आस्था के केंद्र पर पर्यावरण की सुध – प्रमोद भार्गव

3:56 pm or November 17, 2017
vaishnao-devi-story_647_082716015744

आस्था के केंद्र पर पर्यावरण की सुध

प्रमोद भार्गव

प्रदूशण और पर्यावरण बदलाव की समस्या जैसे-जैसे धार्मिक आस्था के केंद्र एवं पयर्टन स्थलों पर गहरा रही है, वैसे-वैसे सर्वोच्च न्यायालय और राश्ट्रीय हरित अधिकरण के फैसले पर्यावरण सुधार और जन-सुरक्षा की दृश्टि से प्रासंगिक लग रहे हैं। कई निर्णयों की प्रषंसा हुई है, तो कई निंदा के दायरे में भी आए हैं। अधिकरण ने जम्मू स्थित वैश्णो देवी मंदिर में दर्षन के लिए प्रतिदिन 50000 श्रद्धालुओं की संख्या निर्धारित कर दी है। यदि इससे ज्यादा संख्या में दर्षार्थी आते है तो उन्हें कटरा और अर्द्धकुमारी में रोक दिया जाएगा। वैश्णो देवी मंदिर भवन की क्षमता वैसे भी 50000 से अधिक की नहीं है। मंदिर मार्ग में ठहरने के स्थलों पर कूड़े के निस्तारण और मल-विसर्जन की क्षमताएं भी इतने ही लोगों के लायक हैं। इस लिहाज से पर्यावरण को स्थिर बनाए रखने में यह निर्देष बेहद महत्वपूर्ण है। किंतु अधिकरण ने अमरनाथ मंदिर की गुफा पर ध्वनि प्रदूशण पर अंकुष लगाने की दृश्टि से नारियल फोड़ने और षंख बजाने पर जो अंकुष लगाया गया है, उसकी तीखी आलोचना हो रही है। बहरहाल दर्षनार्थियों की संख्या सीमित कर देने से भगदड़ के कारण जो हादसे होते हैं, वे भी नियंत्रित होंगे।

यह निर्देष उस याचिका पर सुनवाई के क्रम में आया है, जिसमें याचिकार्ता ने जम्मू स्थित वैश्णो देवी मंदिर परिसर में घोड़ों, गधों, टट्टुओं और खच्चरों के आवागमन पर रोक लगाने का निर्देष देने की मांग की थी। दरअसल इन पारंपरिक पषुओं पर लादकर रोजमर्रा के उपयोग वाला सामान तो जाता ही है, कई बुजुर्ग, दिव्यांग एवं बच्चे भी इन पर सवार होकर माता के दर्षन के लिए जाते हैं। इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से मंदिर परिसर और मार्ग में प्रदूशण बढ़ रहा है। यह प्रदूशण जन-स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक बताया गया है। लेकिन इनकी आवाजाही से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है। इस नाते इनकी आवाजाही भी जरूरी है। बावजूद अधिकरण ने धीरे-धीरे इनको हटाने का निर्देष दिया है।
वैश्णो देवी मंदिर त्रिकुट पहाड़ियों पर समुद्र तल से 5200 फुट की ऊंचाई पर एक गुफा में स्थित है। फिर भी तीर्थयात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नवरात्रियों के समय यह संख्या औसत से ज्यादा बढ़ जाती है। दिसंबर में बड़े दिन की छुट्टियों के अवसर पर भी श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे अवसरों पर मंदिर का प्रबंधन देख रहे श्राईन बोर्ड पर भी दबाब बढ़ जाता है। नतीजतन व्यवस्थाएं लड़खड़ाने का संकट गहरा जाता है। इसीलिए अधिकरण ने श्राईन बोर्ड के प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराए गए तीर्थयात्रियों के आंकड़े और बुनियादी सुविधाओं का आकलन करने के बाद ही यह फैसला लिया है।

किंतु अधिकरण ने पषुओं के उपयोग को धीरे-धीरे खत्म करने का श्राईन बोर्ड को जो निर्देष दिया है वह इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आजीविका की दृश्टि से अप्रासंगिक लगता है। यह बात अपनी जगह सही है कि जिस स्थल पर भी मनुश्य और पषु होंगे वहां पर्यावरण दूशित होगा ही। लेकिन एक सीमा में इनकी उपस्थिति रहे तो इनके द्वारा उत्सर्जित होने वाला प्रदूशण प्राकृतिक रूप से जैविक क्रिया का हिस्सा बन पंच-तत्वों में विलय हो जाता है। हालांकि इसी साल 24 नबंवर से मंदिर जाने के लिए नया रास्ता खुल जाएगा। 13 किमी से ज्यादा लंबे इस रास्ते पर या तो बैटरी से चलने वाली टैक्सियां चलेंगी या लोगों को पैदल जाने की अनुमति होगी। इस रास्ते पर खच्चरों और गधों का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा।

एनजीटी ने जिन मानकों को आधार बनाकर यह फैसला दिया है, वह बेहद अहम् है। यदि कचरे के निस्तारण और मल-मूत्र के विर्सजन को पैमाना मानकर चले तो देष के ज्यादातर महानगर और षहर इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते है। देष की राजधानी होते हुए भी दिल्ली इस समस्या से दो-चार हो रही है। आबादी और षहर के भूगोल के अनुपात में ज्यादातर षहरों में ये दोनों ही व्यवस्थाएं छोटी पड़ रही है। परेषानी यह भी है कि षहरों की ओर लोगों को आकर्शित करने के उपाय तो बहुत हो रहे है, लेकिन उस अनुपात में न तो षहरों का व्यवस्थित ढंग से विस्तार हुआ है और न ही सुविधाएं उपलब्ध हो पाई है। हमारे जितने भी प्राचीन धर्म-स्थल हैं, वहां के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उपाय तो बहुत किए गए लेकिन जमीनी स्तर पर आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधाएं नहीं जुटाई गईं। यहां तक कि न तो मार्गों का चैड़ीकरण हुआ और न ही ठहरने के प्रबंध के साथ बिजली-पानी की सुविधाएं समुचित हो पाईं। यही वजह है कि हर साल तीर्थ स्थलों पर जानलेवा दुर्घटनाएं हो रही हैं।

भारत में पिछले डेढ़ दषक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में प्रचार-प्रसार के कारण उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही ह्रै। जिसके चलते दर्षनलाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाले भगदड़ों का सिलसिला जारी है। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम षालीनता और आत्मानुषासन का परिचय दें, किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रषासनिक अधिकारियों को नहीं होती। इसलिए उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अकसर देखने में नहीं आती ? आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रषासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोषिष में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोषिष करता तो हालात कमोबेष बेकाबू ही नहीं हुए होते ? इसलिए अब ऐसी जरूरत महसूस होने लगी है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर व्यवस्था की जिम्मेदारी जिन आयोजकों, संबंधित विभागों और अधिकारियों पर होती है, उन्हें भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेबार ठहराया जाए।
हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विषेश पर्वों के अवसर पर एक साथ तीन-तीन करोड़ तक लोग एक निष्चित समय के बीच स्नान करते हैं। किंतु इस अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि षासन-प्रषासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े हाते है। बावजूद लपरवाही बरतना हैरान करने वाली बात है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौषल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देषों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेषी साहित्य और प्रषिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देष में किसी एक दिन और विशेष मुहूर्त के समय लाखों-करोडों़ की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है ? यह भीड़ रेलों और बसों से ही यात्रा करती है। बावजूद हमारे नौकरषाह भीड़ प्रबंधन का प्रषिक्षण लेने खासतौर से योरुपीय देषों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रषिक्षण विदेषी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देषज ज्ञान और अनुभव से लिखने एवं सीखने होंगे।

इस दृश्टि से इस वैश्णो देवी मंदिर पर यात्रियों की संख्या की जो सीमा तय की गई है, वह एनजीटी की सजगता दर्षाती है। एनजीटी अब उन स्थलों पर पर्यावरण एवं जनसुरक्षा की सुध ले रही है, जिन्हें आस्था का केंद्र मानकर अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हमारे ज्यादातर प्राचीन तीर्थ पर्यावरण की दृश्टि से बेहद संवेदनषील हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान हर हाल में होना चाहिए, किंतु इन स्थलों पर पर्यावरण की जो महिमा है, उसका भी ख्याल रखने की जरूरत है ? आस्था और पर्यावरण के तालमेल से ही इन स्थलों की आध्यात्मिकता बनी हुई है। इन स्थलों पर अंधाधुंध निर्माण और लोगों की बढ़ती संख्या इनका आध्यात्मिक अनुभव को तो ठेस लगा ही रहे है, भगदड़ से अनायास उपजने वाली त्रासदियों का सबब भी बन रहे हैं। केदारनाथ त्रासदी इसी बेतरतीब निर्माण और तीर्थयात्रियों की बड़ी संख्या का परिणाम थी। इसलिए एनजीटी ने वैश्णो देवी मंदिर पर श्रद्धालुओं की संख्या तय करके उचित पहल की है।

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in