धर्म के खेल धर्म से खेल – वीरेन्द्र जैन

6:17 pm or September 21, 2017
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धर्म के खेल धर्म से खेल

—– वीरेन्द्र जैन ——

पिछले दिनों म्याँमार में रोहंगिया मुसलमानों के साथ बौद्धों की मारकाट के जो भयावह दृश्य मीडिया में देखने को मिले उससे फिर यह प्रश्न कौंधा कि धर्म मनुष्य के लिए है या मनुष्य धर्म के लिए? इससे पहले आईएसआईएस ने तो दूसरे धर्म के साथ अपने ही धर्म की दूसरी शाखा वाले लोगों के साथ यही व्यवहार किया था। हमारे देश में भी कुछ लोग इस तरह की कट्टरता के प्रशंसक हैं और वे अपने धर्म के लोगों को ऐसे बनने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं।

इन घटनाओं से कुछ स्मृतियां कौंध गयीं।

छतरपुर जिले में एक कवि और सोशल एक्टविस्ट थे श्री रामजी लाल चतुर्वेदी। वे एक सरकारी स्कूल में अध्यापक भी थे, कविताएं लिखते थे, अच्छे पाठक थे, व प्रगतिशील लेखक संघ के प्रत्येक राष्ट्रीय, प्रादेशिक, या स्थानीय आयोजन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते थे। हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं का उन्हें ज्ञान था किंतु अपने क्षेत्र में वे ठेठ बुन्देली बोलते थे और उस बुन्देली भाषा व मुहावरे में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर सटीक व मारक टिप्पणी करने के लिए जाने जाते थे। वे मुँहफट थे और बिना किसी लाग लपेट के किसी से भी निःसंकोच रूप से अपनी बात कह सकते थे, यही कारण था कि उनसे बात करने में राजनेता, अधिकारी, व साहित्यकार सभी घबराते थे। वे मान अपमान की परवाह नहीं करते थे व पहनावे के प्रति लापरवाह थे। अम्बेडकर को पूरा पढा था व छतरपुर जैसे सामंती क्षेत्र में दलितों के बीच उनका निःस्वार्थ, उल्लेखनीय काम था। अनेकों दलितों को उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर के पुजारी बनने के बजाय उनके विचारों को जानने व समझने के लिए प्रेरित किया था। चतुर्वेदी जी कर्मठ थे और जितना विचार से जुड़े थे उतना ही कर्म से भी जुड़े थे। छतरपुर में अभी भी ठाकुरशाही का आतंक व्याप्त है, जिससे टकराने के लिए उनकी अनेक युक्तियां और घटनाएं चर्चित हैं जिनमें से एक है धर्म परिवर्तन की धमकी। जिस गाँव के दलित ठाकुरों के आतंक से पीड़ित होकर गाँव छोड़ने की तैयारी कर रहे होते थे, उन्हें एकत्रित कर वे बयान दिलवाते थे कि इतनी संख्या में दलित फलाँ तारीख को धर्म परिवर्तन करने जा रहे हैं। इससे न केवल प्रशासन सक्रिय हो जाता था अपितु धर्म के ठेकेदार तक चौंक जाते थे और उन्हें समझाने के लिए खुद चल कर आने लगते थे। इससे उनकी समस्याएं सुनी जाती थीं। वे मानते थे कि धार्मिक समुदाय डरे हुये हैं, और इन गरीबों दलितों को धर्म से शोषण के सिवाय और क्या मिलता है। इसके लिए वे बाबा साहब के धर्म परिवर्तन का उदाहरण रखते थे। वैसे वे कहते थे कि सामने वाला जिससे ज्यादा डरता है, उसी का भय पैदा करना चाहिए इसलिए वे दलितों से कभी मुसलमान, कभी ईसाई तो कभी बौद्ध बनने की घोषणाएं कराते रहते थे। वे सिखाते थे कि धर्म को तो कपड़ों की तरह बदलते रहना चाहिए। एक बार एक आयोजन के दौरान किसी ब्राम्हणवादी कवि ने उनके नाम में चतुर्वेदी होने के नाते निकट आने की कोशिश की तो उससे वे बोले कि गोत्र तो हमारा चतुर्वेदी है पर हमें जाति से निकाल दिया गया था क्योंकि परिवार में कुछ ऊँच नीच हो गयी थी। उनके ऐसे ही सैकड़ों किस्से हैं, जो रोचक भी हैं, और प्रेरक भी।

ग्वालियर के एक कवि थे किशन तलवानी। वैसे तो वे सिन्धी व्यापारी थे किंतु उन्हें श्री मुकुट बिहारी सरोज के मित्र के रूप में लोग अधिक जानते थे। कहा जाता है कि अगर दोनों लोग शाम को ग्वालियर में हों तो उनका मिलना जरूरी था। यह बात अलग है कि दोनों लोग आपस में खूब लड़ते थे और यह लड़ाई अगली सुबह खत्म हो जाती थी। किशन तलवानी की एक प्रसिद्ध कविता है-

मैंने कहा मार्क्स सही,

उसने कहा गाँधी सही,

मैंने फिर कहा मार्क्स सही

उसने फिर कहा गाँधी सही, गाँधी सही,

मैंने फिर कहा मार्क्स सही, मार्क्स सही, मार्क्स सही,

उसने मारा मुझे चाँटा

मैंने कहा गाँधी पिट गये,

अब ये बात कल पर रही

दरअसल विचार के बीच हिंसा का आना ही उसे शुरू करने वाले की पराजय है। म्याँमार में बौद्धों ने बौद्ध भेषभूषा में बच्चों, महिलाओं के साथ जो निर्मम हिंसा की उससे बौद्ध धर्म को ही पराजय मिली है। अगर रोहंगिया मुसलमानों ने कुछ किया था तो उसको रोकने व यथोचित दण्ड देने का काम वहाँ के शासन, प्रशासन का था, न कि अहिंसा का नारा देने वाले बौद्ध धर्म के गुरुओं का। जिस धर्म को हिंसा का सहारा लेना पड़े तो मान लेना चाहिए कि उसका विचार कमजोर है व वहाँ का शासन कमजोर है, या गलत हाथों में है। म्याँमार में बुद्ध हार गये।

मेरे एक मुस्लिम मित्र थे जो वैसे तो शाह खर्च थे किंतु पैसे से तंग रहते थे। शाम की पार्टी में जितना भी पास में होता उसे खुले दिल से खर्च करते थे। मैं अपनी हिसाबी बुद्धि से उन्हें मितव्यता का पाठ पढाता तो वे कहते थे कि मेरी पूंजी तुम नहीं जानते, जब ज्यादा संकट आयेगा तो अपने धर्म का सौदा कर लूंगा। चूंकि देश में मेरा नाम है इसलिए मेरा धर्म भी ठीक ठाक दामों में बिकेगा क्योंकि खरीदने वाले को ज्यादा फायदा होगा। मुझसे कहते थे कि अगर तुम्हारे धर्म में कोई ठीक ठाक सा व्यापारी हो तो उससे बात करके देखना। वे मानते थे कि सारे धर्म संकट में हैं, इसलिए धर्म से निकालने की घटनाएं नहीं हो रही हैं, पर उसमें शामिल करने की घटनाएं जरूर बढ रही हैं। बाज़ार के इस युग में व्यापार का राज यह है कि जिसके पास जो कुछ है उसे अच्छे दामों में बेचने की कोशिश करना चाहिए। समझदार लोग यही कर भी रहे है। 2011 की जनगणना में इंगलेंड में नास्तिक लिखाने वालों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ चुकी है जिससे ईसाई परेशान हैं। प्रतिदिन वहाँ के समाचार पत्रों में चर्चों के भवन बेचने के विज्ञापन छपते हैं।

डरा हुआ धर्म ही हिंसक हो जाता है क्योंकि धर्म का धन्धा व उसमें प्रतियोगिता बहुत बढ चुकी है। आशाराम, रामपाल, रामरहीम, हों या रजनीश या साँईबाबा के भक्त सब पुराने धर्म से विचलित होकर भी इतनी विशाल संख्या में अनुयायी बना ले रहे हैं यह संकेतक है। धर्म के क्षेत्र में जो भीड़ दिखायी देती है वह या तो पर्यटन प्रेमी युवाओं की भीड़ है, या सेवा से रिटायर्ड पुरुषों व घर से रिटायर्ड महिलाओं की भीड़ है। यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र में चिकित्सा, या मनोरंजन का स्थान बढता जा रहा है।

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