सउदी अरब की महिलाएँ अब चला सकेंगी कार – डाॅ0 गीता गुप्त

5:14 pm or October 17, 2017
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सउदी अरब की महिलाएँ अब चला सकेंगी कार

डाॅ0 गीता गुप्त

वैसे तो दुनिया के सभी देशों में महिलाओं के अधिकार को लेकर मतभेद व्याप्त हैं । किन्तु सऊदी अरब इकलौता ऐसा देश है, जहाँ आज भी महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबन्ध हैं। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में उनपर लगे कुछ प्रतिबन्ध तो सचमुच चकित कर देने वाले हैं। मसलन, सऊदी अरब की महिलाएँ आज तक वाहने चलाने के अधिकार से वंचित रही हैं। इसके अलावा उन्हें अभी तक ऐसे कई अधिकार नहीं मिले हैं, जो दुनिया की बाक़ी महिलाओं को सहज सुलभ हैं।

सऊदी अरब की महिलाओं द्वारा विगत 27 वर्षों से वाहन चलाने की आज़ादी हेतु अभियान चलाया जा रहा था। पहले वहाँ महिलाओं के वाहन चलाने पर प्रतिबन्ध केवल परम्परा के रूप में व्याप्त था। जिसे सरकार ने वर्ष 1990 में क़ानून का रूप दे दिया। इस तरह वहाँ महिलाओं के लिए वाहन चलाना क़ानूनन प्रतिबन्धित हो गया। इसके बावजूद पहली बार 6 नवम्बर 1990 को 47 महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से इस क़ानून का बहिष्कार किया। इसके बाद तो महिलाओं के विरोध ने अभियान का रूप ले लिया। इस अभियान को नाम दिया गया-‘ वीमेन टू ड्राइव मूवमेण्ट।‘ इस अभियान के तहत दर्ज़नों महिलाओं ने गाड़ी चलाते हुए अपना वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर साझा करने के बाद गिरफ़्तार होने का अद्भुत साहस दिखाया। इसी अभियान के अन्तर्गत वर्ष 2011 में गिरफ़्तार हो चुकीं मनल अब तक छिपकर रह रही थीं। लेकिन हाल ही में जब सऊदी अरब के शाह ने महिलाओं को लम्बे संघर्ष के बाद गाड़ी चलाने की अनुमति दे दी तो मनल ने सोशल मीडिया पर एक फ़ोटो साझा की है, जिसमें वे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठी दिख रही हैं।

उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब के सरकारी मीडिया के मुताबिक़, सऊदी के शाह मोहम्मद बिन सलमान ने एक आदेश जारी करते हुंए महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार दिया है। सऊदी मन्त्रालय द्वारा 26 सितम्बर 2017 को ट्वीट कर यह जानकारी दी गई कि शाह का यह आदेश 24 जून 2018 तक लागू किया जाएगा। एक समिति एक माह के भीतर रपट तैयार करेगी। सम्भवतः इसके बाद शाह का आदेश का क्रियान्वित होगा।

वस्तुतः सऊदी अरब की महिलाओं पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध हैं, जिनसे अब वे छुटकारा चाहती हैं। जैसे आज तक उन्हें ड्राइविंग की आज़ादी नहीं है। हर महिला का एक क़ानूनी अभिभावक होता है, चाहे वह उसका पति हो, भाई हो, पुत्र हो या फिर पिता हो। उन्हें यात्रा करने , काम करने , विवाह करने , तलाक लेने़, बैंक खाता खुलवाने, पासपोर्ट बनवाने, चिकित्सकीय शल्य क्रिया करवाने, विदेश में अध्ययन हेतु जाने आदि अनेक कार्यों के लिए पुरुष अभिभावक की अनुमति आवश्यक होती है।

यह आश्चर्य की बात नहीं कि सऊदी अरब में हज़ारों की संख्या में स्त्रियों ने अपने अधिकारों की लड़ाई आरम्भ कर दी है। वे देश के ‘मेल गार्जियनशिप सिस्टम‘ में बदलाव के लिए आतुर तथा संघर्षरत् हैं। वे पुरुषवादी क़ानून से मुक्ति प्राप्त कर मनचाहे तरीक़े से अपनी ज़िन्दगी जीना चाहती हैं। दरअसल वहाँ अधिकतर कामों को करने से पहले स्त्रियों को पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ तक कि बाज़ार जाने के लिए भी माँ को बेटे से या बहन को भाई से अनुमति लेने की बाध्यता है। ऐसे प्रतिबन्ध के विरुद्ध महिलाएँ सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान चला रही हैं। वे वीडियो, तस्वीरों और सन्देशों को संचार माध्यमों से सरकार तक पहुँचाकर अपनी समस्याओं का निराकरण चाहती हैं।

महिलाएँ मानती हैं कि वे पुरुषों की गु़लाम नहीं हैं, वे अपनी अभिभावक स्वयं हैं और उन्हें किसी भी बात के लिए किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। एक महिला ने लिखा है-‘‘ हमारे देश में पुरुष अपनी पत्नी को गाली देते हैं, मारते हैं। इसके बावजूद वे हमारे अभिभावक होते हैं।‘‘ कुछ महिलाओं ने सोशल मीडिया पर हैशटैग टू-गेदर द-इण्ड मेल गार्जियनशिप नाम से पेज भी बनाया है। वीडियो के माध्यम से भी स्त्री के जीवन की सचाई को दुनिया से साझा किया जा रहा है। एक वीडियो में स्त्री को उसका पति पीट रहा है और उसे घर से निकल जाने के लिए भी कहता है। पत्नी पुलिस स्टेशन पहुँचकर उसकी शिकायत करती है तो उसे पति से सुलह करने का मशविरा देकर लौटा दिया जाता है। इसके बाद पति दुबारा उसे खींचते और पिटाई करते हुए वापस घर लाता है। वह हँस रहा होता है।

एक अन्य वीडियो में महिला सर्जन को ब्रिटेन में कार्डियक सर्जरी काॅन्फ्रेन्स में बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है। लेकिन इसके लिए वह बेटे की अनुमति की मोहताज़ है। बेटा माँ को अनुमति नहीं देता क्योंकि उसे यह अच्छा नहीं लगता। एक दूसरे वीडियो में लड़की जब फीमेल जुविनाइल डिटेंशन सेण्टर से छूटती है तो उसे उसकी माँ गले लगा लेती है लेकिन पिता बेटी को घर लौटने की अनुमति नहीं देता। वह कहता है कि‘ इसने हमें लोगों के सामने शर्मिन्दा किया है।‘ इस तरह महिलाएँ अपने जीवन की कड़वी सच्चाइयों को मानवाधिकार आयोग के साथ साझा कर रही हैं।

मिडिल ईस्ट ह्यूमन राइट वाॅच की डायरेक्टर सराह लेह बिटसन के अनुसार, ‘यही सऊदी अरब की हक़ीक़त है।‘ महिलाओं को ज़बरदस्ती पुरुषों से अनुमति लेनी पड़ती है। यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो इसे अपराध माना जाता है। सऊदी सरकार को आधी आबादी की आवाज़ सुननी चाहिए और उन्हें ‘मेल गार्जियनशिप क़ानून‘ से मुक्ति दिलवानी चाहिए।

ग़ौरतलब है कि वर्ष 2015 में सऊदी अरब में पहली बार महिलाओं ने चुनाव लड़ा और उसमें अपनी जीत भी दर्ज करवायी। दिसम्बर 2015 में वहाँ लोकल काउन्सलर के लिए हुए चुनाव में पहली बार महिला उम्मीदवारों और मतदाताओं ने हिस्सा लिया। वहाँ के इतिहास में यह तीसरा चुनाव था क्योंकि लगातार चालीस वर्षों ( वर्ष 1965 से वर्ष 2005 ) तक वहाँ चुनाव स्थगित किये जाते रहे थे। लोकल काउन्सलर के लिए चुनाव में महिलाओं कोे मतदाता और उम्मीदवार के रूप में भाग लेने की अनुमति पहली बार दी गई थी। इसमें उनका उत्साह देखने लायक था।
देश भर में नगर परिषद् चुनाव में 2100 सीटों के लिए कुल सात हज़ार उम्मीदवार थे। जिनमें 978 महिलाएँ उम्मीदवार के रूप में अपनी क़िस्मत आज़मा रही थीं। हालाँकि स्त्रियाँ सीधे सम्पर्क कर वोट नहीं माँग सकती थीं। पुरुषों से उनके मेलजोल पर प्रतिबन्ध होने के कारण वे पर्दे की ओट में ही बात कर सकती हैं। सऊदी अरब में राजशाही है इसलिए वहाँ केवल निकाय के चुनाव ही होते हैं। पहली बार वर्ष 2005 में चुनाव हुए थे। 13. 5 लाख पुरुष मतदाताओं के अलावा 1. 31 लाख महिलाओं ने मतदान के लिए पंजीयन कराया था। जीतने वाली महिलाओं ने तो इतिहास ही रच दिया। इससे उनके हौसले बुलन्द हुए। पहली महिला पार्षद होने का गौरव मक्का के निकट स्थित गाँव मदरकाह की सलमा बिन हिजब अल ओतिबी को हासिल हुआ।

वर्ष 2015 के चुनाव-परिणामों के बाद सऊदी अरब सिनेमा कमेटी ने देश में शीघ्र ही सिनेमा थिएटर खुलने की घोषणा की। राजधानी रियाद में इसके निर्माण हेतु एम ओ यू पर हस्ताक्षर करने की ख़बर भी आई। लम्बे समय से कई संगठनों ने वहाँ सिनेमा लाने के लिए आन्दोलन चला रखा है। पर धर्मगुरु इसके विरुद्ध हैं। सऊदी अरब के प्रसिद्ध धर्मगुरु ने कहा है कि अगर देश में सिनेमा और म्यूज़िक काॅन्सर्ट की अनुमति दी जाएगी तो इससे अनैतिकता बढ़ेगी। धर्मगुरु मुफ़्ती अब्दुल्ला अज़ीज़-अल-शेख ने मीडिया से कहा कि सिनेमा और काॅन्सर्ट से व्यभिचार, कामुकता , अनैतिकता और नास्तिकता जैसे विकार बढ़ेंगे। उनके मतानुसार, शुरुआती दौर में पुरुष और महिलाओं के बैठने के लिए अलग स्थान होगा परन्तु बाद में दोनों साथ-साथ बैठने लगेंगे जिससे हमारे देश में नैतिकता समाप्त होगी। हालाँकि स्त्रियाँ उनकी राय से इत्तफ़ाक नहीं रखतीं।

महिलाओं का मानना है कि आज़ादी उनके लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। लिंग आधारित भेदभाव से उनका जीवन नर्क बन गया है। एक ही अपराध के लिए स्त्री और पुरुष को अलग-अलग सज़ाएँ दी जाती हैं। वर्ष 2013 में श्रीलंकाई मूल की 45 वर्षीया महिला रियाद में नौकरानी के काम के लिए गयी थी। वहीं उसका प्रेमी भी काम करता था। दोनों के सम्बन्ध उजागर होते ही शरीया कोर्ट में सुनवाई हुई। महिला को अपने पति से बेवफ़ाई का दोषी पाया गया। उसे मृत्यु होने तक पत्थरों से मारने की सज़ा सुनायी गई। जबकि इसी अपराध के लिए पुरुष साथी को सौ कोड़ों की सज़ा मिली। कोर्ट की दलील थी कि अविवाहित पुरुष को मौत की सज़ा नहीें दी जा सकती।

ज्ञातव्य है कि सऊदी अरब हमेशा से शरीया क़ानून को मानता आया है। इसके विरुद्ध वहाँ आवाज़ें उठाई गई हैं। वहाँ का क़ानून बहुत विचित्र और ख़तरनाक है। महिलाओं को हिज़ाब में ही रहना होता है। उनके हाथ और आँखों के सिवाय शरीर का कोई भाग नहीं दिखना चाहिए। उन्हें जिम जाने की अनुमति नहीं है। छोटी उम्र की लड़कियों का बुज़ुर्गों से निकाह वहाँ आम बात है। अपराधों के लिए इतने कठोर दण्ड का प्रावधान है कि अधिकतर अपराधियो के बचने की गंुजाइश ही नहीं है । ज़्यादातर सिर से धड़ अलग करने की सज़ाएँ हैं। मानव अधिकार संस्था एमनेस्टी इण्टरनेशनल के अनुसार, वर्ष 2015 में नवम्बर तक 150 लोगों को मौत की सज़ा दी गई। यह पिछले बीस वर्षों में सबसे अधिक है। सऊदी अरब में अधिकतर निर्धन और पिछड़े देशों के लोग काम के लिए जाते हैं और वहाँ के क़ानून से अनभिज्ञ होने के कारण दण्ड के भागी हो जाते हैं।

बहरहाल, सऊदी अरब की स्त्रियोें में प्रसन्नता की लहर है। उन्होंने वाहन चलाने की आज़ादी हासिल कर ली है। हालाँकि यह आज़ादी जून 2018 के बाद रंग लाएगी। मगर अभी तो उन्हें 27 बरस लम्बे अभियान की इस सफलता पर बधाई दी जा सकती है। यह तो तय है कि मानवी के रूप में जीने के लिए अभी उन्हें लम्बी लड़ाई लड़नी है। ‘मेल गार्जियनशिप सिस्टम‘ में बदलाव के लिए सऊदी सरकार को मनाना आसान नहीं है। तमाम स्त्रीवादी संगठनों और मानव अधिकार आयोगों को आधी दुनिया की दर्द भरी आवाज़ पर ग़ौर करना चाहिए ताकि सऊदी अरब की स्त्रियाँ भी दुनिया की तमाम स्त्रियों की तरह अपने अधिकारों का उपभोग कर सकें।

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