‘92 में मस्जिद ढ़हाने वाला कारसेवक अब है मोहम्मद आमिर! – सुनील अमर

5:14 pm or January 11, 2018
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‘92 में मस्जिद ढ़हाने वाला कारसेवक अब है मोहम्मद आमिर!

—सुनील अमर—-

पच्चीस साल पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढ़हाने में अग्रणी रहा कारसेवक बलबीर सिंह, आज मोहम्मद आमिर है और वह अपने उस ‘कुकृत्य’ के प्रायश्चित स्वरुप अब जीर्ण-शीर्ण हो चुकी मस्जिदों के पुनर्निर्माण में लगा हुआ है। बलबीर सिंह से मोहम्मद आमिर बनने की उसकी गाथा न सिर्फ पारिवारिक संस्कारों और मूल्यों की गहराई को रेखांकित करती है बल्कि यह व्यक्ति मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का भी विषय हो सकता है। हरियाणा के पानीपत शहर के निकट के एक गाॅंव में एक कट्टर गाॅंधीवादी अध्यापक के घर जन्मे बलबीर सिंह ने समाज की उपेक्षा से खिन्न हो कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बनने, अयोध्या में 06 दिसम्बर को मस्जिद के गुम्बद पर सबसे पहले चढ़ने वालेे समूह का कारसेवक बनने और फिर अपने ‘इस कृत्य’ और पिता की घोर नाराजगी से शर्मिन्दा होकर धर्म परिवर्तन करने की अपनी कहानी को मुम्बई मिरर अखबार से साझा किया है।

‘मैं एक राजपूत घराने में पैदा हुआ था। पिता दौलतराम ने देश के बॅटवारे की खूनी त्रासदी को झेला था। वे गाॅंधीवादी थे और उन्होंने जीवन भर इस बात की कोशिश की थी कि उनके क्षेत्र के मुसलमान भयमुक्त रह सकें और वे चाहते थे कि उनके बेटे भी उन्हीं की राह पर चलें। मेरे तीन और भाई हैं। स्थानीय स्तर की पढ़ाई के बाद पिता परिवार को पानीपत ले आए ताकि हमलोगों की आगे की पढ़ाई हो सके। पानीपत आने पर हमलोगों को सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा। क्योंकि हम ग्रामीण परिवेश से आये थे, इसलिए शहरी लड़के हमारे रहन-सहन को लेकर मजाक उड़ाते थे और हमें अपने साथ खेलने नहीं देते थे। ऐसे में एक दिन मैं वहाॅं संघ की स्थानीय शाखा में गया तो वहाॅं के लोगों ने मुझसे ‘आप’ कहकर बातें की जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ और उन सबके इसी व्यवहार ने मुझे संघ से पक्का जोड़ दिया।’ बलवीर, जो कि अब मोहम्मद आमिर हैं, ने बताया।

बाद में बलवीर शिवसेना में चला गया। इसी दौरान उसने रोहतक के महर्षि विश्वविद्यालय से तीन विषयों- अॅंग्रेजी, राजनीति शास्त्र और इतिहास में स्नातकोत्तर भी किया। उसकी शादी हो गई और वह अपने भाईयों के साथ पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बॅटाने लगा। ये सब होने के बावजूद उसके घर में उसको लेकर एक खिन्नता सी रहती थी क्योंकि एक गाॅंधीवादी के घर में वह एक ‘चढ्ढ़ीवाला’ था। बलवीर बताता है कि उसके पिता मूर्तिपूजा के विरोधी थे इसलिए वे सब भी कभी मन्दिर नहीं गए। घर में गीता की एक पुस्तक थी जरुर लेकिन उसने उसे कभी भी पलटा तक नहीं था। बावजूद इसके वर्ष 1990 के बाद से उसे बहुत सी ऐतिहासिक गल्तियांे पर गुस्सा आने लगा था जिनमें बाबर, औरंगजेब और ऐसे ही अन्य विजेता थे। इसके साथ ही वह बताता है कि वे लोग जिस ग्रामीण परिवेश से आये थे वह भी काफी हद तक उसे धार्मिक कट्टर बनाने में जिम्मेदार था। वहाॅं तो अगर बाॅंऐं हाथ से रोटी तोड़ ली जाय तो देखने वाला तपाक से कहता था- अरे तू मुसलमान है क्या? ऐसे में वह कहता है कि इन भावनाओं के चलते उसका ‘ब्रेन वाॅशिंग’ कर लेना आसान ही था और यही हुआ भी। मेरे मन में यह बात घर कर गई कि ये मुसलमान बाहर से आए और हमारी जमीनें छीनकर हमारे मन्दिरों को ध्वस्त किया और फिर हरियाणा जैसे राज्य में जहाॅं मर्दानेपन को खासा महत्त्व दिया जाता है, मेरे मन में भी यह था कि कुछ ऐसा करुॅं कि लोग मुझे भी मर्द समझें। वह बताता है कि दिसम्बर 1992 के पहले सप्ताह में जब वह अयोध्या जाने लगा तो उसके संगी-साथियों ने कहा कि कुछ करके ही वापस आना।

पाॅंच दिसम्बर के दिन को याद कर बलबीर बताता है कि उस दिन अयोध्या और फैजाबाद पर विहिप के लोगों की ही हुकूमत चल रही थी। हम लोग हजारों कारसेवकों के साथ थे। वहाॅं आडवाणी जी थे लेकिन उनको हम लोग हिन्दू ही नहीं मानते थे क्योंकि सिन्धी होने के कारण वे भगवान झूलेलाल की पूजा करते थे। उमा भारती को हम लोग नौटंकीबाज मानते थे। मैं अपने अभिन्न मित्र योगेन्द्र पाल के साथ था और हम सभी लोग कुछ करने को अधीर हो रहे थे। वह बताता है कि उस दिन वह एक जानवर जैसा हो गया था और मस्जिद तोड़ने के अलावा उसे और कुछ सूझ नहीं रहा था। वह याद करके बताता है कि कैसे उसने बीच वाले गुम्बद पर पहली हथौड़ी मारी थी। वह जब योगेन्द्र पाल के साथ पानीपत वापस लौटा तो उनका भव्य स्वागत किया गया। वे लोग विध्वंस के चिह्न के तौर दो ईंटें ले आए थे जिन्हें पानीपत के शिवसेना कार्यालय में रख दिया गया।

वह जब घर गया तो उसके इसके कुकृत्य से क्रोधित और दुःखी पिता ने ऐलान कर दिया कि या तो ये घर में रहेगा या मैं। बलवीर बताता है कि मैंने कहा कि मैं ही घर छोड़ देता हॅूं। मेरी पत्नी वहीं खड़ी थी लेकिन उसने जब मेरे बारे में कुछ नहीं कहा तो मैंने अकेले ही घर छोड़ दिया। और फिर कई महीनों तक इधर-उधर छिपता रहा कि कहीं मुसलमान मुझे देख न लें। इसी बीच पिता के निधन की खबर सुनकर वह घर लौटा तो पाया कि बाकी घरवाले भी उसके खुश नहीं हैं और उसके पिता ने तो साफ-साफ कह रखा था कि बलवीर को उनकी अर्थी भी छूने न दिया जाय। बलवीर को सदमा लगा लेकिन इससे भी बड़ा सदमा उसे तब लगा जब उसने सुना कि उसका मित्र और बाबरी मस्जिद विध्वंस में उसका जोड़ीदार योगेन्द्र पाल अब इस्लाम कबूल कर मुसलमान बन गया है। वह जब योगेन्द्र से मिलने गया तो उसने बताया कि अयोध्याकांड के बाद से देश भर में फैले दंगों, हत्या और हिंसा की वजह से वह अपने आपको अपराधी महसूस कर रहा था इसलिए प्रायश्चित स्वरुप उसने इस्लाम अपना लिया। जून 1993 में बलवीर भी सोनीपत के मौलाना कलीम सिद्दीकी से मिला जिन्होंने योगेन्द्र को इस्लाम कबूल कराया था और बलवीर भी मुसलमान बन गया। बलवीर याद कर बताता है कि उसकी बातों को सुनकर मौलाना ने सिर्फ यही इतना कहा कि ठीक है कि उसने एक मस्जिद को तोड़ा है लेकिन वह चाहे तो सैकड़ों मस्जिदों का जीर्णोद्धार कर सकता है। बलवीर यानी अब मोहम्मद आमिर तब से इसी काम में लगा हुआ है। इस बीच उसने कुछ ऐसे भी काम किए जिसकी तरफ मनोवैज्ञानिकों का ध्यान एकदम से अपेक्षित है- उसके बड़े भाई की पत्नी का देहान्त हो गया तो उसने अपनी पत्नी जो कि चार बच्चों की माॅ है, से कहा कि वह उसके भाई से शादी कर ले ताकि उसके भाई के बच्चों को भी माॅं मिल जाय और उसके साथ ही इस्लाम अपना चुके उसके भाई ने उसकी पत्नी से शादी कर ली। इसके कुछ अरसा बाद बलवीर उर्फ आमिर ने एक विधवा स्त्री शहनाज बेगम से निकाह कर लिया। बलवीर याद कर बताता है कि वर्ष 1993 से लेकर अब तक उक्त मौलाना के वलीवुल्लाह ट्रस्ट के तहत उसने 40 से भी अधिक मस्जिदों का पुनर्निर्माण किया है। वह बताता है कि उसने ऐसी कई मस्जिदों में मदरसा भी शुरु किया है क्योंकि मुसलमान कौम को प्रायः ही उसके कम शिक्षित होने की वजह से नुकसान उठाना पड़ता है। इस प्रकार बलवीर 25 साल से अपने एक गुनाह का प्रायश्चित कर रहा है।

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