बूढ़े नेता जनाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते – शैलेन्द्र चौहान

7:05 pm or December 21, 2017
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बूढ़े नेता जनाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते

—- शैलेन्द्र चौहान —–

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव कांग्रेस के लिए जहां अपनी खोती जमीन को बचाने का संघर्ष था तो बीजेपी के लिए कांग्रेस को एक और चुनाव में पछाड़ने का. दोनों ने सारी ताकत इन चुनावों में फूंक दी थी, लेकिन उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि एक दूसरे को खत्म कर वे भारतीय लोकतंत्र का भला नहीं करेंगे. मतदाताओं ने गुजरात में बीजेपी को कमजोर कर और कांग्रेस को मजबूत कर ये साफ किया है कि उन्हें उनके हकों के लिए लड़ने वाला मजबूत विपक्ष चाहिए. ग्रामीण इलाक़ों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन बीजेपी को मात देने और सरकार बनाने के लिए तो उसे शहरी इलाक़ों में भी ऐसा ही प्रदर्शन दोहराने की ज़रूरत थी. हालाँकि ये बात भी सही है कि शहरी इलाक़े बीजेपी का गढ़ रहे हैं. पिछले चुनाव में भी 64 में से 60 सीटें भारतीय जनता पार्टी की ही थीं. कांग्रेस पार्टी इन शहरी इलाक़ों में बीजेपी के गढ़ को ध्वस्त नहीं कर पाई. कांग्रेस की सारी कोशिशें अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट, सूरत जैसे शहरी इलाक़ों में आकर रुक गईं. इस बार के चुनाव में कोई स्थानीय नेता या मुद्दा सामने नहीं आया. पूरा चुनाव मोदी बनाम राहुल लड़ा गया. ये कांग्रेस की एक उपलब्धि है क्योंकि पहली बार कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी जी को एंगेज किया. अब तक मोदी जी आगे दौड़ते थे और कांग्रेस पीछे खिसकती रहती थी. लेकिन इस बार राहुल इस राज्य में एक चुनौती की तरह सामने आए. इस बार वोटिंग प्रतिशत में भी फ़र्क नज़र आ रहा है. साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि कांग्रेस का वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है. एक समय था कि कांग्रेस और राहुल गांधी को चुनौती तक नहीं माना जाता था. लेकिन इस बार ऐसी हड़बड़ाहट इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री को अपने ‘गुजरात का बेटा’ और ‘चायवाला’ जैसे कार्ड भुनाने पड़े. इस बात को सब मानते हैं कि अगर केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो तो फ़ायदा तो होता है. दूसरे, प्रचार अभियान के बीच बीजेपी ने कुछ ऐसे फ़ैसले किए जिनका फ़ायदा उन्हें तुरंत मिला जैसे सूरत में जीएसटी को लेकर गुस्सा था तो उन्होंने कैंपेन के बीच उसमें बदलाव कर दिए. तीसरे, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की हमेशा से रणनीति रही है कि वे दिग्गज नेताओं को टारगेट करते हैं. जैसे अगर आप यहां भी देखें तो कांग्रेस के तीन वरिष्ठ नेता शक्ति सिंह गोहिल, सिद्धार्थ पटेल और अर्जुन मोडवाडिया तीनों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा.

हिमाचल के नतीजे बीजेपी के लिए सुख दुख दोनों वाले नतीजे हैं. आम तौर पर वह अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं करती, लेकिन हिमाचल में जीतने के लिए उसने ये किया. लेकिन बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल का अपनी सीट हारना दिखाता है कि जनता को उम्मीदवारों में भी बदलाव चाहिए. कांग्रेस को काटने के लिए कांग्रेस जैसी राजनीति को लंबे समय तक समर्थन नहीं मिलेगा. कांग्रेस ने असम के बाद फिर वही भूल की और वयोवृद्ध मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को फिर से उम्मीदवार बनाया. पार्टी को और उसके नेताओं को भी कुर्सी छोड़ने का सही समय समझना होगा. जब भी पार्टी ये फैसला नहीं कर पाएगी, तो फैसला जनता करेगी. और हिमाचल में मुख्यमंत्री को बदलने की हिम्मत न दिखा सकने वाले पार्टी नेतृत्व का फैसला मतदाताओं ने कर दिया. जिस देश की 65 प्रतिशत आबादी की उम्र 35 साल से नीचे हो, वहां अब बूढ़े नेता उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने की हालत में नहीं हैं. भारत के राजनीतिक दल शायद जर्मनी के बवेरिया प्रांत से कुछ सीख सकते हैं, जहां इसी वीकएंड 67 वर्षीय वर्तमान मुख्यमंत्री ने 47 वर्षीय युवा नेता मार्कुस जोएडर को कुर्सी सौंपने का फैसला किया है. बवेरिया के चुनाव अगले साल होंगे, नये नेता तब तक अपनी जगह बना सकेंगे और मतदाताओं को प्रभावित कर सकेंगे. सत्ताविरोधी लहर से बचने के लिए बवेरिया की सत्तारूढ़ पार्टी की ये रणनीति है.

इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक ये है कि पार्टियों को और लोकतांत्रिक बनना होगा. लोकतांत्रिक पार्टियां ही लोकतांत्रिक फैसले ले सकती हैं और लोकतंत्र को मजबूत बना सकती हैं. एक दूसरे पर कीचड़ उछाल कर वे एक दूसरे को कमजोर ही करेंगी. लोकतंत्र में राजनीतिक दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे सिर्फ जनमत बनाने की भूमिका ही नहीं निभाते, बल्कि बहुमत से मिले जनादेश के आधार पर सरकार बनाकर अपनी नीतियों को लागू भी करते हैं. इसलिए पार्टियों का एक दूसरे पर भरोसा और मतदाताओं का पार्टियों पर भरोसा जरूरी है. इन नतीजों के बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों को आत्ममंथन करने की ज़रूरत है. प्रधानमंत्री को विचार करना होगा कि आख़िर कब तक वे ‘मेरे साथ अन्याय हुआ’ जैसी बातों पर चुनाव लड़ और जीत सकते हैं. उन्होंने सरकार भले ही बचा ली, लेकिन उन्हें समझना पड़ेगा कि ग्रामीण इलाक़ों में उनकी राजनीति कमज़ोर (अलोकप्रिय) हो रही है. दूसरे, मजबूत होता विपक्ष उनके लिए आगे चलकर परेशानी खड़ी कर सकता है. बीजेपी को यह भी सोचना होगा कि सिर्फ़ एक शख़्स के नाम पर राजनीति करते रहने से क्या होगा. कांग्रेस में भी एक समय में इंदिरा गांधी पार्टी से बड़ी हो गई थी. ‘इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा’ के दौर में कांग्रेस के ज़मीनी काडर को जो नुकसान हुआ, कांग्रेस पार्टी आज तक उससे निकल नहीं पा रही है. बीजेपी का कांग्रेसीकरण होने से ये सारी परेशानियां उनके हिस्से में भी आएंगी.

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