प्रजातंत्र को खतरा है संघ और नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली से

एल.एस.हरदेनिया

देश के दो प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के संबंधा में विस्तृत लेख प्रकाशित किये हैं। ये दो समाचार पत्र हैं ”दी हिन्दू” और ”दी इंडियन एक्सप्रेस”। एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख उसके मुख्य संपादक शेखर गुप्ता ने लिखा है और  ”हिन्दु” में प्रकाशित लेख हरीश खरे द्वारा लिखा गया है। हरीश खरे पूर्व में हिन्दू के प्रमुख संवाददाता थे बाद में वे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रेस सलाहकार भी रहे।  दोनों लेखों को पढ़ने से यह नतीजा निकलता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और मोदी की कार्यशैली से न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी वरन् देश को भी खतरा है। शेखर गुप्ता ने अपने लेख में यह बताने का प्रयास किया है कि भारतीय जनता पार्टी का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। उसके सारे प्रमुख निर्णय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लेता है। शेखर गुप्ता लिखते हैं भारतीय जनता पार्टी प्राय: प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का मजाक उड़ाती है। भाजपा कहती है कि डॉ. मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनाया है। वे कोई भी निर्णय  सोनिया गांधी की सलाह के लिये बिना नहीं लेते हैं। पर भाजपा को चाहिए कि वह स्वयं से पूछे कि उसके कितने अधयक्ष उसने स्वयं नियुक्त किए हैं। क्या वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा नहीं थोपे गये हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि जन कृष्णमूर्ति, कुशाभाऊ ठाकरे, वैन्कय्या नायडू और नितिन गडकरी को अध्यक्ष पद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने  बिठाया था? सच पूछा जाय तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय जनता पार्टी का 10 जनपथ (सोनिया गांधी का निवास) है। भाजपा कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी बताती है। परंतु उस परिवार के सदस्य ऐसे तो हैं जिनका अपना सार्वजनिक जीवन है और जो चुनाव लड़ते हैं। परंतु संघ के नेता न तो सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में हैं व न ही चुनाव लड़ते हैं। न सिर्फ संघ भाजपा के मुखियों को चुनता है वरन् वह अपनी नीतियां  भी भाजपा पर थोपता है। नीतियां चाहे राजनीति की हों या चाहे उनका संबंधा आर्थिक या सामाजिक  क्षेत्र से हो, भाजपा उन पर चलने को मजबूर है। संघ कहता है देश खतरे में है, तो भाजपा उसको दुहराती है और जोर-जोर से कहती है कि देश सचमुच खतरे में है। संघ के आदेशों और यहां तक कि संघ के इशारों के विरूध्द चलने का साहस भाजपा नेताओं में नहीं है। अभी तक ऐसा लगता था कि नरेन्द्र मोदी संघ की धाुन पर नहीं नाचते हैं। अभी हाल में वह भ्रम भी टूट गया जब नरेन्द्र मोदी नागपुर आकर संघ के दरबार में पेश हुये।

 

शेखर गुप्ता लिखते हैं कि इस समय भाजपा में एक भी ऐसा नेता नहीं है जो संघ को ”न” कह सके। परंतु इतिहास इस बात का गवाह है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसा साहस दिखाया था। शायद इसलिए वे मिलीजुली सरकार का लगातार नेतृत्व कर सके। अटल बिहारी वाजपेयी का कद काफी ऊंचा था या यूं कहे कि उनका कद इसलिये बढ़ा क्योंकि उन्होंने कदम-कदम पर संघ से नहीं पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। संघ विदेशी पूँजी निवेश का विरोधी था परंतु वाजपेयी ने देश के दरवाजे विदेशी पूँजी के लिये खोल दिये। संघ चाहता था कि भाजपा सरकार पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर पर फौजी हमला करके उसे आजाद करवाये। परंतु वाजपेयी ने लाइन ऑफ कंट्रोल को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता दे दी। संघ पाकिस्तान से दोस्ताना संबंधों का विरोधी रहा है परंतु वाजपेयी ने अनेक ऐसे निर्णय लिये जिससे पाकिस्तान से दोस्ताना संबंध बढ़े। दोस्ताना संबंध मजबूत करने के लिये वाजपेयी स्वयं बस में बैठकर पाकिस्तान गये। संघ चाहता था कि वाजपेयी ब्रजेश मिश्रा को प्रधानमंत्री सचिवालय से हटाएं। परंतु वाजपेयी ने संघ के इस आदेश को भी ठुकरा दिया। वाजपेयी ने यह साफ कर दिया था कि यदि वे ब्रजेश मिश्रा को हटवाना चाहते हैं तो वे उनके स्वयं के त्यागपत्र के लिये तैयार रहें। अब स्थिति पूरी तरह इसके विपरीत है। इस समय भाजपा में अनेक नेता हैं परंतु उनमें एक भी ऐसा दमदार नेता नहीं जो भाजपा का नेतृत्व कर सके। ऐसी स्थिति में सभी को यह अच्छा लगता है कि संघ ही उनके लिये निर्णय ले। शायद भाजपा के अनेक नेता चाहते हों कि गंभीर आरोपों के चलते गडकरी को घर बिठा दिया जाये। पर किस की हिम्मत है कि वह ऐसा कहने  का साहस दिखाये। इसलिये गडकरी के संबंधा में निर्णय पूरी तरह संघ पर छोड दिया गया है, भले ही गडकरी के अध्यक्ष बने रहने से भाजपा का कितना भी नुकसान हो।

 

हरीश खरे भाजपा के भीतर उत्पन्न एक अन्य खतरे के प्रति धयान आकर्षित करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक चैनल प्रारंभ किया है। इस चैनल का नाम ”नमो” रखा गया है। इस चैनल का मुख्य कार्य मोदी के गुणगान करना है। वैसे तमिलनाडू में कुछ ऐसे चैनल है जो वहां के नेताओं के नाम पर चलते हैं और उन नेताओं के गुणों को बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं। शायद मोदी की ओर से यह कहा जा सकता है कि जब तमिलनाडू में नेताओं के नाम से चैनल चल सकते हैं तो मेरे नाम से क्यों नहीं। परंतु मोदी को एक अंतर समझना चाहिए। वह यह कि जिन नेताओं के नाम से तमिलनाडू के चैनल चल रहे हैं वे क्षेत्रीय नेता है जबकि नरेन्द्र मोदी एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं। भाजपा संजय गांधी और इंदिरा गांधी की व्यक्तिपूजा की विरोधी रही है। उसका कहना रहता था कि व्यक्ति पूजा प्रजातंत्र के मूल्यों के विपरीत है। परंतु मोदी के मामलों में भाजपा मौन धारण किये हुये है। मोदी के नाम पर चालू किया गया चैनल तो मोदी की व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति का एक मामूली हिस्सा है परंतु भाजपा की ओर से मोदी की जो तस्वीर पेश की जाती है वह खतरे से खाली नहीं है। यह तस्वीर एक ऐसे नेता की है जिसके तानाशाह बनने की पूरी संभावना है। आज स्थिति यह है कि भाजपा मोदी की सभी मांगों को स्वीकार कर लेती है भले ही वे उचित हों या अनुचित। मोदी के गुणगान में यह कहा जाता है कि वे सफलता की प्रतिमूर्ति हैं, उन्होंने जो हासिल किया है वह और कोई नहीं कर सकता, उसने गुजरात की तस्वीर बदल दी है वे देश की तस्वीर भी बदल सकते हैं। बीच-बीच में ऐसी घटनायें होती रहती हैं जिनसे लगता है कि शायद वह दिन दूर नहीं जब मोदी भाजपा पर अपना नियंत्रण कायम कर लेंगे। जब सन् 2002 में गुजरात में दंगे हुये थे उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म पालन करने की सलाह दी थी। परंतु उस समय जो साम्प्रदायिक वातावरण था उसके चलते मोदी ने वाजपेयी की सलाह को नामंजूर कर दिया था। उसके बाद भाजपा ने मोदी को आदर्श माडल के रूप में पेश करना प्रारंभ कर दिया। इससे मोदी को यह अवसर मिला कि वह अपनी एक ऐसी तस्वीर पेश कर सकें जिसमें भविष्य का तानाशाह विकसित होता नजर आए। मोदी का यह रूप भाजपा के साथ-साथ देश के लिये भी खतरनाक है। सबसे बड़ी बात यह है कि मोदी के समर्थन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा होता है, जिसकी कार्यशैली भी प्रजातांत्रिक नहीं है परंतु स्वयं संघ इस बात की उपेक्षा नहीं कर सकता कि संघ परिवार से जुड़े विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी मोदी के उपेक्षा पूर्ण रवैये के कारण स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। यह स्थिति प्रजातांत्रिक समाज के विपरीत है। गुजरात ने भले ही मोदी के इस रूप को स्वीकार कर लिया हो परंतु देश उन्हें इस रूप को स्वीकार नहीं करेगा। आशा है कि स्वयं भाजपा इस खतरे को महसूस करेगी।

 

एल.एस.हरदेनिया

 

 

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