क्या भारतीय महिलाएँ सचमुच आर्थिक असमानता की शिकार हैं ? – डाॅ0 गीता गुप्त

6:49 pm or December 5, 2017
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क्या भारतीय महिलाएँ सचमुच आर्थिक असमानता की शिकार हैं ?

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

नवम्बर 2017 में विश्व आर्थिक मंच ने स्त्री-पुरुष असमानता सूचकांक जारी किया है। तदनुसार, भारत में दो तिहाई महिलाएँ बिना वेतन के घरेलू कामकाज और सदस्यों की देखभाल जैसे महत्त्वपूर्ण काम करती हैं। रपट के मुताबिक़, 66 प्रतिशत महिलाओं के मुक़ाबले 12 प्रतिशत भारतीय पुरुष ही बिना वेतन काम करते हैं। घरेलू कार्य और पारिवारिक सदस्यों की देखभाल में उनका योगदान नगण्य रहता है। इस सन्दर्भ में 15 से 64 वर्ष के बीच के कामकाजी स्त्री और पुरुषों की स्थिति का अध्ययन किया गया।

वैश्विक स्थिति का अवलोकन करें तो आइसलैण्ड, नार्वे, फिनलैण्ड, रवांडा और स्वीडन महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक समानता के मामले में शीर्ष स्थान पर हैं। जबकि यमन, पाकिस्तान, सीरिया, ईरान अन्तिम क्रम पर हैं। रपट के अनुसार शिक्षित महिलाएँ आगे आ रही हैं परन्तु अनेक उद्योग उनकी भर्ती करने, उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देने में हिचकते हैं। चीन की महिलाएँ इस दृष्टि से बेहतर स्थिति में हैं। मगर ब्रिटेन और अमेरिका की हालत ख़राब है। चीन में 44 प्रतिशत महिलाएँ बिना वेतन के काम करती हैं और पुरुषों केे मामले में यह अनुपात 19 प्रतिशत है।

यद्यपि स्त्री-पुरुष असमानता के मामले में ब्रिटेन 15 वें स्थान पर है तथापि वहाँ भी 56.7 प्रतिशत महिलाएँ बिना वेतन काम करती हैं। अमेरिका में ऐसी महिलाओं का आँकड़ा 50 प्रतिशत है। हालाँकि वहाँ 31.5 प्रतिशत पुरुष बिना वेतन काम करते हैं। रपट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि महिला असमानता समाप्त करने से ब्रिटेन की जीडीपी में 250 अरब डाॅलर , अमेरिका की जीडीपी में 1750 अरब डाॅलर और चीन की जीडीपी में 2.5 लाख करोड़ डाॅलर की वृद्धि हो सकती है। दक्षिण एशिया के देशों की जो रैंकिंग दर्शायी गई है, तदनुसार बाँग्लादेश 47, मालदीव 106, भारत 108, श्रीलंका 109, भूटान 124, नेपाल 111 और पाकिस्तान 143वें स्थान पर हैं।

महिला-पुरुष समानता सूचकांक में भारत 21 स्थान फिसलकर 108 वें स्थान पर आ गया है। अर्थ व्यवस्था और कम वेतन में महिलाओं की भागीदारी निचले स्तर पर रहने से भारत अपने पड़ोसी देशों चीन व बाँग्लादेश से पिछड़ गया है। विश्व आर्थिक मंच की सन् 2006 की सूची के हिसाब से भी भारत का स्थान पीछे चला गया है। स्त्री-पुरुष असमानता रपट 2017 के अनुसार, भारत ने 67 प्रतिशत लैंगिक भेदभाव दूर किया है परन्तु वह अपने चीन व बाँग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से पीछे है। इसी सूची में बाँग्लादेश का स्थान 47 वाँ है और चीन सौवें स्थान पर है। भारत 2006 के मुक़ाबले भी 10 स्थान पीछे खिसक गया है। रपट के अनुसार, कुछ देशों को छोड़कर समूचे दुनिया में स्त्री-पुरुष असमानता तेज़ी से बढ़ी है। विश्व आर्थिक मंच ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्थान पर स्त्री-पुरुषों मंे समानता का आकलन किया। दशकों की धीमी प्रगति के बाद अब लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के प्रयास ठहर से गए हैं। लेकिन यह विश्व आर्थिक मंच का आकलन है।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के मामले में भारत को बीसवें स्थान पर दर्शाया गया है। भारत को पहली महिला प्रधानमन्त्री सन् 1966 में मिली थी। यहाँ स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि नया राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने की आवश्यकता भी बहुत अहम है क्योंकि अभी भी राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं का क़दम रखना सामान्य बात नहीं है। पारिवारिक विरासत में ही जिन्हें राजनीति और राजनीतिक पद मिले हैं, अधिकतर वे ही महिलाएँ इस क्षेत्र में आ सकी हैं। स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए राजनीति में स्थान बना पाना अथवा शीर्ष पद तक पहुँच पाना अभी स्त्रियों के लिए सम्भव नहीं है। अलबत्ता लड़कियों की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में भारत ने अच्छी प्रगति की है।

जहाँ तक वेतन का प्रश्न है तो विश्व आर्थिक मंच का आकलन है कि यही हाल रहा तो पुरुषों के मुक़ाबले वेतन प्राप्त करने के लिए स्त्रियों को 217 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। रपट में कहा गया है कि वर्ष 2234 तक ही हम कार्यस्थलों पर लैंगिंक समानता हासिल कर पाएँगे। जबकि एक वर्ष पूर्व अनुमान लगाया गया था कि असमानता दूर करने में 83 वर्ष लगेंगे। अभी वैश्विक औसत कमाई पर विचार करें तो उच्च वेतन के मामले में यह अन्तर दोगुना है। महिला की कमाई यदि 7.74 लाख आँकी गई है तो पुरुष की कमाई 13.56 लाख रुपये बतायी गई है। भारत पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता के मामले में 21 स्थान खिसक कर 108 वें स्थान पर पहुँच गया है। वैसे भारत ने अलग-अलग क्षेत्रों में 66.9 प्रतिशत लैंगिक समानता हासिल करने में सफलता प्राप्त की है।

केवल भारत की ही बात करें तो आर्थिक भागीदारी और अवसर के मामले में देश 139 वें स्थान पर है तथा स्वास्थ्य और जीवन-प्रत्याशा के मामले में 141 वें स्थान पर है। कार्यस्थल में भागीदारी ओर वेतन के मामले में 136 वें स्थान पर हैै। लेकिन यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है कि फोब्र्स की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में पाँच भारतीय महिलाएँ शामिल हैं। आईसीआईसीआई बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी चन्दा कोचर बत्तीसवें स्थान पर हैं। बाॅलीवुड की अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पहली बार टाॅप सौ में शामिल की गई हैं। एच.सी.एल. काॅरपोरेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोशनी मल्होत्रा 57 वें स्थान पर हैं। बायोकाॅन की संस्थापक चेयर पर्सन किरण मजूमदार शाॅ 71 वें स्थान पर हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स मीडिया लिमिटेड की चेयर पर्सन शोभना भरतिया 92 वें और प्रियंका चोपड़ा 97 वें स्थान पर हैं। सूची में पेप्सिको की मुख्य कार्यकारी अधिकारी भारतीय मूल की इन्दिरा नूयी 11वें स्थान पर और भारतीय अमेरिकी निक्की हैली 43 वें स्थान पर हैं।

विश्व आर्थिक मंच के मानदण्डों के हिसाब से 88 प्रतिशत भेदभाव दूर कर आइसलैण्ड पहले स्थान पर है। दस शीर्ष देशों में एक भी एशियाई देश सूची में नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे आकलन की चिन्ता की जानी चाहिए ? भारत ही नहीं वरन् तमाम देशों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं अन्य स्थितियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। सबकी कार्य-प्रणाली, प्रशासनिक व्यवस्था, शिक्षा-व्यवस्था, कामकाज की स्थितियाँ, अवसरों की सुलभता आदि में विविधता के कारण सबका मूल्यांकन एक ही मानदण्ड पर किया जाना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। हर देश अपने तरीक़े से अपनी समस्याओं को हल करने की हरसम्भव चेष्टा करता है। एक वैश्विक पैमाना निर्धारित कर उसके आधार पर देशों का आकलन कर देना तुलनात्मक दृष्टि से किसी के लिए गौरवमय भले हो सकता है, पर यह उत्साहजनक नहीं हो सकता।

यदि विश्व आर्थिक मंच भारतीय महिलाओं को असमानता की शिकार मानता है तो यह हमें क़तई स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि भारत एक लोकतान्त्रिक देश होने के साथ-साथ परम्परावादी देश भी है। जहाँ स्त्रियों को पुरुषों के समान ही समस्त नागरिक अधिकार प्राप्त हैं और संविधान में उनके साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया गया है। लेकिन हमारी सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक ढँाचा, स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा और कुछ परम्पराओं के कारण अभी भी शत-प्रतिशत स्त्रियाँ शिक्षित और सार्वजनिक क्षेत्रों में कार्यरत् नहीं हैं। वे प्रकट रूप में अर्थोपार्जन में संलग्न नहीं हैं अतः उनकी गणना कामकाजी स्त्री के रूप में नहीं की जा सकती। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वे हमारे परिवार, समाज और देश की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई हैं। वे भारतीय परिवारों की धुरी हैं। उनके बिना घरों का सही ढंग से संचालन नहीं हो सकता। उन्हें गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी सम्बोधित किया जाता है। माता, पत्नी, भगिनी, पुत्री आदि विभिन्न भूमिकाओं में वे जो कार्य करती हैं उनका मूल्य कभी नहीं चुकाया जा सकता।

सोचने की बात है, क्या मातृत्व या पत्नीत्व का कोई मूल्य भारत में निर्धारित किया जा सकता है ? माता निःस्वार्थ भाव से बच्चों को जन्म देती है, उनका पालन-पोषण करती है और अपनी अन्तिम साँस तक उनका हित चाहती है। कोई सन्तान उसके इस कार्य का मूल्य नहीं चुका सकता। इसी तरह पत्नी की सेवा, समर्पण ,सहयोग का भी कोई मूल्य नहीं हो सकता। बहिन-बेटियाँ परिवार के लिए जो कुछ करती हैं उनसे उनका समर्पण, रागात्मक लगाव और निःस्वार्थ भाव ही प्रकट होता है। इसीलिए आज तक उन्होंने कभी अपने काम का मूल्य नहीं आँका, न ही इसकी माँग की। वह तो जब नौकरीपेशा स्त्रियाँ घर में अपनी सुविधा के लिए काम वाली आया रखने लगीं तब पता चला कि एक स्त्री के काम की क़ीमत क्या है ? इस दृष्टि से विचार करने पर ज्ञात होता है कि घर में रहने वाली स्त्रियाँ परिवार के लिए बाहर काम करके अर्थोपार्जन भले न करती हों परन्तु अपने काम से वे आर्थिक दृष्टि से परिवार को मज़बूती तो प्रदान करती ही हैं, साथ ही सुरक्षा व समृद्धि में भी सहायक होती हैं।

एक बात और, भारतीय स्त्रियाँ बाहर कार्यरत् न होने के कारण आर्थिक असमानता की शिकार नहीं मानी जा सकतीं क्योंकि घर में उन्हें अपनी भूमिका के कारण जो आदर-सम्मान, स्नेह और महत्त्व मिलता है ; उसकी क़ीमत कोई विश्व मंच नहीं आँक सकता। यहाँ अशिक्षित या अल्पशिक्षित गृहलक्ष्मी की कमर में अब भी घर की तिजोरी की चाबी देखी जा सकती है और कमाने वाली स्त्री को अपने आवश्यक ख़र्च के लिए भी पति या पिता की आज्ञा का मोहताज़ देखा जा सकता है। आर्थिक असमानता का कमाने या न कमाने से बहुत सम्बन्ध नहीं है। असल बात पारिवारिक व्यवस्था, शिक्षा की सुलभता, अवसरों की अनुकूलता और मानसिकता की है। भारतीय स्त्री मेधासम्पन्न, मेहनतकश और योग्य ही नहीं , वरन् हर चुनौती का सामना करने की हिम्मत रखती है। उसे जब भी अवसर मिलता है, वह अपने को साबित कर दिखाती है। परन्तु अभी वह वैश्विक स्पद्र्धा में शामिल नहीं है। जिस दिन वह अपने कार्यों का मूल्य तय करके उसका भुगतान माँगने पर आमादा हो जाएगी, उस दिन भारतीय सामाजिक ढाँचे के सामने ऐसा संकट उत्पन्न होगा जिसकी कल्पना भी सिहरा देने वाली है।

विश्व आर्थिक मंच के आँकड़े जो भी कहते हों, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला देश है। हमारा समाज पूरी तरह क़ानून से संचालित नहीं होता बल्कि परम्पराएँ और आस्थाएँ अब भी हमारे समाज का मार्गदर्शन करती हैं। भारतीय समाज केवल आर्थिक समृद्धि को वरीयता नहीं देता, हमारे लिए पारिवारिक-मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य, आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्य, मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय चेतना और मानव-मूल्य जैसे कई बिन्दु बहुत अहम हैं; जिनके लिए महिलाएँ अपना जीवन निःसंकोच ईमानदारीपूर्वक उत्सर्ग कर देती हैं। परिवार के लिए किये गए उनकेे काम का आर्थिक मूल्यांकन भले ही विश्व आर्थिक मंच करता हो और वह सब कामों का मूल्य भी चाहे तो निर्धारित कर सकता है लेकिन भारतीय संस्कृति में भावों और संवेदनाओं को महत्त्व दिया जाता है। यहाँ स्त्रियाँ अपने बच्चों के पालन-पोषण का मेहनताना पति से नहीं ले सकतीं। कल्पना कीजिए, यदि पारिवारिक उत्तरदायित्वों को ‘कार्य‘ मानकर उनका पारिश्रमिक स्त्री को देना अनिवार्य कर दिया जाए तो क्या आर्थिक असमानता दूर हो जाएगी ? और क्या तब भारतीय परिवार का पारम्परिक ढाँचा क़ायम रह पाएगा ? हम सचमुच एक गौरवशाली सामाजिक संस्कृति के संवाहक रह पाएँगे?

निःसन्देह हमारी महिलाएँ कुछ क्षेत्रों में असमानता से जूझ रही हैं लेकिन इसका प्रमुख कारण उनमें शिक्षा की कमी और जागरूकता का अभाव है। उन्हें ‘आर्थिक असमानता की शिकार‘ कहकर पूरे देश को लांछित करना सर्वथा अनुचित है। भारत में स्त्री को ‘मातृ शक्ति‘ की संज्ञा दी गई है। हमारे यहाँ मातृ-ऋण, पितृ-ऋण और देव-ऋण की बात की जाती है, जिनसे कभी मुक्त नहीं हुआ जा सकता। स्त्री की बेहतरी के लिए भारत में बहुत काम करने की आवश्यकता है और सरकार इसके लिए प्रयासरत् भी है। शिक्षा, स्वावलम्बन, आर्थिक मज़बूती, रूढ़ियों से मुक्ति और उन्नत जीवन के लिए स्त्री स्वयं भी सचेष्ट हो रही है। उसके सामने प्रश्न समानता का नहीं अपितु मानवी के रूप में उसकी अस्मिता का है। समूची दुनिया को यह समझना होगा। आकलन उसकी कमतरी का नहीं, इस बात का होना चाहिए कि इस दुनिया को और बेहतर बनाने में उसकी भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण है ? और उसके सशक्तिकरण से देश कितना सशक्त होगा ? विश्व आर्थिक मंच जैसे संगठनों को एक नयी दृष्टि से भी विचार करने की आवश्यकता है, जो तुलनात्मक और स्पद्र्धात्मक होने की अपेक्षा सकारात्मक और प्रेरणास्पद् हो।

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