समुद्रों के बारे में कुछ नया सोचिये – शब्बीर कादरी

5:37 pm or October 3, 2017
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समुद्रों के बारे में कुछ नया सोचिये

शब्बीर कादरी

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे शब्द अब विश्व के अधिकांश लोगों को इसलिए समझ आने लगे हैं कि इससे हमारे परिस्थितिकी तंत्र पर बुरी तरह प्रभाव पड़ने लगा है। अमेरिका, मेक्सिको, जापान में हाल ही में आए भीषण तूफान और कई देशों सहित हमारे देश के ही कुछ राज्यों में मूसलाधार बारिश और ऐतिहासिक बाढ के साथ कुछ राज्यों में सूखे और गंभीर पेयजल की आहट सुनाता यह प्राकृतिक प्रकोप राजनीतिक तंत्र को छोड़कर सब को भयभीत करने लगा है। चिंतनीय यह है कि पृथ्वी पर हो रहे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम अब समुद्र के परिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं। समुद्र में जिस वनस्पति पर सर्वाधिक खतरा मंडरा रहा है वह है केल्प के जंगल । दरअसल समुद्र के भीतर पानी में कई बड़े-बड़े जंगल हैं। इनमें सबसे बड़े जंगल को केल्प फाॅरेस्ट कहा जाता है जिसका क्षेत्रफल लगभग 5800 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है अमूमन ये जंगल तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं पर अब ग्लोबल वार्मिंग के चलते ये जंगल अपने परिस्थितिकी तंत्र के विपरीत पानी के और अधिक भीतर गहराई में जाने को मजबूर हुए हैं।

केलीफोर्निया की एक मरीन प्रयोगशाला सहायक सिंथिया  कैटन के अनुसार उत्तरी कैलीफोर्निया से ओरेगाॅन सीमा तक के पेसिफिक तट पर केल्प वनों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। वर्ष 2014 के बाद हवाई सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि बुलू केल्प (केल्प का एक प्रकार जिसे हब्र्स के रूप में भी प्रयोग किया जाता है) में 9.0 प्रतिशत तक की कमी आंकी गई है। केल्प न होने से समुद्री घोंधों को भारी नुकसान पहुंचा है जो परिस्थितिकी तंत्र के नुकसान का सूचक है। केल्प काफी लचीले होते हैं तथा समुद्री तूफान तथा गर्मी को सहने की क्षमता रखते हैं पर अब ये मेन की खाड़ी (उत्तर अमेरिका के पूर्वी तट पर अटलांटिक महासागर में स्थित एक बड़ी खाड़ी) में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से बढ़ते पृथ्वी के तापमान का प्रभाव समुद्री सहत पर भी पड़ रहा है जो केल्प के जंगलों को विस्थापित होकर गहरे पानी में अपनी जड़ें जमाने को मजबूर कर रहा है। याद रहे विश्व के सर्वाधिक विविध समुद्री परिस्थितिकीय प्रणालियों में से एक है केल्प के ये जंगल जो कि अंटार्टिका को छोड़कर सभी महाद्वीपीय तट रेखाओं पर पाए जाते हैं। केल्प जंगल की लगातार हो रही कमी ने भूमध्यसागरीय प्रजातियों में 60 प्रतिशत की कमी का संकट पैदा कर दिया है जिससे जापान में एबेलोन फिशरी को गंभीर नुकसान झेलना पड़ रहा है ये समुद्री घोंघों के एक समूह का नाम है। वैज्ञानिकों का मत है पिछले पचास वर्षों में 38 प्रतिशत केल्प फाॅरेस्ट के अस्तित्व में कमी पाई गई है। जबकि इसके विघटन या विलुप्त होने से पर्यटन और मत्स्य उद्योग पर लगभग 10 मिलियन डाॅलर का नुकसान आंका गया है।

समुद्री जीवन पर हो रहे इसी प्रकार के दुष्प्रभाव के संबंध में प्रोफेसर डगलस मैक्काले जो यूसीएसबी के इकॅालाॅजी इवोल्यूशन एंड मरीन बायोलाॅजी विभाग से संबंधित है कहते हैं कि पिछले 200 वर्षों में समुद्री जीवन काफी कुछ बदल गया है समुद्र में भी स्थितियां पृथ्वी की तरह ही उद्योगीकृत हो गई हैं। समुद्र में फैक्ट्री फार्म ंसंचालित हो रहे हैं, मछली पालन मवेशी की तरह हो गया है। झींगा फार्म मेंग्रोव को ठीक उसी तरह खा रहे हैं जैसे जमीन पर खेती-बाड़ी की बढ़ती जरूरतों ने जंगलों को समाप्त कर दिया है। समुद्र की तलहटी में खनन ठीक उसी जुनून से हो रहा है जैसा सोने की खोज के लिए होता हैं, समुद्र में खनन मशीनों का आकार 300 टन तक बढ़ गया है। मछुआरा नौकाऐं 750 फुट तक लंबी और विशालकाय हो गई हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक न सिर्फ समुद्रों का औद्योगिक इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है वरन् समुद्रों के दोहन का वैश्वीकरण हो गया है। इससे समुद्री जीवन का प्राकृतिक और संतुलित चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। समुद्र में जीवों के हालत बिल्कुल वैसे ही बन गए हैं जैसे जमीन पर वन्यजीवों के लिए हंै।

साइंस पत्रिका ‘‘नेचर’’ ने दो कनाडाई विज्ञानियों के हवाले से जो रिपोर्ट छापी है उसके मुताबिक बीते 50 सालों में ही काॅड, हैलीबट, टयूना और सोर्डफिश जैसी महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों का 9/10 हिस्सा मछली पकड़ने के बड़े अभियानों के कारण साफ हो गया है। पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस का आंकड़ा है कि विशालकाय ट्राॅलरों से मछली पकड़ने के कारण हर साल हजारों टन ऐसी अनुपयोगी मछलियां और अन्य समुद्रीजीव भी पकड़ लिये जाते हैं। जिन्हें वापस समुद्र में नहीं छोड़ा जाता। ऐसे में अगर समुद्री जीवन तबाह हो रहा है तो आश्चर्य कैसा? यूं तो दुनिया के कई मुल्कों में समुद्र नीति बनाई जाती है लेकिन जागरूकता के अभाव के चलते नीति-नियमों का पालन ही नहीं हो रहा है। हममें से बहुत से लोग यह नहीं जानते कि समुद्र की भूमिका जैव-विविधता कायम रखने, ऋतुओं के बदलने और मौसम के व्यवहार पर अंकुश रखने में ही नहीं बल्कि लाखों करोड़ों लोगों को भोजन व रोजगार देने में भी है। लेकिन पृथ्वी और मानव सभ्यता को जीवन देने वाले रत्नगर्भा समुद्र के साथ खिलवाड़ ही हो रहा है। अनेक देश समुद्र को कचराघर मानने जैसा बर्ताव करतें हैं। समुद्र में तेल गैस से निकलने वाले अपशिष्टों के अलावा रेडियोएक्टिव पदार्थ और दूसरे जहरीले तत्व छोड़े जाते हैं। क्योंकि धरती पर उन्हें ठिकाने लगाना काफी खर्चीला है। लंदन और आॅस्पार संधियों के लागू होने के बाद भी जिस तरह ला हेग (फ्रांस), सेलाफील्ड (ब्रिटेन) और डाउनरेय (उत्तरी स्काॅटलैंड) स्थित नाभिकीय संयंत्रों से रेडियोएक्टिव कचरा समुद्र में वर्षों तक फेंका गया। उससे तो यही जाहिर होता है कि मनुष्य अपनी जिम्मेदारियां समुद्र के माथे मढ़कर निश्चित हो जाना चाहता है। लेकिन उसकी यह कोशिश खुद के लिये ही घातक साबित हो सकती है। जहरीली बारिशें, अल नीनो व ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव के कारण सतह का तापमान बढ़ने से खाने योग्य मछलियों का संपूर्ण सफाया, जल स्तर बढ़ने से तटीय शहरों और द्वीपों का लुप्त होना और मौसम के विनाशकारी बदलाव जैसे कारकों से अगर बचना है, तो समुद्रों के बारे में नए सिरे से सोचना होगा।

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