फोटो के सहारे नहीं बल्कि अपने गरम गरम विचारों के सहारे। यूं तो विचारों का आदान प्रदान अच्छा होता है, विचार प्रचारित प्रसारित करने के लिए ही होता है। सोशल मीडिया का इसमें योगदान मानना ही पड़ेगा। लेकिन गौर इस पर फरमाया जाना चाहिए कि यह निष्क्रियता को भी सक्रिय होने के बोध में बदल रहा है। यदि अपनी गतिविधियों तथा कामों को एक दूसरे तक जानकारी के रूप में पहुंचाया जाना या फिर इसे ही अपनी गतिविधि मान कर दूसरों तक पहुंचने का माध्यम बनाया जाए इन दोनों में काफी फर्क है।

इस आनलाइन एक्टिविजम के सबसे चर्चित रूप ‘लाईक’ को निशाने पर रखते हुए पिछले साल यूनिसेफ ने अपने एक बेहद साहसी विज्ञापन मुहिम की शुरूआत की थी। यूनिसेफ स्वीडन ने जनता से यह अपील करने के लिए वह मानवीय सहायता को महज सोशल मीडिया के पोस्ट के माध्यम से शेअर करने या लाइक करने तक सीमित न रखें बल्कि ठोस वित्तीय सहायता देने के लिए आगे आएं इसके लिए तीन विज्ञापनों की एक श्रृंखला जारी की।

एक में दस साल का एक अनाथ बच्चा एक अंधेरे कमरे में खड़ा कैमरे के सामने खड़े होकर बात करता दिखता है, पीछे उसका छोटा भाई खेल रहा है। वह कहता है कि ‘कभी कभी मुझे इस बात की चिन्ता होती है कि मेरी मृत मां की तरह मैं भी बीमार हो जाउंगा। लेकिन मुझे लगता है कि सबकुछ ठीक ही रहेगा क्योंकि आज की तारीख में स्वीडन की यूनिसेफ शाखा को फेसबुक पर 1,77,000 लाइक्स मिले हैं।’पत्राकारों से बात करते हुए यूनिसेफ, स्वीडन की कम्युनिकेशन्स प्रमुख कहती हैं कि ‘ फेसबुक पर ‘लाइक’ हमें पसन्द आते हैं, और किसी मुद्दे से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया अच्छा पहला कदम हो सकता है, मगर लाइक से बच्चों की जिन्दगी नहीं बच सकती, टीके खरीदने के लिए पैसे लगते हैं।

अमेरिका की अदालत में एलजीबीटी समुदाय (समलैंगिक सम्बन्धों के हिमायती) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने आ रही याचिका को लेकर हयूमन राइटस कैम्पेन की तरफ से यह अपील की गयी थी कि लोग अपना फेसबुक प्रोफाइल बदलें और उसे लाल एवं गुलाबी समानता के चिन्ह में तब्दील करें। हयूमन राइटस कैम्पेन का मकसद था कि इसके जरिए अमेरिका में समयौनिक विवाहों को लेकर समर्थन उजागर हो सके। इसकी अच्छी प्रतिक्रिया भी रही। इस मुहिम पर प्रतिक्रिया देते हुए एक विश्लेषक ने कहा कि जस्टिस एंथनी कैनेडी, जो इस मुद्दे पर अपना निर्णय सुनानेवाले हैं , वे आप का फेसबुक प्रोफाइल फैसला सुनाने के पहले देखेंगे नहीं और न ही उस पर गौर करेंगे। दरअसल अदालत पहले से जानती है कि देश में इस मसले को लेकर लोग किस तरह बंटे हुए हैं।

उसका कहना था कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इसका महत्व नहीं है। ‘मगर प्रतिरोध का भविष्य यही है तो हमारी पीढ़ी को शर्म आनी चाहिए। यह वास्तविक बदलाव लाने की दिशा में बेहद आलस्य भरा एवं अप्रभावी काम है।’ अपने लेख का अन्त करते हुए वह लिखते हैं ‘अपना प्रोफाइल पिक्चर अपडेट करने के पहले आप प्रेरणा ग्रहण करने के लिए अपने अतीत को देखें। साठ के दशक को याद करें, उन तमाम जुलूसों को याद करें जब समानता की मांग करते हुए हजारों लोग सड़कों पर उतरे थे।’

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