यशस्वी जीत से कांग्रेस का बढ़ता आत्मविश्वास – डॉ. महेश परिमल

6:43 pm or October 17, 2017
8

यशस्वी जीत से कांग्रेस का बढ़ता आत्मविश्वास

डॉ. महेश परिमल

पहले नांदेड के स्थानीय निकायों के चुनाव से उसके बाद गुरदासपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत ने उसके खोते आत्मविश्वास को फिर से जगा दिया है। इससे लोगों का रुझान एक बार फिर कांग्रेस की ओर दिखाई देने लगा है। गुरदासपुर से शानदार विजयश्री प्राप्त करने वाले कांग्रेसी प्रत्याशी सुनील जाखड़ ने इसकी तुलना 1978 के उस ऐतिहासिक चिकमंगलूर लोकसभा उपचुनाव से की है, जिसमें विजयी होकर इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को फिर से सत्ता में स्थापित कर दिया था। गुरदासपुर भाजपा की परम्परागत सीट रही है और इसके सभी दसों विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत यह साबित करती है कि सात महीने पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार से लोगों की उम्मीदें बरकरार हैं, जबकि भाजपा से बांधी गई उम्मीदें साढ़े तीन साल बाद छीजने लगी हैं। इस नाउम्मीदी को नोटबंदी से परेशान हुए पंजाब के किसानों और जीएसटी से क्षुब्ध व्यापारियों ने अपने ढंग से व्यक्त किया है। इस सीट से 1998 के बाद चार बार अभिनेता और भाजपा के उम्मीदवार विनोद खन्ना को जीत हासिल हुई और 2009 में हारने के बाद उन्होंने 2014 फिर यह सीट कांग्रेस से छीन ली थी।

भारतीय राजनीति में कभी कुछ भी स्थायी नहीं रहता। न हार और न जीत। पहले लोकसभा उसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया, तब यह माना जा रहा था कि अब कांग्रेस का भगवान भी भला नहीं कर सकता। नेतृत्वविहीन महाराष्ट्र कांग्रेस खत्म हो जाएगी। पर नांदेड म्युनिसिपल कार्पोरेशन के चुनाव परिणाम में चमकदार विजय से यह सिद्ध हो गया कि जो लोग कांग्रेस को श्रद्धांजलि देने की तैयारी कर रहे थे, वे अब खुद को संभालें। अपनी यशस्वी विजय से कांग्रेस ने भाजपा-शिवसेना को यह संकेत दे दिया है कि यह तो शुरुआत है। मोदी लहर में ऐसी चमकदार विजय प्राप्त करना कांग्रेस की एक बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि ने विपक्ष की आंखें चौधियां दी।

सिखों के लिए पवित्र मानी जाने वाली भूमि नांदेड की 81 सदस्यों वाले म्युनिसिपल कार्पोरेशन में 77 में से 63 सीटें कांग्रेस को मिली है। इसे अशोक चौहान की उपलब्धि माना जा रहा है, जिन्होंने भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण करने में कामयाबी पाई। इसके पहले 2012 में नांदेड म्युनिसपिल कार्पोरेशन के चुनाव परिणामों की तुलना आज से करें, तो इसे चमत्कार ही कहा जाएगा। उस समय कांग्रेस ने बमुश्किल 41 सीटों प्राप्त की थी। तब शिवसेना को 14 सीटें मिली थी, इस बार उसने केवल एक सीट ही प्राप्त की है। 2012 में ओवैसी की पार्टी को 11 सीटें मिली थी। इस बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। तब शरद पवार की पार्टी को 10 सीटें मिली थी, इस बार एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। 2012 में भाजपा को केवल दो ही सीटें मिली थी, लेकिन इस बार 6 सीटें जीतने में कामयाब रही। इस बार भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने मोर्चा संभाला था, 10 मंत्रियों ने नांदेड़ पहुंचकर प्रचार किया था, पर कोई काम नहीं आया। उसके बाद भी उसे 6 सीटों से संतोष करना पड़ा।

नांदेड म्युनिसिपल कार्पोरेशन का चुनाव कांग्रेस ने विकास के मुद्दे पर लड़ा है। भाजपा के पास भी मुख्य विकास ही था। पर अशोक चौहान की रणनीति के आगे सभी पार्टियों के समीकरण को तहस-नहस कर दिया। चौहान को उस क्षेत्र का सांसद होने का भी लाभ मिला। इस हार के बाद अब सभी के मुंह खुलने लगे हैं। शिवसेना का कहना है कि चुनाव परिणाम हमारे मित्र के लिए शायद स्तब्ध करने वाले हों, जिसने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा है। इससे यह तय हो गया कि भाजपा को हराना संभव है। शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में एक संपादकीय में कहा, ‘शिवसेना को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा, एक ओर अशोक चव्हाण की कांग्रेस से और दूसरी तरफ भाजपा से, जिसने चुनाव जीतने के लिए सभी हरसंभव तरीके का इस्तेमाल किया।’ इसमें कहा गया है कि शिवसेना जाति की राजनीति करने में विश्वास नहीं करती। दूसरी ओर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण करने में कांग्रेस ने कामयाबी पाई है।

ये वही अशोक चौहान हैं, जिनका नाम आदर्श घोटाले में उछला था, तब उन्होंने इसी कारण से इस्तीफा दे दिया था। तब लोग यह मान रहे थे कि अशोक चौहान की राजनीतिक कैरियर अब खत्म हो गया है। अशोक चौहान ने उस समय मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, उसके बाद साफ-सुथरी छवि वाले पृथ्वीराज चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया। तब 2014 के चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह से मात मिली थी, उस समय अशोक चौहान ने अपने संसदीय क्षेत्र नांदेड़ से चुनाव जीतकर कांग्रेस की लाज रखी थी। इस चुनाव में कांग्रेस के केवल दो ही सीटें मिली थी, जिसमें से एक अशोक चौहान की थी। दूसरी सीट नांदेड़ से लगी हुई परभणी थी, जहां से राजीव सातव ने कामयाबी हासिल की थी। राजीव को जिताने में अशोक चौहान की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

वास्तव में अशोक चौहान कांग्रेस के लिए तारणहार साबित हुए हैं। उन्होंने कई बार कांग्रेस को कामयाबी दिलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनीति में स्वच्छ छवि वाले अक्सर चुनाव में मात खा जाते हैं। यह एक ऐसी सच्चाई है, जो हमारे सामने बार-बार आई है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान साफ-सुथरी छवि वाले माने जाते हैं, इसके बाद भी वे मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में नाकामयाब साबित हुए हैं। अशोक चौहान का नाम आदर्श घोटाले में आया, उसके बाद भी वे मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल सिद्ध हुए हैं। आदर्श घोटाला आज भी उनके सामने एक लटकती हुई तलवार से कम नहीं है। अभी भी वे बुरे फंसे हैं। एक तरफ महाराष्ट्र के गवर्नर ने उसके खिलाफ कार्रवाई करने की सीबीआई को अनुमति दे दी है। पर मुम्बई हाईकोर्ट ने उस पर स्टे लगा दिया है। अशोक चौहान का राजनीतिक भविष्य हाईकोर्ट के फैसले पर ही टिका हुआ है। पर उनके मतदाता ऐसा नहीं मानते। अशोक चौहान ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि भाजपाविरोधी मतों को संगठित कर दिया जाए, तो उसे हराना आसान है। यही थ्योरी यदि गुजरात विधानसभा चुनाव में सफल हो जाती है, तो भाजपा को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in