क्या भारत “लिंचिस्तान” बन गया है? – रूपा सुब्रमण्या

3:59 pm or September 5, 2017
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क्या भारत “लिंचिस्तान” बन गया है?

—– रूपा सुब्रमण्या —–

मोदी सरकार को पशु व्यापार के अपारदर्शी और कठोर नियमों की तत्काल समीक्षा करने की आवश्यकता है।

देश में भीड़ के द्वारा नृशंस हत्या (लिंचिंग) और सामूहिक हिंसा की बहुप्रचारित घटनाओं, जिनमें से ज्यादातर मवेशियों के व्यापार या गौ मांस खाने के मुद्दों से संबंधित हैं, के मद्देनजर हिन्दुस्तान को लिंचिस्तान कहा जाने लगा है क्योंकि भीड़ द्वारा नृशंस हत्या करने और सामूहिक हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। यह कहा जा सकता है कि केंद्र में  मई 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद इस तरह की हिंसा बढ़ गई है।

मुख्यधारा के  मीडिया प्रतिष्ठानों द्वारा ऐसी घटनाओं को जनता के समक्ष लाने पर हमेशा ऑनलाइन रहने वाले दक्षिणपंथी तत्वों, जिनमे अधिकांश भाजपा के पक्षधर है, इसका विरोध करते हुए दावा करते है कि लिंचिंग और सामूहिक हिंसा की घटनाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह वास्तव में अंग्रेजों द्वारा स्थापित व्यवस्था से संचालित लोगों द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और देश की छवि को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख़राब और बदनाम करने का कुत्सित प्रयास है।

दुर्भाग्य से,  भारत को लिंचिस्तान कहने वाले और इसका विरोध करने वाले  दोनों ही पक्षों के पास न तो ऐसी घटनाओं के आंकड़े है और न ही उनका विश्लेषण है। उल्लेखनीय रूप से ये बातें सिर्फ दावों और राय पर  आधारित हैं तथा कभी-कभी इन्हें आंकड़ों और विश्लेषण का चोला पहनाकर प्रस्तुत किया जाता हैं।

भीड़ द्वारा नृशंस हत्या (लिंचिंग) और सामूहिक हिंसा से सम्बंधित आंकड़ों के अभाव में इस अविवेकपूर्ण और पक्षपाती बहस से सत्य और असत्य के बीच निर्मित इस गहरी खाई को पाटने के लिए मेरे पास तथ्यपरक आंकड़े है जो मैं कुछ समय से एकत्रित कर रही हूँ। ये आंकड़े जनवरी  2011 से लेकर 2017 तक के है।  चूंकि मेरे पास  कोई आधिकारिक आंकड़े नहीं है, जिन्हें घटना के प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया गया हो, लेकिन  मैंने विविध समाचार रिपोर्टों का विस्तृत अनुसन्धान करके एक नया डाटासेट इकट्ठा किया है। जहां संभव हुआ  मैंने  ऐसी घटनाओं पर केन्द्रित विशिष्ट रिपोर्टो की वैकल्पिक रिपोर्टों से तुलना करके  घटनाओं की न्यायपूर्ण तरीके से जांच की है।

स्पष्टतया, सभी आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार स्रोतों से आते हैं और इसलिए यदि कोई चाहे तो उन्हें पुनर्निर्मित किया जा सकता है। यहाँ लिंचिंग से आशय ऐसी घटनाओं से है जिनमे भीड़ द्वारा की गयी हिंसा के कारण व्यक्ति मारे गए हों। लोक अव्यवस्था या उपद्रव से आशय हिंसा की उन घटनाओं से है जिन्हें किसी समूह या व्यक्ति द्वारा अंजाम दिया गया हो। दोनों में ही ऐसी घटनाये शामिल है जिनके सांप्रदायिक उद्देश्य हो भी सकते है और नहीं भी हो सकते है। ये घटनाये या तो एक वर्ग में आती है, या दूसरे में। लेकिन दोनों में नहीं।

चार्ट-1 में जनवरी 2011 से जून 2017 तक भीड़ द्वारा की गयी हिंसा  (लिंचिंग एवं पब्लिक डिसऑर्डर) की कुल घटनाओं का एक लाइन चार्ट बनाया गया है। चार्ट में डाटा पॉइंट्स के माध्यम से एक रैखिक ट्रेंडलाइन भी बनाई गयी है।

chart-1

इस चार्ट को देखने से यह स्पष्ट है और ट्रेंडलाइन देखने से पुष्टि होती है कि समय के साथ-साथ प्रति माह की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। उक्त चार्ट में प्रदर्शित ग्राफ उन लोगों के दावों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है जो यह कहते है कि लिंचिंग और भीड़ द्वारा सामूहिक हिंसा की घटनाओं में पहले की तुलना में कोई वृद्धि नहीं हुई है तथा कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के समय भी इतनी ही घटनाये होती थी जितनी वर्तमान में भाजपा सरकार के समय में हो रही है।

लिंचिंग से आशय ऐसी घटनाओं से है जिनमे किसी व्यक्ति की सामूहिक हिंसा में हत्या कर दी जाती है। डिसऑर्डर या उपद्रव से आशय हिंसा की ऐसी घटनाओं से है जिन्हें व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा अंजाम दिया गया हो।

सतही रूप से, यह चार्ट दिखाता है कि यूपीए शासन में और फिर भाजपा शासन में भी भीड़ की हिंसा समय के साथ साथ लगातार बढ़ रही है। यह संभवतया दोनों सरकारों को कटघरे में खड़ा करता है क्योंकि शायद वे दोनों ही यह तर्क दे सकते है कि कुछ अंतर्निहित सामाजिक परिवर्तनो के कारण समय-समय पर हिंसा में वृद्धि होती रही हैं, फिर  चाहे जो भी पार्टी सत्ता में हो।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंसा में समग्र वृद्धि की प्रवृत्ति जनवरी 2011 से जून 2017 तक के आंकड़ों में महत्वपूर्ण बदलाओ को दर्शाती है। दूसरे शब्दों में, यह यह कहा जा सकता है  कि यूपीए के शासन में  भीड़ की हिंसा बढ़ी  है, लेकिन यह प्रवृत्ति भाजपा के सत्ता में आने के बाद तेज हो गई है। लेकिन समूची अवधि की ट्रेंडलाइन हमें यह नहीं बता सकती है कि यह सही है या नहीं।

आंकड़ों की भाषा में कहें तो  जो हम ढूँढ रहे हैं वह समय की श्रृंखला में एक “संरचनात्मक विराम” है और आगे क्या यह संरचनात्मक विराम  यदि मौजूद रहता  है, तो क्या यह भाजपा की चुनावी जीत के अनुकूल होगा?

हम यह मान लेते है कि मई 2014 में बीजेपी द्वारा आम चुनाव जीतने के बाद इसमें एक संरचनात्मक विराम हो सकता है। इस संभावना का परीक्षण करने का एक आसान तरीका चार्ट 1 में आंकड़ों को पुन: निर्मित किया गया  है, लेकिन हमें इन आंकड़ों को दो उप-समूहों में बांटना है। पहले जनवरी 2011 से मई 2014 (चार्ट 2) और उसके बाद जून 2014 से जून 2017 (चार्ट 3)।

रैखिक ट्रेंडलाइन के साथ ये दो चार्ट प्रस्तुत है। (चार्ट 2 और 3)

chart-2

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यह कहानी हमें चकित करती  है। चार्ट 2 में एक नीचे की ओर गिरती हुई ट्रेंड लाइन दिखाई देती है, जिसका मतलब है कि संप्रग सरकार के उत्तरार्ध के दिनों में भीड़ द्वारा की गयी हिंसा वास्तव में कम थी। चार्ट 3 बाद की अवधि के लिए घटनाओ की बढती हुई प्रवृत्ति दिखाता है, जिसका अर्थ है कि 2014 के मध्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद लिंचिंग और हिंसा कि घटनाये बढ़ रही है।

इसके अलावा, हम देखते हैं कि चार्ट 1 के पूर्ण डाटासेट में जून 2014 और उसके बाद से ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ता जा रहा है। यह क्या हो रहा है, इसे जानने के लिए बस थोडा सा गणित लगाने की जरुरत है।

यह संभव है कि एक कठोर सांख्यिकीय परीक्षण, जिसे चाऊ टेस्ट कहा जाता है, के माध्यम से इस पूर्वाभास को औपचारिक रूप दे दिया जाये, जो यह निर्धारित करता है कि क्या इस ट्रेंड में संरचनात्मक विराम मौजूद है या नहीं। यह परीक्षण इस बात की पुष्टि करता है कि वास्तव में मई और जून 2014 के बीच इस ट्रेंड में एक सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण संरचनात्मक विराम या ठहराव है।  ठीक उसी तरह चार्ट 2 और 3 हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं।

इससे भी अधिक एक और परीक्षण करना संभव है जिसे क्वांट-एंड्रयूज़ टेस्ट कहा जाता है।  यह वास्तव में एक मेटा-टेस्ट है, जो सभी संभव विकल्पों के बीच आंकड़ों में सबसे सांख्यिकीय महत्वपूर्ण विराम बिंदु (ब्रेकपॉइंट) को ढूंढने के लिए उपयोग किया जाता है। क्वांट-एन्ड्रयूज़ टेस्ट निश्चित रूप से जून 2014 को ब्रेकपॉइंट के रूप में दर्शाता है। यहाँ यह बात दोहराई जा रही है कि संरचनात्मक विराम के लिए यह तारीख शोधकर्ता द्वारा लागू नहीं की गई है, बल्कि परीक्षण द्वारा यह तारीख सामने आई है। आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि मई और जून 2014 के बीच भीड़ द्वारा हिंसा की प्रवृत्ति में वास्तव में एक बदलाव आया है और ऐसी हिंसक ताकतों का प्रभाव बढ़ा है।

इस सांख्यिकीय विश्लेषण के नतीजे, सदैव ऑनलाइन रहने वाले दक्षिणपंथियों के उन तर्कों को ख़ारिज करते है जिसमे वे हिंसा में वृद्धि को नकारते है। यदि  भारत को एक लिंचिस्तान इसी आधार पर कहा जा रहा है और ऐसे आरोप लगाये जा रहे है कि 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाये बढ़ रही है तो आंकड़े इसका समर्थन करते है।

एक महत्वपूर्ण और आवश्यक चेतावनी यह है कि यह डेटासेट, जिस पर यह सांख्यिकीय विश्लेषण आधारित है, मीडिया रिपोर्टों से बनाया गया है। किसी  आधिकारिक डेटासेट से नहीं। इसलिए यह तार्किक संभावना कम से कम है कि भाजपा की जीत के बाद सामूहिक हिंसा में बढ़ोतरी को मीडिया द्वारा बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया हो। हालांकि यह सवाल किया जा सकता है कि इस तरह का कोई दावा कैसे विश्वसनीय हो सकता है? सच कहें तो इसके लिए प्रमुख मीडिया हाउसों में उच्च स्तर के समन्वय और तालमेल की आवश्यकता होगी, जो आगे भाजपा की जीत के समय अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

प्रधान मंत्री मोदी और भाजपा के प्रति  मुख्यधारा के मीडिया का झुकाव सभी को भली भांति ज्ञात है। यह निश्चित है कि मई 2014 के बाद कुछ रिपोर्टिंग पूर्वाग्रह से ग्रस्त रही है। लेकिन सामूहिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि एक वास्तविकता है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

आंकड़े स्वयं से इन सवालों का जवाब नहीं दे सकते हैं, लेकिन प्रधान मंत्री मोदी ने हाल ही में स्वयं इसका जवाब दिया है,  जिसमें उन्होंने हिंसा और गौरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करने की चेतावनी दी है ।

प्रधानमंत्री मोदी गौरक्षा के नाम पर हिंसा और शायद सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से समझते है और जानते है कि भारत में यह एक बढती हुई समस्या है। चार्ट 4 में जनवरी 2012 से जून 2017 तक कुल हिंसा में सांप्रदायिक हिंसा और गौरक्षा के नाम पर हिंसा को दर्शाया गया है। पहले कुछ वर्षों के में सांप्रदायिक हिंसा कुल 20% के आसपास स्थिर है।  2015 में गिरावट के बाद इसमें 2016 में वृद्धि हुई है जो 2017 में पुनः कम हुई है। हिंसा का यहां कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं है।

इसके विपरीत, और आश्चर्यजनक रूप से गाय से सम्बंधित हिंसा जो सिर्फ 5% से भी कम थी वह जून 2017 के अंत तक काफी बढ़ी है और यह पैटर्न स्पष्ट रूप से दिखाई देता है ।

chart-4

यह जरुर है कि अपने कार्यकाल के शेष समय में, प्रधान मंत्री मोदी और भाजपा शासन सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे है।  खासकर बुरी तरह से टूटी हुई आपराधिक न्याय प्रणाली के सुधारने को। मोदी सरकार को कम से कम अपारदर्शी और कठोर पशु व्यापार नियमों की समीक्षा करने की आवश्यकता है जिनके कारण केवल गौरक्षा एयर गौमांस को लेकर हिंसा की घटनाओं में वृद्धि संभावित है। गौरक्षा के नाम पर बढ़ते हुए अपराध जैसी घटनाये कमजोर शासन और उसकी सीमित क्षमताओ का पर्दाफाश करती है।

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