राममंदिर आदि मुद्दों को लेकर संघ परिवार द्वारा नरेन्द्र मोदी पर दबाव बनाना शुरू

12:30 pm or June 2, 2014
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एल.एस.हरदेनिया-

क बहुत ही प्राचीन कहावत है कि हाथी के खाने के और दिखाने के दांत अलग होते हैं। यह कहावत पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लागू होती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान संघ परिवार के किसी भी सदस्य ने न राममंदिर बनाने की बात कही, न तो जम्मू एवं कश्मीर से धारा 370 हटाने की मांग की और ना ही समान नागरिक संहिता लागू करने की चर्चा की। स्वयं मोदी ने अपने कुछ भाषणों में यह सुझाव दिया था कि इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि जम्मू एवं कश्मीर में धारा 370 लगी रहे या हटाई जाए। अब चूंकि चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है और नरेन्द्र मोदी जी ने सत्ता संभाल ली है तो इन सब मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा प्रारंभ हो गई है। राममंदिर के निर्माण का आंदोलन विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में चला था। यह सभी को ज्ञात है कि विश्व हिन्दू परिषद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख शाखा है। परिषद के सर्वमान्य नेता हैं अशोक सिंघल। वे विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव और अधयक्ष रह चुके हैं। वे वर्तमान में विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक हैं और गुजरात के डा. प्रवीण तोगड़िया इस समय विश्व हिन्दू परिषद के सर्वेसर्वां हैं। सिंघल ने दिनांक 24 मई को सार्वजनिक रूप से राममंदिर के निर्माण की मांग की। उनसे जब यह पूछा गया कि चूंकि अब भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया है तो क्या राममंदिर निर्माण की बात नहीं होना चाहिए और क्या शीघ्र से शीघ्र राममंदिर नहीं बनना चाहिए? उनका जवाब था ”मजबूत सरकार बनी है, मजबूती से बनेगा राममंदिर”। सिंघल ने कहा कि सर्वप्रथम आवश्यकता इस बात की है कि राममंदिर बनाने के लिए संबंधित संगठनों को पूरी स्वायतता देनी चाहिए। इसके साथ ही उन लाखों मंदिरों को जिन्हें सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया है उन्हें भी शासकीय नियंत्रण से आजाद कर देना चाहिए।

इसी तरह समान नागरिक संहिता भारत की मूलभूत एकता के लिए आवश्यक है। समान नागरिक संहिता के माध्यम से ही देश में एकता रहेगी। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह राय प्रगट कर दी है कि भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार भी समान नागरिक संहिता आवश्यक है। उन्होंने यह भी मांग की कि देश में धार्मिक परिवर्तन पर पूरी तरह से प्रतिबंधा लगा देना चाहिए। खुलेआम धर्म परिवर्तन हो रहे हैं और इससे देश में अशांति फैलती है और कानून और व्यवस्था की स्थिति भंग होती है। सिंघल का दावा है कि ये सब कदम हमारे संविधान के अंतर्गत ही उठाए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी मांग की है कि आतंकवादी गतिविधियों से सख्ती से निपटा जाए और माता-बहनों को पूरी तरह सुरक्षा प्रदान की जाए। सिंघल के बयान का स्पष्ट संदेश है कि अयोधया में राममंदिर का निर्माण मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रश्न यह है कि यदि मोदी ऐसा नहीं करते हैं तो क्या अशोक सिंघल, डा. प्रवीण तोगड़िया और विश्वहिन्दू परिषद तथा बजरंग दल से जुड़े लोग शांत रहेंगे या किसी तरह के आंदोलन की रूपरेखा बनाएंगे? इस संबंधा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. भागवत की क्या राय है यह कहना मुश्किल है। परंतु यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनके ऊपर भी विश्व हिन्दू परिषद एवं सिंघल ने जबरदस्त दबाव बनाया था और यहां तक कि वाजपेयी जी को सार्वजनिक रूप से बुराभला कहा था और लगभग हिन्दू विरोधी बताया था।

संघ से सीधे जुड़े हुए एक और महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं उनका नाम है इंद्रेश कुमार। जहां सिंघल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रत्यक्ष पदाधिकारी नहीं हैं वहीं इंद्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के एक महत्वपूर्ण सदस्य हैं। यहां यह स्मरण दिलाना प्रासंगिक होगा कि कुछ आतंकवादी घटनाओं में इंद्रेश कुमार की भागीदारी की बात कही गई थी। इसके साथ ही यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े अनेक लोग हैदराबाद, अजमेरशरीफ और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोटों के लिए उत्तरदायी पाए गए। इनमें से अनेक लोग जेल में हैं। इंद्रेश जी का आरोप है कि इन लोगों के विरूध्द जानबूझकर कार्यवाही की गई। यूपीए सरकार के दबाव के कारण सीबीआई, एनआईए, एटीएस आदि संगठनों ने जानबूझकर संघ से जुड़े और अन्य हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं के विरूध्द आपराधिक प्रकरण बनाए हैं। इस तरह के लोग कई वर्षों से जेल में हैं। परंतु उनके विरूध्द अभी भी औपचारिक रूप से अदालती कार्यवाही प्रारंभ नहीं हुई है। उनकी मांग है कि उन्हें कम से कम जमानत पर तो छोड़ा जाए और शीघ्र ही उनके विरूध्द अदालती कार्यवाही प्रारंभ की जाए। परंतु ऐसा नहीं किया जा रहा है इसलिए यह सबकुछ संदेह के घेरे में आता है। इंद्रेश कुमार कहते हैं कि मैं जानता हूँ कि इस तरह की प्रक्रिया प्रारंभ करने में कम से कम तीन से चार माह लगेंगे। परंतु प्रक्रिया तो प्रारंभ हो। स्वयं इंद्रेश कुमार का नाम 2007 में मक्का मस्जिद में हुए विस्फोट से जुड़ा है। इंद्रेश कुमार के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक सुनील जोशी से घनिष्ठ संबंध थे। सुनील जोशी का नाम मक्का मस्जिद के अलावा मालेगांव में हुए विस्फोट से भी जुड़ा था। बाद में सुनील जोशी की हत्या कर दी गई। कई महीनों तक जोशी की हत्या की जांच तक प्रारंभ नहीं हुई थी। हत्या मध्यप्रदेश में देवास के पास हुई थी। कई महीनों तक हत्या की घटना पुलिस की फाईलों में बंद पड़ी रही। बाद में जांच पड़ताल प्रारंभ हुई तो यह पाया गया कि संघ से जुड़े लोगों ने ही सुनील जोशी की हत्या की थी। हत्या इसलिए की गई क्योंकि संघ से जुड़े लोगों को संदेह था कि सुनील जोशी उन घटनाओं से संबंधित सूचना जांच एजेंसियों को न दे दें। और भी कई ऐसी घटनाएं हैं जिनसे इंद्रेश कुमार को जोड़ा गया। परंतु यह भी वास्तविकता है कि इन सबके बावजूद इंद्रेश कुमार के विरूध्द चार्जशीट तैयार नहीं की गई।

इंद्रेश कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में धारा 370 की भी चर्चा की, समान नागरिक संहिता का मुद्दा भी उठाया और राममंदिर के निर्माण की भी बात की। उनका दावा था कि संविधान के अनुसार समान नागरिक संहिता बनाना शासन की जिम्मेदारी है। जहां तक राममंदिर का सवाल है उन्होंने आशा प्रगट की कि संविधान के अंतर्गत जनभावना से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे का हल निकाला जाए। उन्होंने अपने इंटरव्यू में यह भी दावा किया कि भारी संख्या में मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 60 वर्षों में कांग्रेस ने मुसलमानों के विकास के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाए हैं।

संघ परिवार के अतिरिक्त भारतीय जनता पार्टी के अनेक सहयोगी दल भी नरेन्द्र मोदी के लिए मुसीबत पैदा करेंगे। जैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को निमंत्रित करने का विरोध शिवसेना ने किया। पूर्व में शिवसेना हर उस गतिविधि का विरोध करती थी जिसमें पाकिस्तानी नागरिकों के भाग लेनी की संभावना होती थी। चाहे वह कार्यक्रम संगीत का हो, क्रिकेट मैच का हो या अन्य कोई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रम हो। अनेक बार यह भी हुआ है कि शिवसेना ने क्रिकेट ग्राउण्ड को ही तहस-नहस कर दिया जिससे पाकिस्तान से मैच खेला न जा सके। इस बार भी शिवसेना ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को दिए गए निमंत्रण का विरोध किया। परंतु कांग्रेस के शासन के दौरान और मोदी सरकार के नेतृत्व के दौरान किए गए विरोध में बुनियादी अंतर है। कांग्रेसी सरकारें शिवसेना के डर के कारण पाकिस्तान से जुड़े कार्यक्रमों को रद्द कर देती थी परंतु इस बार मोदी ने शिवसेना के दबाव में आकर ऐसा नहीं किया। इसी तरह श्रीलंका के राष्ट्रपति को दिया गया निमंत्रण का भी विरोध किया गया। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता समेत अनेक तमिल संगठनों ने भी विरोध किया। परंतु इस तरह के विरोध के बावजूद नरेन्द्र मोदी अपने निर्णय पर कायम रहे। अगर इसी तरह की दृढ़ता कांग्रेसी शासक दिखाते तो इस तरह के विघटनकारी तत्व कब के समाप्त हो गए होते। अभी हाल में श्रीलंका में राष्ट्रमंडल प्रधानमंत्रियों का सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में डा. मनमोहन सिंह को भी जाना था। उनके जाने का जोरदार विरोध किया गया और उस विरोध के चलते मनमोहन सिंह ने श्रीलंका की अपनी यात्रा रद्द कर दी।

देखना यह है कि नरेन्द्र मोदी किस हद तक संघ परिवार के विभिन्न समूहों द्वारा किए गए दबावों के चलते क्या रवैया अपनाते हैं। यदि वे उनके सामने झुकते हैं तो एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री के रूप में उनकी छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और यदि नहीं झुकते हैं तो उन्हें संघ परिवार के समर्थन के बिना देश के शासन का संचालन करना होगा। यहां इस बात का स्मरण रखना आवश्यक है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ही निर्णायात्मक भूमिका रही है। क्या मोदी संघ के इस एहसान को भुलाकर अपने निर्णयों पर कायम रह पाएंगे? यह भविष्य ही बताएगा।

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