आस्था-इबादत का शोर क्यों ? – डाॅ0 गीता गुप्त

5:50 pm or January 16, 2018
loud-speakers-at-religious-places_factly

आस्था-इबादत का शोर क्यों ?

डाॅ0 गीता गुप्त

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के निर्देश के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने ध्वनि-प्रदूषण पर नियंत्रण हेतु सार्वजनिक स्थानों पर लगे ध्वनि विस्तारक यन्त्रों के सम्बन्ध में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया है। दिसम्बर 2017 में स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की ओर से धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई थी। जिसपर निर्णय सुनाते हुए न्यायालय ने महत्त्वपूर्ण निर्देश दिये। 20 दिसम्बर को उच्च न्यायालय ने राज्य में ध्वनि-प्रदूषण नियंत्रण में विफलता को लेकर रोष व्यक्त करते हुए राज्य-सरकार से पूछा था कि क्या प्रदेश के सभी धार्मिक स्थलों, मन्दिरों, मस्ज़िदों, गुरुद्वारों या अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगे लाउड स्पीकर सम्बन्धित अधिकारियों से अनुमति लेने के बाद लगाये गए हैं ?

इसके जवाब में सरकार ने लाउड स्पीकर के सर्वेक्षण हेतु दस पृष्ठों का प्रोफार्मा जारी किया है और स्थायी रूप से लाउड स्पीकर लगाने की अनुमति लेने का फार्म तथा जिन लोगों ने एतदर्थ अनुमति नहीं ली है, उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई का विवरण देने हेतु कहा है। न्यायालय ने प्रमुख सचिव गृह एवं उत्तरप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन को ये सभी जानकारी अपने व्यक्तिगत हलफ़नामे के ज़रिये 1 फ़रवरी तक प्रस्तुत करने का आदेश दिया था और दोनों को चेतावनी दी थी कि ऐसा न करने की स्थिति में दोनांे अधिकारियों को अगली सुनवाई के समय व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा।

ज्ञातव्य है कि ध्वनि-प्रदूषण नियमन एवं नियंत्रण नियमन 2000 में यह प्रावधान है कि आॅडिटोरियम, काॅन्फ्रेन्स रूम, कम्युनिटी हाॅल जैसे बन्द स्थानों को छोड़कर रात 10 बजे से प्रातः छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यन्त्रों का उपयोग नहीं किया जाएगा। हालांकि राज्य सरकार को यह छूट है कि वह एक कैलेण्डर वर्ष में अधिकतम 15 दिनों के लिए सांस्कृतिक या धार्मिक अवसरों पर रात 10 बजे से रात 12 बजे के बीच ध्वनि-प्रदूषण कम करने की शत्र्तों के साथ लाउड स्पीकर बजाने की छूट दे सकती है।

ध्वनि-प्रदूषण नियंत्रण हेतु न्यायालय में गुहार का यह पहला मामला नहीं है। त्योेहारों का मौसम आते ही ध्वनि-प्रदूषण की बाढ़ का आगमन सुनिश्चित हो जाता है और इस सम्बन्ध में न्यायालयीन निर्देश भी जारी हो जाते हैं। वर्ष 1985 से ही यह सिलसिला चला आ रहा है। इसका सम्पूर्ण श्रेय मुम्बई के विले पार्ले में प्रैक्टिस करने वाले डाॅ0 यशवन्त त्रिम्बक ओक को है। जिन्हंे वर्ष 1979 में एक जर्मन वैज्ञानिक की शोेध-रपट से पता चला कि ध्वनि-प्रदूषण या शोर से रक्तचाप होता है। उसी दौरान उनके घर के सामने मिल कम्पाउण्ड में एक औद्योगिक इकाई लगी। जिसका शोर उस रिहायशी इलाके के लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक था। अतः उन्होंने उस इकाई के लाइसेन्स का नवीनीकरण नहीं होने दिया। फिर वर्ष 1985 में उन्होंने अपने चिकित्सक एवं अधिवक्ता मित्रों के साथ मिलकर गणेशोत्सव में लगने वाले ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के विरुद्ध याचिका लगाई कि इन्हें रात 11 बजे केे बाद बन्द कर दिया जाना चाहिए।

अन्ततः निर्णय डाॅ0 ओक के पक्ष में आया और पर्यावरण- संरक्षण क़ानून के तहत पहली बार ध्वनि-प्रदूषण पर एक लाख रुपए के अर्थदण्ड सहित पाँच वर्ष तक कारावास के दण्ड का प्रावधान किया गया। देश में पहली बार इस तरह का क़ानून अस्तित्व में आया। बाद में उनकी ही याचिका पर वर्ष 2003 में ध्वनि-प्रदूषण सम्बन्धी वर्ष 2000 के क़ानून में संशोधन किया गया। इसके बाद वर्ष 2010 में मुम्बई के उपनगरीय इलाके ठाणे में कार्यरत् डाॅ0 महेन्द्र बेडेकर ने त्योहारों पर होने वाले ध्वनि-प्रदूषण के सन्दर्भ में मुम्बई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसपर लम्बी प्रतीक्षा के उपरान्त आने वाला निर्णय सभी धर्माें व प्रार्थना-स्थलों पर समान रूप से लागू होता है। तदनुसार, कोई भी धर्म लाउड स्पीकर लगाने को अपना मौलिक अधिकार नहीं कह सकता।

भारत उत्सवधर्मा देश है। यहाँ उत्सव मनाने के दौरान और आम तौर पर भी लाउड स्पीकर का जितना दुरुपयोग किया जाता है, उससे शान्तिप्रिय लोगों को ही नहीं वरन् विद्यार्थियों, बच्चांे, बुज़ुर्गों और रोगियों को भी घोर असुविधा होती है। परन्तु कभी उत्सव या धार्मिक आयोजन समितियों का ध्यान इस ओर नहीं जाता। धार्मिक पर्व-त्योहार तो पहले भी मनाये जाते थे लेकिन आज इनका स्वरूप बहुत भव्य और आडम्बरप्रधान हो गया है। अस्तु, प्रदर्शनप्रिय मनुष्यों की आस्था का शोर ध्वनि-प्रदूषण बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण को गम्भीर क्षति पहुँचा रहा है। मगर किसी धार्मिक आयोजन या उपासना-पद्धति के कारण होने वाले ध्वनि-प्रदूषण पर आपत्ति दर्ज करवाना तो दूर, टिप्पणी करना भी आज सर्वथा अनुचित माना जाता है। जबकि इसके गम्भीर दुष्परिणाम सामने आते हैं।

विचारणीय है कि पर्व-त्योहार मानव-जीवन में आनन्द, उत्साह, स्फू़़र्ति, सुख और सौहार्द्र का संचार करते हैं। उनमें अद्भुत सन्देश निहित होता हैै। वे प्रयोजनमूलक होते हैं। बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की परम्परा का सूत्रपात जिस उद्देश्य से किया था, आज वह कहाँ दिखाई देता है ? गणपति बप्पा बुद्धि-विधाता हैं लेकिन उन्हंे गली-गली और घर-घर स्थापित कर जिस तरह लाउड स्पीकर पर ‘बीड़ी जलई ले जिगर से पिया या सरकाय लो खटिया और मुन्नी हुई बदनाम‘ जैसे भोंडे फ़िल्मी गीत सुनवाये जाते हैं, उससे क्या देवता प्रसन्न होंगे ? कृष्ण-जन्माष्टमी, नवरात्र या किसी भी पर्व- अनुष्ठान, शोभा-यात्रा, विसर्जन, रतजगे आदि के कार्यक्रम में इतना शोर होता है कि अब ये आयोजन ध्वनि-प्रदूषण के पर्याय हो गए हैं। धार्मिक आयोजनों में लाउड स्पीकर और डी जे का उपयोग तो अब सामान्य बात है। इनके विरुद्ध आवाज़ उठाना धर्मविरुद्ध कार्य माना जाता है और शिकायत करने पर प्रशासन और पुलिस भी इसे संवेदनशील मामला मानकर कोई कार्रवाई नहीं करती।

सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि रात्रि दस बजे से लेकर सुबह छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यन्त्र का उपयोग निषिद्ध है तथापि इसका पालन नहीं किया जाता। गत वर्ष नवरात्र में दुर्गा माता की शान में दिन-रात बजते लाउड स्पीकर के शोर ने एक बीमार बुज़ुर्ग की जान ले ली थी। उनके परिजन ने काॅलोनी में हो रहे धार्मिक आयोजन-स्थल पर जाकर आयोजकों से बुजुर्ग के स्वास्थ्य की दुहाई देते हुए शोर कम करने का विनम्र आग्रह किया था, पर वे नहीं माने। अंततः जिस दिन धूमधाम से माता के विसर्जन हेतु झाँकी निकाली गई, उसी दिन बुज़ुर्ग की जीवन-लीला समाप्त हो गई। यह कोई संयोग या दुर्योग मात्र नहीं है, इससे हमें सबक़ लेना चाहिए।

कबीरदास ने लिखा भी है-काँकर-पाथर जोरि के, मसजिद लई बनाय/ ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय? पिछले वर्ष गायक सोनू निगम द्वारा अजान को लेकर दिये गए बयान को अन्यथा ले लिया गया जबकि वर्ष 2005 में ही उच्चतम न्यायालय ने मन्दिर-मस्ज़िद सहित सभी धार्मिक स्थलों पर रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यन्त्रों का उपयोग प्रतिबन्धित कर दिया है। लेकिन ऐसे निर्देशों की अवमानना इस देश में कोई बड़ी बात नहीं। मेरी एक मुस्लिम सखी ने बताया कि पुराने ज़माने में सबके घरों में घड़ियाँ नहीं होती थीं; ऐसे में लोग लाउड स्पीकर पर अजान की आवाज़ सुनकर ही धार्मिक प्रक्रिया सम्पन्न करते थे। लेकिन आज तो सबके घरों में घड़ी, चलभाष, दूरभाष और अन्य सुविधाएँ हैं, फिर भी मस्ज़िदों मंे अजान की गूँज सुनाई देती है। गुरुद्वारों में भी सबद और गुरुवाणी तेज़ आवाज़ में सुनी जा सकती है।

ध्वनि-प्रदूषण का सम्बन्ध केवल मन्दिर, मस्ज़िद, चर्च या गुरुद्वारा से नहीं है। यह हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई या सिक्खों का भी मामला नहीं है। सभी धर्मों और धार्मिक स्थलों का सम्मान बराबर है परन्तु इनमें होने वाले धार्मिक आयोजनों में भक्ति-भावना के प्रदर्शन हेतु ध्वनि-विस्तारक यन्त्रों के उपयोग के औचित्य पर प्रश्नचिह्न है। हमारी पूजा-उपासना, भक्ति-भावना यदि दूसरों के जीवन की शान्ति को भंग करती है, उनके जीवन में बाधा उत्पन्न करती है तो इसका सुफल हमें कैसे मिल सकता है ? किसी भी धर्म में दूसरों को पीड़ा पहुँचाना पाप माना जाता है। फिर ध्वनि-प्रदूषण फैलाते समय यह लोगों के ध्यान में क्यों नहीं आता ? मन्दिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारों और तमाम धार्मिक स्थलों पर निरन्तर आस्था का शोर होता रहता है जो दूसरों के जीवन को बाधित करता है। तो ऐसी प्रार्थना या उपासना क्या सार्थक हो सकती है ?

वर्ष 2016 में मुम्बई उच्च न्यायालय ने एक मामले में महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा था कि कोई भी धर्म लाउड स्पीकर लगाने को अपना मौलिक अधिकार नहीं बता सकता। ध्वनि प्रदूषण-नियंत्रण से जुड़े नियम सभी धर्मों एवं प्रार्थना-स्थलों पर लागू होते हैं। कोई धर्म बिना पुलिस और प्रशासन की अनुमति के अपने कार्यक्रमों में लाउड स्पीकर का उपयोग नहीं कर सकता है। ध्वनि विस्तारक यन्त्र के उपयोग की अनुमति किसे देनी है, किसे नहीं-इसका निर्णय पुलिस स्वविवेक से करेगी।

मुम्बई न्यायालय ने निर्माण-कार्य से होने वाले ध्वनि-प्रदूूषण को भी गम्भीरता से लिया और वाहनों से होने वाले शोर-शराबे पर भी कड़ी आपत्ति जतलायी। तदनुसार, सरकार निर्माण-कार्य की गतिविधियों से उत्पन्न ध्वनि-प्रदूषण रोकने हेतु तीन माह के भीतर नियमावली बनाये। साथ ही जिन वाहनों का हाॅर्न तेज़ है अथवा अलग ध्वनि है, उनके विरुद्ध भी सख़्त कार्रवाई करे। न्यायमूर्तिद्वय श्री अभय ओक व श्री ए0 ए0 सैयद की खण्डपीठ ने ध्वनि-प्रदूषण सम्बन्धी शिकायतों के निवारण हेतु प्रभावी व्यवस्था करने पर भी बल दिया और प्रत्येक त्योहार के पूर्व इस सम्बन्ध में व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता जतलायी। उन्होंने यह तथ्य भी उजागर किया कि शासकीय अधिकारियों को ध्वनि-प्रदूषण फैलाने वाले लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए परन्तु वे इसमें असमर्थ ही होते हैं। उनकी असमर्थता आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। खण्डपीठ ने ध्वनि-प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों के लिए नगरपालिकाओं में एक अलग प्रकोष्ठ के गठन की राय भी दी थी।

उल्लेखनीय है कि इज़राइल सरकार ने हाल ही में क़ानून बनाकर मस्ज़िदों में लाउड स्पीकर पर अज़ान को प्रतिबन्धित कर दिया है। चीन में भी लाउड स्पीकर पर अज़ान प्रतिबन्धित है। फ़िलहाल, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा ध्वनि-प्रदूषण-नियंत्रण की दृष्टि से उठाये गए क़दम की आलोचना की जा रही है, परन्तु इस मुद्दे पर धार्मिक दृष्टि की बजाय पर्यावरण के नज़रिये से विचार किया जाना चाहिए। यह राजनीतिक या धार्मिक मुद्दा न होकर विशुद्ध रूप से पर्यावरणीय एवं सामाजिक मुद्दा है जिसका निराकरण सम्बन्धित समुदाय अपनी समझदारी से भी चाहें तो कर सकते हैं, जैसेकि उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद के एक गाँव थिरियादान के लोगों ने किया।

भगतपुर थाना के थिरियादान गाँव में ग्राम प्रधान सुनीता रानी की उपस्थिति में पूरे गाँव की पंचायत बुलायी गई। जिसमें कहा गया कि ‘‘गीता हो या क़ुरान, किसी में भी यह नहीं लिखा कि ऊपर वाले की इबादत लाउड स्पीकर से ही होनी चाहिए।‘‘ पंचायत के बाद हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदाय के लोगों ने अपने-अपने धार्मिक स्थलों से लाउड स्पीकर उतार लिये और भविष्य में भी किसी धार्मिक आयोजन में इसका प्रयोग निषिद्ध कर दिया। उन्होंने इस आशय का वचनपत्र थाने में भी दे दिया। उनके इस निर्णय की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है। निश्चित रूप से समूचे देश में सभी धर्मावलम्बियों के लिए यह अनुकरणीय है।

वस्तुतः ध्वनि-प्रदूषण का मामला किसी एक राज्य का नहीं है। त्योहार तो पूरे देश में मनाये जाते हैं और धार्मिक आयोजन सभी जगह होते हैं। जुलूस, राजनीतिक प्रदर्शन, विवाह और पूजा-पाठ के लिए दल-बल सहित तेज़ ध्वनि में बजते बैण्ड बाजे व ताम-झाम के साथ सभी जगह लोेग निकलते हैं। इनसे तथा धर्मस्थलों पर प्रतिदिन लाउड स्पीकर पर तेज़ आवाज़ में प्रार्थना से लोगों को सर्वत्र परेशानी होती है। अतः इस सम्बन्ध में क़ानून की आवश्यकता समूचे देश को है। लाउड स्पीकर के उपयोग से मेरा कोई विरोध नहीं है, न ही किसी धर्म की प्रार्थना या पर्व-त्योहार मनाने को लेकर कोई आक्षेप है। मेरे कथन का आशय मात्र इतना है कि क्या हम बिना शोर-गुल के सुसंस्कृत रीति से दूसरों की सुविधा-असुविधा, परेशानियों-कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए अपने धार्मिक क्रियाकलाप सम्पन्न नहीं कर सकते ? और यह भी कि ध्वनि-प्रदूषण नियंत्रण क़ानून की आवश्यकता किसी राज्य विशेष को ही नहीं वरन् पूरे देश को है, इस पर सरकार को विचार करना चाहिए। निरन्तर बढ़ता ध्वनि-प्रदूषण हम सबके स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त घातक है, यह किसी को नहीं भूलना चाहिए। निश्चित रूप से सभी धर्म के लोगों को ध्वनि-प्रदूषण पर विराम लगाने के साथ-साथ स्वास्थ्य की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द्र भी सुनिश्चित करना चाहिए। यह नितान्त आवश्यक है।

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in