गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत – वीरेन्द्र जैन

4:25 pm or November 7, 2017
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गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत

—- वीरेन्द्र जैन —-

भोपाल की राजधानी के मध्य में सबसे प्रमुख स्थान के निकट एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ गेंग रेप हुआ। उल्लेखनीय यह भी है कि छात्रा जिस पद के लिए कोचिंग कर रही थी उसमें सफल होने पर वह राज्य प्रशासनिक सेवा और भविष्य में आईएएस तक भी पहुँच सकती थी। उल्लेखनीय यह भी है कि पीड़िता के माँ बाप दोनों ही पुलिस की नौकरी में हैं और फिर भी उन्हें रिपोर्ट तक लिखाने में लम्बा समय लग गया व उन्हें उस आधार पर झुलाया जाता रहा जिसके बारे में अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि थाने के क्षेत्र के चक्कर में न पड़ कर रिपोर्ट को तुरंत लिखा जाना चाहिए।

अब यह घटना कोई अनोखी घटना नहीं है क्योंकि यह आये दिन की बात हो गयी है। यह ठीक है कि मध्य प्रदेश इस तरह के अपराधों के मामले में बहुत आगे है किंतु दूसरे राज्य भी बहुत पीछे नहीं है, और यह बात किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हर घटना के बाद कुछ राजनीतिक आलोचनाएं और प्रदर्शन हो जाते हैं तथा कुछ समय के लिए कुछ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों का निलम्बन हो जाता है जिन्हें जनता की याद्दाश्त की सीमा समाप्त होने के बाद रद्द कर दिया जाता है। यही सब कुछ इस मामले में भी हो रहा है। खेद है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न तो समस्या की जड़ों तक पहुँचने का कोई प्रयास होता है और न ही किसी स्थायी समाधान की ओर ही बढा जा रहा है।

वोटों की राजनीति ने जो तुष्टीकरण की कूटनीति अपनायी है उसमें आम जनता के हिस्से में कोरे वादे आये हैं जबकि हर तरह के कानून भंजकों को सरकारी संरक्षण और मदद मिलने लगी है। देशभक्ति का ढंढोरा पीटने वाली पार्टी चन्दे के लिए व भीड़ जुटाने के लिए देशद्रोहियों को अच्छे अच्छे पद दे देती है और वे सरकार के मंत्रियों के साथ मंचों पर गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी दबाव में आ जाते हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है जिनकी लापरवाहियों के कारण अपराधी पार्टी में आते हैं और संरक्षण पाते रहे हैं। दो एक वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर किसी भी प्रमुख पार्टी में प्रवेश के लिए कोई छलनी नहीं है और जो ज्यादा से ज्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकता है वह स्वयं या अपने किसी व्यक्ति के माध्यम से पार्टी, सरकार, और देश के संसाधनों पर अधिकार करने में लग जाता है। इस तरह एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे राष्ट्रीय संसाधन व्यक्तियों और पार्टियों के संसाधनों में बदलते जाते हैं। क्या कारण है कि किसी भी पार्टी में आदर्श आचार संहिता के आधार पर सदस्यों की समीक्षा नहीं होती और इस आधार पर पार्टी से निकाले जाने की घटनाएं नहीं सुनी जातीं। पार्टी से तब निकाला जाता है जब कोई सदस्य दूसरी पार्टी में जा चुका होता है। पार्टी का टिकिट देने में जब किसी सदस्य की पार्टी में वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया जाता व दो दिन पहले दल बदल कर आये हुए व्यक्ति को टिकिट दे दिया जाता है तो उस दल की आदर्श आचार संहिता पर निगाह डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि लगभग प्रत्येक अपराध में आरोपी को पकड़ने पर राजनेताओं के सिफारिशी फोन जरूर आते हैं जिनमें से कुछ तो ऐसे होते हैं जिन पर विचार करना ही पड़ता है। जिस दिन उपरोक्त घटना घटी उसी दिन के अखबार में खबर है कि बड़े अधिकारियों के आदेश पर जब भोपाल के ढाबों पर शराब पीने वालों पर दबिश दी गयी तो पकड़ में आये 27 लोगों के पक्ष में लगातार फोन आते गये कि एक एक करके अंततः सब को छोड़ देनी पड़ा। भोपाल में ही हेल्मेट चैकिंग के दौरान रोके गये एक व्यक्ति ने सम्बन्धित इंस्पेक्टर की बात मुख्यमंत्री के पिता से करायी व इंस्पेक्टर ने हाथ जोड़ कर उसे छोड़ दिया। यह खबर भी अखबारों में छप गयी थी। वैसे तो सार्वजनिक जीवन में आये प्रत्येक व्यक्ति को व अधिकारी को संविधान की शपथ लेनी चाहिए किंतु सरकार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति जो संविधान की शपथ ले चुका है, अगर किसी कानून तोड़ने वाले के लिए सिफारिश करता है तो वह तो सीधा सीधा अपराध में भागीदारी करके शपथ का उल्लंघन कर रहा होता है।

न्याय का दायित्व होना चाहिए कि या तो वह अपराधी को सजा दे या अपराधी को सजा न दिला पाने वाली व्यवस्था के कारिन्दों को सजा दे क्योंकि आमजन व्यवस्था कायम रखने के लिए भरपूर भुगतान कर रहा है। खेद की बात है कि बहुत सारे मामले न केवल लम्बे समय तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं अपितु बिना किसी को सजा दिये हुए समाप्त भी कर दिये जाते हैं। यह दशा कानून का भय समाप्त करती है और अपराधियों को निर्भय होकर मनमानी करने की प्रेरणा देती है। जो लोग पहले से ही सामंती सोच के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं वे दूसरों को कमतर इंसान मान कर व्यवहार करते हैं। सत्ता की ताकत या संरक्षण उन्हें और अधिक निर्मम बना देता है। बलात्कार और हिंसा इसी का परिणाम है।

यौन अपराधों के अधिकतर मामले बदनामी के डर से सामने नहीं आने पाते क्योंकि समाज पीड़िता को न केवल कमजोर व जिम्मेवार मानकर व्यवहार करती है अपितु हेय दृष्टि से देखती है। इसके लिए बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिसमें पूरा समाज एक साथ उठ खड़े हो कर अपने साथ हुए अपराध की स्वीकरोक्ति करते हुए पीड़ितों के साथ हो व आपस में हमदर्दी प्रकट करे। गाँधीजी के बाद ऐसे प्रयोग बन्द हो चुके हैं।  अपराधियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अकेले व्यक्ति की कमजोरी को स्वीकारना जरूरी होता है और पीड़ितों की एकता बनाने का आवाहन होना चाहिए। पीड़िता को दोषी मानना अपने आप में अपराध घोषित होना चाहिए।

अपराधों की रिपोर्ट दर्ज न करके अपना रिकार्ड ठीक करना भी समाज के खिलाफ पुलिस का अपराध है जिसे करने के लिए देश के बड़े बड़े पुलिस अधिकारी अपने थानेदारों को प्रेरित करते हैं। किसी क्षेत्र में अपराधों की संख्या का अधिक होना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेवारी नहीं होना चाहिए अपितु अपराधियों को पकड़ना और सजा दिलाने के आधार पर उनका कार्य मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके अभाव में रिपोर्ट न लिख व सच को छुपा कर बड़ा अपराध किया जा रहा है।

कानून के शासन का अभाव जंगली न्याय की ओर अग्रसर करता है जिसकी ओर बढते जाने के संकेत उक्त घटनाओं में हो रही वृद्धि से मिलने लगे हैं।  देखना होगा कि निर्भया कांड की तरह घटनाएं व्यवस्था को किस बदलाव की प्रेरणा दे पाती हैं।

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