गाय के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं – जाहिद खान

3:48 pm or September 11, 2017
supreme-court-on-cow-vigila

गाय के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं

—– जाहिद खान —–

देश में गौरक्षा के नाम पर कथित गोरक्षकों द्वारा की जा रही हिंसा पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाल ही में केंद्र सरकार को सख्त निर्देश देते हुए कहा, उसे गोरक्षकों की हरकतें रोकनी होंगी। इन घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यही नहीं अदालत ने सभी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे एक हफ्ते के अंदर हर जिले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोडल अधिकारी तैनात करें, जो ऐसी वारदात रोके और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करे। राज्यों के मुख्य सचिव राजमार्ग पर गश्त की तैनाती समेत मामले में की गई कार्यवाही का हलफनामा अदालत में दाखिल करें। अदालत इस मामले में केन्द्र सरकार से इस कदर खफा थी कि उसने तल्ख लहजे में उससे जवाब तलब करते हुए कहा, क्यों न उसे धारा-256 के तहत ऐसी घटनाओं को रोकने का जिम्मेदार ठहराया जाए ? अदालत की यह नाराजगी वाजिब भी है। इस मामले में अदालत की कड़ी फटकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई बार सार्वजनिक तौर पर ‘चिंता’ जताने के बावजूद गोरक्षकों की हिंसा में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि इस तरह की हिंसक घटनाएं और भी ज्यादा बढ़ गई हैं। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 से 2017 के बीच गोरक्षा को लेकर 63 हिंसक वारदातें हुईं। इनमें 97 फीसद साल 2014 के बाद हुईं। इन 63 में से 32 वारदातें बीजेपी शासित राज्यों में हुईं। 10 घटनाओं के साथ उत्तर प्रदेश इसमें अव्वल नंबर पर है।

सर्वोच्च न्यायालय महात्मा गांधी के पौत्र तुषार गांधी, तहसीन एस. पूनावाला समेत कई अन्य जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाओं में इल्जाम लगाया था कि इस मामले में बीजेपी शासित राज्यों की स्थिति काफी चिंताजनक है। यहां गोरक्षक दल, गोरक्षा के नाम पर हिंसा कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच ऐसे गोरक्षक दलों का बहुत खौफ हैै। लिहाजा उन पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। तमाम वादों और दावों के बावजूद केंद्र सरकार ऐसे संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रही है। वहीं कुछ राज्य सरकारें इन्हें संरक्षण देती हैं। कानून के मुताबिक हिंसक कार्यवाइयों में संलिप्त कथित गोरक्षकों पर आइपीसी की विभिन्न धाराओं में कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन राज्य सरकार से इन्हें बकायदा पहचान पत्र मिले हुए हैं, जिससे ये कार्रवाई से छूट पा रहे हैं। हालत यह हैं कि इन स्वयंभू गोरक्षकों के डर से लोग अपना व्यवसाय नहीं कर पा रहे हैं। जिनके पास मांस आदि के व्यापार का लाइसेंस हैं, वे भी डरे हुए हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील काॅलिन गोंजाल्विस और इंदिरा जय सिंह ने गोरक्षक दलों की हिंसा के मामलों का जिक्र करते हुए अदालत से उनके खिलाफ कार्रवाई और पाबंदी के अलावा गोरक्षक दलों द्वारा सोशल मीडिया पर डाली गई हिंसक सामग्री हटाने की भी मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान में अलवर की हालिया घटना का भी जिक्र किया, जहां कथित गौरक्षक दल की हिंसा में एक शख्स की मौत हो गई थी।

गोरक्षा के नाम पर कथित गोरक्षकों द्वारा की जा रही हिंसा के मामले देश में आए दिन सामने आते रहते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब राजस्थान के अलवर में कथित गोरक्षकों ने हरियाणा के एक समूह पर उस वक्त हमला कर दिया, जब वे गायें ले जा रहे थे। जिनमें से एक शख्स की मौत भी हो गई थी। जयपुर से गायें लेकर हरियाणा के मेवात के नूहं जा रहे इन लोगों ने गायों की खरीद के दस्तावेज भी दिखाए लेकिन इन गोरक्षकों की गैंग ने इन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। और यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ। पुलिस इन गोरक्षकों के खिलाफ कोई कार्यवाही करती, इसकी बजाय उसने उलटे हिंसा के शिकार हुए लोगों पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया। पुलिस ने गायें ले जा रहे इस समूह पर गोवंश अधिनियम के तहत पांच मामले दर्ज कर दिए और इनमें से 10 लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है। वहीं गोरक्षकोें पर पुलिस ने हमले और मौत का मामला तो दर्ज किया है लेकिन इस मामले में अभी तक सभी मुल्जिमों को गिरफ्तार नहीं किया है। जबकि सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में कथित गोरक्षक पिक-अप गाड़ी को तोड़ते हुए और गायें ले जा रहे लोगों को बुरी तरह से पीटते हुए साफ दिख रहे हैं। पुलिस के मुताबिक हमलावर स्थानीय लोग थे, जिनकी पहचान वीडियो साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। यानी जिन लोगों को पूरे देश ने अपने-अपने टेलीविजन सेट पर कानून को तोड़ते हुए देखा, पुलिस के हाथ अभी तलक इन मुल्जिमों के गिरहबान तक नहीं पहुंच सके हैं। इस पूरे मामले मंे राजस्थान पुलिस की भूमिका तो कठघरे में है ही, सरकार का रवैया भी ठीक नहीं था। प्रदेश में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने गोरक्षकों द्वारा कानून हाथ में लेने की औपचारिक निंदा तो की, लेकिन साथ ही यह भी जता दिया कि गोरक्षकों ने अच्छा काम किया है। यानी उनकी नजर में गोरक्षक इस घटना के लिए कसूरवार नहीं हैं। पीड़ित ही इस घटना के लिए दोषी हैं।

सब जानते हैं कि देश के ज्यादातर राज्यों में गोहत्या और गो तस्करी के खिलाफ सख्त कानून बने हुए हैं। कई राज्यों में तो इस अपराध के लिए अपराधियों को तीन साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा है। राजस्थान में भी गो तस्करी के खिलाफ सख्त कानून बना हुआ है। फिर गोरक्षकों को कानून अपने हाथ में लेने का क्या हक है ? अलवर वाले मामले को यदि देखें, तो पीड़ितों के पास गाय खरीदने से संबंधित सभी विभागों के पर्चे और रसीदें मौजूद थीं। वे गायों को नाजायज तरीके से नहीं ले जा रहे थे। फिर तस्करी की बात कहां से आ गई ? एक पल के लिए यह बात भी मान लें कि वे लोग गाय की तस्करी कर रहे थे, तो उनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार पुलिस का था। गोरक्षकों को इसकी सूचना पुलिस को देना थी। वही उन पर कार्यवाही करती। लेकिन इन कथित गोरक्षकों ने खुद ही कानून अपने हाथ में ले लिया और लोगों को मारा-पीटा। वसुंधरा सरकार जिसका काम सच के हक में खड़ा होना था, उसके गृहमंत्री आरोपियों के बचाव में खड़े हो गए। यह मामला जब संसद में गूंजा, तो केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले तो अलवर में इस तरह की कोई घटना होने से ही इंकार किया। राज्य सभा में उनका बयान था कि ‘‘जिस तरह की घटना पेश की जा रही है, ऐसी कोई घटना जमीन पर नहीं हुई है।’’ यानी जिस घटना का वीडियो पूरी दुनिया ने देखा, मंत्री महोदय ने उस घटना के होने से ही इंकार कर दिया। यह पहली बार नहीं है, जब निर्दोष लोगों पर हमले के आरोपियों गोरक्षकों के बचाव में बीजेपी सरकारों के मंत्री या उनके नेता सामने आये हांे। उत्तर प्रदेश के दादरी में गोमांस की अफवाह पर एक और शख्स मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने इस घटना को बड़े ही बेशर्मी से एक दुर्घटना करार दिया था। इन सब घटनाआंे की प्रकृति कमोबेश एक जैसी है और इन्हें देखने से यह मालूम चलता है कि अपराधियों को कहीं न कहीं सरकार की सरपरस्ती हासिल है। वरना वे इस तरह के अपराध करने से पहले दस बार सोचते।

एक तरफ देश में गौरक्षा के नाम पर गौरक्षकों की गैर कानूनी हरकतें और हिंसा जारी है, तो दूसरी ओर सड़कों पर एवं गोशालाओं में गायें सुविधाओं और खाने-पीने के अभाव में दम तोड़ रही हैं। जयपुर के हिंगोनिया गौशाला की उस घटना को भला कौन भूल सकता है, जब देखभाल और खाने-पीने के अभाव में सैकड़ों गायों ने दम तोड़ दिया था। पिछले दिनों जब यह मामला मीडिया में आया, तो वसुंधरा सरकार जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्यवाही करती, इसके उलट वह मामले की पर्दादारी में जुट गई। राज्य सरकार ने हिंगोनिया गोशाला को गोशाला की जगह ‘रीहैबिलिटेशन सेंटर’ बताया। यह एक छोटी सी मिसाल भर है, वरना देश में गाोशालाओं के और भी बुरे हाल हैं। बीजेपी सरकारें और उससे जुड़े कट्टर हिंदूवादी संगठन गाय के नाम पर सियासत तो करते हैं, लेकिन गाय की हिफाजत और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी नहीं लेते। गोरक्षा की आड़ में कथित गोरक्षक कानून का खुला उल्लंघन करते हैं, तो पुलिस एवं सरकारें तमाशाई बनी हुई हैं। गोरक्षा और गो तस्करी रोकने का काम सरकार और पुलिस का है। इसके लिए पहले ही देश के सभी राज्यों में सख्त कानून हैं। गोरक्षा के नाम पर जो लोग गुंडागर्दी कर रहे हैं, उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही जरूरी है। फिर वे चाहे किसी पार्टी या संगठन से जुड़े हुए हों। यदि मोदी सरकार और दीगर राज्य सरकारें इस मामले में संजीदा होतीं, तो सबसे पहले गोरक्षा के नाम पर बने नाजायज और गैर कानूनी संगठनों पर पूरी तरह से पाबंदी लगातीं। फिर उसके बाद हिंसक घटनाओं में शामिल उत्पाती लोगों पर कड़ी कार्यवाही की सिफारिश करतीं। लेकिन अफसोस ! ऐसी कोई सकारात्मक पहल कहीं से नहीं हुई। यही वजह है कि अदालत को इस मामले में सख्त निर्देश देने पड़े। शीर्ष अदालत के कड़े रवैये के बाद उम्मीद बंधना लाजिमी है कि देश में गाय के नाम पर हिंसा की घटनाओं में कमी आयेगी।

Tagged with:     , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in