समय से पहले बालिग होते किशोरों को सबक – प्रमोद भार्गव

6:54 pm or December 21, 2017
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समय से पहले बालिग होते किशोरों को सबक

—- प्रमोद भार्गव —-

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेषनल स्कूल के कक्षा 2 के 7 वर्शीय प्रद्युम्न ठाकूर की हत्या के मामले में किशोर वय आरोपी पर बालिग की तरह मुकदमा चलेगा। किशोर  न्यायालय बोर्ड ने यह फैसला सुनाते हुए प्रकरण गुड़गांव सेषन कोर्ट को स्थानांतरित कर दिया है। अभियुक्त छात्र को बालिग मानकर उस पर व्यस्कों की तरह मुकदमा चलना उन सभी किशोरों के लिए सबक है, जो समय से पहले बालिग होकर हिंसक व यौनिक प्रवृत्तियों के षिकार हो रहे हैं। दरअसल सीबीआई और बोर्ड ने प्रद्युम्न की हत्या को जघन्य अपराध माना है। जिन परिस्थितियों में इस क्रूर कृत्य को अंजाम दिया गया है, उससे जाहिर है कि आरोपी छात्र को मानसिक रूप से इतना परिपक्व था कि वह भलीभांति जान-समझ रहा था कि इस हत्या के परिणाम क्या हो सकते हैं ? इसीलिए हत्या के बाद वह इतना सामान्य बना रहा कि दिल्ली पुलिस की पकड़ से साफ बच गया। साफ है, जब कोई आरोपी इस मानसिक अवस्था को पहुंच गया हो तो उसपर व्यस्कों की तरह ही मुकदमा चलाना उचित है। इस कानून के लागू होने के बाद यह पहला मामला  है कि किसी नाबालिग पर बालिगों की तरह मुकदमा चलेगा।

इस हत्याकांड के मामले में दिल्ली पुलिस ने पहले केवल संदेह के आधार पर स्कूल बस के परिचालक अषोक को हिरासत में ले लिया था। मगर उस पर सवाल उठने के बाद जब सीबीआई ने जांच आरंभ की तो मामला पूरी तरह पलट गया और उसी स्कूल के 11वीं के छात्र को गिरफ्तार कर लिया। आरोपी छात्र ने यह हत्या सिर्फ इसलिए की थी, जिससे परीक्षा की तिथी आगे बढ़ जाए। इस समय आरोपी छात्र की उम्र 16 साल पांच महीने थी। इस कारण यह उलझन पैदा हुई कि इस किशोर  न्याय अधिनियम के तहत मुकदमा चले या व्यस्कों की तरह। अंततः किशोर  न्यायालय बोर्ड ने व्यस्कों की तरह मामला चलाने का फैसला ले लिया। कुछ समय से देखने में आ रहा है कि हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में 16 से 18 साल के किशोरों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। एनसीआरबी के अनुसार 2002 से लेकर 2012 तक नाबालिगों द्वारा बलात्कार के मामलों में 125 प्रतिषत की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में हत्या के मामलों में किशोरों की संख्या में 87 प्रतिषत की वृद्धि दर्ज की गई है। निष्चित रूप से ये आंकड़े चैंकाने वाले है। इस लिहाज से किशोर  पर व्यस्क की तरह मुकदमा चलाना जायज है।

दरअसल दिसंबर 2012 में दिल्ली में चलती बस में एक मेडिकल छात्रा से बलात्कार और क्रूरता पूर्वक की गई हत्या का मामला सामने आया था। इसमें एक आरोपी नाबालिग भी था। पुराने कानून के मुताबिक उसे सजा के तौर पर महज तीन साल सुधार गृह में रखा गया। इसके बाद वह बरी हो गया। इस कानूनी प्रावधान की जानकारी फैलने पर आम लोग आक्रोष और क्षोभ से भर गए। दिल्ली में इस कानून में बदलाव को लेकर अर्से तक प्रदर्षन हुए। नतीजतन किशोर  न्याय अधिनियम (बच्चों की देखभाल और सरंक्षण) 2014 वजूद में आया। गोया, जघन्यतम अपराधों में षामिल किशोरों पर व्यस्कों की तरह मुकदमा चलाने का मार्ग खुल गया। इस कानून में प्रावधान रखा गया कि आरोपी किशोर  पर व्यस्कों की तरह मामला चले अथवा नहीं इसका फैसला लेने का अधिकार किशोर  न्याय बोर्ड के पास होगा। हालांकि इस कानून में दर्ज प्रावधानों के मुताबिक आरोपी नाबालिग छात्र को उम्र कैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकेगी।

निर्भया और प्रद्युम्न हत्याकांड के मामलों ने देश  के मानस को झकझोरा है। ये मामले युवाओं में बढ़ रहे आक्रोष और नफरत को दर्षाते है। यह ठीक है कि अपराध को अंजाम देने के बाद अभियुक्त को मौजूदा कानून के तहत सजा मिल जाएगी। लेकिन क्या उन स्थितियों को नजरअंदाज कर दिया जाए, जो समाज में किशोरों को अपराध के लिए उकसाने का काम कर रही हैं। किशोर  आपराधिक गतिविधियों में षामिल होने से हिचक नहीं रहे हैं। आखिर बच्चों में हिंसा और बलात्कार की ये विकृतियां क्यों विसित हो रही है। क्या सोषल मीडिया के साथ-साथ इसके लिए टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले वे कार्यक्रम जिम्मेबार हैं, जो आपराधिक घटनाओं को महिमामंडित करते है ? मोबाइल पर इंटरनेट की सुविधा और उसके इस्तेमाल की लत भी बच्चों को समय से पहले बालिग बना रही है। मोबाइल पर पोर्न फिल्में आसानी से उपलब्ध है। इसीलिए इन वेबसाइटों को प्रतिबंधित करने की मांग सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके की गई थी, लेकिन परिणाम ढांक के तीन पात रहा। मोबाइल पर हिंसा और अष्लीलता की सुविधाओं पर अंकुष के उपाय नहीं खोजे गए तो किशोरों में अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति को थामना आसान नहीं है।

इसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही माना जाएगा कि हमारे विद्या के मंदिर अब केवल अकूत धन कमाने का जरिया बनकर रह गए है। विद्यालय प्रबंधन और षिक्षकों का वास्ता केवल छात्रों को अच्छे अंकों से पास कराने के अलावा कुछ नहीं रह गया है। संस्कार और नैतिक षिक्षा को सर्वथा दरकिनार कर दिया गया है। पाठ्यक्रम में इनका कोई स्थान ही नहीं रह गया है। यही वजह है कि छात्रों में रिष्तों एवं संस्कार की समझ विकसित नहीं हो रही है। दूसरी तरफ छात्रों में यदि हिंसक और यौनिक कोई प्रवृत्ति उभरती दिखाई भी देती है तो इसका मनोवैज्ञानिक सामाधान न तो अध्यापक के पास है और न र्ही अिभभावकों के पास है। हम हर गलती का सामाधान थाने में रिपोर्ट लिखाने में तलाष रहे है। हाल ही में दिल्ली के एक निजी विद्यालय में ऐसा दर्दनाक मामला सामने आया है, जहां पर चार साल की एक बच्ची के साथ उसी के कक्षा में पढ़ने वाले हमउम्र बच्चे द्वारा यौन दुराचार की कोषिष की गई। इस मामले की बच्ची के अभिभावकों ने तत्काल पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी। लेकिन क्या चार साल के इस छात्र पर व्यस्कों की तरह मामला चलाया जाना संभव है ? क्या यह बच्ची न्यायालय में यौन दुराचार का बयान दे पाएगी ? दरअसल इस तरह के मामलों में मुकदमे से कहीं ज्यादा उस कुरीति को रेखांकित करने और उसका मनोवैज्ञानिक समाधान तलाषने की जरूरत है, जो समाज में बेखौफ पनप रही है।

हालांकि दुनिया भर में बालिग और नाबालिगों के लिए अपराध दंड प्रक्रिया संहिता अलग अलग हंै। किंतु अनेक विकसित देषों में अपराध की प्रकृति को घ्यान में रखते हुए,किशोर  न्याय कानून वजूद में लाए गए हैं। नाबालिग यदि हत्या और बलात्कर जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं तो उनके साथ उम्र के आधार पर कोई उदारता नहीं बरती जाती है। कई देषों में नाबालिग की उम्र भी 18 साल से नीचे है। दरअसल बाल अपराधियों से विषेश व्यवहार के पीछे सामाजिक दर्षन की लंबी परंपरा है। दुनिया के सभी सामाजिक दर्षन मानते हैं कि बालकों को अपराध की दहलीज पर पहुंचाने में एक हद तक समाज की भूमिका अंतर्निहित रहती है। आधुनिकता, षहरीकरण, उद्योग, बड़े बांध, राजमार्ग व राश्ट्रीय उद्यानों के लिए किया गया विस्थापन भी बाल अपराधियों की संख्या बढ़ा रहा है। हाल ही में कर्नाटक विधानसभा समिति कि रिपोर्ट आई है,जिसमें दुश्कर्म और छेड़खानी की बढ़ी घटनाओं के लिए मोबाइल फोन को जिम्मेबार माना गया है। इससे निजात के लिए समिति ने स्कूल व काॅलेजों में इस डिवाइस पर पांबदी लगाने की सिफारिष की है। जाहिर है,विशमता आधारित विकास और संचार तकनीक यौनिक एवं हिंसक अपराधों को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। लिहाजा सरकार और समाज को सोचने की जरूरत है कि आखिर कम उम्र के बच्चों को गंभीर किस्म के अपराधों को अंजाम देने की खुराक और कुसंस्कार कहा से मिल रहे है।

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