मर-मर कर क्यों जीत रही है टीबी – शब्बीर कादरी

5:04 pm or January 27, 2018
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मर-मर कर क्यों जीत रही है टीबी

— शब्बीर कादरी —

उन्नत अनुसंधानों, अत्यधिक आधुनिक तकनीकों, योजनाकारों की अनगिनत कुशल रणीनीतियों और प्रभावशाली योजनाओं के बावजूद इन दिनों विश्वभर में तपेदिक का रोग अपना ऐसा भयावह रौद्ररूप दिखा रहा है जिसके चलते मानव समुदाय को इस जानलेवा रोग के समक्ष घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ रहा है ओर यही कारण है कि वर्ष 2015 में 217 देशों के 14 वर्ष की उम्र तक 2,39,000 बच्चों की मृत्यु तपेदिक के कारण हो चुकी है इनमें से 80 प्रतिशत पांच वर्ष से कम आयु के थे। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में इस रोग के एक करोड़ चार लाख नए प्रकरण दुनियाभर में सामने आए। इन नए प्रकरणों में लगभग सत्तर प्रतिशत भागीदारी भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान, नाईजीरिया व दक्षिण अफ्रीका की है। इन दिनों भारत में यह रोग जनस्वास्थ्य की प्रमुख चिंता के रूप में उभर रहा है क्योंकि तपेदिक के 27.9 लाख मामलों और 4.23 लाख मौत तथा प्रति एक लाख लोगों में से लगभग 211 का इस रोग के संक्रमणग्रस्त हो जाने की जानकारी ने भारत को इस समय विश्व में सर्वाधिक टीबी रोगियों की संख्या वाला देश बना दिया है।

इन्हीं चिंताओं के चलते केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कहा गया है कि देश से तपेदिक को वर्ष 2025 तक पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी चरम पर है क्योंकि इसके सम्पूर्ण उन्मूलन किए जाने हेतु विश्व के सभी देश वर्ष 2030 तक की सीमा तय कर चुके हैं। इस तैयारी में वर्ष 2020 तक भारत 12,327 करोड़ रू. व्यय करेगा। कहा गया है कि देश के समक्ष क्षय रोग के उन्मूलन के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसे रोगियों तक पहुंचना है जिनकी पहचान नहीं हो पाती है। इसी के तहत सरकार अब क्षयरोग के प्रत्येक रोगी को राशि रू. 500 की मासिक आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराने की योजना साकार करने वाली है जिससे वे बीमारी से उबरने तक अपने लिए पोशक आहार क्रय कर उपभोग कर सकें। यह राष्ट्रीय रणनीतिक योजना का एक हिस्सा है। ऐसा इसलिए भी किया जा रहा है कि अभी हमारे यहां पांच लाख लोग प्रतिवर्ष और हर तीन मिनट में दो भारतीयों की मौत तपेदिक के चलते हो रही है, इनमें से अधिसंख्य कुपोषण और पोष्टिक आहार की अनुपलब्धता के चलते भी हो रहा है।

राष्ट्रीय तपेदिक कार्यक्रम हमारे यहां वर्ष 1964 से चलाया जा रहा है और वर्ष 1997 से संशोधित तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम भी गतिमान है जिसमें देशी वित्तीय सहयोग के साथ विदेशी ऋण के साथ भी धन की कमी नहीं आने दी जा रही है फिर भी हमें इस दिशा में सफलता की जिस ऊंचाई तक हमें पहुंच जाना था वह मंजिल अभी हमसे ओझल ही है। देशी आर्थिक सहयोग और विदेशी ऋण रूपी विशाल राशि का एक भाग हमारे यहां पांच सितारा होटलों में तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम पर रणनीति बनाने और कई एनजीओ के कर्ताधर्ताओं की नियोजित परियोजनाओं के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की भेंट चढ़ जाता है। चिंतनीय यह भी है कि जो धन सीधे चिकित्सालय पहुंच कर रोगियों तक पहुंच जाना था वह संस्थाओं के माध्यम से कितना, कब और कहां तक पहुंच भी पाता है या नहीं। दरअसल विश्वभर में इस बीमारी पर प्रतिवर्ष लगभग 170 अरब रू. से अधिक की राशि खर्च हो जाती है और आपेक्षिप लाभ मिल नहीं पाता है। इस रोग ने एक गंभीर सामाजिक चिंता भी पैदा की है कि प्रतिवर्ष लगभग दो लाख से अधिक महिलाओं को उनके पतियों द्वारा छोड़ दिया जाता है जबकि मां या बाप की मृत्यु हो जाने पर कई लाख बच्चे प्रतिवर्ष स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर घर से भाग जाते हैं।

हाल ही में एम्स के सहयोग से इंटरनेशनल संेटर फाॅर इंजीनियंिग एंड बाॅयोलाॅजी के वैज्ञानिकों ने एक शोध के आधार पर यह रहस्य सुलझाया है कि टीबी के बैक्टीरिया इंसान के शरीर में आखिर पनपते कैसे हैं। वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि मानव शरीर में मौजूद वे 44 प्रोटीन इस रोग के लिए जवाबदार हैं जो तपेदिक के वायरस को खुराक उपलब्ध कराते हैं यदि ये प्रोटीन मानव शरीर की किसी महत्वपूर्ण गतिविधि का कारक नहीं हैं तो इन पर चोट कर तपेदिक वायरस पर प्रहार किया जा सकता है। दरअसल इस रोग के जीवाणुओं ने भी शक्तिशाली प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है जो दवाई के एन्टीबायोटिक प्रभाव को शून्य कर देता है। यद्यपि अनेक शोध और अनुसंधान इस पर नियंत्रण के लिए तैयारी में हैं।

कुल मिलाकर तेजी से बढ़ते और अनियंत्रित होते इस रोग ने न केवल हजारों की तादाद में देशवासियों को प्रतिवर्ष अपनी जान गंवाने पर मजबूर किया है बल्कि इसके नियंत्रण पर भी कई अरब रू. प्रतिवर्ष व्यय भी किए जा चुके हैं। क्योंकि गरीबी और पौष्टिक भोजन की कमी इस रोग का आधार है अतः बड़े पैमाने पर तपेदिक के रोगियों का हमारे देश में पाया जाना अवश्यंभावी है, कारण वही गरीबी है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पग-पग पर हमारी उस प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति को मुंह चिढा़ती है जिसके चलते अनेक मदों में धन का व्यय तो हो रहा है पर सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पा रहे। हमारे यहां के चालीस प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे किसी तरह जीवन गुजार रहे हों तो यह मानकर चलना ही होगा कि तपेदिक रोगियों का अनवरत इस प्रकार तिल-तिल कर मरना अवश्यमंभावी है। हमारी सरकारों की प्राथमिकता में इन दिनों गरीबी उन्मूलन कोई मुददा नहीं क्योंकि आज के दौर मंे केवल चुनाव जीतने वाली योजनाओं का बनाना और उन्हें लागू करने की कवायद करना ही जारी है अब चुनावी उत्सव के स्थायी आयोजन में यदि आप टीबी की तकलीफ किसी को बताऐंगे तो उसे सुनेगा कौन। इसी लिए यह रोग हर रोज मर मर कर जी रहा है।

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