माध्यमिक शिक्षा मण्डल की यह गाइड लाइन खोखली कर देगी शिक्षा की नींव – डाॅ0 गीता गुप्त

6:23 pm or August 31, 2017
exam-school

माध्यमिक शिक्षा मण्डल की यह गाइड लाइन खोखली कर देगी
शिक्षा की नींव

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

समूचे देश में विद्यालयीन शिक्षा की दशा बहुत चिन्ताजनक है। एक ओर क़ानून बनाकर बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो दे दिया गया मगर दूसरी ओर, शिक्षा के लिए जो नितान्त आवश्यक बातें हैं उनपर किसी सरकार का ध्यान नहीं है। अब तक देश में एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्मित नहीं हो पाई है। शिक्षा-पद्धति, शिक्षा-व्यवस्था, पाठ्यक्रम-निर्धारण, शिक्षा-संस्थानों की अधोसंरचना आदि को लेकर इतनी विसंगतियाँ हैं कि सोचकर आश्चर्य होता है कि स्वाधीनता के बाद भारत में जिस शिक्षा की उन्नति को प्राथमिकता देने की सर्वाधिक आवश्यकता थी, उसकी पूरी तरह अनदेखी की गई और यह सिलसिला अब तक चला आ रहा है।

प्राथमिक शिक्षा के बारे में अनगिनत बार यह रपट उजागर हो चुकी है कि आज पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी तीसरी कक्षा का पाठ भी नहीं पढ़ पाते। उनका भाषा-ज्ञान दयनीय है। गणित और विज्ञान की बात तो छोड़ ही दें। पहले पाँचवीं, आठवीं और ग्यारहवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षाएँ होती थीं। विद्यार्थी डटकर पढ़ाई करते थे और पढ़ाई बोझ नहीं समझी जाती थी। पता नहीं कब विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई भारस्वरूप हो गई और सरकार उन्हें भारमुक्त करने के लिए इतनी आतुर हो उठी कि उसने बच्चों के भविष्य की परवाह किये बिना पहले पाँचवीं और आठवीं की बोर्ड परीक्षाओं के प्रावधान को समाप्त कर दिया। फिर 11वीं की बोर्ड परीक्षा भी बन्द कर दी गई। इतना ही नहीं, कक्षा आठवीं तक बच्चों को अनुत्तीर्ण किये जाने पर भी पूर्णतः रोक लगा दी गई। यानी विद्यार्थी 14 वर्ष की उम्र तक बिना कुछ सीखे भी अगली कक्षा में बढ़ता रहा।

इस व्यवस्था के दुष्परिणाम निरन्तर सामने आते रहे हैं। निश्चित रूप से, परीक्षा से मुक्ति मिल जाने के कारण विद्यार्थियों में पढ़ाई के प्रति उत्साह नष्ट हो गया। और अब, जब आगे की कक्षाओं में बोर्ड परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है तो वे दबाव अनुभव करते हैं। यही कारण है कि परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर वे आत्मघाती क़दम तक उठा लेते हैं। प्रारम्भिक कक्षाओं से उन्हें परीक्षा का सामना करनेे की अब आदत ही नहीं रही। सीखने की उम्र में वे बिना मेहनत किये, बिना परीक्षा दिये अपने जीवन का अमूल्य समय गँवा रहे हैं तो इसमें दोष किसका है ?

अब इसपर विचार किया जा रहा है कि विद्यार्थियों को बिना परीक्षा आगे की कक्षा में न बढ़ने दिया जाए। माता-पिता स्वयं भी इस व्यवस्था से असहमति व्यक्त करते हुए बच्चों के लिए इसे घातक मानते हैं। मगर विडम्बना देखिए, सरकार को एक महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय लेने में कितना समय लग रहा है ? बच्चे परीक्षा दें, उनमें आत्मविश्वास जाग्रत हो और वे अपनी योग्यता के बल पर ही अगली कक्षाओं में पढ़ें-ऐसी नीति बनाने और उसे लागू करने के लिए कितना समय चाहिए ? यह भी विडम्बना है कि सुधार के नाम पर शिक्षा में निरन्तर प्रयोग किये जा रहे हैं। हाल ही में माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने नयी गाइड लाइन जारी की है, जिसके अनुसार कक्षा नवमी और दसवीं में अब छह में से केवल पाँच विषयों में ही उत्तीर्ण होना आवश्यक होगा।

माध्यमिक शिक्षा मण्डल के अन्तर्गत हाई स्कूल की नौवीं और दसवीं कक्षाओं में अध्ययनरत् विद्यार्थियों की वार्षिक परीक्षा की अंकसूची में अब उनके सभी छह विषयों के अंकों को शामिल नहीं किया जाएगा। केवल उन पाँच विषयों के अंक जोड़े जाएँगे, जिनमें उनका प्रदर्शन अच्छा होगा। मतलब, परीक्षा तो सभी विषयों की देनी होगी मगर जिन पाँच विषयों में विद्यार्थी सर्वाधिक अथवा सन्तोषजनक अंक प्राप्त करेगा उन्हीं की गणना अंकसूची में शामिल की जाएगी। यदि एक विषय में वह अनुत्तीर्ण भी होगा तो उसे अंकसूची में प्रदर्शित तो किया जाएगा पर उसके अंक महायोग में शामिल नहीं किये जाएँगे। यदि वह दो विषयों में, उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम अंक प्राप्त नहीं कर पाता ; तो उसे दो विषयों में पूरक की पात्रता होगी।

प्रश्न यह है कि अब यदि पाँच ही विषयों में उत्तीर्ण होने की बाध्यता या अनिवार्यता होगी तो विद्यार्थी छह विषयों की पढ़ाई क्यों करेगा और सभी विषयों की परीक्षा क्यों देगा ? माध्यमिक शिक्षा मण्डल का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। यह विद्यार्थियों के हित में नहीं है। ऐसे में तो विद्यार्थी जिस विषय में कमज़ोर है, उसकी परीक्षा की तैयारी ही नहीं करेगा और उस विषय के प्रति पूर्णतः उदासीन हो जाएगा। यह विद्यालयीन शिक्षा और परीक्षा-व्यवस्था के साथ ऐसा खिलवाड़ है जो बुनियादी शिक्षा को कमज़ोर करेगा। इसका दुष्परिणाम विद्यार्थियों को ही भुगतना होगा क्योंकि आगे चलकर उच्च शिक्षा में वे मेहनत करने के क़ाबिल नहीं बन पाएँगे। उनमें इच्छा-शक्ति का अभाव होगा और पढ़ाई के प्रति रुचि नहीं रह जाएगी।

आजकल बारम्बार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव की बात दोहरायी जा रही है तो इसका दारोमदार आखि़र किस पर है ? अब सरकार, राजनेता और अफ़सर तय करते हैं कि विद्यालयों में क्या पढ़ाया जाए, कब और कैसे पढ़ाया जाए ? शिक्षक के हाथ में कुछ भी नहीं है। वह एक डरा-सहमा हुआ वेतन-भोगी प्राणी है, जो सरकारी आदेश का पालन करने के लिए अभिशप्त है। जिसके मुँह में ज़बान तो है लेकिन उसे खोलने की मोहलत नहीं। उससे न कुछ पूछा जाता है, न उसकी सुनने की किसी में उत्कण्ठा है। शायद यही वजह है कि अब पहले की तरह समर्पित शिक्षक भी नहीं रहेे। फिर भी शिक्षा की तरह शिक्षक के महत्त्व को भी नहीं नकारा जा सकता।

यह तो निर्विवाद है कि आज शिक्षा-व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। बुनियादी शिक्षा पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए; क्योंकि जिस तरह बुनियादी शिक्षा की नींव खोखली हो रही है उसके कारण उच्च शिक्षा की गुणवत्ता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। विद्यालयीन शिक्षा-पद्धति में सुधार के लिए तत्काल पहल की जानी चाहिए। यह देश बहुत समय गँवा चुका है, अगर अब भी शिक्षा में सुधार के नाम पर प्रयोग ही जारी रहे तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में प्रतिभाओं का अकाल हो जाएगा।

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in