समाजवादी पार्टी के लिए आत्ममंथन का समय

5:16 pm or June 9, 2014
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हरेराम मिश्र-

लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की करारी हार के कारणों की समीक्षा और आम जनता के बीच सपा सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए पार्टी द्वारा पूरे उत्तर प्रदेश में जिला स्तरीय बैठकों का आयोजन अभी हाल ही में किया गया। लेकिन ये समीक्षा बैठकें जिस तरह से न केवल बेनतीजा रहीं बल्कि बैठक के दौरान ही नेताओं-कार्यकर्ताओं द्वारा आपसी जूतमपैजार और आरोप-प्रत्यारोप से जिस अराजकता का परिचय दिया गया, वह यह साबित करता है कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता शालीनता और सभ्यता की लक्ष्मण रेखा को लांघ चुके हैं। उनके अंदर अनुशासन की बेहद कमी हो चुकी है। बैठकों में हार के कारणों की समीक्षा के दौरान कार्यकर्ताओं द्वारा जिस तरह तोहमत एक दूसरे पर मढ़ी गई उससे यह बात साफ हो गई कि सपा के कार्यकर्ता और नेता इस चुनावी हार की सामूहिक जिम्मेदारी लेने और आत्ममंथन से बचने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। किसी भी राजनैतिक संगठन में ऐसा तभी होता है जब उसके सदस्यों में आपस में मिलकर काम करने की प्रवृत्ति का खात्मा हो जाए और संगठन के अंदर ही कई धड़े बन जाएं। ऐसी स्थिति में एक ऐसा माहौल बन जाता है जहां कार्यकर्ता पार्टी के लिए नहीं बल्कि किसी खास नेता के प्रति जिम्मेदार हो जाता है। यह स्थिति किसी व्यक्ति को पार्टी और उसकी नीतियों से बड़ा बना देती है। देष के ज्यादातर छोटे दलों के साथ यह स्थिति साफ दिखाई देती है।

वैसे भी, इन बैठकों के पहले ही सपा सरकार ने चुनाव में हार के बाद प्रदेश में राज्य मंत्रियों का दर्जा प्राप्त 36 लोगों को एक झटके में बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद आयोजित इन बैठकों में जिस तरह कई जगहों जमकर हिंसक बवाल हुए वो कई सवाल खड़े करते हैं। पूरे उत्तर प्रदेष से कार्यकताओं के बीच आपस में ही जूतमपैजार की खबरें मिली हैं। सारे नेता एक दूसरे पर भितरघात और गद्दारी करने की बात कह रहे थे। उनके बीच अविश्वास इस कदर हावी था कि किसी भी बैठक में हार के कारणों पर कोई सार्थक विचार तक नहीं हो सका। निष्कर्ष की बात तो कोसों दूर थी।

अगर गौर किया जाए तो यह बात साफ हो जाती है कि समाजवादी पार्टी के नेता हार के असल कारणों पर विचार करना ही नही चाहते या फिर उनमें विचार और आत्ममंथन की क्षमता खत्म हो चुकी है। आखिर इस चुनाव में सपा की दुर्गति का जिम्मेदार कौन है? आखिर उत्तर प्रदेश की जिस जनता ने दो साल पहले जिस पार्टी को सर आंखो पर लिया उसी से ऐसा मोह भंग क्यों? आखिर समाजवादी पार्टी इस हार के कारणों का निष्पक्ष विष्लेश्ण करने में हिचक क्यों रही है? आखिर इस विष्लेशण से उसे डर क्यों लग रहा है?

क्या यह सच नहीं है कि सपा सरकार की अर्कमण्यता ने आज उत्तर प्रदेश में उसे हाशिए पर खड़ा कर दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुसलमान सपा सरकार की नाकामियों के कारण बड़ी संख्या में आज भी सड़क पर जीवन जीने को मजबूर है? प्रदेश में भगवान भरोसे चल रही कानून व्यवस्था, मंहगाई, दंगे, लूट, बलात्कार, बिजली, पानी, सड़क, गन्ना किसानों का लटका भुगतान और न जाने कितनी समस्याएं मुह खोले खड़ी हैं। आखिर आम जनता फिर सपा को वोट क्यों दे? सपा सरकार उत्तर प्रदेश में हर मोर्चे पर नाकाम साबित हुई है। आखिर दो साल में सरकार की क्या उपलब्धियां हैं?

दरअसल आज उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की जो दुर्गति हुई है उसका एक कारण मुलायम की खुद की ‘चुनावी रणनीति’ रही है। इनकी सारी रणनीति इन्ही पर भारी पड़ी। उत्तर प्रदेश में भाजपा की मजबूती के लिए मुलायम भी कम जिम्मेदार नही हैं। आखिर क्या वजह है कि सामाजिक न्याय के रथ पर चढ़कर राजनीति में आने वाले मुलायम सिंह संघ द्वारा पिछड़ी जातियों की सवर्णों के साथ की जा रही गोलबंदी को रोकने में बुरी तरह असफल रहे? भाजपा के साथ पिछड़े वर्ग के मतदाता कैसे चले गए और उसे रोकने के लिए सपा ने क्या किया? मुलायम उसे रोक भी नही सकते थे क्योंकि अब सपा केवल परिवारवाद और जातिवाद को जिंदा रखने में ही अपनी सारी ताकत लगा रही है। सामाजिक न्याय के सवाल को सांप्रदायिक बनाने में मुलायम जैसे लोगों का ही हाथ है। इसे भाजपा ने इन चुनावों में भुना लिया। भले ही इसके लिए उसने विकास की राजनीति जैसे शब्द गढ़े। युवाओं के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जबरजस्त गुस्सा था। मुलायम के पास भ्रष्टाचार के सवाल पर बोलने के लिए कुछ नही था। कार्पोरेट की अकूत पूंजी ने पूरे चुनावी परिदृश्य को मोदीमय बनाकर हाईजैक कर लिया। सामाजिक न्याय और जाति का सवाल विकास के सवाल में बह गया। अब यादवों को यादव नेता नहीं चाहिए। उन्हें नौकरी देने वाला नेता चाहिए, विकास करने वाला नेता चाहिए, विजली, पानी और सड़क देने वाला नेता चाहिए। मुलायम जनता की नब्ज टटोल नहीं सके और यहीं असफल हुए। चुनावी नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि मुलायम सिंह जैसे लोगों को अगर आगे राजनीति करनी है तो उन्हें गंभीर आत्ममंथन करना ही होगा। अन्यथा इनका हश्र अजीत सिंह जैसा होना तय है।

जहां तक कैडरों का सवाल है, समाजवादी पार्टी के कैडर पूरे चुनाव के दौरान दिग्भ्रमित रहे।  पूरा माहौल ही मोदीमय हो चुका था। वे आम जनता को भ्रष्टाचार के सवालों पर कतई संतुश्ट नहीं कर सके। भ्रष्टाचार के सवाल पर उनकी हताशा साफ देखी जा सकती थी। वैसे भी सपा की छवि एक ऐसे संगठन में तब्दील हो गई है जो अपने लाभ के लिए किसी से भी हाथ मिला सकती है। सपा के कैडर वैचारिक शून्यता के महासमुद्र में गोते लगा रहे हैं। उनके पास विचार ही नही बचा है। देष की राजनीति में अगर किसी के पास विचारों की पूंजी बची है तो वह केवल वामपंथ और संघ के कैडरों के पास ही है। राजनीति में लंबी पारियां वही खेलते हैं जिनके पास विचार होता है अन्यथा उन्हे मिट जाना ही होगा। सपा के लिए यह दौर इतिहास का सबसे बुरा दौर है। इसके जल्द खात्मे के आसार नही दिख रहे। विचारशून्य सपा भी अपने अस्तित्व का आखिरी दांव खेल रही है। सपा के लिए यह समय गंभीर आत्ममंथन का है। आखिर कार्यकर्ता हार की वजहों को कैसे समझे? उसे कोई ठोस रास्ता ही नही सूझ रहा।

कुल मिलाकर कैडरों का यह आपसी झगड़ा बताता है कि सपा का कैडर बौध्दिक स्तर पर शून्य समझ वाला एक ऐसा आदमी है जिसकी समझ में चुनाव हारने के लिए पॉलिसी जिम्मेदार न होकर आपसी गुटबाजी ही असल कारण है। सपा की करारी हार के बाद प्रदेश के भूतत्व एवं खनिकर्म मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति ने तो बेरोजगारी भत्त और लैपटॉप जैसी योजनाएं बंद करने की बात कही है। यह सपा सरकार के मंत्रियों की हताशा का परिचायक है। आत्ममंथन से ही समस्या हल होगी। क्या सपा नेतृत्व आत्ममंथन के लिए तैयार है?

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