‘गांधी’, ‘बापू’ और ‘चतुर बनिया’: एक विचार – धीरज मुक्तिकामी

6:39 pm or October 3, 2017
gandhiji

‘गांधी’, ‘बापू’ और ‘चतुर बनिया’: एक विचार

धीरज मुक्तिकामी

‘‘मैं गांधी जयन्ती पर प्रिय ‘बापू’ को नमन करता हूँ।

उनके महान आदर्श दुनियाभर के करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं।’’।

2 अक्तूबर 2017  मेरे मोबाइल पर यह मैसेज मेरे एक मित्र ने मुझे भेजा और इस पर मेरी राय जाननी चाही। यह पक्तियाँ हमारे प्रधानमंत्री महोदय ने गांधी जयन्ती पर ट्वीट की हैं। जबकि कुछ वर्ष पूर्व न्यायालय से तड़ीपार किए गए उनके प्रमुख सखा और केन्द्रीय सत्ता के राईट हैण्ड महोदय गांधी जी को ‘‘चतुर बनिया’’ कह कर सम्बोधित करते हैं। अब ऐसे में प्रधानमंत्री महोदय के कथन की इन पक्तियों का क्या अर्थ निकाला जा सकता है। मोहन दास करमचंद गांधी उर्फ ‘‘बापू’’ – इस नाम से संघ को इतनी नफ़रत रही है कि न सिर्फ़ उनकी हत्या की बल्कि जश्न भी मनाया और विशेष रूप से उनके अनुषांगिक संगठनों ने, संघ के राजनैतिक दल द्वारा 2014 में केन्द्र की सत्ता हथिया लेने के बाद, गांधी जी के हत्यारे के नाम पर मन्दिर बनवा डाला, तब हमारे प्रधानमंत्री महोदय ने नहीं कहा कि हमें अहिंसा का पुजारी ही चाहिए आतंक का नहीं।

संघ के लिए ‘गांधी’ कभी ‘महात्मा’ या ‘बापू’ तो ख़ैर रहे ही नहीं, लेकिन सोचने लायक़ बात है कि अगर ‘गांधी’ को एक व्यक्तित्व न भी माना जाए तो क्या एक मृत व्यक्ति के तौर पर उनके लिए ‘‘जी’’ जैसे सम्मान सूचक शब्दों का प्रयोग किया जाना हमारा दायित्व नहीं है ? या फिर यह भी अब हमारे समाज का हिस्सा नहीं रहा। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री महोदय हों या उनके मंत्री मण्डल के अन्य नेता, अब सभी ‘गांधी जी’ को महज़ ‘गांधी’ कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। उनके समर्थकों द्वारा स्पष्टीकरण यह दिया जा रहा है कि अब कोई औपचारिकता नहीं की जा रही है ताकि जनसामान्य से सीधा जुड़ाव हो सके। उसकी भाषा में उससे बात हो सके, हम कोई अंग्रेज़ तो हैं नहीं। इस तरह के तमाम मैसेज विभिन्न सोशल मीडिया माध्यमों पर आपको असीमित मिलेंगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि आम बोलचाल की भाषा संसदीय भाषा हो जाएगी तो क्या होगा, आप ख़ुद सोच सकते हैं।

हमारे वर्तमान राजनैतिक अगुवाकारों की इस नई ससंदीय भाषा ने ही जनसामान्य में हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद की उस नवोन्मेषी भाषायी संस्कृति का सूत्रपात किया है जिसमें एक स्त्री को मरणोपरान्त ‘‘कुतिया’’ कहा जाएगा। कल किसी चैतन्य व मुखर स्त्री को ‘‘रण्डी’’ भी कहा ही जाना है। ऐसे में इस संस्कृति का उत्कर्ष ‘‘वेश्यालयों की संस्कृति की पुर्नस्थापना’’ न होगा तो और क्या होगा ? ऐसे में एक सामान्य प्रश्न दिमाग में आता है कि क्या संघ, उसके अनुषांगिक संगठनों और भा.ज.पा. में शामिल महिलाओं-युवतियों या पुरूषों को भी ऐसे शब्द स्वयं या स्वयं के परिवार की स्त्रियों के लिए स्वीकार होंगे, क्यों कि संगठन में जब किसी विषय या प्रश्न पर उनके वैचारिक मतभेद होंगे तो वे भी इसी भाषा में उत्तर पाएँगे, इसमें कोई शंका नहीं है। भारतीय जनमानस अगर यह समझता है कि इस घटना से उससे कोई लेना-देना नहीं है तो बी.एच.यू. काण्ड हमें हमारा कल दिखाने के लिए काफ़ी है –

बी.एच.यू. की घटना में एक लड़की को रोक कर उसको टाॅप में हाथ डाल दिया जाता है और विरोध करने पर बी.एच.यू. प्रशासन द्वारा दो बड़े प्रश्न किए जाते हैं एक तो यह कि ‘‘क्या तुम यहाँ रेप होने तक रूकोगी ?’’ दूसरा यह कि ‘‘शाम 7 बजे के बाद बाहर क्या रेप करवाने जाती हो ?’’। यह लड़की किसी ना किसी परिवार की बेटी-बहन तो है ही और यह भी तय है कि वह किसी सशक्त या राजनैतिक परिवार की नहीं है। बी.एच.यू. के आसपास के सामान्य दुकानदारों ने बताया कि कुछ ख़ास संगठनों से जुड़े लड़कों का गल्र्स हाॅस्टल के सामने हस्तमैथुन करना या लड़कियों को रोक कर उनके अंगों की तारीफ़ें करना या तस्वीरें लेना कई बार हो चुका है, विशेषकर यह सब 2014 के बाद से एकदम से बढ़ा है। आप समझ सकते हैं कि ऐसे हालात आपकी बेटी या बहन के साथ नहीं होंगे, ऐसा तो होने से रहा। लेकिन आज चुप रहने वाले लोगों से सवाल यह है कि तब आप क्या करेंगे ? क्यों कि तब दूसरे भी बोलने नहीं आएँगे, यही सोच कर कि इसका उनसे कोई लेना-देना नहीं है। क्या आपको लगता है ‘‘हिन्दुत्व’’ का सीमा-क्षेत्र मुस्लिम युवतियों, महिलाओं से होकर एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. से होकर अशक्त सवर्णों तक विस्तारित नहीं होगा ?

उपरोक्त बातों पर गम्भीरता से मनन करेंगे तो आप पाएँगे कि ऐसा होना निश्चित है। ऐसी और भी तमाम बातें हैं जिस पर एक अच्छी-ख़ासी किताब लिखी जा सकती है कि ‘‘हिन्दुत्व’’ का अंधानुसरण हमें कैसा कल देगा। यह विचार करने का सही समय है कि हमें ‘‘हिटलर’’ या ‘‘गांधी’’ में से क्या चाहिए ?

‘गांधी’ के महत्व पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि कुछ नया लिख पाने की सोचना काफी मुश्किल काम जान पड़ता है। हाँ ! अपनी समझ आप के साथ साझा करने के लिए इतना कह सकता हूँ कि ‘‘गांधी’’ को दुनिया के इतने देशों में लिखा-पढ़ा-अपनाया गया है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री महोदय पिछले लगभग चार सालों में सरकारी ख़र्च पर हवाई जहाज़ से उतने देश घूम तक नहीं पाए हैं। ‘‘गांधी’’ का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि उसकी दी हुई ‘‘खादी’’ अगर बदन से उतर जाए तो उन्हे ‘‘चतुर बनिया’’ कहने वाले तड़ीपार अपराधी निकलेंगे।

मैं मूलतयः वामपंथी हूँ, इसलिए विचारधारात्मक स्तर पर गांधी जी के कई राजनैतिक फै़सले मुझे कत्तई उचित नहीं लगते हैं लेकिन क्या मतभेद या विचारधारा का टकराव हमें किसी का अपमान या हत्या करने की अनुमति देता है ?

‘विलासितापूर्ण जीवन छोड़ कर ग़रीबी अपनाने’ और ‘ग़रीबी से भाग कर विलासितापूर्ण जीवन हथियाने’ के बीच का फ़र्क ही ‘‘गांधी’’ है। ‘‘गांधी’’ के नाम पर विज्ञापनों में अपना चेहरा छपवा लेने या ट्वीट कर देने भर से कोई ‘‘बापू’’ नहीं बन सकता है।

दो देशों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना और नोटबंदी करके जापान में डमरू बजाने में क्या फर्क है, नितान्त अंधभक्तों को छोड़ कर लगभग सभी को समझ में आ चुका है।

आईए ! ‘‘गांधी’’ की 148वीं जयन्ती पर हम उनसे सीख लें और ‘हिन्दू-मुसलमान’ के विषय से उबर कर अपना और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि दें।

वैष्णवजन तो तेनेे कहिए,

जे पीड़ परायी जाने रे…।

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