महिला आरक्षण विधेेयक अब पास होना ही चाहिए -जाहिद खान

5:51 pm or October 3, 2017
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महिला आरक्षण विधेेयक अब पास होना ही चाहिए

—- जाहिद खान —-

संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने की बात करने वाला महिला आरक्षण विधेयक एक बार फिर चर्चा में है। कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर उनसे ये अपील की है कि इस विधेयक को वे लोकसभा में पास कराएं। सोनिया ने अपनी चिट्ठी में प्रधानमंत्री को इस बात का भी यकीन दिलाया है कि संसद में उनकी पार्टी महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करेगी। यह चिट्ठी जैसे ही मीडिया में सार्वजनिक हुई सियासत में उबाल आ गया। महिला आरक्षण की हिमायत करने वाली पार्टियों ने इस मांग से अपना सुर मिलाया, तो बीजेपी को भी मजबूरन ये बात कहना पड़ी कि ‘‘उनकी सरकार इस विधेयक को पास कराने को लेकर ‘प्रतिबद्ध’ है। आगामी शीतकालीन सत्र में वह यह विधेयक संसद में पेश करेगी।’’ बहरहाल मोदी सरकार इस विधेयक को लेकर कितनी गंभीर है ?, यह आने वाला वक्त बतलाएगा। लेकिन सरकार का अभी तक का जो कार्यकलाप है, उससे कतई नहीं लगता कि वह महिला आरक्षण विधेयक के प्रति गंभीर है। यदि सरकार गंभीर होती, तो विधेयक कभी का संसद में पारित हो जाता। लोकसभा में बहुमत होने के बाद भी, बीते तीन सालों में उसने अपनी ओर से कोई कोशिश नहीं की है कि विधेयक संसद में पेश हो। जबकि अपने चुनावी घोषणा-पत्र में बीजेपी और अपनी चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महिलाओं से वायदा किया था कि वह केन्द्र की सत्ता मंे आए, तो महिला आरक्षण विधेयक जरूर पारित होगा।

संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण मिले, इसके लिए देश की महिलाएं लंबे समय से संघर्ष कऱ रही हैं। जैसे-तैसे महिला आरक्षण विधेयक तैयार हुआ, तो पिछले बीस सालों से यह संसद में अटका हुआ है। साल 1996 में तत्कालीन एच. डी. देवगौड़ा सरकार में यह विधेयक पहली बार पेश किया गया, लेकिन कई पुरुष सांसदों के विरोध के चलते बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में इसे दोबारा सदन के सामने रखा गया, लेकिन उन्हीं की पार्टी के कुछ सांसदों और दीगर सहयोगी पार्टियों के विरोध की वजह से विधेयक पारित नहीं हो पाया। आखिरकार महिला आरक्षण विधेयक को साल 2010 में आकर ऊपरी सदन राज्यसभा से मंजूरी मिली। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के शासनकाल में 9 मार्च, 2010 को विधेयक राज्यसभा में तो पारित हो गया था, लेकिन लोकसभा में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों के भारी विरोध के कारण यह विधेयक पास नहीं हो पाया। तब से ही ये विधेयक संसद में अटका पड़ा हुआ है। जब भी इस विधेयक को संसद में लाने की बात होती है, तो ओबीसी नेता विधेयक में यह कहकर अड़ंगा लगाते हैं कि इससे दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं को नुकसान होगा। वे चाहते हैं कि महिला आरक्षण कोटे में इस वर्ग की महिलाओं का कोटा हो, जिससे उनकी उचित नुमाइंदगी हो। बहरहाल ओबीसी की राजनीति कहें या फिर पुरुषवादी राजनीति, महिला आरक्षण विधेयक अपनी परिणति तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसमें कहीं न कहीं पुरुषों का वह डर भी शामिल है कि आरक्षण के बाद एक तिहाई पुरुष विधानसभाओं और संसद में नहीं पहुंच पाएंगे। विधेयक अमल में आने के बाद संसद में 263 और विधानसभाओं में 1373 महिलाएं आ जाएंगी। यानी संसद के दरवाजे इतने ही पुरुषों के लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। हालांकि विधेयक के मुताबिक महिलाओं की आरक्षित सीटें हर चुनाव में बदलतीं रहेंगी, लेकिन इससे कई पुरुषों के सियासी भविष्य पर असर तो पड़ेगा ही।

हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां एक अरब से ज्यादा की आबादी में से कोई 76 करोड़ मतदाता अपनी सरकार चुनते हैं। लेकिन देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में हमारी आधी आबादी महिलाओं की यदि नुमाइंदगी देखें, तो यह बारह फीसद से ऊपर नहीं पहुंच पाई है। अब तक हुए सोलह आम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि संसद में महिला सांसदों की संख्या दहाई की दहलीज से सिर्फ एक बार आगे बढी है, वह भी सोलहवीं लोकसभा में। साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 62 महिला उम्मीदवारों को जीत मिली थी, जिसके बाद चार और महिला सांसद पिछले तीन सालों के दौरान उपचुनावों के जरिए पहुंची हैं और महिला सांसदों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व 11.4 फीसदी से फरवरी, 2016 में 12 फीसदी हो गया। संसद में महिलाओं का यह अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। बावजूद इसके साठ करोड़ से अधिक की महिला आबादी वाले देश, जिसमें 38 करोड़ से ज्यादा महिला मतदाता हों, वहां 543 सदस्यीय लोकसभा में उनका यह प्रतिनिधित्व सचमुच निराशाजनक है। जबकि राजनीति ही एक ऐसा जरिया है, जिसका समाज के हर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है। कानून बनाने से लेकर देश के लिए नई नीतियां भी संसद से ही तय होती हैं।

इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में फिलवक्त 21.8 फीसद महिला सांसद मौजूद हैं। खास तौर से यूरोपीय देशों के अंदर संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व साल दर साल बढ़ता जा रहा है। वहीं एशिया और अरब देशों में लाख कोशिशों के बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने का नाम नहीं ले रहा। महिला सांसदों के औसत के लिहाज से भारत दुनिया में 111वें पायदान पर है। यानी महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में हमारे देश की स्थिति काफी बुरी है। इस मामले में विकास के कई सूचकांकों में हमसे पिछड़े अफ्रीका महाद्वीप के देश बेहतर स्थिति में हैं। महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से यह देश भारत के मुकाबले कहीं आगे हैं। आंकड़ो के लिहाज से देखें तो साल 1952 में भारतीय संसद में कुल 499 सीटों में से 22 पर महिलाएं चुनी गई थीं। यानी 4.4 फीसद। आपातकाल के बाद जब देश में चुनाव हुए, तो संसद में महिलाओं की संख्या और भी कम हो गई। 1977 के संसदीय चुनाव में संसद के अंदर महिलाओं की संख्या 19 रह गई। यानी 3.4 फीसद, जो कि संसद में महिलाओं की अब तक की सबसे कम नुमाइंदगी है। जाहिर है जब महिलाएं संसद में पहुंच ही नहीं पातीं, तो उनकी सरकार में भागीदारी कैसे होगी ? साल 1952 में चुनी गई देश की पहली सरकार में सिर्फ 4.9 प्रतिशत ही महिलायें मंत्री पद पर थीं। यह आंकड़ा हालांकि धीरे-धीरे बढ़ रहा है। लेकिन आबादी के लिहाज से आज भी यह उतना नहीं बढ़ पाया है, जितना कि होना चाहिए। 1984 में चुनी गई केन्द्रीय सरकार में महिला मंत्रियों की संख्या 10 फीसद तक पहुंच गई। लेकिन यह आंकड़ा तब से लेकर अब तक यहीं अटका हुआ है। लाख कोशिशों के बाद भी ना तो संसद में और ना ही केन्द्रीय सरकार में महिलाओं की संख्या बढ़ पा रही है। राज्यसभा जो कि हमारी संसद का ऊपरी सदन होता है, वहां भी महिलाओं की नुमाइंदगी कभी उत्साहजनक नहीं रही है। राज्यसभा में फिलवक्त 12.8 फीसदी महिला सदस्य हैं। जो कि 22 फीसदी के वैश्विक औसत से काफी कम है। यानी राज्यसभा में भी उनकी भागीदारी ना के बराबर है। सत्ता में महिलाओं की नुमाइंदगी के प्रति यदि राजनीतिक पार्टियां वाकई संजीदा होतीं, तो वे उन्हें राज्यसभा के जरिए संसद में पहुंचा सकती थीं। लेकिन यहां भी इन पार्टियों का पुरुष वर्ग नहीं चाहता कि वे संसद में पहुंचें। क्योंकि यदि महिलाएं संसद में पहुंच गईं, तो उनका राजनीति में एकाधिकार खत्म हो जाएगा।

संसद में महिलाओं के कमजोर प्रतिनिधित्व की यह स्थिति तब है, जब कांग्रेस, बसपा, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों की कमान महिलाओं क्रमशः सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी के हाथ है। और यह नेता निर्णय लेने के मामले में अपनी पार्टियों में काफी प्रभावशाली भूमिका अदा करती हैं। यह महिला नेता यदि चाहें तो अपनी पार्टियों में टिकिट देने के मामले में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की पहल कर सकती हैं। लेकिन यह महिला नेता लाख चाहकर भी अपनी पार्टियों को इस मसले पर तैयार नहीं कर पाई हैं। देश की प्रमुख पार्टियों का आंतरिक ढांचा और सोच कुछ ऐसी है कि वह नहीं चाहता कि संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़े। जब भी संसद में महिला आरक्षण की बात होती है, तो इन पार्टियों के नेता बेवजह के सवालों से आरक्षण के जरूरी मुद्दे को पीछे धकेल देते हैं। जाहिर है संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व तभी बढ़ेगा, जब महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी मिलेगी। महिला आरक्षण विधेयक संसद में कई दशकों से अटका पड़ा हुआ है, अब वक्त आ गया है कि यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो। संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, तो न सिर्फ हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति सुधरेगी, बल्कि समस्त समाज और देश की स्थिति और भी बेहतर होगी। विधेयक, महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। समाज में चाहे कोई सा भी क्षेत्र हो महिलाओं के प्रति अनेकों विषमताएं मौजूद हैं और यह विषमताएं दिन-पे-दिन बढ़ती जा रही हैं। यह विषमताएं तभी दूर होंगी, जब महिलाएं खुद सत्ता में होंगी।

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