जल को भी चुनाव सा महत्व मिले – शब्बीर कादरी

2:57 pm or November 21, 2017
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जल को भी चुनाव सा महत्व मिले

शब्बीर कादरी

मानसून पूर्व हमारे मौसम विज्ञानी आधुनिक यंत्रों और अनुभवी धारणाओं के आधार पर हर बार आश्वस्त करते हैं कि इस बार जमकर बरसेंगे बादल, यही इस बार भी कहा गया कि इस वर्ष पूरे 100 प्रतिशत बारिश होने की उम्मीद है और मानसून अच्छा रहने से फसल उत्पादन भी अच्छा होगा। मौसम विभाग प्रमुख केजे रमेश ने कहा था कि अल-नीनों प्रभाव कम होने के कारण मानसून बेहतर होने की संभावना है। इससे पूर्व भारतीय मौसम विभाग के जलवायु अनुसंधान व सेवाओं के प्रमुख ऐ.के. सहाय ने बताया गया था, अलनीनों के संभावना के बारे में भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी, कहा गया था कि मौसमी कारक अल-नीनो का प्रभाव इस वर्ष फिर पड़ने की आशंका है। कम बारिश का प्रभाव मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में 5.2 प्रतिशत सहित उत्तर-पश्चिम में 10 प्रतिशत कम आंकी गई। जबकि देशभर के 24 जिलों में अतिवृष्टि, 78 जिलों में सामान्य से अधिक और 215 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश का आंकड़ा 15 राज्यों जिनमें कुछ केन्द्र शासित राज्य भी शामिल हैं पर अधिक प्रभावी रहा है।

इस बार मानसून के दौरान पांच प्रतिशत कम बारिश देशभर में आंकी गई और कम बारिश का प्रभाव जलाशयों की भंडारण क्षमता पर देखा गया। ज्ञात हो कि देशभर के कुल जलाशयों की कुल क्षमता 157.799 अरब घनमीटर है जो समग्ररूप से देश की कुल अनुमानित भंडारण क्षमता 253.388 अरब घनमीटर का 62 प्रतिशत है। बीते वर्ष 2016 में देश के जलाशयों के उपलब्ध जल मात्रा 96.721 बीसीएम थी जो भंडारण क्षमता का 61 प्रतिशत थी। देश के मध्यक्षेत्र में आने वाले 12 बड़े जलाशयों में जिनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है की कुल क्षमता 42.30 बीसीएम है इस वर्ष इनमें गत वर्ष की तुलना में उपलब्ध जल मात्रा काफी कम पाई गई है। बारिश के वर्तमान आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश के कुल जलाशयों में से 292 बांध इस बार सूखे रह गए हैं, जबकि 298 बांध आंशिक ही भर पाए हैं इन बांधों में कुल भराव क्षमता का 68.5 प्रतिशत ही आंकी गई जबकि वर्ष 2016 में यह 84.4 प्रतिशत थी। इन सब के विपरीत देश के 241 बांध ऐसे भी रिकार्ड में लिए गए जिनमें वर्षा जल भराव ओवरफ्लो रूप में आंका गया। राजस्थान में इस वर्ष 1 जून से 30 सितम्बर तक कुल 2.51 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई जबकि मध्यप्रदेश में मानसून अवधि 15 जून से अक्तूबर प्रथम सप्ताह तक लगभग 30 प्रतिशत कम वर्षा रिकार्ड की गई। मध्यप्रदेश में जो वर्षा मानसून के दौरान 1098 मिमि दर्ज की जानी थी वह केवल 760 के आसपास ही पहुंच सकी। इसी अवस्था के चलते राज्य के तीन जिले शिवपुरी, श्योपुर और टीकमगढ़ अति-गंभीर श्रेणी में दर्ज किए गए। कम वर्षा के चलते प्रदेश के 17 जिले गंभीर जल संकट की चपेट में पाए गए कुल मिलाकर इसी साल 29 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश के चलते प्रदेश के 13 जलाशयों में क्षमता के अनुरूप जल संग्रहण भी प्रभावित हुआ है। इसका सीधा असर शहरी और ग्रामीण जल आपूर्ति पर अभी से पड़ने लगा है। अभी से ही प्रदेश के 98 शहरों में जलापूर्ति एक दिन बीच की जा रही है। जिसके आगे चलकर विकराल होने की पूर्ण आशंका है।

अवर्षा या अल्पवषा्र्र के चलते देश के कुछ हिस्सों में मंहगाई बढ़ने की आशंका भी है क्योंकि देश के हर तीसरे जिले में कम वर्षा का प्रभाव देखा गया है जो रबी की फसल पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का मत है कि इस विसंगति के चलते खाद्य उत्पाद पर मंहगाई बढ़ने की संभावना है। वैसे तो एक आंकड़े के अनुसार विश्व के 4 अरब लोग किसी न किसी रूप में जलसंकट का सामना करने को मजबूर हैं। देश में ही 90 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में पानी की कमी से ग्रस्त हैं जबकि चीन में एक अरब के आसपास लोग इस संकट से ग्रस्त पाए गए हैं।
नीति आयोग के सदस्य रमेशचंद्र ने हाल ही में कहा है कि खाद्यसुरक्षा से बड़ी चुनौती जलसंरक्षण की है। हमारी बढ़ती आबादी के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने की आश्यकता है जो केवल पानी से ही संभव है। इसराईल ने न केवल एक-एक बूंद पानी का सदउपयोग कर कम पानी में फसलों के उत्पादन की तकनीक विकसित कर कृषि उत्पादों का आत्मनिर्भर बना और निर्यातक भी बन गया है। जबकि हमारे यहां उपलब्ध साफ पानी को हर तरह से प्रदूषित करने का काम धड़ल्ले से जारी है। हम शहरी भारत में उत्पन्न गंदे पानी का परिशोधन भी नहीं कर पाते और यह पानी बेतरतीब ढंग से नदियों, समुद्र, झीलों और कुंओं के पानी से मिल कर शेष जल को भी प्रदूषित कर देता है। अभी हमारे शहर 62 हजार मिलियन लीटर गंदा पानी प्रतिदिन पैदा कर रहे हैं जबकि हमारी परिशोधन क्षमता 23,277 एमएलडी या उत्पन्न सीवेज का 37 प्रतिशत है। यह भी चिंतनीय है कि देशभर में सूचीबद्ध 816 नगर निगम के सीवेज उपचार संयत्र में से लगभग 522 ही क्रियाशील हैं।यह भी संयोग है कि देश में 650 शहर, और कस्बे प्रदूषित नदियों के पास बसे हैं जो जल को और भी प्रदूषित करते रहते हैं।

एक तो प्राकृतिक रूप से कम या अल्पवर्षा का प्रभाव, उसपर उपलब्ध जल के संरक्षण के प्रति गंभीर लापरवाही हमें विकट परिस्थिति की ओर धकेल रही है। हमारे दलीय राजनेताओं की धींगामस्ती हमें हर समय केवल चुनाव पर ही बांधे रखना चाहती है। बढ़ती आबादी और भविष्य में होने वाली अवर्षा या अल्पवर्षा की स्थिति में जितना जल चाहिए उसकी वास्तविक चिंता का स्पष्ट आभाव दिखाई देता है। अगर चुनाव की ही तरह जल संरक्षण का महत्व नहीं समझा गया तो हमे भविष्य में पानी से जरूर हाथ धोने पड़ सकते हैं।

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