टीपू सुल्तान के नाम पर फिर सियासत – जाहिद खान

4:34 pm or November 2, 2017
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टीपू सुल्तान के नाम पर फिर सियासत

—- जाहिद खान —-

ब्रितानी सेना से लोहा लेने वाले 18वीं सदी के मैसूर के महान शासक टीपू सुल्तान के बारे में एक बार फिर विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है। विवाद की शुरूआत केंद्रीय कौशल विकास राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने की है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार हर साल की तरह, इस साल भी 10 नवंबर को टीपू सुल्तान की जयंती मना रही है। इस कार्यक्रम के लिए सरकार ने दीगर लोगों के साथ अनंत कुमार हेगड़े को भी न्योता भेजा था, लेकिन हेगड़े ने न सिर्फ कार्यक्रम में शामिल होने से इंकार कर दिया बल्कि कर्नाटक सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखकर इस आयोजन में उन्हें शामिल नहीं करने को भी कहा है। आयोजन में शामिल न होने के पीछे हेगड़े की दलील है कि ‘‘टीपू सुल्तान, कट्टर मुस्लिम शासक और हिंदुओं का दुश्मन था। वह जन बलात्कारी और क्रूर हत्यारा था। लिहाजा इस तरह के कार्यक्रम में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता।’’ जाहिर है केन्द्रीय मंत्री के इस तरह के बेतुके बयान के बाद बवाल मचना ही था। इस मामले पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गई है। सोशल मीडिया पर टीपू सुल्तान के समर्थकों और विरोधियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। जैसे कि आज यही एक अहम मुद्दा हो। इन सबके बीच देश के असल मुद्दे हाशिये पर हैं।

यह पहली मर्तबा नहीं है, जब टीपू सुल्तान के किरदार पर कोई विवाद छिड़ा हो, बल्कि उनकी शानदार शख्सियत पर बार-बार सवाल उठाए जाते रहे हैं। कुछ दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठनों का हमेशा से यह मानना रहा है कि टीपू सुल्तान घोर सांप्रदायिक मुस्लिम शासक था। जिसने अपने शासनकाल में तटीय दक्षिण कन्नड़ जिले के अनेक मंदिरों और चर्चों को ध्वस्त किया और हजारों लोगों को धर्मांतरण करने पर मजबूर किया था। कर्नाटक में जब से कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का कार्यक्रम शुरू किया है, बीजेपी और आरएसएस समर्थित संगठन इस कार्यक्रम का राज्यव्यापी विरोध करते आ रहे हैं। उनकी नजर में यह कार्यक्रम, कांग्रेस सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति है। साल 2015 में टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का हिन्दूवादी संगठनों ने जबर्दस्त विरोध किया। इस मुद्दे पर कर्नाटक में हिंसा भी फैली और कई लोग घायल हुए थे। साल 2016 में भी यही कहानी दोहराई गई और साल 2017 में जयंती कार्यक्रम से पहले विरोध की नई पटकथा लिख दी गई है। टीपू सुल्तान के बारे में फिर देश में नई बहस शुरू हो गई है कि उन्हें किस रूप में याद किया जाए ? ट्विटर पर पोस्ट की गई कई टिप्पणियों में टीपू सुल्तान को देशभक्त और हीरो बतलाया जा रहा है, तो बहुत सी टिप्पणियांें में उनकी निंदा करते हुए उन्हें क्रूर और हत्यारे शासक की उपमा दी गई है। कई लोगों की यह टिप्पणी है कि टीपू सल्तान एक क्रूर शासक था। जिसने कई गांवों को तबाह किया, हिंदुओं के मंदिरों और ईसाइयों के गिरजाघरों को तोड़ा और हजारों लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया। लेकिन लेखक, बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों का नजरिया इससे बिल्कुल उलट है। स्कूली पाठ्यक्रम में टीपू सुल्तान, एक बहादुर शासक के रूप में छात्रों को पढ़ाए जाते हैं, जिसने 18वीं सदी के अंत में ब्रितानी उपनिवेशवाद से जमकर लोहा लिया। उनकी ये छवि दूरदर्शन पर दिखाए गए धारावाहिक,‘द स्वोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ से और मजबूत हुई। तमाम दुष्प्रचार के बाद भी देश का बच्चा-बच्चा आज टीपू सुल्तान को अंग्रेजों के दुश्मन के रूप में ही जानता है।

टीपू से जुड़े दस्तावेजों की गहराई से छानबीन करने वाले इतिहासकार टीसी गौड़ा कहते हैं कि टीपू के संबंध में जो भी कहानियां गढ़ी गई हैं, उनका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। टीपू ऐसे भारतीय शासक थे, जिनकी मौत मैदान-ए-जंग में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ते-लड़ते हुई थी। सरकारी दस्तावेजों में यह बात साफ-साफ दर्ज है कि टीपू ने श्रृंगेरी, मेल्कोटे, नांजनगुंड, सिरीरंगापटनम, कोलूर, मोकंबिका आदि मंदिरों को न सिर्फ धन-दौलत, जेवरात दिए बल्कि उन्हें सुरक्षा भी मुहैया करवाई थी। 156 से अधिक मंदिरों को टीपू सुल्तान की ओर से भूमि तथा अनुदान राशि प्रदान की जाती थी। मैसूर में हैदर अली और उनके पुत्र टीपू सुल्तान हिंदू संतों के संरक्षक थे। दोनों ही के मन में श्रीरंगनाथन मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा थी। टीपू सुल्तान नजरिए के लिहाज से बेहद उदारवादी था। अपने राज्य में उसकी लोकप्रियता भी बेमिसाल थी। टीपू ने मैसूर की प्राचीन परंपराओं का हमेशा आदर किया और अपनी हिंदू प्रजा को धार्मिक मान्यताएं मानने की पूरी आजादी दी। अंगे्रज मेजर टेरर ने लिखा है कि ‘‘भारत की सभी रियासतों में टीपू सुल्तान की मैसूर स्टेट सर्वाधिक खुशहाल थी, जिसके लोग प्रसन्नता से परिपूर्ण रहते थे।’’ यही नहीं धार्मिक मामलों में भी वे बेहद सहिष्णु थे, धर्मांध नहीं, जैसा कि उनके बारे में संघ परिवार प्रचारित करता है।

टीपू सुल्तान के दुश्मन सिर्फ मराठा ही नहीं, अंग्रेज और निजाम भी थे। टीपू के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक हैदराबाद के निजाम थे। मजहबी मुस्लिम होने के बावजूद टीपू सुल्तान ने सभी धर्मों का पूरा सम्मान किया तथा धार्मिक संस्थानों को बराबरी से तरजीह दी। टीपू सुल्तान के शासन में अहम ओहदों पर हिंदू काबिज थे। दिवान पोर्निया उनका प्रधानमंत्री, सूबा राव वजीरे दरबार और शमाया आयंगर गृहमंत्री थे। इतिहासकार सुरेन्द्रनाथ सेन की किताब ‘स्टडीज इन द इंडियन हिस्ट्री’ में इस बात का हवाला मिलता है कि प्रसिद्ध श्रृंगेरी मठ पर जब मराठी सेना ने हमला किया, तो वे इस घटना से काफी हैरान हुए। हमले से मठ को काफी क्षति हुई। वे श्रृंगेरी मठ में काफी आस्था रखते थे। लिहाजा उन्होंने देवी शारदा की प्रतिमा पुनसर््थापित करने में पूरी मदद की। यही नहीं एक घटना जिसका कि जिक्र करना बेहद जरूरी है। मालाबार पर फतह कर जब टीपू सुल्तान अग्रइवार के नजदीक थे, तो उनके कुछ सैनिकों ने अग्रइवार के पवित्र मंदिर का कुछ हिस्सा आगजनी की भेंट चढ़ा दिया। सुल्तान को जब इस बात का पता चला, तो उन्होंने गुनहगार सैनिकों को कड़ी सजा दी और मंदिर में फौरन सुधार कार्य करवाए।

यह बात सच है कि टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में कुर्ग तथा नायरों को कुचलकर रख दिया, लेकिन उन्होंने मुस्लिम निजामों को भी नहीं बख्शा। टीपू सुल्तान पर ये इल्जाम भी बेबुनियाद हैं कि उन्होंने हिंदुओं का जबरिया धर्मांतरण करवाया। जबकि उनकी हुकूमत में जबरिया धर्मांतरण के लिए सख्त सजा का प्रावधान था। कुछ कुर्गों और नायरों ने जब टीपू की ताकीद के बावजूद फिर बगावत की, तो टीपू ने उन्हें मुस्लिम बनाकर दंडित किया। यानी उसके दौर में जो भी धर्मांतरण हुए, उसकी वजह मजहबी प्रतिशोध नहीं था, बल्कि इसके सियासी कारण थे। जिसे संप्रदायवादी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। एक बार मालाबार तटीय इलाके के कुछ हिंदू नायरों ने सामूहिक धर्मांतरण कर ईसाई धर्म अपनाने के संबंध में टीपू की राय जानना चाही, तो उन्होंने उनसे यह कहा, ‘‘राजा अपनी प्रजा का पिता होता है तथा आप सब को मेरी यही सलाह रहेगी कि आप सब अपने मूल धर्म के प्रति निष्ठा बनाए रखें।’’(स्टडीज इन द इंडियन हिस्ट्री: सुरेन्द्रनाथ सेन) अगर टीपू ने वाकई हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण किया होता, तो आज मैसूर राज्य का जनसंख्या घनत्व कुछ और होता। धार्मिक रूप से संवेदनशील प्रजा भला उनके राज्य में क्यों रूकती ? अंग्रेजों और टीपू सुल्तान के बीच हुई तीसरी जंग के दौरान अंग्रेज सेना के साथ रहे मेकेंजी लिखते हैं, ‘‘अंग्रेजों ने लोगों को बहलाया-फुसलाया ताकि वे झांसे में आकर टीपू का तख्ता पलटकर ईसाई शासन के प्रभाव में आ जाएं, लेकिन उन प्रलोभनों का कोई प्रभाव नहीं हुआ।’’ (हिस्ट्री आॅफ टीपू सुल्तान: मोहिब्बुल हसन) यही नहीं टीपू सुल्तान पर लगाए जा रहे इन इल्जामांें में जरा सी भी सच्चाई नहीं कि वे दीगर धर्म को मानने वाली महिलाओं का अपमान करते थे। हकीकत इसके उलट है, महिलाओं के प्रति टीपू सुल्तान का हमेशा सम्मान का भाव रहा। मराठों के साथ दो बार हुए युद्ध में मराठा सरदारों की पत्नियों समेत अनेक महिलाएं सेना के हाथ लगी थीं, मगर टीपू ने उनसे पूर्णतः सम्मानजनक बर्ताव किया और उन्हें उनके पतियों के हवाले कर दिया।

टीपू सुल्तान अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी थे। उन्होंने कई भारतीय राजाओं की तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के सहायक की हैसियत पर बने रहने से इंकार कर दिया था। वे इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ थे कि कोई देशज ताकत नहीं, बल्कि अंग्रेज देश के दुश्मन हैं। लिहाजा अपनी जिंदगी के आखिर तक वे अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे। अंग्रेजों ने टीपू के भरोसेमंद सिपहसालारांे मीर सादिक, हुजूर दीवान, मीर मीरां महकमे के मुखिया, विश्वस्त सलाहकार कमरूद्दीन और किले के कमान अधिकारी मीर नदीम की वफादारी खरीद ली, तभी वे उन्हें परास्त कर पाए। देश के लिए लड़ते-लड़ते टीपू ने अपनी जान का बलिदान दिया। बावजूद इसके कुछ संप्रदायवादी संगठन महज देश में अपनी सियासत को चमकाने के लिए उनकी छवि जानबूझकर कलंकित कर रहे हैं। टीपू सुल्तान तो सिर्फ एक बहाना है, उनका विरोध कर दरअसल वे कर्नाटक में सांप्रदायिक तनाव पैदा करना चाहते हैं। जो लोग टीपू सुल्तान को बदनाम कर रहे हैं और उन पर सवाल उठा रहे हैं, वे वही हिंदूत्ववादी ताकतें हैं जिन पर मैंगलोर और ओडिशा के चर्चों पर हमले और तर्कवादी चिंतक एमएम कलबुर्गी की हत्या का गंभीर इल्जाम है। इतिहास के पन्नों में जितना भी टीपू सुल्तान का जिक्र मिलता है, उसके मुताबिक टीपू सुल्तान एक महान राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष शासक था। जिसने अंग्रेजों के खिलाफ तीन लड़ाइयां लड़ीं और अपनी बहादुरी से अंग्रेजी सेनाओं के छक्के छुड़ा दिए। एक लिहाज से यदि देखें, तो टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच हुई मैसूर की लड़ाई, देश की आजादी का टर्निंग पाॅइंट बनी। इस जंग के बाद ही हमारे देश की जंग-ए-आजादी की शुरुआत हुई थी। भारतीय इतिहास का एक ऐसा महानायक जिसकी जिंदगी के किस्से आज भी हमारी मौजूदा पीढ़ी को रोमांचित करते हैं, उसकी छवि को जो लोग दागदार कर रहे हैं, उनकी निंदा की जानी चाहिए। अच्छी बात यह है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने टीपू सुल्तान को शहीद बतलाकर इस विवाद पर लगाम लगाने की कोशिश की है। कर्नाटक विधानसभा के डायमंड जुबली के अवसर पर अपने भाषण में राष्ट्रपति ने टीपू सुल्तान की शहादत को याद करते हुए कहा कि अंग्रेजों से हीरो की तरह लड़ते हुए उनकी मौत हो गई थी।

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