अब अपनों ने दिखाया आइना – जाहिद खान

3:31 pm or October 10, 2017
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अब अपनों ने दिखाया आइना

—-जाहिद खान —-

आर्थिक नीतियों पर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रही मोदी सरकार को अब उन्हीं की पार्टी के बड़े नेताओं ने एक-एक कर आइना दिखलाना शुरू कर दिया है। इसमें सबसे तीखा हमला बोला है, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री रहे बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने। एक अंग्रेजी अखबार में लेख के जरिये यशवंत सिन्हा ने वित्त मंत्री अरुण जेटली पर अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर देने का गंभीर इल्जाम लगाया है। उन्होंने यहां तक कहा कि पार्टी के ज्यादातर लोग भी यही मानते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के डर से खामोश हैं। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी जैसे सरकार के हालिया फैसलों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि गिरती अर्थव्यवस्था में नोटबंदी ने आग में घी डालने का काम किया और बुरी तरह लागू किए गए जीएसटी से उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा है। यशवंत सिन्हा के इस लेख की आग ठंडी हुई नहीं थी कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री, तजुर्बेकार पत्रकार और लेखक अरुण शौरी ने इस आग को और हवा दे दी। शौरी ने मोदी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा, मुद्रा योजना के तहत सरकार ने नौजवानों को 5Û5 करोड़ रोजगार देने का दावा किया था लेकिन इस साल की पहली तिमाही में ही 15 लाख रोजगार और चले गए। सरकार का हर साल करोड़ रोजगार देने का वादा भी हवाहवाई निकला। अरुण शौरी यहीं नहीं रुक गए, बल्कि तख्ख लहजे में उन्होंने यहां तक कह दिया कि नोटबंदी जिसे मोदी सरकार अपनी क्रांतिकारी योजना कहकर प्रचारित कर रही है, दरअसल वह कालेधन को सफेद करने का उपक्रम भर था। इस योजना की आड़ में भ्रष्ट अफसरों, सियासतदानों और सरमायेदारों ने अपना काला धन सफेद कर लिया। यशवंत सिन्हा के समर्थन में बीजेपी के स्टार प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा आगे आए। उन्होंने कहा कि यशवंत सिन्हा ने आर्थिक स्थिति को लेकर सरकार को आइना दिखाया है, उनकी बातों को सरकार नकारने की बजाय गंभीरता से ले। कभी बीजेपी सरकार में कद्दावर मंत्री रहे इन नेताओं के अलावा आरएसएस का अनुषांगिक संगठन भारतीय मजूदर संघ भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमलावर है। देश में मौजूदा आर्थिक मंदी के लिए उसने सरकार की गलत नीतियों को दोषी ठहराया है। इस फेहरिस्त में नया नाम संघ परिवार के महत्वपूर्ण आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति का जुड़ा है। गुरुमूर्ति का कहना है कि एक साथ नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों की गैर-निष्पादन परिसंपत्तियां (एनपीए) ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है। गुरुमूर्ति की यह आत्मस्वीकृति इस मायने में काफी दिलचस्प है, क्योंकि शुरू में वे नोटबंदी और जीएसटी जैसे कानून के हिमायती थे। मोदी सराकर पर बीजेपी और आरएसएस के नेता तो हमलावर हैं ही सार्वजनिक क्षेत्र में देश के सबसे बड़े बैंक ‘भारतीय स्टेट बैंक’ ने भी इस बात को माना है कि अर्थव्यवस्था में ये मंदी अस्थायी या ‘तकनीकी’ नहीं है, बल्कि आगे भी ये और बनी रहने वाली है।

केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर ये सवाल कोई पहली बार नहीं उठे हैं, विपक्ष शुरू से ही मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाता रहा है। खासकर नोटबंदी के फैसले को ज्यादातर विपक्षी पार्टियों के साथ राजग की सहयोगी पार्टियों ने भी एक आत्मघाती फैसला करार दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री और बड़े अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने जब राज्यसभा में बहस के दौरान सरकार के नोटबंदी के फैसले पर सवाल उठाए और इस कदम से विकास दर धीमी होने की तरफ इशारा किया, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ पूरे मंत्रिमंडल ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया और उल्टा उनका मजाक उड़ाया। लेकिन अब उनकी बात हू-ब-हू सच साबित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा समूह, क्रेडिट सुइस की मुंबई स्थित रिसर्च इकाई का भी इस संबंध में कहना है कि ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही है और नोटबंदी और जीएसटी जैसे नीतिगत उपायों ने अर्थव्यवस्था में बड़ी रुकावटें पैदा की हैं। इससे भी सबसे ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि इन रुकावटों के साथ-साथ कुल सरकारी खर्च में भी भारी कमी आई है।’’ क्रेडिट सुइस की यह बात सही भी है। सरकार ने पिछले दिनों मनरेगा जैसी आम आदमी को रोजगार देने वाली योजना के खर्च में काफी कटौती की है। जबकि यह बात एक अनाड़ी भी अच्छी तरह से समझ सकता है कि निजी निवेश की गैरहाजिरी में सार्वजनिक निवेश ही वह इकलौता इंजन होता है, जो विकास की गाड़ी को थोड़ा-बहुत आगे खींचता है। संप्रग सरकार के पहले शासनकाल में जब दुनियावी आर्थिक मंदी आई, तो वह मनरेगा योजना ही थी जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत हद तक संभाला और इस मंदी की हालत में भी लोगों को रोजगार दिया।

यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने जो कहा, उसमें कहीं कोई बात गलत नहीं है, बावजूद इसके सरकार यह बात मानने को बिल्कुल तैयार नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर उनका पूरा मंत्रिमंडल एक सुर में नोटबंदी और जीएसटी कोे ‘सुधारवादी’ कदम बतला रहा है। उनकी नजर में भारत सबसे ‘तेजी’ से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। बकौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार ने अर्थव्यवस्था के सुधार के लिए कई ‘अहम’ फैसले किए हैं। जिससे देश में वित्तीय ‘स्थिरता’ और अर्थव्यवस्था ‘मजबूत’ हुई है। जबकि हकीकत कुछ और है, जिसे कोई स्वीकारना नहीं चाहता। सच बात तो यह है कि वित्तीय कुप्रबंधन, नोटबंदी और जीएसटी के लचर क्रियान्वयन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया है। आंकड़ों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की मौजूदा वृद्धि दर भले ही 5.7 फीसदी दिखलाई दे, लेकिन वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर घटकर 3.7 प्रतिशत तक पंहुच गयी है। जीएसटी की वजह से न सिर्फ छोटे और मझोले उद्योग बंद हो रहे हैं, बल्कि बड़े उद्योगों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव नजर आने लगा है। निजी निवेश पूरी तरह से ठप हो गया है। निवेश इतना कम हो रहा है कि औद्योगिक उत्पादन पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। दो दशक में ऐसा पहली बार है, जब देश के सामने इस तरह के हालात सामने आए हंै। खेती हमारे देश की रीढ़ है, पर खेती के हालात ही सबसे ज्यादा खराब हैं। पहले नोटबंदी और अब देश के कई राज्यों में कहीं विकराल सूखे, तो कहीं बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। स्थिति विनिर्माण उद्योग की भी अच्छी नहीं है। यहां भी मंदी है और जिसकी वजह से औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है। निर्माण क्षेत्र तथा सेवा क्षेत्र का कारोबार गिरा, तो बेरोजगारों की फौज लंबी होती चली गई।

असंगठित क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। असंगठित क्षेत्र 90 फीसदी श्रमिक वर्ग को रोजगार देता है, लेकिन इस क्षेत्र में काम के हालात बड़े निराशाजनक हैं। नोटबंदी तथा जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र की कमर तोड़कर रख दी है, जिसका असर उत्पादन पर भी पड़ा है। पहले नोटबंदी के चलते असंगठित क्षेत्र के हजारों कर्मचारियों की नौकरी चली गई, तो अब जीएसटी इन पर भारी पड़ रहा है। इतने दिन हो गए, लेकिन जीएसटी कानून आज भी असंगठित क्षेत्र की समझ में नहीं आ रहा है। कई इकाइयों के मालिक अर्धशिक्षित होने के चलते डिजिटल जीएसटी पेपरवर्क के अभ्यस्त नहीं हैं। छोटे उत्पादकों तथा निर्यातकों से संबंधित आये दिन ऐसी खबरें आ रही हैं कि उन्हें लागत के बारे में रिटर्न भरने में मुश्किल पेश आ रही है। जीएसटी पेपरवर्क के चलते उनकी कार्यशील पूंजी पहले ही रुक कर रह गई है। असंगठित क्षेत्र के मध्यम दर्जे के कारोबारियों को हैसियत से ज्यादा खर्च कर अकाउंटेंट की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं। एक बात और, असंगठित क्षेत्र को इन दिनों सरकारी बैंकों से कर्ज हासिल करने में भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वजह, बैंक पहले ही एनपीए के बोझ तले दबे हुए हैं। फिर वे नया कर्ज कैसे बांटें ? जाहिर है कि इन सब बातों का उत्पादन की विकास दर पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। असंगठित क्षेत्र का हाल तो बुरा है ही, संगठित क्षेत्र में भी पर्याप्त संख्या में नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है। तमाम दावों और वादों के बाद भी साल 2016 में सिर्फ डेढ़ लाख नयी नौकरियां सृजित हो पायीं थीं। तिस पर पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को और बढ़ाया है। देश में महंगाई आसमान छू रही हैं। इसमें जीएसटी भी एक वजह है। जीएसटी लागू होने के बाद मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

इतना सब कुछ हो गया, लेकिन आर्थिक गिरावट को लेकर सरकार अभी तलक बेखबर बनी हुई है। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उसने अपनी तरफ से कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है। जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो। देश गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है, फिर भी कुछ करना तो दूर, कोई इन समस्याओं पर बोलने को भी तैयार नहीं है। जो कोई इन समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाता है, मोदी सरकार और उनके मंत्री झूठे आंकड़ों से उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया नारा, नया स्लोगन लेकर तुरंत जनता के बीच आ जाते हैं। इस भयानक पसमंजर में यशवंत सिन्हा, शत्रुधन सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेताओं ने सरकार की आर्थिक नीतियों को जो आइना दिखलाया है और समस्या की जड़ पर तगड़ी चोट की है, वह सचमुच काबिले तारीफ है। देश के ऐसे आर्थिक हालात में कोई भी सच्चा देशभक्त ऐसा ही करता। बावजूद इसके मोदी सरकार पर आज भी अहंकार इस कदर हावी है कि उसे सही सलाह भी गलत लगती है या वह जानते हुए भी उसे मानना नहीं चाहती। क्योंकि जिस दिन उसने अपनी गलती को स्वीकार लिया, उसी दिन जनता के मन में उसकी छवि टूट जाएगी। अपनी सरकार का उसने जो तिलिस्म बनाया है, वह टूटकर बिखर जायेगा और केन्द्र में मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।

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