पत्रकारों को भी है अभिव्यक्ति की आजादी का संवैधानिक अधिकार -जाहिद खान

5:38 pm or February 1, 2018
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पत्रकारों को भी है अभिव्यक्ति की आजादी का संवैधानिक अधिकार

— जाहिद खान —

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में सुनाए अपने एक अहम फैसले में, सीबीआई की विशेष अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई की कार्यवाही की रिपोर्टिंग या प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपियों द्वारा सनसनी फैलाने की चिंता मात्र, इस तरह के पाबंदी आदेश जारी करने का पर्याप्त आधार नहीं हैै। इस तरह की पाबंदी नाजायज है और यह आदेश पत्रकारों को अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है। अदालत का इस बारे में साफ कहना था कि प्रेस के अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करने वाले संवैधानिक अधिकार में निहित हैं। एक खुली सुनवाई की रिपोर्टिंग में प्रेस न केवल अपने अधिकार का इस्तेमाल करती है, बल्कि आम जनता को इस तरह की सूचनाएं मुहैया कराने के बड़े मकसद को पूरा करती है। अदालत ने अपने फैसले में यहां तक कहा कि इंसाफ सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चहिए। खुली अदालत का मकसद ही यही है और मीडिया इस संदेश को जनता तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है। जाहिर है कि अदालत ने जो कुछ कहा, उसमें कोई भी बात गलत नहीं है। अदालत ने अपना फैसला, संविधान और कानून की रौशनी में ही दिया है। प्रेस की आजादी को लेकर जस्टिस मोहिते डेरे का यह अहमतरीन फैसला ऐसे दौर में आया है, जब मीडिया सŸाा के बेहद दबाव में है। कमजोर आधार पर दायर होने वाले मानहानि के मुकदमे रोज की बात हो गए हैं। अपना काम कर रहे पत्रकारों को लगातार धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।

संदेह, सवालों और हर दम नए विवादों में घिरे रहे सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड मामले की सुनवाई मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत में चल रही हैं, जिसने बीते साल 29 नवंबर को बचाव पक्ष की एक अर्जी के बाद मीडिया को अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने से रोक दिया था। अदालत के इस आदेश को गैरकानूनी बताते हुए इसके खिलाफ दो याचिकाएं बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल की गईं। एक याचिका बृहन्मुंबई पत्रकार संघ ने, तो दूसरी याचिका विभिन्न अखबारों और समाचार चैनलों की ओर से नौ पत्रकारों ने दायर की। याचिकाकर्ताओं में ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ समेत वरिष्ठ पत्रकार नीता कोल्हात्कर, सुनील बघेल, शरमीन हाकिम, सदफ मोदक, रेबेका समेर्वल, नरेश फर्नांडिस, सुनील कुमार सिंह और विद्या कुमार शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुजारिश की, कि सीबीआई जज द्वारा बचाव पक्ष की गलत रिपोर्टिंग की आशंका पर जल्दबाजी में आदेश दिया गया है। जबकि पिछले पांच सालों से मीडिया इस मामले की रिपोर्टिंग कर रही है और अब तक गलत रिपोर्टिंग का एक भी मामला सामने नहीं आया है। यह मामला लोगों से जुड़ा है और इसमें कई पूर्व पुलिस अधिकारी आरोपी हैं, लिहाजा मामले में मौके पर कवरेज बेहद जरूरी है। बहरहाल इन याचिकाओं पर जब अदालत में सुनवाई शुरू हुई, तो बचाव पक्ष के वकील द्वारा इस मामले को ‘संवेदनशील’ बताते हुए कहा गया कि इस मामले में बड़ी राजनीतिक पार्टियों का नाम है और गवाहों और वकीलों दोनों की ही जान को खतरा हो सकता है। बचाव पक्ष की इस दलील सुनने के बाद, जस्टिस मोहिते डेरे ने सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामला कितना भी गंभीर हो, क्या आप उस प्रावधान के बारे में बता सकते हैं, जिसके अनुसार यह आदेश दिया गया है ? अगर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो क्या किसी ट्रायल कोर्ट जज को इस तरह का आदेश देने का अधिकार है ? संवैधानिक मुद्दों पर जोर देने के साथ अदालत ने यह बात भी मानी कि सीबीआई के विशेष जज ने अपनी शक्तियों से बाहर जाकर मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी का आदेश दिया है। जबकि सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में इस तरह का आदेश देने का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की इस बात पर रजामंदी जताई कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत केवल उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय को ही इस तरह के पाबंदी आदेश जारी करने का अधिकार है।

सोहाराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामला, मुंबई के सत्र न्यायालय में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है। इल्जाम है कि साल 2005 में हुई इस फर्जी मुठभेड़ में गुजरात और राजस्थान की पुलिस ने सोहराबुदीन की हत्या की बाद में उसकी पत्नी कौसर बी की भी हत्या कर उसे दफना दिया था। साल भर बाद फर्जी मुठभेड़ के चश्मदीद तुलसीराम प्रजापति की भी फर्जी मुठभेड़ में मौत दिखाई गई। मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह और राजस्थान के भी एक मंत्री के साथ कई बड़े पुलिस अफसरों के नाम शामिल होने और गुजरात मे निष्पक्ष मुकदमा ना हो पाने की आशंका के चलते, सीबीआई की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मुकदमा मुंबई में हस्तातंरित कर दिया गया। अब तक अमित शाह, गुलाब चंद कटारिया जैसे नेता और डी. जी. वंजारा जैसे कई दूसरे पुलिस वालों पर से इल्जाम खारिज हो चुके हैं और उन्हें इन इल्जामों से बरी किया जा चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि सीबीआई ने इन फैसलोें के खिलाफ अभी तलक कोई अपील नहीं की है। इस मामले में अब भी 23 के करीब पुलिस वाले मुल्जिम हैं, जिन पर यह मुकदमा चल रहा है। सोहराबुदीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई में विशेष अदालत ने मीडिया पर पाबंदी तब लगाई थी, जब पहले गवाह का बयान होना था। तब से लेकर अब तक 40 गवाहों के बयान हो चुके हैं, जिनमें से 28 गवाह अपने बयान से मुकर चुके हैं। इस दौरान कई पुलिसकर्मियों ने अपने पुराने सहकर्मियों, जो इस मामले में आरोपी हैं, को पहचानने से इनकार कर दिया। इन गवाहों में वो चश्मदीद भी शामिल हैं, जिन्होंने पहले जांच के दौरान बयान दिया था कि उन्होंने नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसी प्रजापति को बस से अपहृत होते देखा था।

बाॅम्बे हाई कोर्ट का हालिया फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है। गाहे-बगाहे कोई ना कोई दलील देकर कभी अभियुक्त, तो कभी अभियोजन पक्ष अदालत में मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी लगाने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे में ये फैसला नजीर साबित होगा। इस मामले में खास बात यह है कि सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई सालों से चल रही है। कभी भी मीडिया की रिपोर्टिंग पर ना तो कोई उंगली उठी और न ही पाबंदी लगी। फिर भी अचानक से बिना किसी आधार के उस पर पाबंदी लगा दी गई, वह भी एक आरोपी की मांग पर। इस पूरे मामले में जांच एजेंसी सीबीआई भी तटस्थ रही, उसने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा मीडिया रिपोर्टिंग पर दिया गया आदेश, कानून की कसौटी पर बिल्कुल भी खरा नहीं उतरता। अदालत का आदेश सीआरपीसी की धारा 327 के तहत मिले खुली सुनवाई के सिद्धांत का हनन है। जब तक मुकदमा ‘इन-कैमरा’ (बंद कमरे में) न हो, तब तक माननीय अदालत को मीडिया पर कोई पाबंदी लगाने का अधिकार नहीं है। लिखना और बोलना मीडिया का अधिकार है और क्या हो रहा है ?, ये जानना जनता का अधिकार है। रिपोर्टिंग कर मीडिया अपने इन्ही अधिकारों का इस्तेमाल करती है। लोकतांत्रिक समाज में मीडिया का बड़ा रोल है। कई मामलों में जनता जानना चाहती है कि उसमें अदालती कार्यवाही क्या हुई ? मगर, जनता खुद तो अदालत में मौजूद नहीं रह सकती। लिहाजा, वह मीडिया के माध्यम से जानकारी प्राप्त करती है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मिलते-जुलते मामले में फैसला दिया था कि कोई भी अदालती कार्यवाही खुली अदालत में होनी चाहिए। ताकि मीडिया का अधिकार प्रभावित न हों। इस मामले में न तो मीडिया पीड़ित है और न ही आरोपी। ऐसे में सोहाराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में मीडिया कवरेज पर रोक लगने से मीडियाकर्मियों का संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत राइट टू प्रेक्टिस (व्यवसाय का अधिकार) का साफ-साफ उल्लंघन होता है।

बचाव पक्ष जिस सीआरपीसी की धारा 327 का हवाला देते हुए, यह दलील दे रहा है कि इस तरह के ‘संवेदनशील’ मामले की सुनवाई बंद कमरे में की जानी चाहिए, उस धारा की प्रोविजन 3 में पहले ही साल 2009 में संशोधन हो चुका है। जिसके तहत मीडिया को ऐसे मामलों में कवरेज की इजाजत दी जा सकती है। मीडिया इस तरह के मामलों में न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी समझता है, बल्कि अब तक उसने इसका पालन भी किया है। यदि, सोहाराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई बंद कमरे में हुई, तो पुलिस, सरकारी मशीनरी और अदालत में क्या सही व गलत हो रहा है, इसकी जानकारी जनता को नहीं मिल पाएगी। जबकि जनता मीडिया के माध्यम से जानना चाहती है कि इस मामले में कब-क्या हो रहा है ? फिर इस मामले में तो सीबीआई की विशेष अदालत, मीडिया पर रोक लगाने की जरूरी परिस्थिति बताने में भी नाकाम रही है। सीआरपीसी की धारा 327 के तहत मीडिया पर पाबंदी लगाना, संबंधित अदालत के अधिकार क्षेत्र और शक्ति के बाहर है। संबंधित मुकदमा बहुत पहले से मीडिया में रिपोर्ट किया जाता रहा है। साथ ही, मामले से जुड़े किसी आरोपी और उसके वकील की जान को मीडिया रिपोर्टिंग से कोई खतरा नहीं है। बावजूद इसके सीबीआई की विशेष अदालत ने सिर्फ अनहोनी की आशंका की वजह से मीडिया पर पाबंदी लगा दी। सोहाराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामला, इस वक्त महत्वपूर्ण स्टेज पर है, इस मोड़ पर मीडिया पर पाबंदी का कोई तुक नहीं है। ये मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। यही वजह है कि बाॅम्बे हाई कोर्ट ने, सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया और मीडिया को उसके काम के लिए पहले सी आजादी प्रदान कर दी।

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