उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की चिन्ता आवश्यक या रैंकिंग की ? – डाॅ0 गीता गुप्त

5:05 pm or November 27, 2017
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उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की चिन्ता आवश्यक या रैंकिंग की ?

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

हमारी उच्च शिक्षा असंगत नीतियों की शिकार है। संसार भर के उच्च शिक्षा संस्थानों में भारत के एक भी संस्थान के शामिल न होने से हमारे राजनेता चिन्तित होते हैं परन्तु इसका तोड़ यह निकाला जाता है कि भारत भर के संस्थानों की ही अपने तईं रैंकिंग कराकर ख़ुश हो लिया जाए। अक्तूबर 2017 में टाइम्स हायर एजुकेशन ( टी0 एच0 ई0 ) ने दुनिया भर के लाॅॅ यूनीवर्सिटी की जो शीर्ष सूची जारी की है, उसमें शामिल दस विधि विश्वविद्यालयों में से पाँच अमेरिका के तथा तीन ब्रिटेन के हैं जबकि भारत का एक भी विश्वविद्यालय शीर्ष सौ में भी शामिल नहीं है। शीर्ष दस विधि विश्वविद्यालयों में प्रथम से चतुर्थ स्थान पर क्रमशः अमेरिका की ड्यूक यूनीवर्सिटी, स्टैनफोर्ड यूनीवर्सिटी, येल यूनीवर्सिटी और शिकागो यूनीवर्सिटी हैं। पाँचवें और छठे स्थान पर क्रमशः ब्रिटेन के कैम्ब्रिज व आॅक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी का नाम है। आॅस्टेªेलिया के मेलबोर्न यूनीवर्सिटी का स्थान सातवाँ तथा लन्दन यूनीवर्सिटी का स्थान आठवाँ है। पुनः नौवें स्थान पर अमेरिका की हार्वर्ड यूनीवर्सिटी और दसवें स्थान पर कनाडा के टोरण्टो यूनीवर्सिटी का वर्चस्व है।

शिक्षा-संस्थानों को रैंकिंग की आवश्यकता है या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता की आवश्यकता को कदापि नकारा नहीं जा सकता। भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में तो गुणवत्ता के साथ-साथ सुव्यवस्था एवं सुशासन की भी दरक़ार है। आज वैश्विक परिदृश्य में परिवर्तन के कारण शिक्षा में भी बदलाव देखने में आ रहा है। अर्थ-व्यवस्था, कौशल और प्रतिस्पद्र्धा के प्रभाववश शिक्षा हाईटेक हो रही है। परन्तु इसमें परम्परागत मूल्यों एवं उद्देश्यों का सन्तुलन बनाये रखने की चुनौती की ओर किसी का ध्यान नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी विश्वविद्यालयों की सूची के अनुसार 291 निजी विश्वविद्यालय भारत भर में विद्यमान हैं, जो आधारभूत संरचना के पूर्णतः सजग हैं क्योंकि यह धन उगाही का प्रबल अवलम्ब है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को शोधयुक्त बनाया जाए, इसमें ज्ञान को महत्त्व दिया जाए। लेकिन निजी संस्थानों ने शिक्षा को विक्रय की वस्तु बना दिया है। यही कारण है कि आज डिग्रियाँ ख़रीदी-बेची जा रही हैं। भारत में विश्वविद्यालय के कई प्रारूप हैं। सेण्ट्रल यूनीवर्सिटी, स्टेट यूनीवर्सिटी और डीम्ड यूनीवर्सिटी के अलावा भी प्राइवेट चूनीवर्सिटी अस्तित्व में हैं; जहाँ मानकों का क़तई ध्यान नहीं रखा जाता।

गत 3 नवम्बर को सर्वोेच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए डीम्ड विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रमों पर रोक लगा दी। ज्ञातव्य है कि उड़ीसा उच्च न्यायालय ने पत्राचार के माध्यम से तकनीकी शिक्षा को सही ठहराया था। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि दूरस्थ पाठ्यक्रम के माध्यम से तकनीकी शिक्षा प्रदान कर पाना सम्भव नहीं है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी और फार्मेसी सहित तकनीकी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत आने वाले तमाम पाठ्यक्रम संचालित करने वाले विश्वविद्यालय शीर्ष न्यायालय के उक्त निर्णय के चलते मनमानी नहीं कर सकंेगे। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पहले ही कम्प्यूटर विज्ञान में पत्राचार के माध्यम से ली गई उपाधि को नियमित अध्ययन से प्राप्त उपाधि की भाँति मानने से इनकार किया जा चुका है।

यह सर्वविदित है कि दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से घर बैठे उपाधियाँ सहज ही हासिल की जा सकती हैं। यद्यपि इग्नू जैसी संस्था एक अपवाद है। परन्तु उच्च शिक्षा के नाम पर जो अव्यवस्था सर्वत्र देखने को मिल रही है वह शिक्षा पर ही प्रश्नचिह्न लगाती है। आज गली-गली में उच्च शिक्षा एवं दूरस्थ शिक्षा की दुकानें खुल गई हैं। स्नातक, परास्नातक सहित कई व्यावसायिक उपाधियाँ भी मामूली शुल्क लेकर दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से सुलभ कराने वाली संस्थाओं की भरमार है। उत्तरप्रदेश में आचार्य नरेन्द्रदेव कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय फै़ज़ाबाद द्वारा बी0 टेक0 एवं एम0 बी0 ए0 की उपाधि दूरस्थ पाठ्यक्रम के माध्यम से संचालित किया जाना शिक्षा की दुर्दशा का ही उदाहरण माना जाएगा। वर्ष 2005 में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल व कुलाधिपति ने विश्वविद्यालय द्वारा चलाये जा रहे दूरस्थ पाठ्यक्रमों पर पूर्णतः रोक लगा दी थी। तब विद्यार्थियों को उनसे वसूली गई फ़ीस भी लौटा दी गई थी। मगर आज ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। अब तो विद्यार्थियों की कमी से जूझ रहे अभियांत्रिकी एवं चिकित्सा शिक्षा संस्थान भी बी0एड0, एम0 एड0 जैसा पाठ्यक्रम संचालित कर धन-उगाही में जुट गए हैं।

चिन्ताजनक यह है कि देश की आई आई टी और आई आई एम जैसी संस्थाएँ भी विश्व के शीर्ष संस्थानों में स्थान नहीं बना पातीं तो अन्य संस्थानों से क्या आशा की जाए ? सर्वोच्च न्यायालय का यह मानना है कि दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी को व्यावहारिक ज्ञान बिल्कुल नहीं मिल पाता अथवा बहुत कम मिल पाता है। इस तथ्य की अनदेखी सम्भव नहीं क्योंकि आज ऊँची-ऊँची व्यावसायिक डिग्री लेने के बावजूद विद्यार्थी नौकरी हेतु भृत्य जैसे पदोें के लिए आवेदन कर रहे हैं तो यह उनमें अपने क्षेत्र के ज्ञान का अभाव दर्शाता है। तकनीकी शिक्षा के मानक सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 1987 में आल इण्डिया काउन्सिल आॅफ टेक्निकल एजुकेशन की स्थापना की गई थी पर वह भी अपनी भूमिका का सही निर्वाह करने में विफल रहा है।

आज शिक्षा में गुणवत्ता दूर की कौड़ी होती जा रही है। तमाम महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों पर ग़ौर करें तो उनमंे नवीनता का सर्वथा अभाव पाते हैं। अधिकतर संस्थान संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी प्राध्यापकों का घोर अभाव है। किसी भी राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों का अवलोकन कर लेंः कहीं भी प्राचार्य, प्राध्यापक एवं अन्य पद पूर्णतः भरे हुए नहीं हैं। जहाँ कुछ सुविधाएँ हैं भी, तो विद्यार्थी पढ़ने नहीं आते। प्रशासन का सारा दबाव शिक्षकों पर तो है कि वे संस्था में आयें, बायोमीट्रिक मशीन पर उनकी उपस्थिति दर्ज की जाए ; परन्तु विद्यार्थियों पर नकेल नहीं कसी जा रही । उनकी उपस्थिति का हिसाब पूरी तरह फर्जी है।

देखने में आता है कि विद्यार्थी काॅलेज में प्रवेश तो लेते हैं पर कक्षा में पढ़ने नहीं आते। भोपाल जैसे शहर में भी दूर-दूर से आकर युवा प्रवेश ले लेते हैं लेकिन केवल छात्रवृत्ति का आवेदन देने और परीक्षा में शामिल होने संस्था में दर्शन देते हैं। गुणवत्ता के नाम पर लागू सतत् मूल्यांकन परीक्षा पद्धति पूर्णतः विफल है क्योंकि उसमें शामिल हुए बिना भी विद्यार्थी उत्तीर्ण कर दिया जाता है। दरअसल शासन का निर्देश है कि उन्हंे अनुत्तीर्ण न किया जाए बल्कि तब तक परीक्षा ली जाए, जब तक वह उत्तीर्ण न हो जाए। तो जो विद्यार्थी कक्षा में आते ही नहीं, उनका सतत् मूल्यांकन कैसे होगा और शिक्षक कब तक माथापच्ची करेगा ? उनकी छात्रवृत्ति रोकी नहीं जाती, मुख्य परीक्षा में बैठने से रोका नहीं जाता, उन्हंे 75 प्रतिशत उपस्थिति देने के लिए शि़क्षक बाध्य है तो बिना अध्ययन किये आराम से छात्रवृत्ति और डिग्री प्राप्त कर लेने वाले युवा की योग्यता का अनुमान लगाना क्या कठिन है ? ऐसे में कुछ ज्वलन्त प्रश्न उभरते हैं। जैसे-

1.क्या उच्च शिक्षा फर्जी डिग्री पाने के लिए है ?
2.क्या गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और योग्य पीढ़ी के निर्माण हेतु यह आवश्यक नहीं कि बिना पात्रता परीक्षा के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश न दिया जाए ?
3. क्या बिना ज्ञान के उपाधिधारी विद्यार्थी देश पर भार नहीं बन रहे ?
4.एक शिक्षक की कक्षा में 100-150 विद्यार्थी उपस्थिति पंजी में दर्ज हैं मगर न तो इतने विद्यार्थियों की उस कक्षा में बैठने की व्यवस्था है, न वे कक्षा में उपस्थित होते हैं। परन्तु परीक्षा सभी विद्यार्थी देते हैं। यह स्थिति क्या सिद्ध करती है ?
5.गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु शिक्षक और विद्यार्थी का अनुपात आदर्श होना चाहिए। इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो इसके लिए कौन दोषी है ?
6.सरकारें साक्षरों की संख्या बढ़ाने हेतु चिन्तित हैं लेकिन क्या यह विशाल देश साक्षरों के भरोसे उन्नति के सोपान तय कर पायेगा ?

ऐसे अनगिनत सवालों को जवाब की दरक़ार है। वर्तमान शिक्षा कैसी पीढ़ी निर्मित कर रही है ?सरकारों को फर्जी उपाधिधारियों की संख्या-वृद्धि की बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु विद्यार्थियों पर लगाम कसने की व्यवस्था भी करनी चाहिए। ताकि जो सचमुच ज्ञानपिपासु हैं और योग्यता की कसौटी पर खरे उतरने लायक़ हैं, वही उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अधिकारी बनें।

प्रधान मन्त्री श्री मोदी बीस भारतीय विश्वविद्यालयों को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की रंैकिंग मंे देखना चाहते हैं। सरकार की ‘सर्च कमेटी‘ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के 10-10 विश्वविद्यालयों का चयन करेगी जिन्हें दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में लाने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए सरकार द्वारा पाँच वर्ष की अवधि में एक हज़ार करोड़ रुपयों के अतिरिक्त अन्य अनुदान भी दिये जाएँगे। 7 अक्तूबर को दिये प्रधानमन्त्री के इस बयान से स्पष्ट है कि अब देश में भी उच्च शिक्षा में रैंकिंग पाने की स्पद्र्धा आरम्भ हो जाएगी। यहाँ स्मरणीय है कि विश्व के दस या सौ विश्वविद्यालयों में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले संस्थान समृद्ध देशों के हैं; साथ ही वहाँ विकेन्द्रित शक्ति और पारदर्शिता केवल ज़बानी जमा-ख़र्च नहीं बल्कि स्वायत्तता और संरक्षण की मिसाल कायम किये हुए हैं। हमारे यहाँ विश्वविद्यालयों में आर्थिक सुधार और धन-उगाही की होड़ चलती है। इसके अलावा शिक्षा को पंचसितारा और उद्यम बनाने की भी स्पद्र्धा देखने में आती है। इससे उच्च शिक्षा में एक योग्य देशभक्त, विवेकपूर्ण, जागरूक नागरिक बनाने की प्रक्रिया पूर्णतः अवरुद्ध हो चुकी है और जो गिरावट आ गई है, वह अत्यन्त गम्भीर है।
दुःखद बात यह है कि सरकारों द्वारा शिक्षा-व्यवस्था में सुधार का कोई गम्भीर प्रयास होता दिखाई नहीं दे रहा। अन्यथा आज केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कई पद रिक्त नहीं पड़े रहते। हरियाणा, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओड़िसा, केरल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचलप्रदेश, बिहार, सिक्किम, जेएनयू जैसे ख्यातिलब्ध या विकास के नाम पर खोले गए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी शिक्षकों की बेहद कमी है। रपटों के अनुसार, देश के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अन्तर्गत आने वाले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में स्थायी चेयरमैन तक नहीं हैं। कई विभाग संविदा नियुक्ति के आधार पर चल रहे हैं। समूचे देश की उच्च शिक्षा का यही हाल है। अब तक एक शिक्षा नीति नहीं बन सकी है।

उच्च शिक्षा के उत्थान हेतु केन्द्र द्वारा ‘श्रेष्ठ संस्थान‘ नामक योजना के निर्माण प्रक्रिया की ख़बर अक्तूबर 2017 में आई थी। ‘इन्स्टीट्यूशन आॅफ एमिनेंस‘ नामक सर्च कमेटी के गठन की भी हवा है। जो दावेदार शिक्षण संस्थानों से आवेदन मँगायेगी। फिर 20 विश्वविद्यालयों ( 10 निजी और 10 सार्वजनिक क्षेत्र) का चयन होगा। तदुपरान्त अनुदान मिलने के आरम्भिक 5 वर्षों में शिक्षक और विद्यार्थी का अनुपात 1ः15 रखना होगा ; जिसे बाद में 1ः 10 कर दिया जाएगा। इस तरह 15 वर्षों में 15-20 हज़ार विद्यार्थियों का प्रवेश होगा। लक्ष्य एकमात्र यही होगा कि चयनित विश्वविद्यालयों के माध्यम से 10-15 वर्षों में विश्व के शीर्ष 100 या 500 शिक्षण संस्थानों में भारतीय विश्वविद्यालयों को भी स्थान मिल सके। क्या यह स्मार्ट सिटी की अवधारणा की तरह समूचे देश के लिए दूर की कौड़ी नहीं लगती ?

निश्चित रूप से हमें विश्व रैंकिंग की स्पद्र्धा में शामिल होने की बजाय, प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। सरकारों को शिक्षा मद में अधिक राशि आबंटित कर शिक्षण संस्थानों की कमियों को दूर करने की चेष्टा करनी चाहिए। शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण पर रोक लगाना नितान्त आवश्यक है। विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के प्रसार पर बल दिया जाना तो अच्छी बात है लेकिन इस विशाल देश को सभ्य ,सुशिक्षित , वैचारिक ऊर्जा-सम्पन्न और जैसे योग्य नागरिक की आवश्यकता है; वह तो गुणवत्तापूर्ण शि़क्षा से ही निर्मित हो सकेंगे। मुट्ठी भर शीर्ष संस्थान इतने नागरिकों का निर्माण नहीं कर सकते। यह सरकार को समझना होगा और सभी शिक्षा संस्थानों की बेहतरी की दिशा में क़दम उठाने होंगे।

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