ब्लू व्हेल गेम: एक राष्ट्रीय समस्या – डाॅ0 गीता गुप्त

4:19 pm or November 6, 2017
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ब्लू व्हेल गेम: एक राष्ट्रीय समस्या

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

22 अक्तूबर 2017 की रात साढ़े तीन बजे एक उन्नीस वर्षीया युवती ने बाथरूम में जाकर ब्लू व्हेल गेम का टास्क पूरा करने के लिए अपने हाथ में धारदार हथियार से 25 कट लगा लिये। इसके बावजूद मौत न होने पर उसने छत से छलांग लगा दी। मध्यप्रदेश के झाबुआ में रहने वाली युवती कुछ दिन पूर्व दाहोद में अपनी बहन की ससुराल आयी हुई थी। ससुराल वालों ने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, जहाँ उसे सौ टाँके लगे। अब मनोचिकित्सक उसकी दिमाग़ी हालत पर नज़र रखे हुए हैं क्योंकि वह दो बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है। भारत में ब्लू व्हेल गेम की यह पहली घटना नहीं है। अगस्त से अब तक लगातार कहीं-न-कहीं ब्लू व्हेल गेम के मामले सामने आ रहे हैं और यह गम्भीर चिन्ता का विषय है।

आभासी जगत् में स्वयं को श्रेष्ठ प्रदर्शित करने की चाह ने युवाओं और बच्चों के मन-मस्तिष्क को इस तरह जकड़ लिया है कि वे इसके लिए प्राणों को भी दाँव पर लगाने तत्पर हैं। इधर कुछ महीनों से अन्तर्जाल पर ख़तरनाक खेलों का दौर दौरा है, जो बच्चों और युवाओं की जान ले रहा है।‘ ब्लू व्हेल इण्टरनेट गेम‘ का आतंक भारत सहित पूरी दुनिया में छाया है। यह ख़ूूूूूनी खेेेेेेेल अब तक दुनिया भर के 300 बच्चों की जान ले चुका है। वर्ष 2013 में इस खेल को रूस के फिलिप बुडेकिन ने बनाया था और रूस में वर्ष 2015 में आत्महत्या का पहला मामला प्रकाश में आया था। इस बरस तो वहाँ 150 से अधिक किशोरों की जान यह खेेेल ले चुका है।

ब्लू व्हेल गेम 50 दिनों का लक्ष्य देता है। इस खेल में खिलाड़ी को शरीर पर व्हेल की आकृति बनाने को कहा जाता है। फिर उसे चुनौतियाँ दी जाती हैं। अन्तिम चुनौती के तौर पर उसे आत्महत्या करनी होती है। भारत के सभी राज्यों में धीरे-धीरे इस खेल का आतंक फैल चुका है। कई बच्चे इसकी गिरफ़्त में आकर अपने प्राण गँवा चुके हैं। मुम्बई में एक बच्चे की जान लेने के बाद इस खेल की श्रृंखला आगे बढ़ी ही थी कि शिक्षा-संस्थानों, अभिभावकों और मनोचिकित्सकों की जागरूकता के कारण अब यह खेल अपने अन्तिम चरण तक न पहुँच सके; इस दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन इसपर पूर्ण विराम लगाने की चुनौती हमारे सामने है।

अगस्त 2017 में इन्दौर के चमेलीदेवी पब्लिक स्कूल में कक्षा सातवीं का छात्र तीसरी मंज़िल की रेलिंग पर झूला झूलते पाया गया। वह पचासवीं चुनौती पूरी करने के लिए वहाँ कूदने ही वाला था कि साथियों ने उसे पकड़कर बचा लिया। इसी तरह पश्चिम बंगाल के मिदनापुर ज़िले के गड़बेता नामक इलाक़े में 11वीं कक्षा के छात्र रौनक सिंह को भी खेल के तीसरे चरण में बचा लिया गया। रौनक के परिजनों को इसकी भनक लग गई थी। अतः उससे मोबाइल फ़ोन छीन लिया गया। रौनक के हाथ पर धारदार हथियार से काटकर ‘एफ 47 ‘ लिखा हुआ पाया गया।

अगस्त के महीने में ही देहरादून में पाँचवीं कक्षा के मासूम छात्र ने अपनी जान लेने की कोशिश की थी। वह तो स्कूल के प्राचार्य ने अनहोनी भाँप ली और उस हँसमुख स्वभाव व शरारती बच्चे को परिसर में अकेले गुमसुम खड़े देखा तो प्यार से पूछा। तब बच्चे ने इस जानलेवा खेल में फँसे होने की बात बतायी। प्राचार्य की सजगता ने उसके प्राण बचा लिए। लेकिन यह विनाशकारी खेल जारी है। सरकारें लगातार चेतावनी जारी कर रही हैं कि अभिभावक बच्चों के व्यवहार का भी आकलन करें। मध्यप्रदेश में लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा सभी विद्यालयीन प्राचार्यों को पत्र लिखा गया है। हाई स्कूल व हायर सेकेण्ड्री स्कूल में मोबाइल फ़ोन का उपयोग न करने के निर्देश पहले से ही दिये गए हैं। शिक्षक-अभिभावक बैठक में भी इस खेल के दुष्परिणाम बताये जाने चाहिए।

वस्तुतः ब्लू व्हेल गेम को खेल माना ही नहीं जाना चाहिए। यह बच्चों को कुण्ठाग्रस्त बनाता है। तनावग्रस्त, क्रोधी और अधीर स्वभाव के बच्चे इस खेल की ओर आसानी से आकृष्ट होते हैं। कुछ बच्चे तो इस उत्सुकतावश कि ‘‘एक बार ट्राई कर लेते हैं‘‘, इस खेल के शिकार हो जाते हैं। यह खेल बनाने वाला मानव-मस्तिष्क को भली-भाँति समझता है। इसलिए इसे इस तरह रचा है कि खिलाड़ी को संवेदनशून्य किया जा सकता है। यह पूरी तरह से दिमाग़ से खेला जाने वाला खेल है। इसमें पड़ने वाले बच्चे किस तरह के हैं, यह जानना-समझना बहुत ज़रूरी है।

ब्लू व्हेल गेम के गम्भीर परिणामों को देखते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने केन्द्र और तमिलनाडु सरकार को इसे प्रतिबन्धित करने की सम्भावनाओं का पता लगाने का निर्देश दिया। इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरु करते हुए मदुरै पीठ के जस्टिस के0 के0 शशिधरन और बी0 आर0 स्वामीनाथन ने केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण सचिव , राज्य के गृह सचिव तथा सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को नोटिस जारी किया है। पीठ ने इस खेल को प्रतिबन्धित करने हेतु सम्भावनाओं का पता लगाने का निर्देश देते हुए कहा है कि आई. आई. टी. मद्रास के निदेशक को पक्षकार बनाया जाए, जो इस तरह के आॅनलाइन खेलों को प्रतिबन्धित करने के लिए सुझाव देंगे। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि जिस छात्र ने यहाँ आत्महत्या की थी, उसने इस खेल को 75 अन्य लोगों के साथ साझा किया है। सरकारी वकील ने कहा कि सभी को यह खेल खेलने से हालाँकि रोक लिया गया है। न्यायाधीशों ने राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव से कहा कि वह इस ख़तरनाक आॅनलाइन खेल को अन्य के साथ साझा करने वाले लोगों के विरुद्ध चेतावनी जारी करें।

दुःखद बात यह है कि समाज में साक्षरता तो बढ़ रही है लेकिन चेतना नहीं। सितम्बर महीने में ही लगातार उजागर हुए इस खेल के मामले बहुत चिन्ताजनक हैं। पिछले दिनों पुलिस ने पुडुचेरी में एक इक्कीस वर्षीया महिला बैंककर्मी को समुद्र किनारे ढूँढ़कर बचाया। महिला के बारे में उसके मित्रों के वाट्सएप ग्रुप से जानकारी मिली थी कि उसका व्यवहार असामान्य है और वह रात को घर नहीं लौटी है। इसके बाद पुलिस ने सुबह उसे समुद्र के निकट सड़क पर खोज निकाला। उसकी कलाई पर ज़ख़्म है। उसके पास से मिले एक पेपर पर ‘तीन दिन में दस कट‘ लिखा है। पिछले कुछ दिनांे से उसने ख़ुद को अपने घर में बन्द कर लिया था।

इधर हरदा के एक निजी विद्यालय में 11 वीं कक्षा के छात्र को ब्लू व्हेल की तीसरी चुनौती को नकारने पर धमकियाँ मिलने की बात सामने आई है। भयभीत छात्र को जब ‘नवदुनिया‘ ने पहचान गुप्त रखने का आश्वासन दिया तब उसने बताया कि वह ब्लू व्हेल गेम के सम्पर्क में किस तरह आया और दो टास्क भी पूरे किये। लेकिन स्वयं को दर्द देने वाला तीसरा टास्क पूरा करने से मना कर दिया तो उसे आॅनलाइन धमकियाँ मिलीं। धमकियों को वह गम्भीरता से ले, इसके लिए उसका आधार नम्बर और घर की लोकेशन तक बता दी गई। रजिस्ट्रेशन के लिए छात्र के फेसबुक पर लिंक आई, जिसमें ब्लू व्हेल गेम नहीं लिखा था। लिंक के साथ लाइन लिखी आई कि इस रोचक गेम को आपको खेलना चाहिए। छात्र ने लिंक पर क्लिक किया तो रजिस्ट्रेशन के लिए मोबाइल नम्बर माँगा गया।

रजिस्टेªशन के बाद मैसेज़ आया कि पहला टास्क दिया जाएगा, आप तैयार रहें। शाम छह बजे मैसेज़ आया कि आपको एक सुनसान जगह पर जाकर बीस मिनट तक अकेले खड़े रहना है। छात्र ने वैसा ही किया। दूसरे टास्क के लिए सुबह 4.15 बजे उठने को कहा। छात्र उठा तो एक घूमता हुआ सर्कल आया जिसे 15 मिनट तक देखना था। छात्र के अनुसार यह किसी हिप्नोटाइज़ के लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया थी। इसके बाद 5-7 मिनट की हाॅरर क्लीपिंग देखने को कहा गया। तीसरे टास्क में ब्लेड से हाथ पर 143 लिखना था। छात्र ने जब मना किया तो आॅनलाइन धमकियाँ मिलने लगीं। उसका आधार नम्बर और घर की लोकेशन भी दी गई जिसको छात्र ने रजिस्टेªशन के समय नहीं दिया था। शिक्षा संस्थान के संचालक के अनुसार, उन्होंने धमकी मिलने के बाद घबराये हुए छात्र को समझाया और ऐसे खेल से दूर रहने की सलाह दी।

दमोह में टेªेन के सामने घुटने के बल बैठकर जान देने वाला 11वीं कक्षा का छात्र सात्त्विक एक सप्ताह से स्कूल नहीं जा रहा था। वह मोबाइल पर हाॅरर फ़िल्में भी देखता था। उसके दोस्तों ने यह खुलासा पुलिस अधीक्षक के सामने किया। उनके अनुसार, सात्त्विक देर रात तक जागता रहता था। मिलने पर बार-बार कहता था कि ‘बचपन ख़त्म हो गया है, अब लाइफ़ में मज़ा नहीं रहा।‘ उन्होंने सात्त्विक के ब्लू व्हेल गेम खेलने की भी पुष्टि की। वह फे़सबुक पर हाॅरर पोस्ट भी करता था।

तीसरा मामला राजस्थान के जोधपुंर का है। वहाँ बी0एस0 एफ0 के जवान की 17 वर्षीया बेटी ने पहाड़ी से कायलाना झील में छलांग लगा दी। गोताखोरों की मदद से उसे बचा लिया गया। उसकी बाज़ू पर चाकू से व्हेल उकेरा हुआ था। उसका कहना है कि-‘नहीं कूदती तो मम्मी मर जाती।‘ रात को वह घर से बाज़ार जाने का कहकर निकली और काफ़ी देर तक नहीं लौटी तो परिजनों ने फ़ोन किया। लेकिन वह फ़ोन कहीं छोड़ गई थी। अतः किसी अजनबी ने फ़ोन पर जवाब दिया। इसके बाद घर वाले उसकी तलाश में जुट गए। इस बीच पुलिस ने उसे झील के आसपास कुछ देर चक्कर लगाते देखा। पुलिस उसके पास पहुँची और उसे आवाज़ लगायी। लेकिन वह दौड़कर पहाड़ी की चोटी पर पहुँची और कूद गई।

गुजरात में भी इस खेल से आत्महत्या का पहला मामला उजागर हुआ है। बनासकांठा स्थित मालण के अशोक ने खेल का अन्तिम टास्क पूरा करने के लिए साबरमती नदी में कूदकर जान दे दी। उसने आत्महत्या से पहले वीडियो बनाकर फेसबुक पर अपलोड किया था। दिल्ली के द्वारका में माँ की सजगता से ब्लू व्हेल गेम के शिकार 17 वर्षीय बेटे की जान बच गई। बेटे के चेहरे पर ज़ख़्म हो गए थे। माँ उसपर नज़र रख रही थी। उसने द्वारका स्थित अस्पताल में टेलीफ़ोन करके न्यूरो साइकेट्रिस्ट की मदद माँगी। बताया कि बेटे का व्यवहार बदल गया है। वह अकेले रहने लगा है। परिजन के साथ डाॅक्टर भी हरक़त में आए। इलाज़ शुरु हुआ। इससे उसे राहत मिली है।

इधर तमिलनाडु के तिरुपुर में इस गेम के शिकंजे में आया 12 वर्षीय बालक भी बच गया। उसने हेल्प लाइन नम्बर 104 पर फ़ोन करके कहा कि-‘वे मुझे और मेरे परिवार को मार देंगे।‘ काउन्सलर द्वारा पूछने पर उसने बताया कि वह ब्लू व्हेल गेम खेल रहा है लेकिन अब इससे बाहर आना चाहता है। बच्चे की जान बच गई और इलाज़ जारी है। काउन्सलिंग, साइकोथेरेपी और दवाओं से उसे सामान्य किया जा रहा है।

अभी उक्त घटनाएँ सुखिऱ्यों में ही थीं कि मध्यप्रदेश में इस जानलेवा खेल के और भी मामले सामने आ गए। एक मामला राजगढ़ ज़िले के खिलचीपुर स्थित उत्कृष्ट विद्यालय का है। जहाँ दसवीं कक्षा में अध्ययनरत् छात्र खेल की 49वीं स्टेज़ पर पहुँच गया तो उसपर आत्महत्या का दबाव बनाया जाने लगा। जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने संस्कृत की तिमाही परीक्षा की उत्तरपुस्तिका मंे सारी पीड़ा लिख डाली। उसने लिखा कि ‘‘ मुझे धमकाया जा रहा है कि सुसाइड नहीं किया तो तुम्हारे माँ-बाप को मार डालेंगे।‘‘ छात्र की उत्तरपुस्तिका देखते ही संस्कृत की शिक्षिका हेमलता श्रृंगी ने अपने साथी शिक्षकों को सूचना दी। वे सब छात्र के परिवार से मिले और उसे आत्मघाती क़दम से बचा लिया।

दुःखद बात यह है कि इस जानलेवा खेल के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हो पा रहा है। तमिलनाडु के मदुरै में बी0काॅम0 द्वितीय वर्ष के छात्र विग्नेश ने इस खेल के अन्तिम टास्क को पूरा करने के लिए फाँसी लगा ली। पाण्डिचेरी विश्वविद्यालय के एक एम0बी0 ए0 प्रथम वर्ष के छात्र बीस वर्षीय शशिकान्त बोरार ने छात्रावास के परिसर में पेड़ पर फाँसी लगा ली। पश्चिम बंगाल में उत्तर 24 परगना के बारासात के स्कूल में कक्षा नौवीं की दो छात्राएँ ब्लू व्हेल गेम खेलती पाई गईं। हेड मास्टर ने इसकी सूचना पुलिस को दी। साइबर सेल के अधिकारियों ने छात्राओं की काउन्सिलिंग की। गेेम के अन्तिम चरण में पहुँच चुकी छात्राओं के हाथ में कट मार्क भी थे।

अब तक इस खेल के कारण विश्व में अनेक जानें जा चुंकी हैं। भारत में मौतों का सिलसिला जारी है। अतएव देश में सभी राज्य इस खेल पर विराम चाहते हैं। उत्तरप्रदेश में शिक्षा विभाग ने इस दिशा में प्रयास करते हुए विद्यालयों में विद्यार्थियों के स्मार्ट फ़ोन के उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया है। शिक्षक , बस व वैन के चालक और परिचालक भी विद्यार्थियों के सामने स्मार्ट फ़ोन का उपयोग नहीं कर सकेंगे। डी.आई.ओ.एस. द्वारा इस सम्बन्ध में आदेश जारी कर दिये गए हैं जोकि सभी ज़िलों के सी.बी.एस.ई., आई. सी.एस. ई., उत्तर प्रदेश बोर्ड और परिषदीय विद्यालयों पर लागू होगा।

एक इण्टरनेट विशेषज्ञ का मानना है कि इस खेल पर प्रतिबन्ध आवश्यक है परन्तु इसे रोक पाना सम्भव नहीं है। राज्य सभा और महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्यों ने हाल में ‘ब्लू व्हेल चैलेन्ज‘ का मुद्दा उठाते हुए ऐसे खेलों को वेबसाइट से हटाने का प्रावधान करने की माँग की थी। लेकिन सेण्टर आॅफ इण्टरनेट एण्ड सोसाइटी के उद्धव तिवारी का कहना है कि ‘ब्लू व्हेल चैलेन्ज‘ के लिए कोई ख़ास वेबसाइट या एप्लीकेशन नहीं है इसलिए इसे प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता। यह तब तक सम्भव नहीं है, जब तक आप इण्टरनेट को ही पूरी तरह प्रतिबन्धित नहीं कर दें।

उल्लेखनीय है कि पी.टी.आई./भाषा ने ‘प्ले स्टोर‘ और कई वेबसाइटों पर इस खेल का पता लगाने की कोशिश की मगर इसमें सफलता नहीं मिली। यह चैलेन्ज तभी लिया जा सकता है, जब इसे शुरू करने वाले भावी खिलाड़ियों के सम्पर्क में आते हैं। ‘ब्लू व्हेल‘ को जितनी बार डाउनलोड करने की चेष्टा की गई, उतनी बार यह बच्चों के उस खेल तक ही पहुँचा सका जिसमें एक एनिमेटेड व्हेल को कई बाधाएँ पर करनी पड़ती हैं। जब इस खेल का लिंक एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ को भेजा गया तो इस कुख्यात चैलेन्ज का सकारात्मक विकल्प निकला। जिसमें खिलाड़ियों से कहा जा रहा है कि वे प्रेरणादायक कार्यों में भाग लें, उनकी ज़िन्दगी बहुमूल्य है। जबकि सच्चाई यह है कि खेल उनकी जान ले रहा है।

बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने इस खेल पर चिन्ता जतलाते हुए इसे राष्ट्रीय समस्या माना है। इस सन्दर्भ में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने इस खेल पर विराम के लिए दूरदर्शन और निजी चैनलों द्वारा इसके विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता भी जतलायी है। ‘ द ब्लू व्हेल किलर चैलेन्ज‘ का ईज़ाद करने वाला फिलिप रूस में मनोविज्ञान का छात्र था। उसे विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया है। उसका मानना है कि वह ऐसे लोगों को मिटा देना चाहता था, जो समाज के किसी काम नहीं आते। बाद में एक और सत्रह वर्षीया रूसी लड़की को पकड़ा गया है जिसे इस खेल का मास्टर माइण्ड बताया जा रहा है। पहले यह लड़की इस खेल में भागीदारी करती थी। उसपर आरोप है कि उसने उन पचास चुनौतियों को बढ़ावा दिया है, जिसमें इस खेल के खिलाड़ी स्वयं को क्षति पहुँचाते हैं।

निश्चय ही, यह जानलेवा खेल हमारी प्रतिभाओं के साथ-साथ देश के लिए भी चुनौती बना हुआ है। कोई क़ानून ऐसी चुनौती पर विजय नहीं दिला सकता जिसके लिए जन-जागरूकता, आत्मनियंत्रण, आत्मानुशासन , विवेक और समझदारी की आवश्यकता सर्वोपरि है। आज परिवार, समाज और शिक्षा-संस्थानों के साथ-साथ हरेक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह ऐसी विडम्बनाओं को रोकने के लिए ईमानदारीपूर्वक प्रयास करे। बाल, किशोर और युवा पीढ़ी को जागरूक करके ही इस दिशा में सार्थक परिणाम की आशा की जा सकती है।

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