सूर्य की उपासना का महापर्व: छठ पूजा – डाॅ0 गीता गुप्त

3:57 pm or October 25, 2017
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सूर्य की उपासना का महापर्व: छठ पूजा

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

भारत में प्राकृतिक उपादानों की उपासना की परम्परा बहुत प्राचीन है। लोक-आस्था, विश्वास और श्रद्धा ही इस परम्परा के मूल हैं। मूलतः बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब देश की सीमा लाँघकर विदेशों में भी प्रवासी भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। गिरमिटिया मज़दूर के रूप में विदेश गये बिहारियों के वंशज माॅरीशस, सुमात्रा, जावा, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, अमेरिका के कैरेबियन देश त्रिनिदाद सहित जहाँ-जहाँ भी प्रवासरत् हैं, अपने इस लोक-पर्व को विधि-विधान से मनाते हैं। सुदूर अंचलों में जीविकोपार्जन हेतु कार्यरत् लोग छठ की पूजा में शामिल होने के लिए अवकाश लेकर घर जाते हैं। मुम्बई केे समुद्र तट पर तो छठ-पूजा के अवसर पर लाखों की भीड़ उमड़ती है। इससे इस पर्व की महत्ता और लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है।

वस्तुतः आदि देव भगवान सूर्य की आराधना का यह पर्व प्रकृति की उपासना का भी महापर्व है। इसे कृषक सभ्यता का महापर्व भी कह सकते हैं। बिहार और पूर्वांचल प्राचीन काल से ही कृषिप्रधान क्षेत्र रहे हैं। सूर्य कृषि का आधार है। वह सृष्टि का संचालक और प्राणियों के जीवन का प्रहरी भी है। छठ-पूजा मूलतः ऊर्जा के प्रतीक भगवान सूर्य के प्रति आभार की अभिव्यक्ति है। वेदों में सूर्य की प्रतिष्ठा प्रमुख देवता के रूप में है। एक बहुप्रचलित उक्ति है-‘उगते सूरज को हर कोई प्रणाम करता है पर डूबते सूरज को कोई नहीं।‘किन्तु छठ इकलौता ऐसा पर्व है जिसका आरम्भ डूबते सूर्य की विशेष पूजा से ही होता है और उगते सूर्य की उपासना से पर्व का समापन होता है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी में मनाये जाने वाले छठ को चैती छठ कहते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को सूर्य षष्ठी पर्व, कतकी छठ या डाला छठ भी कहते हैं।

ऐसी मान्यता है कि कार्तिक में भगवान विष्णु जल में वास करते हैं। सूर्य को भगवान विष्णु का प्रत्यक्ष रूप माना जाता है। इसलिए इन्हें सूर्यनारायण भी कहा जाता है। सूर्य षष्ठी पर्व में नदी या तालाब में कमर तक प्रवेश करके डूबते सूर्य को अध्र्य दिया जाता है। इस विधि से भगवान विष्णु के सूर्य रूप तथा जल में स्थित विष्णु के परोक्ष रूप की आराधना एक साथ हो जाती है। इसलिए कार्तिक मास के सूर्य षष्ठी व्रत का विशेष महत्त्व है। छठ-पूजा की परम्परा एवं उसके महत्त्व के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक तथा लोक कथाएँ प्रचलित हैं। किंवदन्ती है कि लंका-विजय के पश्चात् रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को श्रीराम एवं सीताजी ने उपवास कर सूर्य की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय सरयू के तट पर पुनः अनुष्ठान कर उन्होंने सूर्य से आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत पूर्ण किया।

एक अन्य मान्यता है कि महाभारत काल से ही छठ-पूजा का विधान है। इसकी शुरुआत अंग देश( आधुनिक भागलपुर) के राजा कर्ण ने की थी। वह सूर्यदेव का अनन्य भक्त था और प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अध्र्य देता था। सूर्य की कृपा से ही महान् योद्धा बना। आज भी छठ में अध्र्य-दान की यही पद्धति अपनायी जाती है। छठ पर्व से सम्बन्धित एक अन्य कथा यह है कि जब पाण्डव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए और वन-वन भटक रहे थे, तब द्रौपदी ने इस दुर्दशा से मुक्ति हेतु छठ-व्रत करके सूर्य की उपासना की। तदुपरान्त पाण्डवों को अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त हो गया। लोक-परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की सर्वप्रथम पूजा सूर्य ने ही की थी। पुराण में भी इस सम्बन्ध में उल्लेख है।

यह भी किंवदन्ती है कि मनु के पुत्र राजा प्रियवद के कोई सन्तान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गई खीर दी। जिसके प्रभाववश मालिनी पुत्रवती हईं किन्तु वह पुत्र मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र-शोक में स्वयं प्राण त्यागने का प्रयास करने लगे। तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुईं और बोलीं-‘‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। राजन तुम मेरा पूजन करो और अन्य लोगांे से भी कराओ।‘‘ देवी षष्ठी ने ऐसा कहकर उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में ही उसे जीवित कर दिया। तक राजा ने घर जाकर सोत्साह विधिपूर्वक षष्ठी देवी की पूजा सम्पन्न की। चूँकि यह पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को की गई थी। अतएव इस तिथि को षष्ठी देवी या छठ देवी का व्रत किया जाने लगा।

लोक कथाओं की महिमा अपनी जगह है। पर छठ-पूजा के विधान में व्रती महिलाओं द्वारा सूर्यदेवता और उनकी बहिन छठी के लिए भक्ति भाव से जो लोकगीत गाये जाते हैं, उनमें अपने आराध्य के प्रति सहज समर्पण , आस्था और विश्वास प्रतिबिम्बित होता है। छठ पूजा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और लोकाचार है। इसमंे स्वच्छता का बहुत ध्यान रखा जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की तैयारी महीनों पहले आरम्भ कर दी जाती है। व्रत के आयोजन में बिहार की संस्कृति स्पष्ट झलकती है। वहाँ के लोक गीत, व्यक्तिगत आस्थाओं, फल-फूल, पारम्परिक वेेशभूषा, श्रृंगार तथा खानपान का अद्भुत सामंजस्य भावविभोर कर देता है। भक्ति भाव से परिपूर्ण इस पर्व के लिए किसी बाहरी तामझाम या कृत्रिम संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। दीपावली के ठीक बाद मनाये जाने वाले इस पर्व में न घरों में बनावटी साज-सज्जा होती है, न ही दुकान की मिठाइयाँ, न पटाख़ों का शोर, न प्रदूषण। पूजा में सिर्फ़ प्राकृतिक वस्तुएँ उपयोग में लायी जाती हैं जैसे-बाँस से बने सूप, दउरी, केला, नारियल, कच्ची हल्दी, सुपारी, सेव, नीबू, ईख, अदरक, मूली, चना आदि। आटा और गुड़ से बने विशेष पकवान ‘ठेकुआ‘ का प्रसाद चढ़ाया जाता है जिसपर लकड़ी के साँचे से सूर्य भगवान के रथ का चक्र उकेरना शुभ माना जाता है। ठेकुआ को बिहार में खजूर भी कहते हैं और यह बहुत स्वादिष्ट होता है।

छठ-पूजा का सम्पूर्ण विधान चार दिनों में पूर्ण होता है। इस पूजा के नियम बहुत कड़े हैं। व्रत के पूर्व घर की प्रत्येक वस्तु स्वच्छ होनी चाहिए। घर में लहसुन-प्याज का सेवन निषिद्ध होता है। छठ-पूजा में कोशी भरने की भी परम्परा होती है। छठी माता से कोई मन्नत माँगने पर जब उसकी पूर्ति हो जाती है तो कोशी भरी जाती है। जिसकी मन्नत पूरी होती है, वह अपने घर से घाट तक दण्ड भरता हुआ (ज़मीन पर लोट लगाता हुआ) जाता है। सायंकालीन अध्र्य और पूजन के बाद घर लौैैटकर सूपों में फल और पकवान बदलकर रखे जाते हैं। रात को छठी माता की गोद भराई होती है। छठ पूजन के साथ-साथ बारह गन्नों का एक समूह बनाकर उसपर नये कपड़े की छाजन डाली जाती है। उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा घड़ा रखकर उसपर छह दीये जलाकर देवकरी में रखा जाता है। यही क्रिया नदी या तालाब के किनारे दोहरायी जाती है। गन्नों के छत्र के नीचे पूजा की सारी सामग्री रखी जाती है। पूजा के समय बड़े भावपूर्ण गीत गाये जाते हैं।

छठ व्रत एक कठिन तपस्या की तरह है जो प्रायः स्त्रियों द्वारा किया जाता है किन्तु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। छठ व्रत करने वाली स्त्रियों को परवैतिन कहते हैं। चार दिनों के व्रत काल में धरती पर कम्बल या चादर पर रात्रि शयन करना होता है। बिना सिले वस्त्र पहनने होते हैं। स्त्रियाँ साड़ी और पुरुष धोती धारण करते हैं। व्रत का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसकी परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती चलती है।
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से छठ व्रत की शुरुआत होती है। इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान करने के बाद छठ व्रत का संकल्प लेते हैं। आम की लकड़ी जलाकर पीतल या मिट्टी के बर्तन में अरवा चावल का भात, चने की दाल और कद्दू का साग बनाकर प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। इस क्रिया को ‘संझवत‘ या ‘नहाय-खाय‘ कहते हैं। पंचमी को दिन भर व्रत रखने के बाद सन्ध्या काल में गुड़ से बनी खीर-रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में किया जाता है। इस क्रिया को ‘खरना‘ कहते हैं। खरना के समय शोर वर्जित है। यदि व्रती के कानों में आवाज़ पड़ती है तो वे उसी क्षण खाना छोड़ देती हैं। व्रती के प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही अन्य लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।

उल्लेखनीय है कि छठ के दिन महिलाएँ फल-फूल, पकवान व दीपक रखकर डाला तैयार करती हैं। घर का पुरुष यह डाला सिर पर उठाकर घाट की ओर चलता है। डाला यानी दउरा सिर पर उठाने के लिए होड-सी लगती है। इसके पीछे महिलाएँ लोकगीत गाती हुई चलती हैं।

कोई गाती हैं- सेई ले शरण तोहार ए छठी मइया
सुनि लेहु अरज हमार।
गोदिया भरल मइया बेटा माँगिले
मँगलवा भरल अहिवात ए छठी मइया
सुनि लेहु अरज हमार।
कोई व्रती गाती है- केरवा जे मँगइली शहर से
बालक दिहले जुठियाय
हमरो सुरजमल के अरधिया
बालक दिहले जुठियाय।

एक ओर मन्नत पूरी करने की गुहार है तो दूसरी ओर गीत में यह चिन्ता कि सूर्य देव के लिए मँगवाया गया प्रसाद बालक ने जूठा कर दिया। अब यह भगवान को अर्पित करना सम्भव नहीं और बच्चे को भी दण्डित नहीं किया जा सकता।

ंषष्ठी के दिन सूर्यास्त से पहले व्रती स्त्री के साथ सब लोग घाट पर जाते हैं। फल, पकवान और प्रसाद और पूजन सामग्री को बाँस की टोकरी और सुपली में भरकर ले जाया जाता है। नदी या तालाब के किनारे पक्की छठी मइया बना दी जाती हैं और बरसोंबरस वहाँ पूजा की जाती है। लेकिन जिन शहरों में ऐसे जलाशय नहीं होते, वहाँ कच्ची मिट्टी और ईंटों की सहायता से अस्थायी तौर पर छठी मइया निर्मित कर दी जाती हैं। छठ देवी सूर्य देव की बहिन हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए, जीवन में जल व सूर्य की महिमा को स्वीकारते हुए इन्हें साक्षी मानकर भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। घाट पर पहुँचने के बाद पानी में खड़े होकर व्रती स्त्री डूबते सूर्य को अध्र्य अर्पित करती है। इसके बाद छठी मइया के पास बैठकर अनूठी रीति से पूजन किया जाता है। यह पूजन तब तक जारी रहता है, जब तक सूर्य भगवान अपने घर नहीं लौट जाते और रात का अन्धकार नहीं घिर आता। इन क्षणों में छठी मइया की प्रार्थना के विशेष गीत गाये जाते हैं।

सप्तमी को प्रातःकाल फिर सन्ध्याकाल की भाँति उन्हीं निश्चित स्थलों पर पानी के किनारे खड़े होकर उदीयमान सूर्य को अध्र्य देने के बाद व्रत के अनुष्ठान की समाप्ति होती है।

छठ पर्व बिहार की संास्कृतिक पहचान बन चुका है। यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसपर बाज़ारवाद की छाया नहीं पड़ सकी है। आहार-विहार, विचार, संस्कार-सबमें यह पर्व सात्त्विकता की माँग करता है। अगर यह सात्त्विकता केवल छठ पर्व के बजाय हमेशा के लिए जीवन को अंगीकार कर लिया जाय तो भौतिक जगत् की अनेक विडम्बनाएँ मिट सकती हैं। प्रकृति की उपासना का यह पर्व हमें सादगीपूर्ण, विकारमुक्त, निश्छल और कृतज्ञता सं परिपूर्ण शान्तिमय जीवन जीने की अद्भुत सीख देता है। वैश्वीकरण की आँधी में भी इस पर्व की सात्त्विकता कायम रहे, यह कामना बहुत स्वाभाविक है।

हम प्राकृतिक उपादानों का निर्ममतापूर्वक दोहन कर रहे हैं। जो पर्व-त्योहार हमें प्रकृति के संरक्षण की शिक्षा एवं प्रेरणा देते थे, उन्हें हमने विस्मृत की दिया है। इसलिए आज स्वच्छता अभियान और पर्यावरण संरक्षण जैसे अनगिनत अभियानों की शुरुआत करनी पड़ रही है। निश्चय ही हमें अपने पर्व-त्योहारों में निहित सन्देशों को समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।

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