सरकार की चुप्पी खतरनाक – जाहिद खान

4:52 pm or November 27, 2017
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सरकार की चुप्पी खतरनाक

—- जाहिद खान —-

उत्तर भारत के कई इलाकों में पिछले कुछ दिनों से ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर हंगामा बरपा हुआ है। राजस्थान से शुरू हुआ यह हंगामा अब कई राज्यों में पहुंच चुका है। अनेक ऐसे स्वयंभू संगठन हैं, जिन्हें इस फिल्म में महारानी पद्मावती का चित्रण जंच नहीं रहा है। लिहाजा ये संगठन और इसके जोशीले कार्यकर्ता फिल्म के प्रदर्शन पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं। फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को तरह-तरह से खुले आम जान से मारने की खतरनाक धमकियां दी जा रही हंै। रोज-रोज प्रदर्शन हो रहे हैं और सेंसर बोर्ड पर दवाब बनाया जा रहा है कि वह फिल्म को पारित करते वक्त उनके ‘जज्बातों’ का ख्याल रखे। फिल्म विरोध की इस बेहूदी सियासत में सूबाई सरकारें भी पेश-पेश हैं। खास तौर पर बीजेपीशासित राज्यों में विरोध चरम पर है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने केंद्र को फिल्म रिलीज होने से रोकने की सलाह दी है, तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया चाहती हैं कि फिल्म के ‘आपत्तिजनक’ सीनों को हटाकर ही फिल्म रिलीज की जाए। इन सबसे एक कदम और आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान और पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने फिल्म रिलीज होने से पहले ही ये एलान कर दिया है कि राज्य में फिल्म का प्रदर्शन नहीं होगा। एक तरफ ‘पद्मावती’ का अतार्किक विरोध जारी है, तो दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर बनी फिल्म ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ की रिलीज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की, कि फिल्म निर्माताओं व लेखकों को अभिव्यक्ति की पूरी आजादी होनी चाहिए। इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ जिसमें जस्टिस अजय खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड़ शामिल हैं, ने कहा कि विचार अभिव्यक्ति का अधिकार पवित्र और अटल है। सामान्य तौर पर इसमें दखल नहीं दिया जा सकता। फिल्म बनाना, नाटक करना, किताब लिखना कला का हिस्सा हैं। किसी कलाकार को इससे रोका नहीं जा सकता। किसी भी कलाकार की कला का आदर जरूरी है। हर व्यक्ति को फिल्म बनाने और नाटकों की रचना करने और उनकी प्रस्तुति का अधिकार है। अभिव्यक्ति दर्शक के विचारों को झकझोरने वाली हो सकती है, लेकिन इस पर नियंत्रण सिर्फ कानून में दी विधि ही से किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में निचली अदालतों को भी हिदायत देते हुए कहा फिल्म, नाटक और किताब के मामलों में कोई भी आदेश या इन पर पाबंदी सोच-समझकर लगाएं। अदालत ने यह महत्वपूर्ण निर्देश एक याचिकाकर्ता नचिकेता वाल्हेकर की याचिका पर सुनवाई के बाद दिये। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह गुहार लगाई थी कि 17 नवंबर को रिलीज होने वाली फिल्म ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ पर रोक लगाई जाए। याचिकाकर्ता का दावा था कि ये फिल्म अरविंद केजरीवाल के जीवन पर आधारित है और फिल्म में उसे दोषी के तौर पर दिखाया गया है, जबकि मामले की सुनवाई अभी चल रही है। इस फिल्म के कारण उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा। ऐसे में फिल्म में उसको लेकर जो दृश्य है, उसे हटाया जाना चाहिए। नचिकेता वाल्हेकर ने साल 2013 में केजरीवाल पर स्याही फेंकी थी और यह सीन फिल्म में मौजूद है। बहरहाल पूरे मामले की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा, किसी फिल्म के बारे में फैसला लेना सेंसर बोर्ड का काम है और किसी भी फिल्म को प्रमाणपत्र देने से पहले वह हर पहलू पर गौर करता है।

यह पहली मर्तबा नहीं है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की आजादी का पक्ष लिया हो, बल्कि इससे पहले भी अदालत ने अपने कई फैसलों में विरोध और हिंसा की धमकी की वजह से फिल्म का प्रदर्शन रोके जाने को अराजक तत्वों के सामने कानून का समर्पण करार दिया था। साल 1989 में फिल्म ‘ओरे ओरु ग्रामाथिले’ के संदर्भ में सुनाए अपने एक अहम फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर फिल्म से किसी व्यक्ति को अपनी भावनाऐं आहत होने का डर है तो वह उसे नहीं देखने या फिर लोकतांत्रिक तरीके से उसकी आलोचना करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन इसके उलट फिल्म के प्रदर्शन में बाधा पहुंचाना और धमकी का सहारा लेना न सिर्फ तानाशाही रवैया है बल्कि एक गैर कानूनी कृत्य भी है। जाहिर है कि अदालत का यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत और दृश्य-श्रव्य माध्यमों की पूरी तरह हिफाजत करता है। बावजूद इसके ऐसा कई बार हुआ है जब केन्द्र सरकार और सूबाई सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की हिफाजत करने में पूरी तरह से नाकाम रहीं। हुड़दंगी और अराजक तत्वों के सामने उन्होंने अपने घुटने टेक दिए। फिल्म ‘पद्मावती’ के मामले में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। सरकार ने ऐसे तत्वों के खिलाफ अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है, जो हिंसा और धमकी के बल पर ‘पद्मावती’ का प्रदर्शन नहीं होने दे रहे हैं। ‘पद्मावती’ 1 दिसंबर को रिलीज होनी थी, लेकिन विवादों की वजह से निर्माताओं ने हाल-फिलहाल इस फिल्म की रिलीज को आगे टाल दिया है। फिल्म से जुड़े सभी कलाकार और सिनेमाघर मालिक डरे हुए हैं। यह डर इसलिए भी है कि इतना सब कुछ हो गया पर न तो केन्द्र सरकार की तरफ से और न ही राज्य सरकारों की ओर से यह आश्वासन आया है कि फिल्म के प्रदर्शन में कोई परेशानी नहीं आयेगी। फिल्म के निर्देशक और उसके कलाकारों को खुले आम धमकियां दी जा रही हैं, लेकिन सरकार ने धमकी देने वाले संगठनों और उनके नेताओं पर कोई कार्यवाही नहीं की है। केन्द्रीय गृहमंत्री से लेकर राज्य पुलिस तक सभी इस मामले में खामोश हैं, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।

‘पद्मावती’ अभी सेंसर बोर्ड के पास है और फिल्म को लेकर उसने अपनी कोई राय प्रकट नहीं की है। न ही फिल्म की विषय वस्तु और कोई सीन जनता के सामने आया है। ऐसे में बिना देखे फिल्म का विरोध करना अतार्किक और अन्यायपूर्ण है। चिंता की बात यह है कि यह पूरा विवाद फिल्म देखे बिना, सिर्फ और सिर्फ अटकलों पर आधारित है। फिल्म निर्देशक और इसके कलाकार ऐसी तमाम अटकलों को लगातार खारिज कर रहे हैं कि फिल्म में रानी पद्मावती के किरदार के साथ कोई छेड़छाड़ की गई है या इसमें कोई ऐसा प्रसंग दिखाया गया है जिससे उनकी गरिमा कम हो। बावजूद इसके इन दलीलों को सुनने को कोई तैयार नहीं। फिल्म ‘पद्मवाती’ को लेकर चल रहा सारा विवाद किसी न किसी स्तर पर संकीर्णता और असहिष्णुता को ही बयान करता है। जो इन दिनों देश में बढ़ती ही जा रही है। इस पूरे मामले में केन्द्र सरकार की चुप्पी और भी ज्यादा खतरनाक है। सब कुछ जानते-बूझते हुए भी उसने अपनी तरफ से राज्य सरकारों को कोई निर्देश नहीं दिए हैं कि आपराधिक तत्वों और धमकी देने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए। अभिव्यक्ति की आजादी की हर हाल में हिफाजत और कानून का राज कायम करना राज्य सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है और किसी भी बहाने की आड़ में वे अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकतीं।

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