समस्या केवल तीन तलाक़ की नहीं ….. डाॅ0 गीता गुप्त

7:11 pm or January 2, 2018
talaq

समस्या केवल तीन तलाक़ की नहीं …..

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

अन्ततः केन्द्र सरकार ने एक बार में ‘‘तीन तलाक़‘‘ के खि़लाफ़ मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 लोकसभा में पारित कर दिया। राज्य सभा में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति से वह क़ानून का रूप ले लेगा। लेकिन विधेयक के मौजूदा स्वरूप को लेकर कुछ मुस्लिम महिला संगठनों को आपत्ति है। विधेयक में प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार एक बार में तीन तलाक़ कहने वाले पुरुष को तीन साल के कारावास का दण्ड दिया जाएगा। यह जुर्म ग़ैर ज़मानती होगा। तलाक़शुदा पत्नी और आश्रित बच्चे के लिए गुज़ारा-भत्ता तय करने का अधिकार मजिस्टेªट को होगा। साथ ही एक बार में तीन तलाक़ दिये जाने की सूरत में नाबालिग बच्चे का अधिकार माँ को दिया जाएगा। सरकार के मुताबिक़, तीन तलाक़ का मुद्दा लिंग न्याय, लिंग समानता, महिला की प्रतिष्ठा तथा मानवीय धारणा से उठाया हुआ मुद्दा है, न कि विश्वास व धर्म से जुड़ा हुआ मुद्दा ।

महिलाएँ ‘तीन तलाक़‘ को ग़ैरक़ानूनी और गुनाह बताकर इसे प्रतिबन्धित करने की माँग करती आ रही हैं। मौलानाओं ने भी तीन तलाक़ को बिद्दत बताकर उसे गुनाह, ग़लत और क़ुरान के बाहर का तो बताया लेकिन ये भी कहा कि ‘अगर किसी ने एक बार में तीन तलाक़ दिया है तो वह तलाक़ हो गया, उसमें पुनर्विचार की गुंजाइश नहीं। ऐसे पति को क़ानून स़ख़्त सज़ा दे। ख़लीफ़ाओं के दौर में उन्हंे 50 कोड़े मारने की सज़ा दी जाती थी।‘ यानी मौलाना तीन तलाक़ को ग़लत मानकर कड़ी सज़ा के भी पक्षधर तो हैं, परन्तु उन्होंने ऐसा कोई प्रावधान करने की ज़हमत नहीं उठाई ,जिससे महिलाओं पर इसका क़हर न टूटे।

सच तो यह है कि दशकों से ‘तीन तलाक़‘ की मार झेल रही महिलाओं के हित में कभी किसी आॅल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड या मुशावरत या तंजीम ने कोई क़दम नहीं उठाया। इस ग़लत परम्परा को समाप्त करने के लिए मौलानाओं या सुन्नी मुस्लिम समुदाय ने कभी कोई बड़ा सन्देश नहीं दिया। ऐसी तलाक़शुदा औरतों के पुनर्वास पर भी वक़्फ़ के अक़ूत ख़जा़ने हमेशा बन्द रहे। ऐसे पतियों को जवाबदेही के लिए इन्होंने नहीं घेरा। मौलानाओं ने चुप्पी साधे रखी और अपने एफ़िडेविट में लिखा कि सभी महिलाएँ ‘नाक़िसुल अक़्ल‘ होती हैं लिहाज़ा सिर्फ़ मर्द तय करेगा कि क्या करना है। ऐसी सोच रखने वालों के हाथ में यदि समाज के नियंत्रण का दायित्व है तो महिलाओं के हक़ में कैसे कुछ अच्छा होने की उम्मीद की जा सकती है ? जो मसला सुन्नी बोर्ड और मौलानाओं के सिर्फ़ एक बयान से हल हो सकता था कि ‘‘तीन तलाक़ ग़ैरक़ानूनी है इसलिए सिर्फ़ ‘तलाक़-ए-अहसन‘ और ‘तलाक़-ए-हसन ही मान्य होगा,‘‘ उसके लिए महिलाओं को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी और सरकार को क़ानून बनाने की ज़द्दोज़हद करनी पड़ी । हालांकि अब भी बहुत-से प्रश्न अनुत्तरित हैं।

गा़ैरतलब है कि अगस्त 2017 में ही सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने 1400 वर्षाें से प्रचलित तीन तलाक़ व तलाक़-ए-बिद्दत की परम्परा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। यही नहीं, ‘तीन तलाक़‘ को संविधान की धारा 14 व 21 के विरुद्ध भी माना। 10 अक्तूबर 2015 को उत्तराखण्ड की शायरा बानो ने सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम पर्सनल लाॅ एप्लीकेशन क़ानून, 1936 धारा-दो की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। 17 संगठनों ने भी याचिका दायर कर शायरा का पक्ष मज़बूत कर दिया था। इसके बाद जयपुर की आफ़रीन, पश्चिम बंगाल ( हावड़ा ) की इशरत, सहारनपुर की अतिया और रामपुर (उत्तरप्रदेश ) की गुलशन ने भी इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द करते हुए याचिका दायर की। इन पढ़ी-लिखी युवतियों को उनके पतियों ने क्रमशः स्पीड पोस्ट, फ़ोन, काग़ज़ पर लिखकर और दस रुपये के स्टाम्प पेपर पर तलाक़नामा भेजकर तलाक़ दे दिया था।

स्मरणीय है कि वर्ष 1978 में इन्दौर की शाह बानो ने भी तलाक़ के बाद अपने पति मोहम्मद खान से गुज़ारा भत्ते हेतु क़ानून की शरण ली थी। तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय दिया था। किन्तु राजीव गंाधी सरकार ने एक वर्ष में मुस्लिम महिला ( तलाक़ में संरक्षण अधिकार ) अधिनियम पारित कर उस निर्णय को ही पलट दिया। इससे शाह बानो जीता हुआ मुक़दमा भी हार गईं। सच तो यह है कि अनगिनत महिलाएँ इस कुप्रथा का दंश झेल रही हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सहसंस्थापक जकिया सोमण और नूरजहाँ सफ़िया नियाज़ ने नवम्बर 2016 में प्रधानमन्त्री को पत्र लिखकर देश के दस राज्यों मंे 47110 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया था कि इनमें 92.1 प्रतिशत महिलाएँ मौखिक/एकतरफ़ा ढंग से दिये तलाक़ पर प्रतिबन्ध चाहती हैं और 91.7 प्रतिशत बहुविवाह के विरुद्ध हैं।
मगर मुस्लिम समुदाय के सुन्नी, बरेलवी, देवबन्दी, अहले हदीस और शिया समेत सभी वर्गों के विद्वानों और मौलवियों ने मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के बैनर तले जुटकर ‘तीन तलाक़‘ को जायज़ ठहराया। आॅल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने तो इसके समर्थन में प्रस्ताव पास कर महिलाओं से जुड़े मसलों पर विचार हेतु अलग महिला विंग का गठन कर दिया। लगातार मुस्लिम महिलाओं के उजागर हो रहे तीन तलाक़ के प्रकरणों ने सरकार को इसपर विचार के लिए बाध्य कर दिया। तब अक्तूबर 2016 में विधि आयोग ने पर्सनल लाॅ में सुधार और समान नागरिक संहिता लाने की दिशा में विचार हेतु एक प्रश्नावली सार्वजनिक की। आॅल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वी रहमानी ने इस प्रश्नावली का बहिष्कार ही नहीं किया अपितु यह भी कहा कि ‘‘मुस्लिम पर्सनल लाॅ ईश्वरीय क़ानून है और इसमें किसी भी बदलाव की सम्भावना या आवश्यकता नहीं है।‘‘

दरअसल जब भी महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे उभरते हैं, कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया निराशाजनक ही होती है। जबकि सभी धर्मों में नारी-विरोधी प्रावधानों में संशोधन समतावादी क़ानून प्रणाली की आवश्यकता है। अधिकतर इस्लामिक देशों, यहाँ तक कि मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान ने भी शरीयत के क़ानून में बदलाव किये हैं। वहाँ सन् 1961 में ‘द मुस्लिम फैमिली लाॅज आर्डिनेन्स‘ पारित हुआ जोकि ‘मैरिज एण्ड फैमिली लाॅज‘ के कमीशन के सम्मुख कुछ सिफ़ारिशों पर आधारित है। 22 इस्लामिक देशों में तीन तलाक़ प्रतिबन्धित है। ईरान, पेलिस्टाइन, इजिप्त आदि में मुस्लिम विधि के कुछ महत्त्वपूर्ण भागों की नयी संहिता तैयार की गई है और सुधार के उद्देश्य से मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम में परिवर्तन किये गए हैं। मिस्र पहला ऐसा देश है जिसने वर्ष 1929 में तलाक़-पद्धति में परिवर्तन किया और तलाक़ के लिए 90 दिनों की प्रतीक्षा अवधि निर्धारित की।

आॅल इण्डिया मुस्लिम वीमन पर्सनल लाॅ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर ने पिछले वर्ष ही सरकार से ‘ हिन्दू विवाह क़ानून‘ की तरह ‘मुस्लिम विवाह क़ानून‘ भी बनाये जाने की माँग की थी। बोर्ड ने निकाह, तलाक़, दूसरे निकाह और विरासत आदि के बारे में प्रावधान कर मुस्लिम विवाह अधिनियम का पूरा मसौदा वर्ष 2009 में ही तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल को सौंपा था। जिसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई। ग़ौरतलब है कि इस्लामी क़ानून निकाह और तलाक़ दोनों सन्दर्भों में पुरुषों को स्त्रियों से अधिक सुविधाएँ देता है। जैसे पुरुषों को यह अधिकार है कि वह बिना कोई कारण बताये ‘तलाक़‘ शब्द का उच्चारण मात्र करके पत्नी को त्याग सकता है। मगर स्त्री तब तक ऐसा नहीं कर सकती, जब तक वह पुरुष को दोषी प्रमाणित न कर दे।

मुसलमानों में तलाक़ के दो आधार हैं-1. प्रथाओं द्वारा 2. न्यायालय द्वारा। यह लिखित एवं मौखिक दोनों रूपों में मान्य है। प्रथाओं पर आधारित तलाक़ के स्वरूप हैं- 1.तलाक़-ए-अहसन-इसमें शौहर अपनी बीवी से मासिक धर्म के समय एक बार ‘तलाक़‘ शब्द कह देता है तथा इद्दत ( वह समय जिसमें यह निश्चित किया जा सके कि स्त्री गर्भवती तो नहीं है ? यह अवधि तीन या चार मासिक धर्म की होती है।) की समयावधि में उससे यौन सम्बन्ध नहीं रखता। ऐसी स्थिति मंे तलाक़ हो जाता है। 2.तलाक़-ए-हसन-इसमें शौहर अपनी बीवी के तुहर ( मासिक धर्म का समय ) के समय ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़‘ बोलता है। यह प्रक्रिया तीन तुहरों तक चलती है। इस बीच दोनों में यौन सम्बन्ध नहीं होता ,तब उनमेें तलाक़ मान लिया जाता है। इस पद्धति में निकाह को बचाये रखने की गुंजायश है। 3.तलाक़-उल-बिद्दत- इसमें शौहर अपनी बीवी के मासिक धर्म के समय बिना किसी गवाह की उपस्थिति के तीन बार ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़‘ कहता है तो निकाह टूट जाता है। 4.इला-यदि शौहर अल्लाह की सौगन्ध खाकर चार माह तक बीवी से यौन सम्बन्ध न रखे तो इस अवधि के बाद तलाक़ हो जाता है। 5. खुला- इसमें स्त्री अपने शौहर के सामने मेहर न लेने पर या मेहर लौटाने के साथ तलाक़ का प्रस्ताव रखती है। शौहर के सहमत होने पर दोनों में तलाक़ हो जाता है। 6. मुबरअत-इसमें भी पति-पत्नी दोनों की सहमति से तलाक़ होता है और दोनों पक्ष किसी भी प्रकार का हर्जाना न देने के लिए स्वतन्त्र रहते हैं।
वैधानिक तलाक़ की घोषणा न्यायालय द्वारा की जाती है। इसके दो प्रकार हैं-1.जिहार-जब कोई मुस्लिम पुरुष किसी ऐसी स्त्री से निकाह कर लेता है जिसे इस्लाम धर्मानुसार निषिद्ध घोषित किया गया हो; तो बीवी शौहर से इस कार्य के लिए प्रायश्चित करने का आग्रह करती है और उसे लैंगिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करने देती। पति द्वारा प्रायश्चित न किये जाने पर वह न्यायालय में तलाक़ के लिए प्रार्थनापत्र दे सकती है। 2.लियान-पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार का झूठा आरोप लगाने पर पत्नी न्यायालय में तलाक़ का दावा पेश कर सकती है। पति द्वारा आरोप वापस लिये जानेे पर मुक़दमा समाप्त हो सकता है अन्यथा तलाक़ हो जाता है।

तलाक़ के इन स्वरूपों से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि मुस्लिम समाज में विवाह-विच्छेद आसान या सामान्य घटना है। यह मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है, व्यावहारिक जीवन में इनमें भी तलाक़ कम होते हैंै पैग़म्बर मोहम्मद साहब इसे अच्छा नहीं मानते थे और अपने जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने पंचों या न्यायाधीशों के हस्तक्षेप के बिना तलाक़ के अधिकार का उपयोग पुरुषों के लिए निषिद्ध -सा ही कर दिया था। आधुनिक युग में सम्भवतः इसीलिए मेेहर की रक़म दूल्हे ही हैसियत से इतनी अधिक रखी जाती है कि उसके इस निरंकुश अधिकार पर रोक लग सके क्योंकि मेहर दिये बिना वह पत्नी से छुटकारा नहीं पा सकता।

मुस्लिम समाज में तलाक़ के सन्दर्भ में न्यायालय की भूमिका से पहले पति को तो इसका अधिकार था किन्तु उसकी स्वीकृति के बिना पत्नी को तलाक़ लेने का अधिकार नहीं था। 7 अक्तूबर 1937 से लागू मुस्लिम शरीयत अधिनियम के अनुसार पत्नी को इला एवं जिहार के आधार पर तलाक़ लेने के लिए आवेदन करने की छूट मिली। सन् 1939 में पारित मुस्लिम विवाह -विच्छेद अधिनियम ने इन आधारों पर स्त्रियों को तलाक़ के अधिकार प्रदान किये- 1.यदि पति चार वर्ष तक लापता हो। 2. वह लगातार दो वर्षों तक पत्नी का भरण-पोषण करने में असमर्थ रहा हो। 3.यदि पति को सात या अधिक वर्षों का कारावास मिला हो। 4. यदि बिना उचित कारण के पति तीन वर्षों से अपने वैवाहिक कर्तव्य पूरा करने में असमर्थ रहा हो। 5. यदि पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ या नपंुसक हो। 6. यदि पति दो वर्षों से पागल, कोढ़ी या किसी प्रकार की लैंगिक बीमारी से पीड़ित हो। 7. यदि पति व्यभिचारी हो और पत्नी को अनैतिक जीवन व्यतीत करने हेतु बाध्य करता हो। 8. यदि पति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता हो, पत्नी की सम्पत्ति बेचता हो या धार्मिक कर्तव्य-निर्वाह में बाधा डालता हो। 9. यदि 15 वर्ष की उम्र के पूर्व किसी लड़की का निकाह करवा दिया गया हो तो यौन सम्बन्ध स्थापित करने और 18 वर्ष की उम्र के पूर्व वह विवाह को अमान्य करने हेतु दावा कर सकती है। 10. यदि पति अपनी सभी पत्नियों के साथ असमानता का व्यवहार करता हो। इनके अतिरिक्त अन्य ऐसे सभी कारणों से तलाक़ सम्भव है जो मुस्लिम सामाजिक क़ानून द्वारा मान्य हों।

उपर्युक्त अधिनियमों ने स्त्री को कुछ सीमा तक अधिकार-सम्पन्न बनाया मगर पुरुषों को प्राप्त मौखिक तलाक़ का अधिकार उस पर आज भी भारी पड़ता हैै। मर्दों द्वारा सिर्फऱ् तलाक़ के उच्चारण को सम्बन्ध-विच्छेद मान लिया जाना, सोशल मीडिया जैसे -स्काइप, वाट्सएप या एसएमएस द्वारा तलाक़ दे दिया जाना हाल के दिनांें में बहुत बढ़ गया है। इस कारण मुस्लिम स्त्रियों का वैवाहिक जीवन भयमुक्त नहीं रह गया है। दरअसल कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन , मुस्लिम विद्वान, राजनीतिज्ञ और मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड भी अपनी महिलाओं के जीवन के अधिकार के सन्दर्भ में कभी प्रगतिशील नहीं रहे। धार्मिक आस्था के नाम पर स्त्रियों का शोषण बदस्तूर जारी रहा। कोई सरकार इस विवादित मुद्दे पर साहसिक पहल नहीें कर सकी। अन्ततः मुस्लिम महिलाएँ ही न सिर्फ़ ‘तीन तलाक़‘ के खि़लाफ लामबन्द हुईं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक भी जा पहुँचीं। 50 हज़ार महिलाओं ने तीन तलाक़ को ख़त्म करने की याचिका पर हस्ताक्षर किये। फिर लम्बी बहस और तर्क-वितर्क के बाद सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया।

न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने अपने निर्णय में कहा कि‘‘ सर्वोच्च न्यायालय पहले भी शमीम आरा के मामले में ‘तीन तलाक़‘ को क़ानूनन ग़लत करार दे चुका है। तब कोर्ट ने इसकी विस्तार से वजह नहीं बतायी थी; अब बताने की ज़रूरत है। इस्लामी क़ानून के चार स्रोत हैं- कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कुरान मौलिक है। जो बात कुरान में नहीं, उसे मौलिक नहीं माना जा सकता। बाक़ी स्रोतों में कोई भी बात कुरान में लिखी बात के विरुद्ध नहीं हो सकती। 1937 बग शरीयत एप्लीकेशन एक्ट का मक़सद मुस्लिम समाज से कुरान से बाहर की बातों को हटाना था। मेरा मानना है कि ‘तीन तलाक़‘ को संविधान में मिले धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार के तहत सरंक्षण हासिल नहीं है।‘‘

ज्ञातव्य है कि इण्डियन मुस्लिम पर्सनल लाॅ को ब्रिटिश शासकों ने बनाया था लेकिन आज़ाद हिन्दुस्तान में भी यह लागू रहा। जबकि इसमें संशोधन आवश्यक था। शरीयत के तलाक़ नियम और मुस्लिम पर्सनल लाॅ का भारतीय संविधान से कोई तालमेल नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट उल्लेख है कि‘‘ राज्य भारतीय क्षेत्र में किसी व्यक्ति को क़ानून के सामने समान मानने अथवा क़ानून का समान संरक्षण मुहैया कराने से इनकार नहीं करेगा।‘‘ और अनुच्छेद 15 के अनुसार-‘‘राज्य किसी के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेद-भाव नहीं करेगा।‘‘ अतःः स्त्रियों को सामाजिक ,आर्थिक और भावनात्मक रूप से कमज़ोर बनाने वाली ‘तीन तलाक़‘ जैसी प्रथा उक्त अनुच्छेदों की भावना के अनुरूप नहीं है।

बहरहाल,‘तीन तलाक़‘ पर सरकार ने क़ानून तो बना दिया, सम्भव है कि वह लागू भी हो जाए। परन्तु तीन तलाक़ पर प्रस्तावित क़ानून महिलाओं की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। मुम्बई की महिला संगठन ‘बेबाक कलेक्टिव‘ के अनुसार,, विधेयक महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने की जगह और कमज़ोर बनाने वाला है। संगठन की ओर से विधेयक की कमियाँ गिनवाते हुए वरिष्ठ वकील इन्दिरा जयसिंह ने कहा कि एक ओर तो यह ‘तीन तलाक़ ‘ को ग़ैरक़ानूनी क़रार देता है, तो दूसरी ओर मुस्लिम महिला को गुज़ारा-भत्ता देने की बात करता है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे सम्भव हैं ?

जहाँ तक महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान दिलवाने की बात है तो , जब तलाक़ देने वाले पति को जेल भेज दिया जाएगा और षादी का रिष्ता ही नहीं बचेगा तो कैसा हक़ और कैसा सम्मान ? मुस्लिम महिला कोर्ट का दरवाज़ा इसलिए खटखटाती है कि वो पति के साथ रह सके और उसे आर्थिक मदद मिलती रहे। लेकिन पति को जेल भेज देने से उसे दोनों ही अधिकार नहीं मिलेंगे। विवाह एक सामाजिक अनुबन्ध है तो फिर उसे तोड़ने पर आपराधिक मामला क्याों बनाया जाए ? विधेयक में निकाह, हलाला, बहुविवाह और दूसरे तरह के तलाक़ के बारे में कोई ज़िक्र नहीं है। विधयक इसपर भी चुप है कि पति के जेल चले जाने पर पत्नी को गुजारा-भत्ता कौन देगा, सरकार या तलाक़ देने वाला पति या पति का परिवार ? एक और महत्त्वपूर्ण प्रष्न यह कि बिना तलाक़ बोले अगर पति छोड़ दे तो उस सूरत मे सरकार के पास नये क़ानून में क्या प्रावधान है ? मुस्लिम महिलाओ की सच्ची मदद के लिए हलाला और बहुविवाह पर भी रोक ज़रूरी है।

‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन‘‘ नामक संगठन की अध्यक्ष ज़किया सोमन ने विधेयक का स्वागत करते हुए कहा कि हलाला और बहुविवाह पर भी क़ानून बनना चाहिए। अगर एक से अधिक विवाह करने की प्रथा को ग़ैरक़ानूनी नहीं माना जाता तो मर्द तलाक़ दिये बिना वही रास्ता अपनाने लगेंगे या फिर तीन महीने की मियाद में तीन तलाक़ देने का रास्ता अख़्तियार करने लगेंगे। अधिकतर महिलाओं का मानना है कि नये क़ानून की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि पहले से ही धारा 498-ए और अन्य कई ऐसे क़ानून हैं जो महिलाओं को अन्याय से बचाते हैं। निक़ाहनामे में ही तलाक़ की षर्तें और प्रक्रिया जुड़वायी जा सकती हैं। यह भी प्रष्न महत्त्वपूर्ण है कि अन्य समुदाय के लिए तलाक़ देने पर एक साल की सज़ा है पर मुसलमान के तलाक़ देने पर तीन साल की सज़ा। ऐसा क्यों ?

ब्हरहाल, लोकसभा में ‘मुस्लिम महिला वैवाहिक अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 पास हो गया है। लेकिन यह केवल ‘‘तीन तलाक़‘‘ यानी तलाक़-उल-बिद्दत पर केन्द्रित है जबकि महिलाओं की समस्या केवल ‘तीन तलाक‘‘ की नहीं है। मुस्लिम विवाह-विच्छेद के सभी पहलुओं पर विचार किये बिना इसके दूरगामी परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।

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