मानवविकास में बन्दर छूमंतर ! – सुभाष गाताडे

5:59 pm or January 27, 2018
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मानवविकास में बन्दर छूमंतर !

—- सुभाष गाताडे —–

यह लगभग तीन दशक से अधिक पहले की बात है जब ज्ञानी जैल सिंह देश के राष्टपति हुआ करते थे।

उन दिनों उनका एक बयान चर्चित हुआ था, जब किसी सभा में बोलते हुए उन्होंने वहां जमा बच्चों को दिखाते हुए पूछा था कि क्या आप को लगता है कि यह सभी बच्चे बंदरों से पैदा हुए होंगे। अपरोक्ष रूप से डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत पर की गयी उनकी टिप्पणी को अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया था। हंसी ठटा में बात आयी गयी हो गयी थी।

पिछले दिनों जनाब जैल सिंह के उपरोक्त बयान को याद दिलाता हुआ ही एक वाकया हुआ जब मानव संसाधन राज्यमंत्राी सत्यपाल सिंह- जो रसायन विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल किए हैं तथा जिन्होंने अपनी सक्रिय जिन्दगी को पुलिस सेवा में गुजार दिया – ने किसी सभा में बोलते हुए डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को खारिज किया। उनका तर्क आसान था कि ‘‘डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत गलत है क्योंकि हमारे पुरूखों ने इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया कि बंदर को आदमी में बदलते हुए उन्होंने देखा है।’’ अपनी यह निजी राय प्रगट करके ही वह खामोश नहीं हुए उन्होंने स्कूली पाठयक्रम में प्रस्तुत सिद्धांत के सीखाये जाने पर भी सवाल उठाए। निश्चित ही यह पहली दफा नहीं है कि मंत्राीमहोदय अपने विवादास्पद बयानों के लिए सूर्खियों में आए हों। बीते सितम्बर में उन्होंने यह कह कर हलचल मचा दी थी कि आई आई टी के छात्रों को यह सीखाना गलत है कि हवाई जहाज का आविष्कार राइट बंधुओं ने किया, दरअसल इसका आविष्कार शिवराम बापूजी तलपदे ने किया था।

विडम्बना ही है कि जहां ज्ञानी जैल सिंह की बात हास्यविनोद तक सीमित रह गयी थी, वहीं सत्ताधारी पार्टी के एक अग्रणी सदस्य, जो मानव संसाधन मंत्रालय – जहां बच्चों का भविष्य गढ़ाने की नीतियां बनती हैं – में अहम पद पर है, उनकी बात को महज प्रलाप नहीं कहा जा सकता। बात की गंभीरता इस वजह से भी बढ़ जाती है कि पार्टी के एक अग्रणी सदस्य राम माधव – जो सरकार की नीतियों को दिशा देने की हैसियत रखते हैं – उन्होंने तत्काल इस बात की ताईद की।

इसमें कोई दोराय नहीं कि संविधान में वैज्ञानिक चिन्तन की जिस अवधारणा पर जोर दिया गया है, तथा जिसकी शपथ मंत्राीमहोदय ने खायी होगी, उसके साथ उनका यह बयान पूरी तरह बेतुका मालूम पड़ता है और यह अकारण नहीं था कि आम तौर पर सार्वजनिक बहसों से दूर रहनेवाले विज्ञान की संस्थाओं ने भी इस मसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। अपने बयान में उन्होंने उनके वक्तव्य को सिरेसे खारिज किया। उन्होंने जोड़ा कि डार्विन का वैज्ञानिक सिद्धांत है और जिसके आधार पर ऐसी तमाम भविष्यवाणियां की गयी हैं जो प्रयोगों एवं अवलोकन के आधार पर सही साबित हुई हैं।’

देशभर के हजारों वैज्ञानिकों ने जिस बयान पर दस्तखत किए हैं, उसमें यह भी कहा गया है कि ‘‘आप का यह दावा है कि वेदों में सभी प्रश्नों का जवाब है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण दावा उपलब्ध सबूतों पर खरा नहीं उतरता और एक तरह से भारत की वैज्ञानिक परम्पराओं के इतिहास अध्ययन पर जो गंभीर अनुसंधान चल रहा है, उसका माखौल उड़ाता है। वैदिक परम्पराएं अपने मीमांसक अनुशासन के माध्यम से हमें वेदों के विश्लेषण में तर्कशीलता /रेशनेलिटी/पर तथा न्यायसंगत विवेकबुद्धि /लाजिकल रिजनिंग/पर जोर देने के लिए कहती हैं। आप के दावे एक तरह से उन्हीं परम्पराओं से असंगत हैं जिनकी हिफाजत का आप दावा करते हैं।’’ (http://epaper.indianexpress.com/1514341/Delhi/January-22,-2018#page/7/2) निश्चित ही इस किस्म का बयान देने में मंत्राी महोदय अकेले नहीं कहे जा सकते हैं।

कुछ माह पहले राजस्थान के शिक्षा मंत्राी ने यह बयान देकर चैंका दिया था कि गायें अपने उच्छवास में भी आॅक्सिजन छोड़ती हैं। भले ही अब बात थोड़ी पुरानी लगे मगर याद करें कि किस तरह धीरूभाई अम्बानाी के अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर खुद प्रधानमंत्राी जनाब मोदी ने चिकित्सकीय विज्ञान को मिथकशास्त्रा से जोड़ा था तथा गणेश और कर्ण की प्रचलित कहानियों के बहाने प्राचीन भारत में ‘‘प्लास्टिक सर्जरी’’ और ‘‘जेनेटिक साइंस’’ की मौजूदगी को रेखांकित किया था। (http://indianexpress.com/article/india/india-others/pm-takes-leaf-from-batra-book-mahabharat-genetics-lord-ganesha-surgery/) प्रधानमंत्राी कार्यालय द्वारा वेबसाइट पर डाले गए उनके व्याख्यान के मुताबिक उन्होने कहा था ‘‘हम गणेशजी की पूजा करते हैं। कोई प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रख कर के प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा।’

दरअसल इन दिनों आलम यहां तक पहुंचा है कि संविधान की कसम खाए लोगों से इस किस्म की अवैज्ञानिक बातें कहीं जा रही हैं और यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि उसी संसद की पटल पर वर्ष 1958 में विज्ञान नीति का प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्राी ने पूरा पढ़ा था /13 मार्च 1958/ और एक मई 1958 को उस पर हुई बहस में किसी सांसद ने यह नहीं कहा कि भारत धर्म और आस्था का देश है। सांसदों ने कुंभ मेले, धार्मिक यात्राओं पर कटाक्ष किए थे, जिनका इस्तेमाल उनके मुताबिक ‘अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जाता है।’ नवस्वाधीन भारत को विज्ञान एवं तर्कशीलता के रास्ते पर आगे ले जाने के प्रति बहुमत की पूरी सहमति थी।

यह विचारणीय मसला किसी को लग सकता है कि मंत्रियों की अपनी इन मान्यताओं, समझदारी को लेकर शेष जनता को क्यों चिंतित होना चाहिए?

दरअसल जिम्मेदारी के पद पर बैठे इन लोगों की राय अपने निजी कक्षों तक सीमित नहीं है, उसका प्रभाव नीतियों पर भी पड़ता दिख रहा है।
मिसाल के तौर पर विज्ञान के विकास के लिए फंड आपूर्ति बढ़ाने के बजाय – जो पहले से बहुत कम है – उसका आवंटन ऐसी चीजों पर हो रहा है जिनमें इस समझदारी को प्रतिबिम्बित होते देखा जा सकता है। याद रहे विज्ञान की नयी शाखा के तौर पर काउपैथी का आगमन या गोविज्ञान का इस क्लब में नया प्रवेश हुआ है। कुछ वक्त पहले राष्टीय स्तर के तमाम विज्ञान विभागों और राष्टीय प्रयोगशालाओं ने इस सम्बन्ध में एक नए साझे कदम का ऐलान किया था। डिपार्टमेण्ट आफ साइन्स एण्ड टेक्नोलोजी द्वारा ‘पंचगव्य’ की वैज्ञानिक पुष्टि और इस सिलसिले में अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए राष्टीय संचालन समिति का गठन किया गया है। इस 19 सदस्यीय कमेटी का कार्यकाल तीन साल का होगा। (https://thewire.in/136259/panchgavya-svarop-iit-csir-cow-urine/) वहीं दूसरी तरफ आलम यह है कि आई आई टी, एन आई टी और आई आई एस ई आर जैसे प्रमुख विज्ञान-टेक्नोलोजी संस्थानों की वित्तीय सहायता को घटाया जा रहा है, वैज्ञानिक शोध में सहायता के लिए विश्वविद्यालयों को फंड की कमी झेलनी पड़ रही है, डिपार्टमेण्ट आफ साइंस एण्ड टेक्नोलोजी, सेन्टर फार साइंटिफिक एण्ड इंडस्टियल रिसर्च जैसे संस्थानों के पास अपने कर्मचारियों, वैज्ञानिकों की तनखा देने के लिए पैसे के लाले पड़ रहे हैं, उन सभी को कहा जा रहा है कि वह अपने आविष्कार और अन्य स्त्रोतों से अपने वेतन का एक हिस्सा जुटाया करें।

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि कर्णधारों के विशिष्ट वैचारिक आग्रहों ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस की बहसों को भी प्रभावित किया है – जहां यह देखने में आया है कि छदम विज्ञान को विज्ञान के आवरण में पेश किया जा रहा है या वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा मिलनेवाली राशि में कटौती जारी है तथा एक विशिष्ट एजेण्डा को आगे बढ़ाने में उनका इस्तेमाल हो रहा हैै। बीते साल की शुरूआत में तिरूपति में आयोजित ‘भारत विज्ञान कांग्रेस’ के अधिवेशन को लेकर वैज्ञानिकों एक हिस्से एवं लोक विज्ञान तथा तर्कशील आन्दोलन के कार्यकर्ताओं ने अपनी आपत्ति पहले ही दर्ज की थी। जानेमाने वैज्ञानिक और सेन्टर फार सेल्युलर एण्ड मोलेक्युलर बायोलोजी के पूर्व निदेशक पी एम भार्गव / जिनका कुछ समय पहले निधन हुआ/ द्वारा इस सम्बन्ध में जारी बयान काफी चर्चित भी हुआ था जब उन्होंने विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान एवं आध्यात्मिकता जैसे मसलों पर सत्रा आयोजित करने के लिए केन्द्र सरकार तथा विज्ञान कांग्रेस के आयोजकों की तीखी भत्र्सना की थी। उनका कहना था कि ‘मैं अभी तक चालीस से अधिक बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशनों को 1948 के बाद से उपस्थित रहा हूं मगर विज्ञान को अंधश्रद्धा के समकक्ष रखना एक तरह से भारतीय विज्ञान के दिवालियेपन का सबूत है।’

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