बापू के विचार प्रतियोगिता के लिए नहीं …… – डाॅ0 गीता गुप्त

5:25 pm or February 1, 2018
gandhiji

बापू के विचार प्रतियोगिता के लिए नहीं ……

डाॅ0 गीता गुप्त

बचपन में एक गीत सुना था-‘‘सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम…..।‘‘इस गीत के माध्यम से युगीन जीवन की विडम्बनाओं से बापू को अवगत कराने की चेष्टा की गई थी। फिर पिछले वर्ष एक पत्र लेखन प्रतियोगिता का विज्ञापन सामने आया था। तदनुसार, महात्मा गाँधी को एक पत्र लिखना था, जिसपर मोटी रक़म पुरस्कार के रूप में रखी गई थी। देश भर में यह आयोजन डाक विभाग की ओर से किया गया था। लेकिन प्रतियोगिता का परिणाम सार्वजनिक नहीं किया गया। न वे पत्र प्रकाशित किये गए, जिससे पता चल सके कि पत्रलेखक बापू के विचारों से किस तरह प्रेरित है और उसने क्या सचमुच पुरस्कार योग्य पत्र लिखा था ? बहरहाल, लोगों ने पत्र लिखे, डाक विभाग की कमाई हुई, पत्र विधा पुनर्जीवित हुई और कुछ समय के लिए बापू लोगों के दिलोदिमाग़ और काग़ज़ पर पर छा गए। यह बात पुरानी पड़ गई। एक बार फिर बापू की पुण्य तिथि आ गई, उनकी प्रतिमाओं की धूल झाड़ी-पोंछी जाएगी, उनके विचारों को भाषणों व प्रतियोगिताओं के लिए खंगाला जाएगा, फिर किसी बक्से में अगले साल के लिए डाल दिया जाएगा।

प्रश्न यह है कि क्या बापू के विचारों की अहमियत बस इतनी ही है कि उन्हंे जन्म और पुण्यतिथि पर स्मरण कर लिया जाए, उनकी तस्वीर पर फूल-मालाएँ चढ़ाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली जाए ? जबकि उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, विचारधारा-सब कुछ इतने प्रासंगिक हैं कि दैनन्दिन जीवन में वे प्रेरणा के अजस्र स्रोत हैं। उन्होंने संकल्प किया था-‘‘1.मैं पृथ्वी पर किसी से नहीं डरूँगा। 2. मैं केवल ईश्वर से ही भय रखूँगा। 3.मैं किसी के प्रति अपने मन में बुरे भाव नहीं रखूँगा। 4.मैं अन्याय के समक्ष सिर नहीं झुकाऊँगा। 5.मैं असत्य को सत्य से जीत लूँगा।‘‘ उनके ये पाँचों संकल्प जीवन-संग्राम में संघर्ष हेतु अद्भुत सम्बल व प्रेरणादायक हैं। उनके तीन बन्दर ‘बुरा मत कहो, बुरा मत देखो और बुरा मत सुनो‘ जैसी प्रेरणा देकर सचमुच संसार को कलह-क्लेश, राग-द्वेष और हिंसा से बचाने में सक्षम हैं। मगर प्रेरणा लेने वाले कहाँ हैं ?
बापू ने कहा था-‘‘हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही बन जाते हैं।‘‘ इसलिए हमें सकारात्मक सोचना चाहिए और एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में समाज व देशहित में कार्य करने की चेष्टा करनी चाहिए। उनके ‘सत्य के प्रयोग‘, ‘हिन्द स्वराज‘ और ‘आरोग्य की कुंजी‘ सहित तमाम कृतियाँ हममें जीवन की समझ पैदा करती हैं और हमारा मार्गदर्शन करती हैं। शिक्षा, ब्रह्मचर्य, विवाह, मातृभाषा, हिन्दी, नशा, शाकाहार, मूर्ति-पूजा, प्राकृतिक चिकित्सा और स्त्री सम्बन्धी विचार आज भी अनुकरणीय हैं। प्रायः समझा जाता है कि ब्रह्मचर्य विद्यार्थियों के लिए ही आवश्यक है। परन्तु बापू के ब्रह्मचर्य की परिभाषा से स्पष्ट है कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी सभी इन्द्रियों पर सदैव तथा सर्वत्र मनसा, वाचा, कर्मणा नियंत्रण। यदि मन पर नियंत्रण न हो तो वाणी और कर्म पर नियंत्रण पाने का कोई मूल्य नहीं है।

हिन्दुस्तानी में एक कहावत है, ‘जिसका हृदय शुद्ध है, उसके घर गंगा का सर्वपवित्रकारी जल निवास करता है। जिसका मन पर नियंत्रण है, उसके लिए बाक़ी सब कुछ मात्र बच्चों का खेल है। मेरी धारणा है कि ब्रह्मचारी स्वस्थ होगा और सहज दीर्घजीवी होगा। उसे मानसिक और शारीरिक श्रम से थकान नहीं होगी। उसमें गीता में बताए गए स्थितप्रज्ञ के सभी गुण दिखाई देंगे। ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन, काया से होना चाहिए। ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्मा की, सत्य की शोध में चर्या-अर्थात् तत्सम्बन्धी आचार। इस मूल अर्थ से सर्वेन्द्रिय-संयम का विशेष अर्थ निकलता है। केवल जननेन्द्रिय संयम के अधूरे अर्थ को तो हमें भूल ही जाना चाहिए। ब्रह्मचर्य पालन करने का अर्थ है निर्विकार होना। विकारमुक्त मनुष्य ईश्वर के सान्निध्य में रहते हैं, वे ईशतुल्य होते हैं।

बापू ने विवाह का जो उद्देश्य बताया, यदि उसे समूचा भारत आत्मसात कर ले तो महिला-उत्पीड़न, दाम्पत्य कलह, विवाह-विच्छेद, यौन-हिंसा, दुष्कर्म जैसी त्रासदियों का अन्त सुनिश्चित हो सकता है। उनके शब्दों में-‘‘विवाह का सच्चा उद्देश्य पुरुष और स्त्री के बीच घनिष्ठ मित्रता और सहचारिता स्थापित करना है। वह विवाह नहीं है, जो कामेच्छा की तुष्टि हेतु किया गया हो। विवाहित जीवन का उद्देश्य मानवता की सेवा भी है।‘‘ उन्होंने युवावस्था में ही काम-सम्बन्धों का परित्याग कर कस्तूरबा के साथ देश और मानवता की सेवा का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। विवाह के सम्बन्ध में उनके विचार बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। तदनुसार, ‘‘विवाह में आध्यात्मिक विकास को प्रथम, मानवता को द्वितीय, पारिवारिक हितों तथा सामाजिक व्यवस्था को तृतीय और पारिवारिक आकर्षण एवं प्रेम को अन्तिम स्थान दिया जाना चाहिए। केवल प्रेम को विवाह का आधार नहीं माना जाना चाहिए और अन्य तीन उद्देश्यों की पूर्ति होने के बावजूद यदि प्रेम का अभाव है तो भी विवाह नहीं होना चाहिए। अभिभावकों तथा प्रेमासक्त युवाओं के लिए भी ये विचार मार्गदर्शक हो सकते हैं।

महिलाओं के सम्बन्ध में उनके विचार सर्वाधिक प्रगतिशील तथा प्रेरणास्पद् हैं। उन्होंने कहा-‘‘स्त्रियों को पुरुषों पर अपनी निर्भरता समाप्त करनी चाहिए और अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए।….स्त्री-पुरुष की समानता के युग में पुत्र-पुत्री में भेदभाव न्यायसंगत नहीं है। माता-पिताओं का अपनी बेटियों का जबरन विवाह करवाना और उन्हें जीविकोपार्जन के योग्य न बनाना भी ग़लत है।‘‘ बापू मानते थे कि-‘‘हिन्दू संस्कृति में पत्नी को पति के अत्यधिक अधीन मानकर और उसके व्यक्तित्व को पति के व्यक्तित्व में पूर्णतः विलीन करने पर ज़ोर देकर भूल की गई है। स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार को रोकने का उपाय क़ानून बनाना नहीं अपितु स्त्रियों को शिक्षित करना तथा पतियों के अनुचित व्यवहार के विरुद्ध जनमत तैयार करना ही है। स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर की साझीदार बनना चाहती हैं तो उन्हें पुरुषों के लिए, पति के लिए भी अपने को सजाने से इनकार कर देना चाहिए। स्त्री का सौन्दर्य उसके चरित्र-बल और शील में है।‘‘ गाँधीजी ने कहा-‘‘यदि मैं स्त्री रूप में जन्मा होता तो पुरुष के इस दम्भ के विरुद्ध कि स्त्री पुरुष के मनोरंजन की वस्तु है, विद्रोह कर देता।‘‘

बापू ने युवतियों को दहेज़ का निदान सुझाते हुए कहा-‘‘ अगर तुम इन कुरीतियों का विरोध करना चाहती हो तो शुरु में तुममें से कुछ को जन्म भर के लिए या कम-से-कम कुछ साल तक कुँवारी रहना होगा। फिर जब तुम्हारी शादी का वक़्त आए और तुम्हें लगे कि जीवन-साथी ढूँढ़ना ही पड़ेगा, तब तुम्हें ऐसे आदमी की चाह न होगी जिसके पास रुपया है, नाम है या सुन्दर शरीर है। बल्कि तुम ऐसा आदमी ढूँढ़ोगी, जिसमें सच्चरित्रता के सारे अद्वितीय गुण होंगे।‘‘ बापू ने माता-पिताओं को भी बेटियों के सुखमय जीवन हेतु योग्य वर ढूँढ़ने के लिए अपनी जाति अथवा प्रान्त सम्बन्धी बन्धन तोड़ने की जो सलाह दी है, वह बहुत उपयोगी है।

उन्होंने कहा-‘‘जाति-पाँति के इन बहुत हानिकारक बन्धनों को तोड़ डालने की आवश्यकता पर मैं ज़रूर ज़ोर देता हूँ। इन बन्धनों के टूट जाने से चुनाव का क्षेत्र विस्तृत हो जाएगा और इस तरह दहेज़ के तौर पर रुपया ऐंठना बहुत कुछ रुक जाएगा।‘‘ दहेज़ के लालच में किये गए विवाह और शादी-ब्याह में भोज और अन्धाधुन्ध ख़र्च के वे विरोधी थे। उनके आश्रम में कई विवाह हुए जिसमें केवल आश्रम की प्रार्थना होती थी और नव दम्पती को आशीर्वाद के साथ गाँधीजी कुछ उपदेश देते थे। अन्त में वर-वधू को श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति भेंटस्वरूप दी जाती थी। इस तरह उन्होंने सादगीपूर्वक विवाह सम्पन्न करने की प्रेरणा दी।

गाँधीजी ने पर्दा-प्रथा, तलाक़, वेश्यावृत्ति, देवदासी-प्रथा, सती-प्रथा और स्त्रियों के विरुद्ध अपराध पर भी बहुत महत्त्वपूर्ण विचार दिये। उन्होंने स्त्री की रक्षा और पवित्रता के सम्बन्ध में कहा-‘‘मेरी सदा से धारणा रही है कि स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ कुकृत्य करना असम्भव है। जो स्त्री निर्भय है और यह जानती है कि उसकी चारित्रिक निर्मलता उसकी सबसे बड़ी ढाल है, उसकी आबरू कभी लुट नहीं सकती। पुरुष कितना ही पाशविक हो, वह उसकी निर्मलता के अग्निस्तम्भ क सामने शर्म से झुक जाएगा।….। इसीलिए मैं महिलाओं से कहता हूँ…….यह साहस पैदा करने की कोशिश करो। अगर वे ऐसा कर सकें तो वे निर्भय हो जाएँगी और आक्रमण का विचार मन में आते ही आज की तरह काँपना बन्द कर देंगी….अभिभावकों और पतियों को चाहिए कि महिलाओं को निर्भय बनने की शिक्षा दें। जब उनपर आक्रमण हो तो उसका प्रमुख कर्तव्य अपनी रक्षा करना है। इसके लिए उसे जो उपाय सूझे, वह उसे अपनाये। ईश्वर ने उसे नाख़ून और दाँत दिये हैं, उसे अपनी पूरी ताक़त के साथ उनका इस्तेमाल करना चाहिए और ज़रूर हो तो इस प्रयास में जान दे देनी चाहिए। जिस पुरुष या स्त्री ने मृत्यु के भय को जीत लिया है, वह अपनी जान देकर स्वयं अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता बल्कि दूसरों की भी कर सकता है।‘‘

गाँधीजी ने स्त्रियों से कुप्रथाओं का मुक़ाबला करने की अपील की थी। उन्होंने 7 अक्तूबर 1926 को कहा था-‘‘ मानाकि हिन्दुस्तान की स्त्रियों में किसी भी कुप्रथा के विरुद्ध युद्ध करने की शक्ति नहीं रह गई और समाज की ऐसी स्थिति के लिए मुख्यतः पुरुष ज़िम्मेदार हैं। लेकिन क्या स्त्रियाँ सारा दोष पुरुषों के माथे मढ़कर अपनी आत्मा को हल्का रख सकती हैं? क्या पढ़ी-लिखी स्त्रियों का स्त्री वर्ग के प्रति तथा पुरुषों के प्रति भी, क्योंकि वे जननी हैं-यह कर्तव्य नहीं कि वे सुधार का काम अपने हाथ में लें ? अगर विवाहोपरान्त वे अपने पतियों के हाथों में कठपुतलियाँ बन जाएँ और कम उम्र में ही हीन निकलने वाले बच्चे पैदा करने लग जाएँ तो वह शिक्षा जिसे वे पा रही हैं किस काम की ?….लेकिन ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं, जो विवाहिता और विधवा बालिकाओं के बीच काम करें और तब तक न स्वयं चैन लें और न पुरुषों को लेने दें, जब तक बाल-विवाह असम्भव न हो जाए और जब तक प्रत्येेक बालिका में इतना साहस न आ जाए कि वह परिपक्व अवस्था में अपनी ही पसन्द के वर के साथ विवाह करने के सिवाय शेष दशाओं में विवाह करने से इनकार कर सकें ?‘‘

बापू स्त्री-जगत् पर हो रहे अत्याचारों की रोकथाम के लिए स्त्री जाति को ही सक्षम देखना चाहते थे। इसके अलावा सार्वजनिक कार्यों में स्त्रियों की उपयोगिता स्वीकारने के साथ-साथ उन्हें राजनीति में भी पुरुषों के समान सक्रिय देखना चाहते थे। उनका मानना था कि स्त्रियाँ अपनी कोमलता और संवेदनशीलता से कलुषित राजनीति का शुद्धिकरण कर सकती हैं। उन्हांेने स्वयं भारतीय राष्ट्रीय संग्राम में इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को सक्रिय सहयोग हेतु प्रेरित करके सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में समुचित भूमिका के निर्वहन योग्य बनाया। भले ही वह परम्परा जारी नहीं रह सकी लेकिन स्त्रियों के लिए पे्ररणा बिन्दु तो है ही।

बापू के कार्यों की सूची बहुत लम्बी है। उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए भी कई प्रयास किये। उन्होंने मूर्ति-पूजा का विरोध किया क्योंकि इससे मिथ्याडम्बर और अन्धविश्वास जुड़कर सामाजिक बुराइयों को जन्म देते हैं। यदि देश के उत्सवधर्मी उनकी भावना की गहराई तक पहुँच पाते तो हमारे नदी-तालाब मूर्तियों के विसर्जन से कदापि प्रदूषित न हो पाते। वस्तुतः गाँधीजी का पूरा जीवन ही प्रेरणा-पुंज है। उन्होंने अपनी पुस्तक रचनात्मक कार्यक्रम में 15 कार्यक्रमों का उल्लेख किया है जिनकी आज भी महत्ता है। वे कार्यक्रम हैं- साम्प्रदायिक एकता, अछूतोद्धार, मद्य-निषेध, खादी, ग्रामीण कुटीर उद्योग, ग्राम सफ़ाई, नयी तालीम, प्रौढ़ शि़क्षा और साक्षरता, नारी का उद्धार, समग्र ग्राम सेवा, हिन्दुस्तानी का प्रचार, मातृभाषा के प्रति प्रेम, आर्थिक समानता के लिए कार्य, आदिवासियों की सेवा, विद्यार्थी-किसान और मज़दूरों का संगठन।
संयुक्त राष्ट्र संघ के सभाकक्ष से लेकर सैकड़ों देशों ने महात्मा गाँधी के नाम को जीवित रखा है। कहीं उनके नाम पर सड़क, कहीं शि़क्षा संस्थान और कहीं प्रतिमाएँ स्थापित हैं। उनके विचार इतने प्रासंगिक हैं कि अमेरिका में बच्चों द्वारा हिंसक घटनाओं को अंजाम देने पर वहाँ की सरकार ने विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने या बच्चों को बुलेटपू्रफ जैकेट बाँटने की बात नहीं की बल्कि बच्चों को गाँधीजी की जीवनी, शिक्षा, विचार तथा उनके कार्यों से अवगत कराने की पहल की। यहाँ तक कि 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में घोषित कर दिया।
आज आधुनिक सभ्यता के अन्तर्विरोध और दुष्परिणाम अनवरत् उजागर हो रहे हैं। ऐसे में उनकी ये उक्तियाँ प्रायः स्मरण हो आती हैं-‘‘आपको अपने भीतर वही बदलाव लाना होगा, जो आप दुनिया में लाना चाहते हैं।‘‘ और…..‘‘जीना ऐसे चाहिए जैसे आपकी कल मृत्यु हो जाएगी। सीखिए ऐसे, जैसे आप हमेशा रहने वाले हैं।‘‘ वर्तमान परिस्थितियों में बापू के विचारों की घर-घर में पैठ आवश्यक है, उन्हंे अपने जीवन में स्थान देना आवश्यक हैै । हर बात के लिए सरकार की मुखापेक्षिता उचित नहीं, यह प्रयास सरकार और समाज को मिलकर करना होगा क्योंकि यह देश के हित में है। बापू का व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी विचारधारा आज भी प्रेरक और प्रासंगिक है, इसमें दो राय नहीं। हमें उनके महत्त्व को समझना होगा।

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