बी.एड. की डिग्री योग्यता की गारण्टी नहीं – डाॅ0 गीता गुप्त

4:39 pm or August 26, 2017
metro_ae9a39ba-e644-11e6-947f-9490afc24a59

बी.एड. की डिग्री योग्यता की गारण्टी नहीं

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

देश में शिक्षा का गिरता हुआ स्तर चिन्ताजनक है। केन्द्र सरकार ने शिक्षा में सुधार की आवश्यक पहल करते हुए लोकसभा में एक विधेयक प्रस्तुत कर सरकारी एवं निजी विद्यालयों के शिक्षकों के लिए दो वर्ष की अवधि में बी.एड.पूरा करना अनिवार्य कर दिया है। इस समय निजी व शासकीय विद्यालयों में अनुमानतः आठ लाख शिक्षक ऐसे हैं जो आवश्यक न्यूनतम योग्यता नहीं रखते हैं। अप्रशिक्षित शि़क्षकों द्वारा विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना बहुत हानिकारक है। अब वर्ष 2019 तक सभी कार्यरत् शिक्षकों को अनिवार्य न्यूनतम अर्हता हासिल करनी होगी अन्यथा नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। अभी उन्हें दो वर्ष का समय दिया गया है।

दरअसल वर्ष 2010 में जब सर्व शिक्षा अभियान चलाया गया और अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू किया गया तब कई विद्यालय खोले गए थे। जिनमें प्रायः स्नातक एवं परास्नातक उपाधिधारी अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई। साधारणतया शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। इसीलिए पूर्व में पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान ( बेसिक ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट ) में दो वर्षीय आवासीय प्रशिक्षण होता था। पहले वर्ष इनमें विधिवत् सैद्धान्तिक शिक्षा दी जाती थी और शिक्षण की पद्धतियों तथा बारीकियों से अवगत कराया जाता था। दूसरे वर्ष प्रशिक्षणार्थियों को प्रयोग व अभ्यास के उद्देश्य से विद्यालयों में अध्यापन के लिए भेजा जाता था। इस अवधि में प्रशिक्षणार्थी के प्रशिक्षण की यह प्रक्र्रिया बड़ी ईमानदारी से सम्पन्न की जाती थी। इसके बाद सरकारी विद्यालयों में नियुक्ति दी जाती थी। यही कारण है कि बी0 टी0 आई0 का बहुत महत्त्व था और वहाँ से भली-भाँति प्रशिक्षित शिक्षक देश को मिलते थे। लेकिन यह चार दशक पुरानी बात हो गई। अब यह प्रणाली लागू नहीं है।

अब शिक्षक बनने के लिए पात्रता परीक्षा तो होती है लेेकिन किसी प्रकार का व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। शिक्षक बनने के लिए बी.एड. का दो वर्षीय पाठ्यक्रम पूर्ण करना पड़ता है। लेकिन यह प्रक्रिया केवल काग़ज़ पर ही सम्पन्न होती है। यह कोर्स करने वालों की हक़ीक़त यह है कि वे बी.एड. तक शुद्ध रूप से नहीं लिख पाते। अभी पिछले माह सम्पन्न परीक्षा में ही लोगों को ‘बि.एड.‘, ‘इमण्क ‘ और ‘ इमक‘ लिखते देखा गया। यह दुःखद सत्य है कि सरकारी संस्थान कम होने के कारण निजी संस्थान बी.एड. की डिग्री बेचने वाली दुकान बन गए हैं। कुकुरमुत्ते की तरह उग आए ये संस्थान खू़ब चाँदी कूट रहे हैं। सरकार की तरफ़ से इन संस्थानों की गुणवत्ता की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है।

अकेले मध्यप्रदेश में ही 480 संस्थान हैं, जहाँ से बी. एड. किया जा सकता है। इनमें से सरकारी संस्थान कुछ ही होंगे। विडम्बना यह कि इन संस्थानों में मोटी फ़ीस चुकाकर प्रवेश लेने वालों की भरमार है परन्तु इन संस्थानों में न प्रवेश की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है, न परीक्षाएँ आयोजित की जाती हैं। उन्हें केवल प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी है परन्तु न वहाँ कक्षाएँ लगती हैं, न कोई प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रवेश व परीक्षाओं की सारी औपचारिकता पारम्परिक उच्च शिक्षा वाले महाविद्यालयों में वहीं के प्राध्यापकों से सम्पन्न करवायी जाती है।

यह विचारणीय है कि यदि सरकार ने बी. एड. की डिग्री बाँटने के लिए निजी संस्थानों को अनुमति दे दी है तो उन्हें ही प्रवेश और परीक्षा करवाने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए ? सरकार देश में शिक्षा का स्तर सुधारने की नीयत दर्शाती है मगर उसकी करनी और कथनी में बहुत अन्तर है। शिक्षकों के वास्तविक प्रशिक्षण पर उसका ज़ोर नहीं है। केवल बी. एड., एम. एड. जैसी डिग्री योग्यता की गारण्टी मान ली गई है। जबकि यह सही नहीं है। बी. एड. के लिए मानव संसाधन विकास मन्त्रालय ने भी ‘स्वयं‘ पोर्टल आरम्भ किया है जिसमें कोई भी पंजीयन कराकर बी. एड. की डिग्री स्वाध्याय करके प्राप्त कर सकता है। प्रश्न यह है कि डिग्री के लिए पढ़ाई तो पोर्टल से सम्भव है पर व्यावहारिक प्रशिक्षण का क्या होगा ?

एक निजी काॅलेज से बी.एड. के लिए प्रवेश की औपचारिकताएँ पूरी करने वाली युवती से जब मैंने पूछा कि उसने भोपाल के काॅलेज मंे प्रवेश क्यों लिया जबकि वह रीवा की रहने वाली है ? तो उसने उत्तर दिया-‘मुझे यहाँ रहना थोड़े ही है। एडमिशन हो गया, अब परीक्षा देने आना है बस। काॅलेज वाले टाइमटेबिल बता देंगे। परीक्षा फार्म भरने आने की भी ज़रूरत नहीं है, सब काॅलेज वाले करा देंगे। बस परीक्षा के समय आ जाऊँगी।‘ स्पष्ट है कि बी. एड. की डिग्री कितनी खोखली हैै।

दूसरा उदाहरण भी देखें। हाल ही में भोपाल के जवाहरलाल ( निजी ) काॅलेज में बी. एड. में प्रवेश लेने आयी एक छात्रा से जब उसका नाम पूछा गया तो वह हड़बड़ा गई। वह नहीं बता पाई कि उसने दसवीं कक्ष़्ाा कब उत्तीर्ण की ? जब पूछा गया कि बारहवीं कक्षा किस संस्था से उत्तीर्ण की ? तो उत्तर मिला-‘ अहिल्या देवी यूनीवर्सिटी इन्दौर से।-‘ उस छात्रा की फ़ोटो फॅार्म पर लगी फ़ोटो से मिलान करने पर पता चला कि वह फ्रॅाड है। उसपर एफआईआर दर्ज करवाने की बात सुनते ही वह फाॅर्म और सारे प्रमाणपत्र छोड़कर भाग खड़ी हुई और काॅलेज का दलाल भी भाग गया। काॅलेजों के मालिक और दलाल जानबूझ कर विलम्ब से प्रवेशार्थियों को लेकर आते हैं ताकि आनन-फानन में उनका भौतिक सत्यापन हो जाए और प्रवेश में कठिनाई न हो। लेकिन प्रवेश की औपचारिकता सम्पन्न करने वाले प्राध्यापक बहुत दबाव में होते हैं क्योंकि एक तो बी. एड. काॅलेजों के मालिक और दलाल गुण्डागर्दी और बहसबाज़ी पर उतर आते हैं । दूसरे, पोर्टल को नियमानुसार समय पर शाम 5.30 बजे बन्द हो जाना चाहिए जैसाकि प्रवेश फाॅर्म पर समय अंकित है लेकिन ऐसा नहीं होने के कारण प्राध्यापकों को बाध्य होकर देर शाम-रात तक भी प्रवेश- कार्य करना पड़ता है। इस अराजकता पर कौन विराम लगाएगा ?

यह नितान्त आवश्यक है कि विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और शिक्षक भी उत्तम कोटि के हों। मगर ऐसा तब तक सम्भव नहीं है, जब तक निजी संस्थान बी. एड., एड. की डिग्री बेचने हेतु स्वतन्त्र हैं। सरकार को चाहिए कि वह शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में ही डी. एड.की भी व्यवस्था करे क्योंकि यह कक्षा बारहवीं के बाद होता है। आगे बी.एड. व एम. एड. करवाने की अनुमति केवल शासकीय पारम्परिक शिक्षा वाले महाविद्यालयों को ही दी जानी चाहिए। इससे इन डिग्रियों के फर्जी़बाड़े पर विराम लग सकता है और कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी संस्थानों की दुकानदारी भी बन्द की जा सकती है, जो नितान्त आवश्यक है।

सच तो यह है कि राज्य व केन्द्र सरकारें शिक्षा की दुर्दशा पर गम्भीर नहीं हैं। कई चरणों में दो-तीन माह तक प्रवेश-कार्य जारी रहना क्या सिद्ध करता है ? शिक्षा सत्र मज़ाक़ बनकर रह गए हैं। विद्यार्थी इन संस्थाओं में प्रवेश के बाद केवल परीक्षा देने आते हैं। एक शिक्षक के लिए प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है मगर प्रशिक्षण केन्द्र अधिकतर निजी होने के कारण डिग्री बेचने वाली दुकान में तब्दील हो चुके हैं, जिनपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। जब तक निजी संस्थान कोरी डिग्रियाँ बेचते रहेंगे, तब तक फर्जी़ शिक्षक तैयार होते रहेंगे। अब तो बुरे दौर से गुज़र रहे इंजीनियरिंग काॅलेज तक बी. एड., एम. एड. करा रहे हैं। ऐसे में सरकार यदि सचमुच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शिक्षक चाहती है तो उसे दृढ़तापूर्वक ऐसे ग़ैरसरकारी संस्थानों पर ताले डलवाने होंगे।

उल्लेखनीय है कि सरकार के निर्देश पर सरकारी विद्यालयों मेें अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों का पता लगाने के लिए एक उपकरण विकसित किया गया है, जो विद्यालय- परिसर के पचास मीटर के दायरे के बाहर रहने वाले शिक्षकों को ग़ैरहाज़िर बता देगा। यह व्यवस्था पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर मणिपुर में आरम्भ की जाएगी और बाद में इसे देश के अन्य हिस्सों में लागू किया जाएगा। शिक्षकों की उपस्थिति के लिए बायोमीट्रिक प्रणाली का भी उपयोग किया जा रहा है। लेकिन असल समस्या तो शिक्षा और शिक्षकों की गुणवत्ता की है । सरकार को इसके लिए दृढ़ता दिखानी होगी और निजी संस्थानों के फर्जीबाड़े पर अविलम्ब विराम लगाना होगा। केवल डिग्री योग्यता का मानदण्ड नहीं हो सकती और वर्तमान में जो देखा जा रहा है, वह तो बहुत ही भयानक है।

प्रधानमन्त्री कहते हैं कि लोगों को शिक्षक बनने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि शिक्षक का पद बहुत गरिमामय होता है और शिक्षण का कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण है। लेकिन आज हम जिस व्यवस्था में साँस ले रहे हैं, उसमें अच्छे शिक्षक बनने की सम्भावनाएँ शून्य होती जा रही हैं। एक ज़माना था, जब शिक्षक अपनी योग्यता और प्रतिभा के बल पर समाज में विशेष स्थाान पाते थे। आज प्रतिभाशाली शिक्षकों का अकाल होता जा रहा है। ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, समयनिष्ठा, अनुशासन, समर्पण जैसे गुणों की शिक्षा लिए बिना ही जब शिक्षकों की जमात तैयार हो रही है तो शिक्षा की बदहाली कैसे दूर होगी ? प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से शिक्षा का विस्तार करने और इसकी गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित करने सम्बन्धी निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार ( संशोधन ) विधेयक लोकसभा में पारित कर देने मात्र से सरकार का दायित्व सम्पन्न नहीं हो गया। अप्रशिक्षित शिक्षकों को बी.एड. करने के लिए समय निर्धारित कर देने से भी समस्या हल नहीं होगी। सरकार को इसके लिए ठोस क़दम उठाने होंगे।

इसके लिए सबसे सरल उपाय तो यही है कि राज्य व केन्द्र सरकार के सभी शासकीय ( पारम्परिक शिक्षा वाले ) महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में बी. एड. और एम. एड. की शिक्षा-व्यवस्था आरम्भ कर दी जाए और शिक्षकों को दो वर्ष तक ईमानदारीपूर्वक प्रशिक्षण दिया जाए। यह मुश्किल काम नहीं है। कालान्तर में बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान की तरह ही आवासीय शासकीय संस्थान खोलकर प्रशिक्षण की अनिवार्य व्यवस्था की जानी चाहिए। यह और भी बेहतर होगा। हालांकि इसमें समय लगेगा क्योंकि संस्थान खोलने की प्रक्रिया और सारी व्यवस्था तत्काल सम्भव नहीं है। पर सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए क्योंकि शिक्षकों की आवश्यकता तो समाज मंे निरन्तर बनी रहेगी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रयास में कोताही नहीं होनी चाहिए।

सरकार अपनी ओर से जो भी क़दम उठाये , पर शिक्षक बनने की इच्छा रखने वालों को भी यह स्मरण रखना चाहिए कि अध्यापन कोई मामूली कार्य नहीं है। यह देश की नींव मज़बूत करने का गम्भीर दायित्व है, जिसे बिना योग्यता के नहीं निभाया जा सकता। शिक्षक के पद को ग्रहण करने के पूर्व अपने को पूर्णतः योग्य बनाना उनकी भी नैतिक ज़िम्मेदारी है। उन्हें सोचना चाहिए कि बिना योग्यता के शिक्षक बनना क्या देश के साथ छल करना नहीं है ?

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in