वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी – डाॅ0 गीता गुप्त

3:27 pm or January 8, 2018
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10 जनवरी विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष

वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी

—- डाॅ0 गीता गुप्त —-

आज़ादी के सात दशक बाद भी हिन्दी भले ही भारत की राष्ट्रभाषा न बन सकी हो परन्तु समूचे विश्व में उसकी स्थिति आज बहुत सम्मानजनक है। हिन्दी के साथ वैश्विक बाज़ार जुड़ गया है, जो इस भाषा की उपादेयता को साबित कर रहा है। आश्चर्यजनक बात यह है कि हिन्दी को विश्वव्यापी स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से सन् 1975 में विश्व हिन्दी सम्मेलन की शुरुआत की गई थी और 10 जनवरी से 13 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाना था। तबसे अब तक 42 वर्ष बीत गए किन्तु हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनना तो दूर, भारत की राष्ट्रभाषा तक नहीं बन सकी है।

भाषा का प्रश्न केवल राजनीतिक या व्यावसायिक न होकर सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। भारतीय मूल के लोग संसार के जिन-जिन देशों में जा बसे हैं, वे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को हिन्दी के माध्यम से अभिव्यक्त करने में गर्व अनुभव करते हैं। यही भारतीयता की पहचान भी मानी जाती है। इसीलिए विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन में प्रवासी भारतीयों की विशेष रुचि होती है। नागपुर में आयोजित सम्मेलन में समूचे भारत से तीन हज़ार प्रतिनिधि तथा पर्यवेक्षकों के अलावा तीस देशों के लगभग 122 प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था सम्मेलन का उद्घाटन भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने किया था। उन्होंने हिन्दी को समृद्ध बनाने तथा विश्व में गौरवपूर्ण स्थान दिलवाने हेतु कई उपयोगी सुझाव दिये थे। इस सम्मेलन में यूनेस्को के प्रतिनिधि के रूप में श्री अशय डिलियान भी उपस्थित थे और इस अवसर पर एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया था।

इस त्रि दिवसीय सम्मेलन मेें कई विचार- गोष्ठियाँ आयोजित की गईं। जिनमें हिन्दी के विश्वव्यापी स्वरूप की स्थापनाओं एवं सम्भावनाओं के सन्दर्भ में विचार किया गया। तीन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किये गए। 1.राष्ट्रसंघ में हिन्दी को मान्यता प्रदान की जाए। 2.महात्मा गाँधी की कर्मभूमि वर्धा में विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना की जाए। 3.सम्मेलन की उपलब्धियों के स्थायित्व तथा कार्य को विस्तार देने हेतु एक निश्चित योजना बनायी जाए।

निश्चित रूप से प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन बहुत सफल रहा और इससे समूचे विश्व में भाषाई सौहार्द्र, मैत्री एवं सहयोग के युग का शुभारम्भ हुआ। इसके बाद वर्ष 2015 तक 42 वर्षों में नौ विश्व हिन्दी सम्मेलन और आयोजित हुए लेकिन हर सम्मेलन में केवल हिन्दी के विश्वव्यापी विस्तार की चर्चा ही की जाती रही। इसके अलावा कतिपय हिन्दी के विद्वानों को लेखन हेतु विश्व-सम्मान देकर कार्यक्रम की उपलब्धि मान लिया गया। हालांकि इन सम्मेलनों में अनेक ऐसे प्रस्ताव पारित किए जाते रहे, जिनका कार्यान्वयन सचमुच हिन्दी को अब तक विश्व की अनिवार्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर चुका होता। लेकिन दुःख की बात है कि अब विश्व हिन्दी सम्मेलन एक औपचारिक आयोजन मात्र रह गया है; जिसमें मुट्ठी भर वे लेखक शामिल किये जाते हैं, जिन्हें सम्मानित किया जाने वाला हो या सम्मानित किया जा चुका हो। और ऐसे लेखक व महानुभाव भी शामिल होतेे हैं, जिनका उद्देश्य सम्मेलन में उपस्थिति का रिकार्ड बनाना मात्र है। बहुलता ऐसे ही लोगों की होती है जिनका सम्मेलन के उद्देश्यों की पूर्ति से कोई सरोकार नहीं होता।

तथापि हिन्दी को विश्व-मंच पर स्थापित करने और उसके प्रचार-प्रसार में वृद्धि के प्रयोजनवश आरम्भ किये गए विश्व हिन्दी सम्मेलनों की सफलता असंदिग्ध है। आज समूची दुनिया में हिन्दी का परचम लहरा रहा है। अकेले अमेरिका के ही लगभग 75 विश्वविद्यालयों में संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी का भी अध्यापन होता है। हिन्दी को बढ़ावा देते हुए बड़ी संख्या में नौकरी देने की बराक ओबामा की पहल से अमेरिका में हिन्दी की प्रतिष्ठा बढ़ी। संसार भर में वाचिक स्तर पर द्वितीय श्रेणी की भाषा बनती हिन्दी की ताक़त से प्रभावित होकर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हिन्दी के पठन-पाठन हेतु अपने देश की शालाओं में पर्याप्त धनराशि सुलभ करवायी।

यह गर्व की बात है कि चीनी के बाद हिन्दी ही विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व के सौ से अधिक देशों में भारतीय भाषाएँ बोलने वाले लोग निवासरत् तथा कार्यरत् हैं। लगभग 50 करोड़ से भी अधिक और संसार की कुल जनसंख्या में हर चैदहवाँ व्यक्ति हिन्दीभाषी है। पाँच करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग भारत से बाहर रहते हैं, पर इनमंे से पचहत्तर प्रतिशत लोग हिन्दी का उपयोग करते हैं। अपनी आजीविका अथवा महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत् मज़दूर हों या चिकित्सक, अभियन्ता, शिक्षक, लेखाकार आदि; सभी अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए अपनी भाषा के पैरोकार हैं। इससे अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी के प्रसार की सम्भावनाओं को बल मिलता है।

हिन्दी आज विश्व-बाज़ार की भाषा बन रही है। लेकिन हिन्दी-शिक्षा की व्यवस्था विश्व के कई देशों में बहुत पहले से है। बेल्ज़ियम विश्वविद्यालय में वर्ष 1950 से तथा पूर्वी जर्मनी में वर्ष 1955 से ही डुबोल्ट एवं मार्टिन लूथर किंग विश्वविद्यालय में हिन्दी-शिक्षण जारी है। पोेलैण्ड के वारसा विश्वविद्यालय तथा हंगरी के बुडापेस्ट विश्वविद्यालय में भी यह व्यवस्था पहले से ही लागू है। स्वीडन में वर्ष 1963 और फ्रांस में वर्ष 1964 से हिन्दी पढ़ायी जा रही है। जर्मनी के 14 विश्वविद्यालयों तथा ब्रिटेन के लन्दन, कैम्ब्रिज व माले विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी पढ़ायी जाती है। आस्टेªलिया के विद्यालयों मेें द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी भारतीय मूल के बच्चों में लोकप्रिय है। फिजी में नयी भाषा-नीति को स्वीकृति देकर देश भर के सभी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई का निर्णय किया गया। माॅरीशस मंे पहले से ही यह व्यवस्था लागू है। विश्व के अनेक देशों के विद्यालयों में अब हिन्दी पढ़ायी जाने लगी है। कथन का आशय यह कि विश्व हिन्दी सम्मेलनों की श्रृंखला आरम्भ होने के पूर्व से ही हिन्दी की शिक्षा ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि कई देशों में दी जाती रही है। लन्दन हिन्दी प्रचार परिषद् द्वारा ‘प्रवासिनी‘, साप्ताहिक अमरदीप, ‘मिलाप‘ आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता रहा है। चेकोस्लोवाकिया में तो हिन्दी का विशेष स्थान है। हिन्दी-साहित्य को चेक विद्वान डाॅ0 स्मैकल का योगदान भुलाया नहीं जा सकता।

आज पूरे विश्व के शिक्षण संस्थानों में हिन्दी अपना स्थान बना चुकी है। सऊदी अरब जैसे देश में बीस हज़ार से अधिक विद्यार्थी हिन्दी सीखते हैं। मिस्र में छह महीने की हिन्दी -प्रशिक्षण कक्षाओं मंे लोगों को स्थान नहीं मिल पाता। बीस लाख की आबादी वाले देश हंगरी में हिन्दी पुस्तकों के हंगेरियन अनुवाद सामने आए हैं। विदेशों में दूरस्थ प्रणाली से भी हिन्दी सीखने के प्रबन्ध किये जा रहे हैं। निश्चित रूप से हिन्दी विश्व में जड़ें जमा चुकी है। परन्तु भारत में वह अब तक राष्ट्रभाषा और राजभाषा के द्वन्द्व से ही नहीं उबर पायी है। प्रशासनिक क्षेत्र में तो वह पूर्णतः उपेक्षित है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति सम्मानजनक नहीं है। देश भर मेें पिछलेे सौ वर्षों में स्थापित केन्द्र सरकार के 47 विश्वविद्यालयों के अधिनियम और अध्यादेश हिन्दी में उपलब्ध नहीें हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी संस्था मीडिया स्टडीज़ ग्रुप द्वारा जारी की गई अध्ययन रपट के अनुसार केवल तीन विश्वविद्यालयों के संचालन सम्बन्धी अधिनियम व अध्यादेश विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। जबकि महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय सहित 11 विश्वविद्यालय ही अपने अधिनियम व अध्यादेशों का हिन्दी में आंशिक अनुवाद कर सके हैं। उत्तरप्रदेश स्थित राजीव गाँधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय वर्ष 2013 में स्थापित होने के बाद अब तक अपनी वेबसाइट नहीं बना पाने वाला एकमात्र केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। 46 विश्वविद्यालयों ने अपनी वेबसाइटें तो तैयार कर ली हैं लेकिन इनमें से केवल 29 विश्वविद्यालयों की वेबसाइट हिन्दी में है।

यह विडम्बना ही है कि आज़ादी के बाद से किसी भी सरकार ने हिन्दी के व्यापक विस्तार पर बल नहीं दिया। जब भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति दिलवाने की बात सामने आती है, अन्य भारतीय भाषाओं के पुरोधा अपनी-अपनी भाषा को राष्ट्र-भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए व्यग्र हो उठते हैं। उनके लिए ‘राष्ट्र ‘गौण हो जाता है, ‘क्षेत्रीयता‘ प्रमुख हो जाती है। इधर कुछ अरसे से हमारे राजनेता भी हिन्दी की खि़लाफत ही करते नज़र आते हैं। हाल ही में कर्नाटक रक्षणा वैदिक संगठन के सदस्यों ने बेंगलुरु मेट्रो स्टेशन पर लगे हिन्दी साइनबोर्ड को निशाना बनाते हुए उसपर काला रंग पोत दिया। एक रेस्तरां के हिन्दी में लगे बोर्ड को भी ख़राब कर दिया गया। कन्नड़ विकास प्राधिकरण ने पिछले दिनों राष्ट्रीयकृत,ग्रामीण और अनुसूचित बैंकों के क्षेत्रीय प्रमुखों को अपने सभी कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से कन्नड़ भाषा सीखने का निर्देश देने के लिए कहा है। इसके अलावा ग़ैर कन्नड़भाषी कर्मचारियों से अगले छह महीने के भीतर कन्नड़ सीखने को कहा गया है। यदि वे छह महीने में कन्नड़ सीखने में नाकाम रहे तो भर्ती नियमों के अनुसार उन्हें सेवामुक्त किये जाने का निर्देश भी दिया गया है।

अपनी-अपनी प्रान्तीय भाषा के प्रति राजनेताओं का अन्धा मोह भी हिन्दी के सामने चुनौतियाँ उपस्थित करता है। ये नेता प्रान्तीय भाषा के बल पर आगे नहीं बढ़े, न देश की राजनीति में चमके। मगर हिन्दी के विरोध में अपनी बात हिन्दी में रखते उन्हें लज्जा नहीं आती। पूर्व केन्द्रीय मन्त्री शशि थरूर ने तो स्पष्ट रूप से वर्तमान सरकार द्वारा आधिकारिक पत्र-व्यवहार और सोशल मीडिया में हिन्दी के उपयोग पर ज़ोर देने का विरोध करते हुए लेख लिखा है। वे अहिन्दीभाषी अफसरों के लिए हिन्दी सीखने और उसे अपनाने की बजाय अंग्रेज़ी में काम करने और अंग्रेज़ीभक्त बनने के पक्षधर हैं। राष्ट्र-भाषा के प्रति वर्षों से राजनेताओं की उदासीनता आज इस देश के लिए नासूर बन गई है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हिन्दी को न्याय की भाषा नहीं बनाना चाहते। उड़ीसा की विधानसभा में विधायकों के हिन्दी बोलने पर प्रतिबन्ध है। असम के ख्यातिलब्ध गायक जुबीन गर्ग को गुवाहाटी में प्रसिद्ध त्योहार बिहू पर आयोजित कार्यक्रम में हिन्दी गीत गाने से रोक दिया गया। हिन्दीतर प्रान्तों के शिक्षा-संस्थानों में हिन्दी बोलने पर विद्यार्थी दण्डित किये जाते हैं। जबकि रोज़ी-रोटी के लिए उक्त प्रान्तों के लोग हिन्दी-प्रदेशों की शरण ही लेते हैं। यह स्थिति चिन्ताजनक है।

दुःख इस बात का है कि हिन्दी अपने ही घर में बेगानी है। बेशक़ आज वह जिस स्थिति में है उसे वैश्विक दर्जा दिया जा सकता है। विश्व हिन्दी सम्मेलनों का सर्वप्रमुख उद्देश्य संयुक्त राष्ट्रसंघ मंे हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाना था। किन्तु पिछले सभी विश्व सम्मेलनों में यह प्रस्ताव दोहराया भर गया है। हिन्दी को मान्यता दिलवाने हेतु संयुक्त राष्ट्र की कार्यवधि नियमावली के नियम 51 मेें संशोधन आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, जब इसके कुल सदस्य देशों में से आधे से अधिक देश प्रस्ताव का समर्थन करें। इसके लिए विदेश मन्त्रालय की ओर से एडवोकेसी पेपर सभी सदस्य राष्ट्रों को भिजवाना होेता है। लेकिन आज तक इस प्रक्रिया के लिए गम्भीर प्रयास नहीं किये गए हैं।

हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने में विदेश मन्त्रालय और हमारे दूतावास महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन जिस तरह विभिन्न देशों के दूतावास अपनी राष्ट्रभाषा में निपुण होने के साथ-साथ सम्बन्धित देश की भाषा में भी दक्षता हेतु प्रयत्न करते हैं, भारतीय दूतावासों के अधिकारी-कर्मचारीगण वैसा नहीं करते। वे तो अपनी राष्ट्रभाषा की बजाय अंग्रेज़ी बोलकर ही गर्व का अनुभव करते रहते हैं। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में किसी विदेशी विद्वान ने प्रश्न भी किया था कि भारत की ओर से विदेशों में पदस्थ राजनयिक, दूतावास के अधिकारी और कर्मचारीगण अपनी राष्ट्रभाषा में कब बोलेंगे ? रूस, जापान व चीन के राजनयिक कूटनीतिक प्रयासों के लिए परस्पर अपनी राष्ट्रभाषा में ही संवाद करके मसौदा तैयार करते हैं और उसे अंग्रेज़ी भाषा में प्रस्तुत कर देते हैं। लेकिन भारतीय तो अपनी राष्ट्र भाषा की उपेक्षा कर अंग्रेज़ी में ही संवाद करके नीति तैयार करते हैं अतएव उनकी कार्रवाई में गोपनीयता नहीं रह पाती। यहाँ तो राष्ट्रपति तक को हिन्दी नहीं आतीं और अपने लम्बे कार्यकाल में वे हिन्दी सीखने का प्रयास तक नहीं करते तो यह कोई बड़ी बात नहीं। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में तो अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है। हमारे प्रौद्योगिकी क्षेत्र की भाषा पूरी तरह अंग्रेज़ी ही है। ऐसे में , विदेशों में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने का श्रेय उन्हें है जिन्होंने हिन्दी के पठन-पाठन को भारतीय संस्कृति के रूप में जीवित रखने का बीड़ा उठाया है।

ग़ौरतलब है कि संसार के कई प्रमुख देश अपनी भाषा-नीति के प्रति इतने दृढ़ और कटिबद्ध हैं कि वे प्रवासियों की भी परवाह नहीं करते। जबकि भारत में चाहे खेलों की वैश्विक स्पद्र्धा हो या अन्य कोई समारोह; विदेशी अतिथियों के संक्षिप्त प्रवास-काल में भी टैक्सी-आॅटोचालक तक अंग्रेजी बोलने का प्रशिक्षण लेने लगते हैं। विदेशी पर्यटक जान ही नहीं पाते कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा भी है। जबकि बिल गेट्स के माइक्रोसाॅफ़्ट ने आॅफ़िस 2003 ( हिन्दी ) पैकेज़ के माध्यम से यह साबित कर दिया है कि अंग्रेज़ी के ज्ञान के बिना भी कम्प्यूटर पर हिन्दी में सारे कार्य सम्भव हैं। हाल ही में ब्रिटिश सरकार ने अपने आव्रजन नियमों को सख़्त कर दिया है। तदनुसार, कुछ सरकारी दस्तावेज़ों एवं सरकारी साइनबोर्ड में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। कई देशों में विमान सेवा हेतु उन्हीं की भाषा में आव्रजन फार्म व अन्य दस्तावेज़ उपलब्ध कराना अनिवार्य है। मगर भारत अपनी गु़लामी की भाषा के व्यामोह से उबर नहीं पा रहा है। दसवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन समाप्त होने के बाद एक माह भी नहीं बीता होगा कि मध्यप्रदेश में व्यावसायिक परीक्षा मण्डल का नाम बदलकर ‘प्रोफे़शनल एक्ज़ामिनेशन बोर्ड ‘रख दिया गया। यह विडम्बना नहीं तो क्या है !

वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी का नया स्वरूप उभरकर सामने आया है। विश्व के समूचे व्यापार का 17 प्रतिशत से अधिक हिन्दी, टेलीविज़न चैनल्स एवं फ़िल्मों पर अवलम्बित है। हाॅलीवुड में जापान के बाद सबसे बड़ी संख्या हिन्दी में निर्मित फ़िल्मों की है। सूचना-माध्यम, टेलीविज़न, एफ़एम रेडियो, इण्टरनेट और मोबाइल फ़ोन के ज़रिए हिन्दी -अंग्रेज़ी खिचड़ी एसएमएस की भाषा ने हिन्दी के मानक स्वरूप को पीछे धकेलते हुए शक्तिशाली सम्प्रेषण-माध्यम होनेे का प्रमाण दिया है। हालाँकि यह ग्लोबल होती हिन्दी का अक्स है, जिसे बाज़ार ने प्रश्रय दिया है। हिन्दी अब जीने के लिए एक ज़रूरी भाषा का रूप लेती जा रही है। इसीलिए अमेरिकी प्रशासन और बराक ओबामा ने हिन्दी सीखने के लिए हज़ारों की गिनती में हिन्दी भाषाई लोगों को भर्ती करने की योग्यता को स्वीकृति देना ठीक समझा था। विश्वनाथ त्रिपाठी का मानना है कि उपभोक्तावाद और पाश्चात्य संस्कारों के प्रभाव में विकसित खिचड़ी भाषा हिन्दी को विकृत कर रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के वर्चस्व से भारत में भारतीय भाषाओं का विकास भी बाधित हुआ है क्योंकि ये कम्पनियाँ अंग्रेज़ी में ही कार्य करती और करवाती हैं।

निश्चित रूप से वैश्वीकरण और औद्योगिक तकनीक के दौर में हिन्दी भाषा में दक्षता और किसी भी रूप में अमेरिकावासियों की माँग से हिन्दी की अहमियत को बढ़ावा मिलेगा। अभी तक हिन्दी को बाज़ार की ताक़त के रूप में जाना गया, पर वह आर्थिक स्वावलम्बन का आधार भी है। रोज़गार के अवसरों की सुलभता हिन्दी को विश्व-भाषा की दिशा में ले जा सकती है। हमारे राजनेताओं को इस बारे में सोचना चाहिए। देश व विदेश में भी हिन्दी सम्पर्क व बाज़ार की भाषा के साथ-साथ जब रोज़गार की भाषा बनेगी ,तभी वह देश व दुनिया में सहज स्वीकृति प्राप्त कर सकेगी। संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने से पहले हिन्दी को देश के सरकारी कामकाज की भाषा बनाना होगा। इसके अलावा ऐसा वातावरण निर्मित करना होगा जिससे विश्व के सभी देशों में स्थापित हमारे दूतावास तथा हमारे यहाँ स्थापित विदेशी दूतावासों को यह आभास हो कि हिन्दी -ज्ञान के बिना संवाद सम्भव नहीं है। इसके बाद ही विश्व-भाषा के लिए हिन्दी की राह आसान होगी। इस दिशा में भारत को सार्क देशों से पहल करनी चाहिए। भारत, नेपाल, बाँग्ला देश, भूटान, श्रीलंका जैसे मुख्य सार्क देशों के राजनयिक व नौकरशाह हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में अपना लें तो संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकृति आसान हो सकती है। आर्थिक स्वावलम्बन का आधार भी हिन्दी को विश्व-भाषा का सम्मान दिला सकता है।

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