आकाशवाणी से कब गूँजेगी ज्ञानवाणी ? – डाॅ0 गीता गुप्त

4:13 pm or February 7, 2018
10-10-2014	Gyanvani office in Bangalore, www.enarada.com

आकाशवाणी से कब गूँजेगी ज्ञानवाणी ?

— डाॅ0 गीता गुप्त —

आज रेडियो हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। 95 वर्षों से यह भारत के प्रसारण जगत् में प्रतिष्ठित है। मानाकि बत्तीस भाषाओं में प्रसारित बीबीसी वल्र्ड सर्विस विश्व की सबसे बड़ी रेडियो सेवा है। 19 करोड़ लोग हर सप्ताह बीबीसी रेडियो सुनते हैं। पर भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है। आॅल इण्डिया रेडियो की पहुँच विश्व के सौ देशों तक है। यह राष्ट्रीय, स्थानीय और राज्य स्तर पर कार्यक्रमों का नियमित प्रसारण करता है। मीडियम वेब रेडियो, शाॅर्ट वेब रेडियो, एएम रेडियो, एफएम रेडियो, एचएम रेडियो, एचएएम रेडियो और रेडियो के सबसे नये स्वरूप डिज़िटल रेडियो ने भारतीय जनजीवन में ऐसी जगह बना ली है कि इण्टरनेट के युग में भी रेडियो की लोकप्रियता क़ायम है।

अपने आविष्कार के बाद से रेडियो ने अब तक 124 वर्षों तक की यात्रा तय कर ली है। वर्ष 1894 में वैज्ञानिक मारकोनी ने पूर्ण टेलीग्राफी सिस्टम बनाया था, जिसे रेडियो नाम मिला। अमेरिका के पिट्सबर्ग में वर्ष 1920 में रेडियो स्टेशन अस्तित्व में आया, जिसमें उसी वर्ष सम्पन्न हुए राष्ट्रपति पद का चुनाव परिणाम उद्घाटन के रूप में प्रसारित किया गया। फिर वर्ष 1923 में ब्रिटेन में बीबीसी और अमेरिका में सीबीएस तथा एनबीसी जैसे रेडियो स्टेशन शुरू किये गए। भारत में भी रेडियो क्लब आॅॅफ बाॅम्बे और कलकत्ता रेडियो क्लब नामक निजी क्लबों ने प्रसारण की शुरुआत की। मद्रास रेडियो क्लब द्वारा वर्ष 1924 में 40 किलोवाॅट की क्षमता वाला रेडियो स्टेशन आरम्भ किया गया। मगर आर्थिक कठिनाईवश उसका प्रसारण 1926 में बन्द करना पड़ा। भारत में इण्डियन ब्राॅडकास्टिंग काॅरपोरेशन का उद्घाटन ब्रिटिश वाइसराॅय लाॅर्ड इरविन ने 23 जुलाई 1926 को किया और बंगाल के गवर्नर सर स्टेनले जेक्सन द्वारा 26 अगस्त 1926 को कोलकाता स्टेशन का उद्घाटन किया गया। । तब हर व्यक्ति रेडियो नहीं रख सकता था और रेडियो के लिए लाइसेन्स रखने और शुल्क चुकाने की बाध्यता होती थी।

1मार्च 1930 को आर्थिक कारणों से इण्डियन ब्राॅडकास्टिंग काॅरपोरेशन बन्द हो गया और उसे ही बाद में सरकार ने अपने नियंत्रण में लेकर इण्डियन ब्राॅडकास्टिंग सर्विस के नाम से प्रसारण आरम्भ किया। 8 जून 1936 को इसका नाम परिवर्तित कर ‘आॅल इण्डिया रेडियो‘ रखा गया और सन् 1939 से समाचारों का प्रसारण भी किया जाने लगा। सन् 1947 तक केवल छह केन्द्रों और 18 ट्रांसमीटरों का नेटवर्क था, जिसकी पहुँच मात्र 11 प्रतिशत लोगों तक थी। भारत की विशाल आबादी रेडियो की सुविधा से वंचित थी। वर्ष 1957 में आॅल इण्डिया रेडियो का नाम बदलकर ‘आकाशवाणी‘ कर दिया गया, जो अब भी चलन में है। आज समूचे भारत में 420 रेडियो स्टेशन सक्रिय हैं। 23 भाषाओं और 146 बोलियों में कार्यक्रम तैयार और प्रसारित किये जा रहे हैं। सात भारतीय और 16 विदेशी भाषाओं के साथ आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा विश्व के 54 देशों तक अपना परचम फहरा रही है। मनोरंजन के अलावा समाचारों के प्रति लोगों के रुझान को दृष्टिगत रखते हुए आकाशवाणी ने एफएम ट्रांसमीटरों की संख्या अधिक रखी है। डायरेक्ट टू होम सर्विस पर इसके 21 चैनल देश की बहुत बड़ी आबादी तक पहुँच रहे हैं तथा सारे कार्यक्रम अब इण्टरनेट पर कभी भी सुलभ हो सकते हैं।

इक्कीसवीं सदी सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी प्रगति की सदी है। आज संचार माध्यमों की बाढ़-सी आई हुई है तथापि रेडियो का महत्व कम नहीं हुआ है। दो-तीन दशक पूर्व अवश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था कि रेडियो की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है और इस संचार माध्यम को जीवन्त बने रहने के लिए बहुत संघर्ष करना होगा। परन्तु शीघ्र ही ऐसा दौर आया, जब नवाचार से रेडियो ने अपनी लोकप्रियता बढ़ाने में अद्भुत सफलता पा ली। आज इसके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं है। भले ही आज दृश्य-श्रव्य माध्यमों की भरमार है, अगणित दूरदर्शन चैनल, निजी एफएम रेडियो, सामुदायिक रेडियो आदि हैं ; समाचार पत्र, इण्टरनेट और सोशल मीडिया के अलावा करोड़ों की संख्या में मोबाइल फ़ोन हैं। व्यक्ति अपने मनोरंजन, ज्ञान तथा जानकारी के लिए किसी भी माध्यम को चुन सकता है, पर आकाशवाणी ही क्यों? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।
हमारी स्मृतियों में रेडियो मनोरंजन के सबसे सस्ते और सहज सुलभ साधन के तौर पर उभरता है। चार-पाँच दशक पहले का सामाजिक परिदृश्य स्मरण करें तो हर घर में रेडियो होना बड़े शान की बात समझी जाती थी। शादी-ब्याह में दूल्हा प्रायः नेग में रेेडियो की माँग करता था। अपने कंधे पर ट्रांजिस्टर लटकाये घूमने वाले सैलानी बहुत गौरवान्वित अनुभव करते थे। रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला‘ और उद्घोषक अमीन सयानी की आवाज़ के दीवाने समूचे देश में थे। लोग समूहों मंे बैठकर अपने पसंदीदा कार्यक्र्रम सुना करते थे। तक किसी कार्यक्रम के प्रति लोगों में ऐसा जुनून होता था कि तयशुदा समय पर अपने काम ख़त्म कर रेडियो सुनना नहीं भूलते थे। स्थानीय बोली में कृषि जगत् के कार्यक्रम, महिलाओं के लिए घर-आँगन, युवाओं के लिए युववाणी, बच्चों के लिए फुलवारी और बुज़ुर्गों के लिए भजन आदि के स्वर घर-घर में गूँजा करते थे। अवकाश के क्षणों में रेडियो से मनोरंजन बहुत सुखदायक होता था।

वस्तुतः लोकप्रसारक के रूप में आकाशवाणी की जो भूमिका है, वह किसी दूसरे संचार माध्यम की नहीं है। इसके कार्यक्रमों में जितनी विविधता है, उतनी अन्य माध्यमों में नहीं है। शासकीय योजनाओं की जानकारी हो या कृषि जगत् से जुड़ी उपयोगी बातें, घर-गृहस्थी की समस्याएँ हों या बच्चों की फुलवारी, युवाओं की महत्वाकांक्षाएँ हों या बुजुर्गों की देखभाल; इन सबके साथ-साथ अर्थ जगत्, खेल जगत्, साहित्य, स्वास्थ्य और अनगिनत विषयों से सुदूर अंचलांे के लोगों को जोड़ने का काम आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे संचार माध्यम ही कर रहे हैं। निजी चैनलों का दायरा इतना व्यापक नहीं है। वैसे तो शासकीय वेबसाइट, समाचारपत्र-पत्रिकाएँ व पोर्टल के अलावा कई लोकसेवा केन्द्र भी हैं परन्तु सही अर्थों में वे लोकसेवक की भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं। रेडियो की प्रभविष्णुता सामाजिक बदलाव में बहुत सहायक है। वह सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता का भी सशक्त माध्यम है।

प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात‘ के प्रसार के लिए आकाशवाणी को चुना है। यह इस माध्यम की सशक्तता का स्पष्ट प्रमाण है। राजनेता चुनाव-प्रचार के लिए इसका उपयोग करते ही हैं। सभी दलों के प्रत्याशियों को जनता से सीधे संवाद का अवसर नहीं मिल पाता, ऐसे में वे रेडियो के माध्यम से ही उनसे रू-ब-रू होते हैंैं। यह सिलसिला पुराना है। कहते हैं कि सर्वप्रथम अमेरिकी गवर्नर रूज़वेल्ट ने वर्ष 1929 में रेडियो को जनसंवाद का माध्यम बनाया था। फिर राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने भी हर सप्ताह जनता के बीच अपने विचारों के प्रसार हेतु इस माध्यम को अपनाया। आज मोदीजी की देखादेखी मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री भी आकाशवाणी पर जनता से ‘दिल की बात‘ कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्री भी ‘रमन के गोठ‘ का प्रसारण करते हैं।

इस माध्यम की ताक़त का अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ तो भारत के सारे रेडियो लाइसेन्स रद्द कर दिये गए थे। उन दिनों रेडियो रखने के लिए लाइसेन्स की आवश्यकता होती थी। हर कोई रेडियो नहीं रख सकता था। सरकार ने लाइसेन्स रद्द करने के बाद ट्रांसमीटर जमा करवाने के आदेश भी जारी किये थे। उस दौरान बाॅम्बे टेक्निकल इन्स्टीट्यूट बायकुला के प्राचार्य नरीमन प्रिंटर थे। उन्होंने बड़ा दुस्साहसिक क़दम उठाया। रेडियो इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त नरीमन ने लाइसेन्स रद्द होने की ख़बर मिलते ही अपना रेडियो ट्रांसमीटर खोलकर उसके पुर्जे अलग-अलग कर दिये और उन्हें कई स्थानों पर छिपाकर रख दिया। फिर जब कुछ काँग्र्रेसी नेताओं ने उनसे अनुरोध किया तो उन पुर्जों को जोड़कर उन्हांेने माइक की भी व्यवस्था की और मुम्बई के चैपाटी इलाके़ के सी व्यू बिल्डिंग से 27 अगस्त 1942 को नेशनल काँग्रेस रेडियो का प्रसारण आरम्भ हो गया।

प्रथम प्रसारण करते हुए उद््घोषिका उषा मेहता ने कहा-‘‘ 41.78 मीटर पर एक अनजान जगह से यह ‘नेशनल काँग्रेस रेडियो‘ है।‘‘ इसके बाद इस रेडियो स्टेशन से वे समाचार प्रसारित किये गए, जो संेसर के कारण समाचारपत्रों में प्रकाशित नहीं किये जा सकते थे। गाँधीजी द्वारा ‘भारत छोड़ो‘ का सन्देश, मेरठ में तीन सौ सैनिकों के मारे जाने और अँग्रेज़ों द्वारा स्त्रियों के साथ दुराचार आदि की ख़बरें नरीमन के कारण ही उजागर हो सकीं। उन्होंने सामान जोड़कर 10 किलोवाॅट के ट्रांसमीटर को 100 किलोवाॅट की क्षमता वाला बना दिया और अँग्रेज़ पुलिस की दृष्टि से बचने के लिए स्थान बदलते रहे। तीन माह में उन्होंने सात स्थान बदले। पर इस रेडियो प्रसारण का सिलसिला अन्ततः 12 नवम्बर 1942 को नरीमन प्रिंटर और उषा मेहता की गिरफ़्तारी के कारण थम गया। इसके साथ ही नेशनल रेडियो काँग्रेस सिर्फ़ इतिहास बनकर रह गया। यहाँ नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का स्मरण भी बहुत प्रासंगिक है, जिन्होंने नवम्बर 1941 में रेडियो जर्मनी से भारतीयों को सम्बोधित करते हुए कहा था-‘‘ तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हंे आज़ादी दूँगा।‘‘ इसके बाद सन् 1942 मेें ‘आज़ाद हिन्द रेडियो‘ की स्थापना की गई, जो क्रमशः जर्मनी, सिंगापुर, फिर रंगून से भारतीयों के लिए समाचारों का प्रसारण करता रहा।

स्वाधीनता के बाद से भारत में रेडियो पर सरकार का नियंत्रण है। हमारे बुज़ुर्ग बताते हैं कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को रेडियो पर ही देशवासियों को आज़ादी का सन्देश दिया था। अब तो यह परम्परा ही बन चुकी है कि राष्ट्रीय पर्व के दिन तथा उसकी पूर्व सन्ध्या पर भी हमारे राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री सहित कई राजनेता रेडियो से जनता के नाम अपने बधाई व शुभकामना सन्देश प्रसारित करते हैं। नेहरूजी ने सन् 1964 में चीनी आक्रमण के समय तथा इन्दिराजी ने पाकिस्तानी आक्रमण के समय भी रेडियो पर जनता को सम्बोधित किया था। इन्दिराजी ने तो आपात्काल की घोषणा भी रेडियो पर की थी। आज रेडियो की भूमिका बहुआयामी है।

वर्तमान राष्ट्र, समाज व जीवन की चुनौतियों को देखते हुए इस संचार माध्यम को अधिक स्वायत्तता की दरक़ार है। एफएम रेडियो, सामुदायिक रेडियो या निजी चैनलों की बहुलता के बावजूद आकाशवाणी ही सामाजिक जागरूकता के दायित्व का सर्वाधिक निर्वाह करती है परन्तु सरकारी नियम कई बार उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैंै। ज्ञातव्य है कि प्रधानमन्त्री जी के रेडियो-प्रेम को देखते हुए देश के विभिन्न शहरों में 1135 नये एफएम रेडियो स्टेशन खोले जाने की ख़बर वर्ष 2015 में उजागर हुई थी। केन्द्रीय सूचना-प्रसारण मन्त्रालय के अपर सचिव जे0 एस0 माथुर ने मुम्बई में इसकी घोषणा की थी। मगर विडम्बना देखिए कि उनका ध्यान इस तथ्य की ओर नहीं गया कि देश का एकमात्र शैक्षणिक रेडियो चैनल ‘ज्ञानवाणी‘ अक्तूबर 2014 से बन्द कर दिया गया है। प्रसार भारती के एडीशनल डायरेक्टर आर 0 के0 पाण्डेय की ओर से 12 सितम्बर 2014 को जारी किए गए एक परिपत्र से पता चलता है कि बकाये का भुगतान न होने की दशा में ‘ज्ञानवाणी‘ का प्रसारण बन्द करना पड़ा। बकाया भी कितना ? महज़ 27 लाख 49 हजार रुपये। जिसमें अप्रैल 2012 से प्रसार भारती के स्टूडियो का किराया 22 लाख 10 हजार रुपये और नवम्बर 2013 से सितम्बर 2014 तक बिजली का 5 लाख 39 हजार रुपये का भुगतान लम्बित था।

उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवाणी‘ का सम्बन्ध इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू )से है। ‘ज्ञानवाणी‘ केन्द्रों द्वारा शैक्षणिक कार्यक्रम तैयार किये जाते थे, जिन्हें आकाशवाणी से प्र्रसारणार्थ ‘प्रसार भारती‘ को भेजा जाता था और इसके लिए उसे बाक़ायदा राशि का भुगतान भी किया जाता था। यह राशि मानव संसाधन विकास मन्त्रालय मुहैया कराता था। मगर काफ़ी अरसे से मन्त्रालय ने विश्वविद्यालय को राशि नहीं दी थी। अर्थाभाववश ही दूरदर्शन का ‘ज्ञानदर्शन‘ जैसा चैनल भी बन्द कर दिया गया था। स्मरणीय है कि ‘ज्ञानवाणी‘ का प्रसारण वर्ष 2001 मेें मानव संसाधन विकास मन्त्री डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी ने आरम्भ किया था। निस्सन्देह, इग्नू का पाठ्यक्रम, उसका प्रस्तुतीकरण और पाठों की ग्राह्यता देश भर के विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों से श्रेष्ठ है। साथ ही विभिन्न राज्यों में जारी दूरस्थ शिक्षा के लिए उपयोगी व प्रेरणास्पद् है। ऐसे में ‘ज्ञानवाणी‘ देश के उन लाखों विद्यार्थियों के लिए लाभदायक थी, जो पारम्परिक और औपचारिक रूप से संस्थानों में शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। मगर ‘ज्ञानवाणी‘ का प्रसारण बन्द होने से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध हो गया। यह शिक्षा जगत् के लिए अत्यन्त निराशाजनक बात है।

निश्चित रूप से रेडियो की प्रासंगिकता और उपयोगिता असंदिग्ध है। इसे दृष्टिगत रखते हुए ही यूनाइटेड नेशन्स जनरल एसेम्बली ने 14 जनवरी 2013 को औपचारिक तौर पर यूनेस्को के ‘विश्व रेडियो दिवस‘ की घोषणा की थी। यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड ने जून 2011 में ही रेडियो दिवस मनाने के विषय में व्यापक स्तर पर विचार-विनिमय आरम्भ कर दिया था। दुनिया भर में रेडियो से सम्बद्ध 46 अग्रणी संगठनों ने इसकी सिफ़ारिश की थी। अन्ततः 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस के रूप में मनाने की स्वीकृति दे दी गई क्योंकि वर्ष 1946 में इसी तिथि को यूनाइटेड नेशन्स रेडियो की स्थापना की गई थी। और अब समूचे विश्व के ब्राॅडकास्टर्स के मध्य वैश्विक सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से 13 फ़रवरी को विश्व दिवस मनाया जाने लगा है। हमारे प्रधानमन्त्रीजी ने अब तक इस माध्यम का जैसा सदुपयोग किया है, उससे स्पष्ट है कि यह देश की स्थिति, कार्य-संस्कृति और तमाम तरह के बदलावों के साथ-साथ जनता को प्रेरित करने का अच्छा माध्यम है। लेकिन शिक्षा-जगत् के लिए तो यह बहुत उपयोगी है। जबकि सरकारें विद्यार्थियों को मुफ़्त में मोबाइल फ़ोन बाँट रही हैं, विद्यार्थी वर्चुअल कक्षाओं में अध्ययन कर रहे हैं और मोबाइल फोन पर भी उन्हें पाठ्य सामग्री सुलभ करायी जा रही है, दृष्टिबाधितों के लिए भी ज्ञान-प्राप्ति का मार्ग सुगम बनाया जा रहा है; ऐसे में शैक्षणिक रेडियो की क़द्र होनी चाहिए और ‘ज्ञानवाणी ‘ जैसे चैनलों को पर्याप्र्त आिर्थक मदद देकर उन्हें पुनर्जीवन दिया जाना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि इस ‘विश्व रेडियो दिवस‘ पर बात करते समय सरकार का ध्यान इस ओर जाएगा और आकाशवाणी से फिर ‘ज्ञानवाणी ‘ की गूँज सुनाई देगी।

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