भूख है तो सब्र कर .. – सुभाष गाताडे

4:15 pm or October 25, 2017
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भूख है तो सब्र कर ..

—- सुभाष गाताडे —-

झारखंड के देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड के भगवानपुर गांव के 62 वर्षीय रूपलाल मरांडी पिछले दिनों कथित तौर पर भूख से मर गए। ख़बर के मुताबिक उनके अंगूठे का निशान बायोमेटिक मशीन से मिल नहीं रहा था और दो माह से परिवार को राशन नहीं मिल रहा था। दो दिन से घर में चूल्हा भी नहीं जला था। सरकारी अधिकारी का कहना है कि यह एक ‘‘नेचुरल डेथ’’ है, कोई पोस्टमार्टेम नहीं कराया जाएगा।

रूपलाल मरांडी की मौत भूख से जुड़ी झारखण्ड की तीसरी मौत है। इसके पहले राज्य झारखंड के सिमडेगा में 11 साल की बच्ची की कथित भुखमरी से हुई मौत के बाद धनबाद के झरिया के भालगढ़ा तारा बागान में 40 वर्षीय रिक्शा चालक बैद्यनाथ दास की मौत भी भूख से हो गई थी.(http://thewirehindi.com/22506/jharkhand-deoghar-starvation-death/

तीनों मौतों की ख़बरों को पलटेंगे तो सरकारी प्रतिक्रिया एक जैसी ही है जो बरबस मशहूर नाटककार गुरूशरण सिंह द्वारा लिखा एक नुक्कड नाटक ‘हवाई गोले’ की याद दिलाती है , जिसमें लोकतंत्रा की विडम्बनाओं को उजागर किया गया था। नाटक में भूखमरी से हुई मौत को छिपाने के लिए सरकारी अफसरों द्वारा किया गया दावा कि उसने ‘सूखे पत्तों का साग खाया था’ बरबस तीनों ही मामलों में लागू होता दिखता है।

इन मौतों में सबसे सूर्खियों में रही संतोष कुमारी की मौत।

कोयली देवी – संतोष कुमारी की मां को अपनी बेटी के आखरी शब्द अभी भी याद है। ‘माई भात दे, थोड़ा भात दे’’। यही कहते हुए उसने आखरी सांस ली थी।(https://scroll.in/article/854225/denied-food-because-she-did-not-have-aadhaar-linked-ration-card-jharkhand-girl-dies-of-starvation) पूरा परिवार कई दिनों से भूखा था और राशन मिलने के भी कोई आसार नहीं थे क्योंकि राशन कार्ड के साथ आधार लिंक न होने के चलते उनका नाम लिस्ट से हटा दिया गया था। रेखांकित करने वाली बात है कि संतोष की मौत की वजह स्पष्ट है, मगर अभी भी जिला प्रशासन का दावा है कि संतोष भूखमरी से नहीं बल्कि मलेरिया से मरी है। दरअसल उस इलाके में कई परिवार ऐसे हैं जो इसी तरह राशन कार्ड के आधार लिंक न होने के चलते सस्ते अनाज से वंचित हैं और भूखमरी का शिकार हैे।

यह तीनों मौतें इस राज्य में व्याप्त प्रचंड भूखमरी की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। निश्चित ऐसी घटनाएं या ऐसे हालात अब अपवाद नहीं कहे जा सकते, न सिमडेगा जैसे जगहों तक सीमित माने जा सकते हैं।

मालूम हो कि हाल में दो अलग अलग रिपोर्टों ने भारत में विकराल होती भूख की समस्या पर रौशनी डाली है।

इंटरनेशनल फुड पॉलिसी रिसर्च इन्स्टिटयूट’ की ताज़ा रिपोर्ट – जो विगत सतरह सालों से वैश्विक भूख सूचकांक जारी करती है – बताती है कि 119 विकसनशील मुल्कों की फेहरिस्त में वह फिलवक्त़ 100 वें स्थान पर है, जबकि पिछले साल यही स्थान 97 था। अर्थात वह महज एक साल के अन्दर तीन स्थान नीचे लुढक गया। और अगर हम पहले के सूचकांको पलटें तो पता चलता है कि 2014 के सूचकांकों की तुलना में यह लुढकना 45 रैंक नीचे है अर्थात उस साल भारत की रैंक 55 थी। नोट किया जा सकता है कि सिर्फ पाकिस्तान को छोड़ दे जिसका भूख सूचकांक 106 है, बाकी पड़ोसी मुल्क भारत से बेहतर स्थिति में है। उदाहरण के लिए नेपाल /72/, मायनामार /77/, बांगलादेश /88/, और चीन /29/भी नीचले पायदान पर है। इतनाही नहीं उत्तरी कोरिया /93/, इराक /78/ भी भारत से बेहतर है।

आखिर कैसे तय होता है वैश्विक भूख सूचकांक ?

यह एक बहुआयामी सूचकांक है जो चार किस्म के संकेतकों से निर्धारित होता है – आबादी में कुपोषितों का प्रतिशत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अल्पविकसित तथा कमजोर बच्चे और उसी उम्र समूह में शिशु म्रत्यु दर आदि। जहां सूचकांक 10 से कम हो तो यह भूख की व्यापकता में काफी कमी दिखाता है जबकि सूचकांक 50 से अधिक हो तो ‘‘अत्यधिक गंभीर’’ स्थिति रेखांकित होती है। गौरतलब है कि चीन एवं क्यूबा जैसे देशों में यह सूचकांक 5 से भी कम है।

एक तरह से कहें तो यह रिपोर्ट विगत माह संयुक्त राष्ट संघ की तरफ से जारी ‘स्टेट आफ फुड सिक्युरिटी एण्ड न्यूटिशन इन द वर्ल्ड 2017’ की रिपोर्ट की ही ताईद करती है, जिसने बढ़ती वैश्विक भूख की परिघटना को रेखांकित करते हुए बताया था कि भारत में भूखे लोगों की तादाद 19 करोड से अधिक है – जो उसकी कुल आबादी का 14.5 फीसदी है। उसने यह भी जोड़ा था कि फिलवक्त पांच साल से कम उम्र के भारत के 38.4 फीसदी बच्चे अल्पविकसित हैं जबकि प्रजनन की उम्र की 51.4 फीसदी स्त्रिायां एनिमिक अर्थात खून की कमी से ग्रस्त है।

स्पष्ट है कि राष्टीय स्तर पर पोषण पर केन्द्रित कार्यक्रमों की घोषित व्यापकता के बावजूद, इन रिपोर्टों ने भारत की बड़ी आबादी के सामने खड़े कुपोषण के खतरे को रेखांकित किया है। जाहिर है कि घोषित नीतियों/कार्यक्रमों एवं ंजमीनी अमल में गहरा अंतराल दिखाई देता है। इसका एक प्रमाण देश की आला अदालत द्वारा मई 2016 से पांच बार जारी निर्देश हैं जिन्हें वह ‘स्वराज्य अभियान’ की इस सम्बन्ध में दायर याचिका को लेकर दे चुका है, जहां उसने खुद भूख और अन्न सुरक्षा के मामले में केन्द्र एवं राज्य सरकारों की प्रचंड बेरूखी को लेकर उन्हें बुरी तरह लताड़ा है। नेशनल फुड सिक्युरिटी एक्ट 2013 को लेकर जितनी राजनीतिक बेरूखी लगातार सामने आयी है, उसी को लेकर उसकी चिन्ता प्रगट हुई है। (https://sabrangindia.in/article/food-thought-sc-raps-central-state-govts-indifference-food-security) जुलाई माह के उत्तरार्द्ध में अदालत को बाकायदा कहना पड़ा था कि संसद द्वारा बनाए कानून का क्या उपयोग है जब राज्य एवं केन्द्र सरकारें उसे लागू न करें।.. ‘अपने सामाजिक न्याय के तकाज़ों के तहत संसद द्वारा बनाए कानून को पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए तथा उसे गंभीरता एवं सकारात्मकता के साथ साल के अन्दर अमल में लाना चाहिए।’

2014 में सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भाजपा/राजग की सरकार ने कई दफा इस अधिनियम को लागू करने की डेडलाइन आगे बढ़ा दी। ऐसा महज संसद की स्वीक्रति से ही संभव है, मगर इसे कार्यपालिका की कार्रवाई के तहत अंजाम दिया गया। अगर अधिनियम जब से बना तबसे लागू किया गया होता तो ग्रामीण आबादी के लगभग 75 फीसदी के पास तक अनाज पहुंचाने की प्रणालियां कायम हो चुकी होती। पिछले साल की ख़बर थी कि राष्टीय अन्न सुरक्षा अधिनियम को लागू करने का कुल बजट 15,000 करोड़ रूपए का था जबकि केन्द्र सरकार ने उसके लिए महज 400 करोड़ रूपये ही आवंटित किए थे।

जो हाल राष्टीय अन्न सुरक्षा अधिनियम का था, कमोबेश वही हाल ‘मनरेगा’ का भी था।

मिसाल के तौर पर क्या इस बात की कल्पना तक की जा सकती है कि ग्रामीण गरीबों की जीवन की स्थितियां थोड़ी बेहतर बनाने के लिए बनाए गए रोजगार अधिकार अधिनियम के तहत – जिसमें ग्रामीण इलाके के हरेक घर से एक वयस्क को साल में सौ दिन की रोजगार की गारंटी की बात की गयी थी तथा जहां मजदूरी का भुगतान पन्दरह दिनों के अन्दर करने का वायदा था – सालों साल मजदूरी देने का काम लटका रह सकता है। इस बात की ताईद खुद संसद के पटल पर ग्रामीण विकास राज्यमंत्राी रामक्रपाल यादव ने की थी, जब उन्होंने बताया कि बीते तीन सालों का 17,000 करोड़ रूपए की राशि अभी दी जानी है। उनके मुताबिक जहां वर्ष 2014-15 का 4,200 करोड़ रूपया बकाया है तो वर्ष 2015-16 का 3,900 करोड़ रूपया बकाया है तो वर्ष 2016-17 में यह राशि 8,000 करोड़ के करीब है। गौरतलब है कि यह आलम तब है जब आला अदालत ने पिछली मई में ही सरकार को लताड़ा था कि वह मनरेगा के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं करा रही है। इस सन्दर्भ में अपने श्रम का भुगतान पाने के लिए जगह जगह आन्दोलन चलने की भी ख़बरें आती रही हैं,  (http://thewire.in/81429/mgnrega-workers-demand-their-wages-now)

अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब ‘‘इक्कीसवीं सदी में पूंजी’’ के चर्चित लेखक थॉमस पिकेटी और उनके सहयोगी लुकास चासेल ने, अपने एक पर्चे में भारत में बढ़ती विषमता पर निगाह डाली थी और बताया था कि किस तरह विगत तीन दशकों में भारत उन मुल्कों में अग्रणी रहा है जहां सबसे उपरी 1 फीसदी तबके के लोगों की राष्टीय आय में हिस्सेदारी में सबसे अधिक तेजी देखी गयी है। उनके अध्ययन के मुताबिक अगर 1982-83 में उपरी एक फीसदी के पास राष्टीय आय का 6.2 फीसदी रहा है वहीं तीस साल के अन्दर – 2013-14 तक आते आते – यह प्रतिशत 21.7 फीसदी हो चुका है। उनके पर्चे का शीर्षक भी उत्तेजक किस्म का है ‘‘फ्रॉम ब्रिटिश राज टू बिलियोनेर राज’ अर्थात ‘ब्रिटिश हुकूमत से खरबपतियों की हुकूमत’ तक। भारत किस तरह सिर्फ उपरी तबके के लिए ही ‘चमक’ रहा है, इसी हक़ीकत की ताईद उपरोक्त पर्चे ने की थी। अब अगर एक जगह चमक बढ़ेगी तो लाजिम है कि दूसरे छोर पर चमक घटेगी, भारत में बढ़ती भूख को लेकर यह ताजा रिपोर्टें शायद यही बात संप्रेषित करती है।

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