साम्प्रदायिक सौहार्द – शैलेन्द्र चौहान

3:43 pm or February 7, 2018
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साम्प्रदायिक सौहार्द

शैलेन्द्र चौहान

धर्म, जाति और लिंग सम्बंधी श्रेष्ठता की मानसिकता बहुत कुछ हमारी साम्प्रदायिक भावना को उभारने के लिए उत्तरदायी है। श्रेष्ठता की मानसिकता, दूसरे के महत्व को स्वीकार करने की गुंजाइश समाप्त कर देती है और जब तथाकथित श्रेष्ठ तबके के अंह को कहीं ठेस पहुंचती है तो वह साम्प्रदायिकता पर उतर आता है। यह एक सामंती मनोवृत्ति है जो समानता की भावना के विपरीत है। किसी भी समस्या के पीछे कार्य कारण सम्बन्ध होता है जो सम्पूर्णता में एक वस्तुगत विश्लेषण की दरकार रखता है, तभी हम सही नतीजे पर पहुँच सकते हैं। यूँ तो हमारे देश में हिन्दू-मुस्लिमों के अलावा अन्य समुदायों तथा विभिन्न क्षेत्रीयताओं और वर्णों तथा जातियों के बीच भी मारकाट मचती रही है। तमिलनाडु में हिंदी वालों के लिए नफ़रत फैलायी गई जो वर्षों तक चली, उत्तरपूर्वी प्रांतों में वहां की जनजातियों के बीच लगातार मारकाट होती रही है। मुम्बई में पहले दक्षिण भारतीयों के खिलाफ दंगे किये गए बाद में बिहारियों के लिए नफ़रत परोसी गई। बंगाल में नक्सलवादियों के खिलाफ कांग्रेस और सीपीएम ने भारी जंग लड़ी। गोरखालैंड का पूरा आंदोलन बंगालियों के विरोध पर केंद्रित रहा। १९८४ के हिन्दू-सिख दंगे तो बड़े पैमाने पर चले। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को बेदखल किया गया। दलितों और सवर्णों के बीच भी कई बार मारकाट हुई, शिया – सुन्नी दंगों का भी लम्बा इतिहास है लेकिन भारत में जब भी साम्प्रदायिकता की बात चलती है तो उसका आशय हिन्दू मुस्लिम सम्बंधों में आपसी द्वेष से ही लिया जाता है। यदि साम्प्रदायिक समस्या के समाधान की भी बात की जाती है तो हिन्दू मुस्लिम विरोध को समाप्त करने का ही अर्थ लिया जाता है। असल में भारत में सम्प्रदाय का तात्पर्य हिन्दू मुस्लिम विभाजन से ही है। एक औसत हिन्दू की मानसिकता यह बना दी गई है कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर अपने हिस्से का भाग ले चुके हैं अब उन्हें भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। और यदि रहना है जो उनके अधीन होकर रहें। हमारे इस साम्प्रदायिक जुनून के लिए बहुत कुछ कानूनी व्यवस्था का अभाव, विधायिका और संवैधानिक निष्क्रियता भी दोषी है हमारा संविधान तो निष्क्रिय इसलिए हो रहा है क्योंकि वह 50-60 साल से ऐसे हाथों में ही रहा है जो साम्प्रदायिकता को उत्प्रेरक के रूप में प्रयोग करने वाले थे। और आज भी यही स्थिति है। यहां तक कि आज हमारी पूरी की पूरी राजनीति ही साम्प्रदायिकता के इर्द गिर्द ही घूमती नजर आती है।

समाजवादी और वामपंथी भी साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और गरीबी एवं साधनहीनता और बेरोजगारी की बात न करके पिछले छह दशकों से सत्ता पर काबिज रही पार्टी की विचार पद्धति को अपना चुके हैं। उनके लिए अब साम्प्रदायिकता ही देश की मूल समस्या है बाकी सब गौण। अब इसे क्या कहा जाये कि सब के सब साम्प्रदायिकता की मशाल लेकर मैदान में हों और यह न महसूस कर सकें कि ऐसे कार्यों से साम्प्रदायिकता कम नहीं होती बल्कि बढाती ही है। दुर्भाग्य से हमारे कुछ बुद्धिवादियों के साम्प्रदायिकता एक ऐसा बांड है जिसे वे कभी भी और कहीं भी भुना सकते हैं। साम्प्रदायिकता पर उनका इतना विशद अध्ययन है कि अब उनसे कोफ़्त होने लगी है क्योंकि पूरे भारतीय समाज की हर समस्या को वे साम्प्रदायिकता से कमतर आंकते हैं। यह भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है। यह भी हम जानते हैं कि भारत की  संघीय सरकार ने पिछले छह दशकों में साम्प्रदायिक सौहार्द को बचाने के बजाय इसकी खाई को अधिक चौड़ा ही किया है। संविधान में स्पष्ट लिखा गया है कि किसी भी धार्मिक संगठन को सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त, अन्य किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिकता उभारने की अनुमति नहीं दी जायगी। पर हम देखते रहे हैं कि साम्प्रदायिकता हमेशा ही उभारी गयी है और संविधान को ताक पर रख दिया गया है। यहां राजनीतिज्ञों ने अल्पसंख्यक समुदाय को सदैव वोट बैंक के रूप में देखा है। उनमें सामाजिक बोध और वैज्ञानिक चेतना को विकसित न करके नितांत रूढ़िवादी और संकीर्णता के दायरे में कैद रहने देने में ही अपने स्वार्थ की पूर्ति की है। हिंदुओं में भी अल्पसंख्यकों को अधिक तरजीह देने के प्रतिक्रियास्वरूप वैमनस्य उभरा है। धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर राजनैतिक पार्टियां बनाई गईं हैं। क्या इन क्रिया कलापों से साम्प्रदायिकता को मिटाया जा सकता है?

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