जनान्दोलनों का विकृतीकरण – वीरेन्द्र जैन

5:59 pm or October 17, 2017
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जनान्दोलनों का विकृतीकरण

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध लेखक व वामपंथी विचारक राजेन्द्र यादव ने अपने एक सम्पादकीय आलेख में कुछ इस तरह लिखा था कि हमारे विरोधी कई तरह के हथकण्डे स्तेमाल करते हैं। पहले वे विरोध करते हैं पर जब उसमें सफल नहीं हो पाते तब हमारे विचार को विकृत करके पेश कर नफरत पैदा करते हैं, और उसमें भी सफल न हो पाने पर वे विलीनीकरण करते हुए कहते हैं कि हमारा रास्ता तो एक जैसा है और हमारी भाईबन्दी है। उन्होंने बुद्ध धर्म का उदाहरण देते हुए बताया था कि एक समय उनका बहुत विरोध किया गया यहाँ तक कि हिंसक संघर्ष में उनके हजारों मठ नष्ट कर दिये गये व मूर्तियां तोड़ दी गयीं। उसके बाद विकृतीकरण का दौर आया और तरह तरह से उनके नियमों आचरणों का मखौल बनाया गया। बुद्धू शब्द भी बुद्ध को विकृत करके जन्मा है। पर उसके बाद बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में मान्यता दे दी गयी और उनको विलीन करने की कोशिश की गयी। उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में भाजपा के एक सांसद मेघराज जैन ने जैन धर्माबलम्बियों को अल्पसंख्यक घोषित किये जाने को एक षड़यंत्र बताते हुए उसे हिन्दू धर्म की ही एक शाखा बताया व मांसाहारियों के साथ अल्पसंख्यक होने की घोषणा को वापिस लेने की मांग की है। रोचक यह है कि इसी दौरान उन्हीं के राज्य के एक विधायक ने स्लाटर हाउस के विरोधियों को जबाब देते हुए कहा कि देश का अस्सी प्रतिशत हिन्दू भी मांसाहारी है, उसके बारे में भी सोचो।

अब आये दिन देखा जाने लगा है कि मजदूरों, कर्मचारियों के आन्दोलन में जलूस धरने प्रदर्शन की जगह कुछ लोग सामूहिक सद्बुद्धि यज्ञ हवन या भजन कीर्तन करने लगे हैं। यह बात अलग है कि अगर प्रबन्धन और श्रमिक संगठनों के बीच पहले से सांठ गांठ न रही हो तो ऐसे धार्मिक आयोजनों के प्रभाव में कभी कोई मांग पूरी नहीं हुयी है। ऐसे आयोजनों के पीछे एक और कूटनीति छुपी होती है और वह है मजदूरों के बीच में साम्प्रदायिक विभाजन कराना। जब एक धर्म विशेष की पूजा पद्धति को आन्दोलन का हिस्सा बनाया जायेगा तो श्रमिक एकता में विभाजन को रोका नहीं जा सकेगा। इसका ही परिणाम हुआ है कि कई प्रबन्धकों ने एक धर्म विशेष के लोगों को कार्यालय के समय में उपासना के लिए छुट्टी दे कर विभाजन के बीज बो दिये हैं जबकि होना यह चाहिए था कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के कार्यालयों/ कारखानों में समस्त उपासनाएं उनके व्यक्तिगत समय में ही सीमित होना चाहिए और भक्ति या नौकरी में से किसी एक का चुनाव करने का नियम कठोरता से लागू होना चाहिए। देखने में यह बहुत मामूली सी सुविधा लगती है पर इसका प्रभाव दूरगामी होता है।

हिन्दू पुराणों में दुनिया के निर्माण के लिए एक देवता का उल्लेख आया है जिन्हें विश्वकर्मा का नाम दिया गया है। बाद में तो देश की कुछ श्रमिक जातियों जैसे लोहार, बढई आदि ने अपना जातिनाम विश्वकर्मा रखना शुरू कर दिया। दुनिया में रूस की क्रांति के बाद जब मजदूरों किसानों का महत्व पहचाना गया तब अमेरिका के शिकागो से शुरू हुये मई दिवस [मजदूर दिवस] का आयोजन हमारे देश में भी जोर शोर से होने लगा। श्रमिकों के बीच कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े मजदूर संगठनों की लोकप्रियता भी बढने लगी। हमारे देश के पहले संसदीय चुनावों में कम्युनिष्ट पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी की तरह उभरी थी। जब दुनिया में शीत युद्ध का दौर आया तो कम्युनिष्ट पार्टियों के समानांतर दक्षिणपंथी पार्टियों को उभारा गया। इनमें आरएसएस की पृष्ठभूमि वाली जनसंघ जो बाद में भाजपा की तरह अवतरित हुयी मुख्य दक्षिणपंथी पार्टी की तरह सामने आयी। इसने वामपंथी श्रमिक संगठनों के समानांतर अपने श्रमिक संगठन बनाये जो भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले गठित किये गये। इस संघ ने कालांतर में मई दिवस के समानांतर विश्वकर्मा दिवस मनाना शुरू कर दिया व धार्मिक प्रतीक के साथ जुड़े होने के कारण हिन्दू मजदूरों में सहज लोकप्रियता प्राप्त कर ली। वैसे तो पुराणों में विश्वकर्मा जयंती दीवाली त्योहर के अगले दिन होने का उल्लेख आया है किंतु समस्त कार्यालयीन कार्य ग्रेगेरियन कलेंडर के हिसाब से होने के कारण उसे प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को मनाया जाने लगा व भारतीय मजदूर संघ की मांग पर प्रबन्धन ने उस दिन छुट्टी भी घोषित कर दी। इस तरह मजदूरों के बीच धार्मिक आधार पर भेद पैदा कर दिया गया। नई इकाइयों के प्रारम्भ करने में हिन्दू विधि से पूजा पाठ करने, भूमि पूजन करने आदि की परम्परा ने भी जोर पकड़ा।

धर्मनिरपेक्ष समाज में साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन के बीज बोने के बारीक काम तो बहुत सारे होते रहे जो तुरंत समझ में नहीं आते किंतु इनके परिणाम दूरगामी होते हैं, जैसे कि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों की लोकप्रियता के समानांतर संघ ने शिक्षण संस्थाएं संचालित करना प्रारम्भ कीं और अपने स्कूलों का नाम सरस्वती शिशु मन्दिर रखा। विद्यालय की जगह मन्दिर का नामांकरण किसी संस्था को धर्म विशेष से जोड़ देने का महीन खेल था, जिसमें दोपहर के भोजन अवकाश के समय भोजन मंत्र का पाठ किया जाना अनिवार्य था। बाद में इनकी सरकारें बन जाने पर तो समस्त योजनाओं का नामांकरण ही इस तरह से किया जाने लगा जिसमें धर्म विशेष से सम्बन्ध प्रकट होता था। सत्ता के सुख भोगते रहने तक काँग्रेस इस के प्रति उदासीन रही।

मजदूरों के विभिन्न संगठनों में बँट जाने के बाद भी उनमें धार्मिक और जातियों के आधार पर भेद हो जाने से उनकी ताकत कमजोर हुयी है। नियमित मजदूरों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है व ठेका मजदूरों की संख्या बढ रही है। बेरोजगारी के कारण प्रतियोगिता बढने के कारण भी वे अपनी मांगों के लिए दबाव नहीं बना पाते जिससे प्रबन्धन ही लाभ की स्थिति में रहता है। इन दिनों धर्म के नाम पर श्रम के शोषण के जो खेल चल रहे हैं उन्हें समझने की जरूरत है। गौरक्षा, घर वापिसी, मन्दिर मस्ज़िद, लव जेहाद, तीन तलाक, धर्म परिवर्तन, आदि ऐसे ही तुरुप के पत्ते हैं जो विभिन्न तरह के आन्दोलनों के खिलाफ पटक दिये जाते हैं जिन्हें खरीदा हुआ मीडिया हवा देता रहता है।

सरकारी मशीनरी और लोकतांत्रिक स्तम्भों/ संस्थाओं को पूर्ण धर्म निरपेक्ष बनाये बिना शोषण की शक्तियों से मुकाबला कठिन है।

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